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Tuesday 27 Jun 2017

रमाशंकर शुक्ल: हृदय की स्मृति में

मरण का काला विस्तीर्ण हाथ उस मुख पर बिछ गया था, किन्तु उसका आना उसे अज्ञात नहीं था। वह उसके लिए तैयार बैठा था। उसके युयुत्सु हृदय में एक नई आशा कांप उठी थी। वह बराबर अपने से चेतन होता हुआ एक अंधेरे मार्ग में से गुजर रहा था। रास्ता उसे मिल नहीं रहा था, काले-काले नाग, उसे काटने को दौड़ रहे थे। जीवन में श्रद्धावान वह पुरुष उनसे लड़ता जा रहा था, अपनी सारी बंटी हुई चेतना एकत्र कर, उन्नत होकर, विशाल होकर, क्योंकि सांप हिमालय को क्या काटेगा, सिंह हवा को क्या मार डाले।
बस, तभी उसने अपनी सम्पूर्णता पाली थी, अनुभव कर ली थी। उस तिमिर-गर्भ में से चलता हुआ वह प्राण अपने ही लिए ईश्वर हो उठा था, अति-मानव हो गया था, जीवन के हर एक क्षण में अपनी अमिट छाप छोडक़र शक्ति इकट्ठा करता हुआ वह आगे बढ़ गया है। जीवन का धर्म पालन करते हुए उसने अपने प्राण-शरीर के एक टुकड़े से अपने मित्रों का सृजन किया, दूसरे से अपने शिष्यों का, तीसरे से अपनी स्त्री का, पिता का, चौथे से अपने बच्चों का, पांचवें से अपने आलोचकों का, छठे से स्वयं अपना-अपनी आग का जो उन सबमें बंटकर फिर एकत्र हो गई। भडक़ उठी और आगे बढ़ गई।
इस संकुचित तिमिर-गर्भ से होता हुआ वह महान तेजस्वी प्राण चल पड़ा है निर्भीक, एक यात्रामय, उत्सुकता लेकर। एक नवीन आशा-सी कांप उठी है उसके हृदय में, एक सुंदर दीपक के लघु प्रकाश को अपने सहस्र-सहस्र किरणों से हतप्रभ करता हुआ अपने नवीन देश में नवीन रूप लिए चलता जा रहा है वह गतिमान आत्मा।
बचपन से जीवन उसका बढ़ता जा रहा था अपने रंगीन रूपों को दूसरे नवीन रंगीन रूपों में खोते हुए, इस तरह विकसित होता हुआ, शक्तिमान होता हुआ, तेजस्वी होता हुआ। वह बढ़ रहा था। उसके पथ में एक तिमिर-आवर्त की झुंझलाहट पड़ी हुई थी। परंतु वहां तो वह अपना ईश्वर हो उठा था, वह आत्मसूर्य मृत्यु की अंधकारमय नग्नता को शरमाता हुआ आगे चल पड़ा। अरे! वह तो आगे चल पड़ा, बढ़ गया, बदल गया, कुछ न कुछ हो गया।
तुम कहते हो वह अपना था। तुम रोओ मत, क्योंकि वह तुम्हारी पहचान भूल गया है, वह निराला हो गया है। कौन कहता है उसे कोई वस्तु मरण नाम की या कोई राक्षस काल नाम का आ गया और खा गया। कौन कहता है ऐसा? ऐसी बाहरी चीज उसे क्या कर सकती हैं वह तो स्वयं ही आगे बढ़ता हुआ, वृहद होता हुआ, अपना ईश्वर होता हुआ क्योंकि उसे चेतना शरीर का एक सूक्ष्माणु भी तुम्हारे तन में समाए प्राण से अधिक सघन और तेजस्वी है, वह चला गया है। तुम मत रोओ, उसकी स्त्री, पिता, माता, बहनों, बच्चों, मित्रों, शिष्यों, आलोचकों, मत रोओ, क्योंकि वह तुम्हारी पहचान भूल गया है, वह तुम्हें नहीं पहिचानता वह तुमसे परे है। तुमसे अलग है। वह अपने नवीन-चेतना-रूप में अपने नवीन धर्म का पालन करता हुआ आगे बढ़ रहा है, चला जा रहा है, और तुम पीछे रह रहे हो। उसको जीवन में इतनी श्रद्धा थी कि वह तन का उत्सर्ग करते हुए बेरोक हो उठा अबोध हो गया। जीवन की रश्मिमय धारा का स्रोत उसने इस तरह पकड़ा था कि कौन उसके वेगमय व्यक्तित्व को पकड़ सकता है? किसका सामथ्र्य है कि उसे ललकारे, ठहरने को कहे।
लोगों ने उसको नहीं पहचाना था परंतु ‘लोग’ यह शब्द ही क्या है? इसके क्या मानी होते हैं। हम क्यों उसको उपयोग में लाएं : लेकिन फिर भी लाते हैं। और इसी में उसका रहस्य है। परंतु जो उनके समक्ष आया, उनके साथ बैठा, बातचीत की, वह उनकी आंतरिकता की प्रकाश-भव्यता से अप्रभावित न रह सका। आत्म-विश्वस्त और विनयपूर्ण, गंभीर पर नित्य स्मित-मुख और विनोदी, जीवन के मूल आदर्श तत्व के प्रति श्रद्धानत फिर भी अत्यंत सूक्ष्म आलोचनाशील, नित्य जागरुक फिर भी शांतिमय, सामाजिक ईमानदारी से भरा हुआ ऐसा उनका सादा साधनाशील व्यक्तित्व अपनी बातचीत में कितना प्रकाशमान, जाज्वल्य और संतुलित था। उनका गृहस्थ जीवन स्नेह की दृष्टि से कितना अधिक सुखी था, परंतु फिर भी कितना अलग चिंतनशील, अपने मूल में जीवनधारा से कितना सुसंगत। उनमें कुण्ठा कहां थी? जीवन में डूबकर उसमें वे कितने सुसंगठित हो उठे थे। लेकिन विचारों के कृत्रिम, आवश्यक अस्वाभाविक जगत में उलझे कब थे? भटके कब थे। वे कुछ ऐरिस्टोक्रेटिक टेस्ट लिए हुए, परंतु अत्यंत उदार और अर्थसम्पन्न प्रोफेसर, हिन्दी के प्राध्यापक, अपनी प्रतिभा से साहित्यसर्जना करते हुए विज्ञापन से दूर भागते थे।
परंतु सबसे अधिक, सबसे पहले और सबसे आगे यदि वे कुछ भी थे तो एक मानवतामय मानव। अपनी मानवता की ज्योति की प्रति,्ठा उन्होंने कई हृदयों में की। उनका एक क्षेत्र यह भी था। जीवन से पूर्ण सुसंगठित और अबाध होकर जो प्रकाश हमारे हृदय में उत्पन्न होता है उसकी सुमधुर व्योमोन्मुख उन्नत ज्वाला की विश्वासमयी मृदुल मुस्कान यदि मुझे कहीं देखने को मिली तो उस नाटे, विनोदी, किन्तु भव्य व्यक्तित्ववाले, अपने घर के, बाग के वृक्षों को पानी देते हुए प्रोफेसर के गंभीर मुख पर।
बीमारी में और विशेषकर मरणकाल में लोग कितने दयनीय मालूम होते हैं। परंतु उसमें वह पुरुष कितना भव्य, अपनी शारीरिक वेदना से लड़ता हुआ कितना वीर और उज्ज्वल मालूम होता था। अपनी बीमारी में वह कितना स्थितप्रज्ञ हो उठा था।
उनकी बीमारी के दो दौर थे। पहला बहुत घातक परंतु उससे वे बच गए थे। डॉक्टर निराश, पत्नी निराश, परंतु मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ आदमी कह रहा कि न जाने क्यों उसके हृदय में जीवन का निर्झर, निर्मल, मधुर, स्पॉण्टिेनियस अनायास बहता चला आ रहा है, उत्तप्त कूलों को धोता हुआ, उन्हें शीतल करता हुआ।
वे अच्छे हुए। घर के लोगों के साथ बड़े सुख से उन्होंने गृह-दर्शन किया। मित्रों से मिले, शिष्यों से मिले, मुझसे मिले। मेरे लिए वह क्षण अत्यंत गहरा था। वे मरण से लौटकर जीवन में आए थे और मेरी आंखों में सुख के आंसू थे। उनकी बड़ी लडक़ी पाटू आवेश के साथ टेम्परेचर चार्ट फाड़ रही थी। वे उस दिन बड़े सुखी थे।
उनको फिर बुखार आ गया था। पहला स्वास्थ्य एक दिखावट थी, एक धोखा था उनको और सबको और फिर एक लम्बी बीमारी और मृत्यु।
परंतु उनकी मृत्यु जीवन की इतनी सम्पूर्ण परिवर्तित रूपान्तरित चेतना की अकस्मात आवेशमय ज्वाला इतनी विचित्र, वृहद और अमानवीय थी कि वह पूजनीय है वन्द्य है। क्योंकि उनके मृत्यु मार्ग से उस विचित्र महान चेतना का महान प्रकाश कुछ ऐसा आश्चर्य, विश्वस्त और भव्य था कि मालूम होता है उनके तन में बहने वाले, गतिमान जीवन ने केवल अपना पथ परिवर्तित कर दिया है, दिशान्तर कर दिया है, रूपान्तर कर लिया है। वह सतत है, चिरंतन है। यह विश्वास-इस श्रद्धा का सागर हमारे हृदय में भरता हुआ वह आज न होकर भी है और अपना पथ अपनी कक्षा पर उसी तरह तय करता जा रहा है जिस तरह इलेक्ट्रोन, प्रोट्रोन के आसपास विद्युत बरसाता हुआ घूमता है।