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Monday 18 Dec 2017

एक-दूसरे की छाती में उलझ गई हैं, दुनिया यह सारी सुलझ गई है...

बीसवीं सदी सभ्यता के इतिहास का ऐसा कालखंड है जिसकी तुलना किसी और समय से नहीं की जा सकती। उन सौ सालों में विश्व में जो युगांतरकारी परिवर्तन हुए, जो उलटफेर हुए, जिस तेजी के साथ बदलाव आए, वैसे पहले कभी नहीं देखे गए। आज इक्कीसवीं सदी में जब यातायात, संचार और सूचना के क्षेत्र में नए-नए आविष्कारों की बदौलत विश्वग्राम की अवधारणा पर बार-बार चर्चाएं हो रही हैं तब यह ध्यान देना दिलचस्प होगा कि बीसवीं सदी में प्रौद्योगिकी के ये उपकरण हासिल न होने के बावजूद जापान से लेकर अमेरिका तक विश्व के तमाम समाजों में एकता, समता और बंधुत्व के सूत्र तलाशे जा रहे थे, परिभाषित किए जा रहे थे और एक नए समाज की रचना का स्वप्न करोड़ों लोगों की आँखों में बसने लगा था। बीसवीं सदी वह समय था जिसकी शुरूआत में कुछ ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने हमारे दैनंदिन जीवन को सुलभ कराने में सहायता की। उस सदी में ही मनुष्य ने अंतरिक्ष तक पंख फैलाकर उडऩे के सफल प्रयोग किए। बीसवीं सदी ने दो विश्व युद्ध भी देखे जिन्होंने समूची मानवता को आक्रांत कर दिया। इस दौर में नृशंस फासीवादी सत्ताओं का उत्थान व पतन भी हुआ। रूस में महान अक्टूबर क्रांति हुई, जिसका शताब्दी वर्ष चल रहा है। संयोग है कि जिन कार्ल माक्र्स के विचार और दर्शन सेे प्रभावित होकर बोल्शेविक क्रांति हुई, उनकी यह दूसरी जन्मशती का वर्ष भी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम और एक सौ नब्बे साल की गुलामी से आजाद होने की अनूठी कथा भी इस सदी के पूर्वाद्र्ध में लिखी गई। उपनिवेशवाद के जुएं तले दबे एशिया, अफ्रीका व लेटिन अमेरिका के देशों को भारत के स्वाधीनता संग्राम से बड़ी प्रेरणा व ताकत मिली। 1950 के बाद देखते ही देखते अनेक देशों में स्वाधीनता का सूर्योदय हुआ। यही समय था जब रंगभेद के विरुद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका में और उधर दक्षिण अफ्रीका सहित अन्य देशों में जनसंघर्ष हुए। मार्टिन लूथर किंग जूनियर व नेल्सन मंडेला जैसी विश्व विभूतियों ने गांधी को अपना गुरु माना। इजिप्त के नासिर, इंडोनेशिया के सुकार्णों, घाना के एनक्रूमा आदि स्वाधीनचेता जननायकों के लिए जवाहरलाल नेहरू आदर्श बने। बीसवीं सदी का इतिहास संक्षेप में लिखने बैठें तो भी सैकड़ों पन्नों की जरूरत होगी। राजनीति, भूगोल, रसायन, भौतिकी, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान- कोई भी क्षेत्र बाकी नहीं है, जिसमें इस अवधि में नए-नए अध्याय न लिखे गए हों। कहना होगा कि बीसवीं सदी ने हमारे समूचे जीवन को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि कई तरह से बदल भी दिया। ये जो बदलाव आए इनके ब्यौरे इतिहास की पुस्तकों में उपलब्ध हैं। ज्ञान-विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं में भी इनका विषय-केन्द्रित दस्तावेजीकरण हुआ है। साहित्यकार भी इन युगांतरकारी परिवर्तनों से दूर और तटस्थ कैसे रह पाता? विश्व की तमाम भाषाओं के साहित्य में इस बदले हुए समय की तस्वीरें देखने मिलती हैं। हिन्दी साहित्य में इस दृष्टि से विचार करें तो हम पाते हैं कि बीसवीं सदी के विश्व समाज में जो नई पदचापें, ध्वनियां और धडक़नें सुनाई पड़ रही थी उन्हें अगर किसी लेखक ने पकड़ा था तो वह गजानन माधव मुक्तिबोध ही थे। जिस तरह कोई सयाना धरती से कान लगाकर दूर से आती घोड़ों की थाप सुनकर गांव को सतर्क कर देता था, कुछ वैसी ही बात मुक्तिबोध जी में है। वे बदलते समय की आहटों को बहुत ध्यान के साथ सुन और समझ रहे थे। इसका प्रमाण उनके लेखों और निबंधों में मिलता है। क्लॉड ईथरली जैसी कहानी में और तमाम कविताओं में यहां से वहां तक उनकी विश्व दृष्टि को देखा जा सकता है। मैं समझता हूं कि उनके समकालीनों में ही नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के हिन्दी लेखकों में एक अज्ञेय ही थे जिनके लेखों में और दिनमान के संपादन में इस दृष्टि का आभास होता है। मैं यह भी सोचता हूं कि अपने से पहले के तमाम बड़े साहित्यकारों के बीच मुक्तिबोध ने जयशंकर प्रसाद की कामायनी को ही सर्वांग समीक्षा के लिए क्यों चुना! क्या शायद इसलिए कि कामायनी का जो महाकाव्यात्मक फलक है वही मुक्तिबोध की लंबी कविताओं में है? या इसलिए कि कामायनी में भी एक वैश्विक परिवर्तन, एक नई दुनिया निर्मित करने का मिथक बुना गया उससे मुक्तिबोध प्रभावित हुए? मुक्तिबोध की रचनाओं पर विगत पचास वर्षों में बहुत चर्चाएं हुई। उनकी अनेक रचनाएं हमारे लिए तब प्रासंगिक हो उठती हैं जब रंगमंच से उनका पाठ करते हुए हमारे कलाकार वर्तमान के विद्रूप को जनता के सामने लाने का यत्न करते है। ऐसे भी कुछ अध्यापक व समीक्षक हैं जो मुक्तिबोध की कविताओं को मध्यमवर्गीय चेतना का कुंठित स्वर मानकर खारिज कर देते हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। अधिकतर लेखक तो यही मानते हैं कि मुक्तिबोध की रचनाओं में प्रखर प्रगतिशीलता है; कि ये रचनाएं अपने समय से मुठभेड़ करती हैं और आगे का रास्ता बताती हैं। मुक्तिबोध ने साहित्यालोचना के जो नए प्रतिमान रचे हैं वे आज सर्वमान्य हैं। कला के तीन क्षण का हवाला आज हर कोई देता है। ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की बात भी बार-बार की जाती है। उन्होंने कबीर से लेकर सुभद्राकुमारी चौहान तक पर जो लिखा है वह एक नए आलोक में इनकी रचनाओं को समझने में सहायक होता है। ‘अंधेरे में’ कविता को तो मुक्तिबोध की महाकाव्यात्मक प्रतिभा का उत्स स्वीकार कर लिया गया है। मैं फिलहाल इनसे हटकर मुक्तिबोध की वैश्विक चेतना को केन्द्र में रख उनकी चर्चा करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि मुक्तिबोध की रचनाओं की यह विशिष्टता हिन्दी ही नहीं, समूचे भारतीय साहित्य में लगभग दुर्लभ है। एक विराट फलक पर अपने समय की त्रासद सच्चाइयों और विसंगतियों की गहरी और तार्किक पड़ताल मुक्तिबोध जी ने की है वह सामान्यत: अन्य रचनाकारों में देखने नहीं मिलती। यूं तो हर साहित्यकार एक मायने में विद्रोही होता है। वह व्यवस्था के मनुष्य विरोधी चरित्र का चित्रण करता ही है, लेकिन यह देखना जरूरी है कि विरोध का स्वर तात्कालिक है अथवा स्थायी प्रभाव डालने में सक्षम है। क्या विरोध भावनामूलक, इसलिए सतही है अथवा उसमें गहराई में जाकर कारणों की पड़ताल की गई है। मुझे यहां मुक्तिबोध जी की दो रचनाएं, जिनसे मैं खासा प्रभावित हूं, विशेषकर उल्लेखनीय प्रतीत होती हैं। एक तो उनकी कहानी क्लॉड ईथरली है जिसका उल्लेख शुरू में हो गया है। यह कहानी अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम गिराए जाने की विभीषिका को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। यह एक ओर साम्राज्यवादी, पूंजीवादी अमेरिका के सत्ताधारी वर्ग के दोहरे चरित्र को उद्घाटित करती है, वहीं दूसरी ओर भारत का अभिजात समाज कैसे इस घनघोर मानवीय त्रासदी से निर्लिप्त रहकर अमेरिका के इन्द्रजालिक स्वर्ग में अपने लिए शरण ढूंढता है, इसका भी बेबाक चित्रण है। कहानी का मुख्य पात्र विमान चालक क्लॉड ईथरली है जो अणुबम गिराने वाले दस्ते में शामिल था, जो अपने आकाओं के आदेश पर किए गए नरसंहार को देख लेने के बाद अपराध बोध से भर जाता है। वह अपने आपको मनुष्य समाज से बहिष्कृत कर लेना चाहता है, लेकिन अमेरिका की आम जनता, जिसे यह सब नहीं पता, उसकी निगाहों में वह एक नायक है। एक नेशनल हीरो, जिसने देशभक्ति का अनुपम उदाहरण पेश किया है। यह कहानी युद्ध की नि:सारता को उजागर करती है, युद्ध और हिंसा से कौन-सा वर्ग लाभान्वित होता है यह बतलाती है और एक वीभत्स सच्चाई सामने लाकर मन को ग्लानि से भर देती है। आज जब एटमी हथियारों की दौड़ कम नहीं हो रही बल्कि नरसंहार के नए-नए तरीके और नए-नए उपकरण विकसित हो रहे हैं तब मुक्तिबोध की कहानी एक चेतावनी की तरह हमारे सामने आती है। हमारे अभिजात वर्ग के जीवन का खोखलापन, आडंबर और लालच तब से अब तक कितना बढ़ गया है- 1953 में लिखी कहानी 2017 में भी विचार करने का अवसर जुटाती है। मुक्तिबोध की कुछ कविताएं हैं जो सहचर मित्रों को संबोधित हैं। उनके ज्येष्ठ सुपुत्र रमेश मुक्तिबोध ने 2001 में एक अड़तालीस पेज की पुस्तिका के रूप में इन्हें प्रकाशित किया है। इनमें दो कविताएं काफी लंबी हैं, तीन-चार कविताएं छोटी हैं। सबके शीर्षक अलग-अलग हैं, किन्तु मुझे लगता है मानो ये सब मिलकर एक लंबी कविता ही बनाती हैं। ये कविताएं किसी एक मित्र को संबोधित हैं अथवा अलग-अलग मित्रों को, इसका कोई संकेत संकलनकर्ता ने नहीं दिया है। वैसे इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इस पुस्तिका में ही मुक्तिबोध के आत्मवक्तव्य का एक संक्षिप्त अंश प्रकाशित किया गया है जो इस प्रकार है- मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूं जिसे अपने गली-कूचे में रहनेवालों का स्नेह प्राप्त हुआ। वे मेरी ही भांति छोटी-छोटी हस्तियां हैं। किन्तु उनके पेचीदा संघर्ष, अथाह प्रेम करने का उनका हार्दिक सामथ्र्य, और बौद्धिक जिज्ञासा के साथ ही साथ, उनकी साहसिक पहल, उनकी रोमैण्टिक कल्पना, उनकी राजनैतिक आशा-आकांक्षाएं, उनके समाजनैतिक स्वप्न मेरे चारों ओर चक्कर लगाने लगे। (आत्म-वक्तव्य : दो / मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-5 पृष्ठ 267) इस वक्तव्य से हमारा यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि कवि ने भारत के, बल्कि विश्व के सामान्यजन को ये कविताएं संबोधित की हैं जिनसे कि वे बहुत प्रेम करते थे और जिनसे उन्हें बहुत आशाएं हैं। मुक्तिबोध की कविताओं में भारत की अंधकार भरी गलियों का जिक्र बार-बार आता है, लेकिन वे आश्वस्त हैं। उनके मन में अपार आस्था है कि जनता अपने संघर्षों में विजयी होगी, उसे मुक्ति मिलेगी और अंधकार दूर होगा। वे जानते हैं कि आमजन को बेहद कठोर स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे कभी जिंदगी के फूटे घुटनों की बात करते हैं, कभी छाती पर पड़े घावों का जिक्र करते हैं। थूहर के जंगल इन कविताओं में बार-बार आते हैं। दैनिक जिंदगी जलते हुए पथरीले सूखे हुए घाटों पर बीतती है। कुटियों में रहने वाले अपनी ही हड्डियां जलाकर ठिठुरते प्राणों को सर्दी की रातों में गरमाते हैं। आमजन को ऐसी इस दारुण परिस्थितियों को जीते हुए विक्षोभ होता है, क्रोध आता है लेकिन वह फूटे घुटनों से बहती रक्तधार से अविचलित कांटों से शरीर के छिल जाने की फिक्र न करते हुए आगे बढ़ता जाता है। इस रास्ते पर कौन उसके साथी बनते हैं? कवि मुक्तिबोध लेखक का धर्म निभाते हैं, वे संघर्षशील जनता के साथ हैं। वे मानते हैं कि वे कलम के मजदूर हैं और निम्नलिखित पंक्तियों में जनता के साथ अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं-

इस रास्ते पर हम लेखक मज़दूरी करते

हम मजबूरी खूब समझनेवाले दिल हैं

लोक विरोधी पाप शक्तियों से मुठभेड़ें

मुंहज़ोरी, शहज़ोरी, सीना ज़ोरी करते।

कवि मेहनतकश जनता के साथ, सर्वहारा के साथ सिर्फ शाब्दिक सहानुभूति व्यक्त नहीं करता, वह उनके संघर्षों में किस तरह साथ देता है इस कवितांश में देखा जा सकता है- 

देखते हो यह भी कि
ज़िन्दगी के कंधे पर झुकी हुई वजनदार
जन-अनुभवों की छलछलाती भरी हुई
कावड़ का मीठा पानी
देता है प्राणदान
दहकते ग्रीष्म में सचाई के बरगद के तले, अरे
पिलाता है मानव-अमृत, जीवन-अमृत
जनता का प्याऊ अरे, दिलभरे
पीती है हृदय की कली
पीते हैं मजूर कूली
पीते हैं $गरीब लोग
$कलम के हमाल और
मटियाले चेहरों के मेहनत के कमाल लोग
पीते हैं मानव-अमृत दोनों हाथों भर-भर
मेरे मित्र, सहचर
सूखा हुआ तरु ज्यों कि
ताज़ा मेघ-जल पिये, पहाड़ों पर हरियाय
प्राणों में यौवन की नई-नई धडक़नें
आंखों में नीली भोर धीरे-धीरे तिर आय।

मुक्तिबोध के मित्रों में किसान, मजदूर, सिपाही- ये सब हैं। उनके किसान के मन में वह श्रद्धा या विश्वास है जो मिट्टी से सने लोहे के फाल सी धारदार है जिससे वह जिंदगी के खेतों में मुक्ति के लेखों की रेखाएं खींचता है। उनका सिपाही मित्र कहीं दूर युद्धभूमि में वतन की याद लिए गीत गाता है, जिसे माता-पिता का प्यार, मजदूर का पसीना और सिपाही का लोहू ये सब मिलकर एक धार बना देते हैं, जिससे ज्ञान, क्रांति और मुक्ति के गीतों की रचना होती है। मुक्तिबोध अपने मजदूर मित्र के पैरों में गुंथी हुई नसों की गठानों में देखकर विचारों की अनुभवी गठानों से गुंथे हुए व्यक्तित्व को साकार करते हैं जो जिंदगी के जलते हुए मैदान पर चलते हुए नवयुग का आसमान छूता है। कवि अपने सर्वहारा मित्र के सामने स्वयं को छोटा पाता है। वह बिंब रचता है कि मित्र के कंधों पर खड़ा होकर नभ को छूकर स्याह चंद्रमा का फ्यूज बल्ब निकाल पावन प्रकाश का वह प्राण बल्ब वहां लगा दे जो मित्र ने जिंदगी की वैज्ञानिक प्रयोगशाला में श्रमपूर्वक तैयार किया है। सहचर मित्र को समर्पित ये कविताएं भारत के सर्वहारा को विश्व के सर्वहारा से जोड़ती है। अमेरिका की खदान में काम कर रहा अश्वेत मजदूर बेतवा के बांसवनों पर उतरी शाम को अपना स्नेह गीत देता है तो क्षिप्रा का कोई तटवासी छाया बनकर नील नदी के तट पर पहुंच जाता है। दोनों मिलकर परिवर्तन का आगाज़ करते हैं जिसे देखकर अरब के रेगिस्तान का चांद मुस्कुराने लगता हैा। एक अन्य बिंब में एक तरफ चीन से यांग्तज़ी नदी बहती आती है इधर भारत से गंगा दौड़े जाती है। कितनी मधुर है यह कल्पना-

एक-दूसरे की छाती में उलझ गई हैं

दुनिया यह सारी सुलझ गई है।

विश्व के जनता के बीच मैत्री हो और नदियाँ मित्रता का प्रतीक बनकर आए, यह अनोखा सुंदर बिंब है। इन कविताओं में मुक्तिबोध बार-बार एक नई व्यवस्था, जाहिर है जो कि समाजवाद है, लागू होने में आस्था व्यक्त करते हैं और उसे एक कौंधते हुए विश्वस्वप्न की संज्ञा देते हैं। इस विश्वस्वप्न के बरक्स विश्व क्रोध भी है। वह जब कौंधता है तब धरती से गगन तक किरणों के इस्पाती तार झनझना उठते हैं। मुक्तिबोध ऐसे प्रबल-प्रखर बिंबों और प्रतीकों को लेकर हर उस जगह से गुजरते हैं जहां मनुष्य मुक्ति का संघर्ष चल रहा है। वे विश्व जनता के गहन सहानुभव से साक्षात करते हैं और कोसों दूर समंदरों के पार बसे मित्रों को पहचान लेते हैं,लेकिन हां, जिन लेखकों, कलाकारों, संस्कृति कर्मियों ने अपनी आत्मा को बेच दिया है उन्हें वे जनशत्रु कहकर उनकी लानत-मलामत करते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं रखते। उन्हें जिनसे उम्मीद है, उनके लिए ये पंक्तियां हैं- देश-देश की, गांव-गांव की, शहर-शहर की

म्लान बस्तियों में घूमा अनुभवी रास्ता

इस पर चल बेचैन लोग ये दुनिया भर के

देश-देश की चौहद्दी के पार, मिलाने हाथ,

बनाते नये प्यार का गहरा रिश्ता

नया वास्ता।