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Friday 24 Nov 2017

इनके पास मां है, उनके पास बाप

सर्वमित्रा सुरजन
डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी वादों में एक था आईएस के आतंक का खात्मा करना और शायद इसलिए अफगानिस्तान में आईएस के कथित ठिकाने पर लगभग दस हजार किलो वजनी बम उसने गिराया। अफगान-पाक सीमा पर गिरे इस बम के निशाने पर आईएस आतंकियों के गुप्त अड्डे थे। बताया जा रहा है कि तीन दर्जन से अधिक आईएस आतंकी मारे गए हैं। यह एक गैर परमाणुबम था, लेकिन इस हमले से  हिरोशिमा-नागासाकी पर अमरीका द्वारा किए गए अणु बम हमले की याद ताजा हो गई। यह और बात है कि जापान के इन दो शहरों में आतंकियों का ठिकाना नहींथा और मरने वाले मासूम लोग थे। हिरोशिमा-नागासाकी की पुरानी और नई पीढ़ी आज भी अणु बम की त्रासदी भुगत रही है। अमरीका ने तब भी दुनिया को यही बतलाने की कोशिश की थी कि उसने विश्वशांति के लिए ऐसा किया है और आज भी वह यही बता रहा है। इस बीच इराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान ऐसे कितने ही देशों में उसने सैन्य दखलंदाजी विश्वशांति के नाम पर नहींकी। पाकिस्तान में घुस कर तब के बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मार कर समुद्र में दफन कर दिया। अभी उस बारे में बताया गया कि गोली लगने के कारण लादेन का सिर फट गया था, फिर उसके टुकड़े जोडक़र उसकी पहचान की गई। ये सारी बातें दुनिया के सामने इसलिए लाई जाती हैं ताकि सब अमरीका की आतंकवाद विरोधी नीति और उससे भी बढक़र विश्वशांति की उसकी प्रतिबद्धता पर भरोसा करें। फिलहाल जो हालात हैं उसमें अमरीका अपनी इस चाल में कामयाब नजर आ रहा है। अफगानिस्तान पर अभी उसके बम गिराने की घटना की प्रशंसा ही अधिक हो रही है कि इससे आतंकवादियों को कड़ी चेतावनी मिल गई है। पर अमरीका से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या इसके लिए उसने संयुक्त राष्ट्र संघ को किसी तरह की सूचना दी थी। अनुमति या परामर्श की बात तो की नहींजा सकती, क्योंकि यह उसकी शान में गुस्ताखी होगी। अमरीका को यह ध्यान  होगा कि संरा की स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इस उद्देश्य से की गई थी कि दुनिया के तमाम देशों के बीच शांति, समन्वय बना कर रखा जाए और टकराव की स्थितियां टाली जा सकें। अभी दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें संरा अपने इस उद्देश्य में विफल ही नजर आ रहा है, क्योंकि टकराव की नित नई स्थितियां निर्मित हो रही हैं। अमरीका पहले सीरिया, फिर अफगानिस्तान पर हमला करता है, उधर कोरिया प्रायद्वीप के निकट अमरीकी नौसेना के मारक बल को तैनात करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उत्तर कोरिया को चेतावनी देते हैं कि इस खतरे को देख लिया जाएगा। उ.कोरिया अमेरिका की चेतावनी का जवाब देते हुए कहता है कि अगर अमरीका ने हमला किया तो परमाणु बम गिरा देंगे। बता दें कि उत्तर कोरिया ने देश के संस्थापक किम इल सुंग की 105 वीं जयंती पर आयोजित भव्य समारोह में अंतर महाद्वीपीय मिसाइल (आइसीबीएम) का प्रदर्शन किया था। वहां की सेना का दावा है कि यह मिसाइल करीब चार हजार किलोमीटर की दूरी पर स्थित अमेरिका तक पहुंच सकती है। राजधानी प्योंगयांग में आयोजित परेड में हजारों सैनिकों ने भारी साजो-सामान के साथ शिरकत की और तानाशाह किम जोंग उन को सलामी दी। इसी समारोह में अमरीका की तरफ से हमला होने पर परमाणु हथियार से जवाब देने की धमकी दी गई। अब दक्षिण कोरिया ने दावा किया है कि उत्तर कोरिया ने एक बार फिर से बैलेस्टिक मिसाइल परीक्षण किया है। हालांकि यह परीक्षण असफल रहा। बताया गया है कि 15 अप्रैल को सिंपो के करीब रात 9.21 बजे जो मिसाइल छोड़ी गई थी उसमें लॉन्च होते ही विस्फोट हो गया था। इधर उ.कोरिया की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर बढ़ रहे तनाव को कम करने के लिए चीन ने रूस से मदद मांगी है। गौरतलब है कि चीन उत्तर कोरिया का प्रमुख और इकलौता सहयोगी तथा उसकी आर्थिक जीवन रेखा भी है। चीन उत्तर कोरिया के खिलाफ किसी भी कार्रवाई का विरोध करता रहा है, क्योंकि उसे लगाता है कि वहां शासन के ध्वस्त होने से सीमा के जरिए शरणार्थियों की बाढ़ आ जाएगी और अमरीकी सेना उसकी चौखट पर पहुंच जाएगी। उ.कोरिया को देख लेने वाली अमरीकी चेतावनी के जवाब में चीन ने चेतावनी देते हुए कहा था कि उ. कोरिया मामले पर युद्ध कभी भी छिड़ सकता है। अगर रूस चीन के साथ उ.कोरिया मामले में साथ आता है, तो सीरिया के बाद यहां भी अमरीका-रूस आमने-सामने होंगे। अमरीका ने अफगानिस्तान में जो बम गिराया उसे मैसिव ऑर्डनेंस एयर ब्लास्ट (एमओएबी) कहते हैं, जो मदर ऑफ ऑल बम के नाम से जाना जाता है। इधर रूस के पास एविएशन थर्मोबैरिक बम मौजूद हैं, जो फादर ऑफ ऑल बम (एफओएबी) के रूप में चर्चित है। एक के पास मां है, दूसरे के पास बाप और इन माई-बाप के शक्तिप्रदर्शन के चलते दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के खतरे को महसूस कर रही है। क्या विश्वशांति कायम करने के लिए युद्ध की विभीषिका अपरिहार्य है? दुनिया गंभीरता से इस पर सोचे।