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Monday 20 Nov 2017

बस इतना सा ख्वाब है


पल्लव
393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स , ब्लाक सी एंड डी,
शालीमार बाग़
दिल्ली-110088

क्या यह मनोवैज्ञानिक कहानी है? क्या इसमें खत लिख रही अन्नपूर्णा मंडल मनोरोगी है? क्या किसी स्त्री को मिट्टी में सरकते केंचुओं और अपनी बेटियों में एकरूपता लग सकती है? क्या वह स्त्री इसी वहम को न सह पाने के कारण आत्महत्या कर सकती है? सुधा अरोड़ा की प्रसिद्ध कहानी अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चि_ी पढ़ते हुए ये कुछ सवाल सामने आ खड़े होते हैं। हिंदी में स्त्री विमर्श के आगमन ने रचना परिदृश्य को खासा प्रभावित किया था। स्त्री विमर्श को जिन कुछ रचनाकारों ने अपने लेखन का उपकरण बनाया उनसे थोड़ा अलहदा लेखन सुधा अरोड़ा का है क्योंकि वे स्त्री विमर्श की परिघटना से पर्याप्त पहले समान्तर कहानी आंदोलन के मार्फत अपनी पहचान बना चुकी थीं। उनके एकाधिक कहानी संग्रह भी आ चुके थे। 2004 के आसपास काला शुक्रवार शीर्षक से उनका कहानी संग्रह आया जिसमें मुख्यत: मुंबई बम विस्फोट के बाद लिखी उनकी कहानियां थीं। इन कहानियों में ही अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चि_ी भी थी। पहली बार यह कहानी प्रभाकर श्रोत्रिय के सम्पादन में निकलने वाले वागर्थ में छपी थी और इस पर विख्यात लेखक मुद्राराक्षस ने एक निबंध भी लिखा था। इसके बाद यह कहानी अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवादित हुई और दूर दूर तक पहुँची।
कहानी में इतनी सी बात है कि बंगाल के आदिवासी बहुल जिले बाँकुड़ा की एक लडक़ी अन्नपूर्णा मंडल की कहानी है जो शादी के बाद पति के घर मुम्बई आ गई है। उसे दो जुड़वाँ बेटियां होती हैं जो उसके मानसिक तनाव का कारण बन जाती हैं क्योंकि अन्नपूर्णा को लगता है कि उसके पति और सास इन्हें मार डालेंगे। इस तनाव से जूझते हुए वह आत्महत्या कर लेती है। तो क्या अपनी बेटियों की हत्या की आशंका से वह त्रास से भर गई है? या उसके परिवेश में मौजूद हिंसा उसे घनघोर विचलित कर रही है?
कहानी के लिए सुधा अरोड़ा ने एक युक्ति रची है। कहानी को वे एक पत्र की शक्ल में लिखती हैं। पत्र जो आत्महत्या कर चुकी अन्नपूर्णा मंडल ने लिखा है और उसकी मृत्यु एक अनेक दिनों बाद उसके माता पिता तक पहुंचा है। पत्र में अन्नपूर्णा लिखती है - कभी-कभी पैरों के नीचे अचानक कुछ पिलपिला-सा महसूस होता है और मैं डर जाती हूँ कि कहीं मेरे पाँव के नीचे आ कर कोई केंचुआ मर तो नहीं गया? क्या यह अतिरिक्त संवेदनशीलता है? यह वही लडक़ी है जो बचपन में केंचुओं पर नमक भुरक भुरक कर उन्हें मार डालती थी। पिता उसे टोकते भी हैं, बाबला की नकल क्यों करती है रे। तू तो माँ अन्नपूर्णा है, देवीस्वरूपा, तुझे क्या जीव-जंतुओं की हत्या करना शोभा देता है? भगवान पाप देगा रे। लेकिन बचपन में ऐसी बातें कहाँ किसी को समझ आती हैं भला? अब वही अन्नपूर्णा लिख रही है, आज मुझे लगता है बाबा, तुम ठीक कहते थे। हत्या चाहे मानुष की हो या जीव-जंतु की, हत्या तो हत्या है। इस लिखने का कारण यह है कि कंेचुएं देखते ही उसके पति क्रोधित हो जाते थे और उन्हें मारने लगते थे। अन्नपूर्णा का कथन है, मेरे पति तो उन्हें देखते ही खूँख्वार हो उठे। उन्होंने चप्पल उठाई और चटाख् - चटाख् सबको रौंद डाला। एक-एक वार में इन्होंने सबका काम तमाम कर डाला था। तब मेरे मन में पहली बार इन केंचुओं के लिए माया-ममता उभर आई थी। उन्हें इस तरह कुचले जाते हुए देखना मेरे लिए बहुत यातनादायक था। केवल पति ही नहीं उसकी सास भी इन केंचुओं की जान की दुश्मन है, एक दिन एक केंचुआ मेरी निगाह बचा कर रसोई से बाहर चला गया और सास ने उसे देख लिया। उनकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं। उन्होंने चाय के खौलते हुए पानी की केतली उठायी और रसोई में बिलबिलाते सब केंचुओं पर गालियाँ बरसाते हुए उबलता पानी डाल दिया। सच मानो बाबा, मेरे पूरे शरीर पर जैसे फफोले पड़ गए थे, जैसे खौलता हुआ पानी उन पर नहीं, मुझ पर डाला गया हो। वे सब फौरन मर गए, एक भी नहीं बचा। इन केंचुओं की हत्या अन्नपूर्णा को विचलित कर रही है।  वह लिखती है,  जब ये घुटनों घिसटती हैं, मुझे केंचुए रेंगते दिखाई देते हैं और जब बाहर सडक़ पर मैदान के पास की गीली मिट्टी में केंचुओं को सरकते देखती हूँ तो उनमें इन दोनों की शक्ल दिखाई देती है। मुझे डर लगता है, कहीं मेरे पति घर में घुसते ही इन सब पर चप्पलों की चटाख-चटाख बौछार न कर दें या मेरी सास इन पर केतली का खौलता हुआ पानी न डाल दें। मैं जानती हूँ, यह मेरा वहम है पर यह लाइलाज है और मैं अब इस वहम का बोझ नहीं उठा सकती।
इस वहम के कुछ कारण हैं। उसकी बेटियों के जन्म पर सास के कथन का उल्लेख कहानी में हुआ है,  एक कपालकुंडला को अस्पताल भेजा था, दो को और साथ ले आई। क्या यह क्षोभ कन्या संतानों की वजह से उत्पन्न हो रहा है? पक्का नहीं कह सकते। अन्नपूर्णा के पति और सास के व्यक्तित्व में मौजूद हिंसा से वह व्यथित है और इस हिंसा का प्रत्याख्यान उसे अपने प्रति जघन्य हिंसा अर्थात आत्महत्या में ही मिलता है। एक जगह वह लिखती है, लेकिन मैं जिंदा रही। मुझे तब समझ में आया कि मुझे अब बांकुड़ा के बिना जिंदा रहना है। यही नहीं अपने मुम्बई आगमन को वह स्वयं किस तरह देख रही है इसे भी जानना चाहिए, देहाती-सी लाल साड़ी में तुम्हारे जीवन भर की जमा-पूँजी के गहनों और कपड़ों का बक्सा लिए जब अँधेरी की ट्रेन में इनके साथ बैठी तो साथ बैठे लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं और बाबला कभी-कभी कलकत्ता के चिडिय़ाघर में वनमानुष को घूरते थे। तो क्या सभ्यताओं के द्वंद्व की वजह को भी त्रास का एक कारण मानना चाहिए? बाँकुड़ा में प्रकृति से अभिन्न रही अन्नपूर्णा ने लिखा है, मुझे लगता था, मैंने अपनी माँ की जगह ले ली है और मुझे सारा जीवन रसोई की इन दीवारों के बीच इन केंचुओं के साथ गुजारना है। यही नहीं उसकी छटपटाहट इस कदर है कि वह बात भी नहीं करना चाहती, और फोन पर तुम्हारी आवाज सुन कर मैं परेशान हो जाती हूँ क्योंकि फोन पर मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि तुम जिस आवाज को मेरी आवाज समझ रहे हो, वह मेरी नहीं है। तुम फोन पर मेरा कुशल-क्षेम ही सुनना चाहते हो और मैं तुम्हें केंचुओं के बारे में कैसे बता सकती हूँ?
चि_ी में अन्नपूर्णा लिखती है, इस बार मुझे बाँकुड़ा का वह अपना घर बहुत याद आया।  बीच में वह जोर दे रही है कि देखो, अब भी वही घर अपना लगता है। शादी के बाद लडक़ी का घर ससुराल हो जाता है और मायका छूट जाता है। फिर भी रह रह कर जीवन भर स्त्रियां अपने लडक़पन को याद करती हैं उन्हें बार बार अपना देस याद आता है। क्या यह मान लिया जाए कि उनका कोई देस नहीं इसलिए ससुराल और पीहर का द्वंद्व उनके जीवन से कभी नहीं जाता। मध्यकाल की स्त्री मीरां की कविता में कह रही थी, आंबा पाक्या, कलहर कैरी, निंबूडा म्हारे देस। उदयपुर रा राणा किण विध छोड्यो देस, मेवाड़ी राणा कण पर छोड्यो देस। देस छोडऩे का त्रास स्त्री लेखन में बार बार आता है। निजी दुख कभी कभी रचना में ऐसे घुल मिल जाता है कि रचना और रचनाकार अभिन्न हो जाते हैं। इसे महज संयोग समझा जाए या मायके की अवचेतन में बसी घनीभूत स्मृति कि अन्नपूर्णा मंडल ही नहीं अपितु अन्नपूर्णा की रचनाकार सुधा अरोड़ा भी बंगाल से मुंबई आई हैं। बहरहाल।
इस कहानी की सार्थकता इस बात में है कि यह पाठक के मन में अनगिनत सवाल छोड़ जाती है। पाठक लगातार कयास लगाता है कि किस सवाल के चलते कहानी लिखी गई होगी। और विचार करने पर ऐसे अनेक सवाल खड़े होते हैं। कहीं यह जिम्मेदारियों के बोझ से थक गई लडक़ी की कहानी तो नहीं है जो चि_ी में लिख रही है, माँ, मुझे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हारी तरह एक अच्छी माँ कभी नहीं बन पाऊँगी जो जीवन भर रसोई की चारदीवारी में बाबला और मेरे लिए पकवान बनाती रही और फालिज की मारी ठाकुर माँ की चादरें धोती-समेटती रही। तुम्हारी नातिनों की आँखें मुझसे वह सब माँगती हैं जो मुझे लगता है, मैं कभी उन्हें दे नहीं पाऊँगी। त्यागपत्र के जज साहब याद आ जाते हैं जो अपनी बुआ की स्थिति से विचलित होकर त्यागपत्र दे देते हैं। यह सही है कि त्यागपत्र या आत्महत्या विकल्प नहीं हो सकते, होने भी नहीं चाहिए लेकिन इनका फिर फिर लौट आना हमारी समाज व्यवस्था पर एक व्यक्ति की टिप्पणी तो है ही। यह व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जिसकी कल्पनाशीलता असीमित संभावनाओं को जन्म देने वाली लगती है। अन्नपूर्णा ने अपनी नन्ही बच्चियों के सम्बन्ध में पिता को लिखा था, इन दोनों को अपने पास ले जा सको तो ले जाना। बाबला और बउदी शायद इन्हें अपना लें। बस, इतना चाहती हूँ कि बड़े होने पर ये दोनों अगर आसमान को छूना चाहें तो यह जानते हुए भी कि वे आसमान को कभी छू नहीं पाएंगी, इन्हें रोकना मत। जिसका होना किसी भी समाज को निश्चय ही अधिक सुन्दर बनाने वाला हो सकता था किन्तु वह नहीं है। अब बिल्कुल नहीं है। अन्नपूर्णा पर कहानी का लिखा जाना उसके न होने का भयानक अहसास करवाता है और पाठक तथा समाज को उन सवालों के बीच छोड़ जाता है जो इस आलेख के प्रारम्भ में पूछे गए हैं।