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Thursday 23 Nov 2017

‘कुछ मेरी कुछ तुम्हारी’ : अस्तित्व संधान की अभिव्यक्ति

डॉ. युवराज सोनटक्के
172, दूसरा क्रॉस,  बालाजी लेआउट, मल्लात्तहल्ली,

बेंगलुरु-560056 (कर्नाटक),

मो. 09740919175

विगत कुछ वर्षों में सिर उठाती भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से अपने आसपास का परिसर बदल गया है। जीने की साधन सामग्री एवं नैतिक मूल्यों से संबंधित  विचारों का अनु क्रम बदलकर वह बाजार केन्द्रित बन गया है। इसलिए मानवीय रिश्तों की गुत्थी बढ़ाने वाले अनेक सवाल पैदा हो गए हैं। संवेदनशीलता, हित, सहकार्य आदि मनुष्य की भावनाएं कमजोर  होती जा रही है। समाज व परिवार में भी इसका असर दिखाई देता है। कवयित्री श्रीति राशिनकर और कवि संदीप राशिनकर का ‘कुछ मेरी कुछ तुम्हारी’ शीर्षक कविता संग्रह उनके दाम्पत्य जीवन का रचनात्मक सफर है, जिसमें उन दोनों का सम्यक व्यक्तित्व व्यक्त हुआ है। प्रस्तुत संग्रह में ‘कुछ मेरी’ अंतर्गत कवयित्री की 37 भाव कविताएं और ‘कुछ तुम्हारी’ अंतर्गत कवि की 25 भाव कविताएं संकलित हैं।
 श्रीति और संदीप की कविताएं भाव काव्य के समीप होने से विषय की खोज करने की अपेक्षा उनमें अंतर्भूत आशय सूत्रों को खोजना ज्य़ादा उचित होगा। मानवीय अस्तित्व के सवाल और जीवन की सार्थकता, अपनों के प्रति प्रेम, बड़ों के प्रति आदर, कभी अंतिम पल में प्राप्त हुआ अपेक्षा भंग, शायद ही अपने हिस्से में आए हुए सुख के पल, सृजनता का अनुशीलन आदि उनकी कविता के आशयसूत्र माने जा सकते हैं।
कुछ मेरी :
भारतीय स्त्री की पारंपरिक स्वाभाविकता से कवयित्री श्रीति स्वयं अपनी ओर देखती हैं। अपने जीने की समृद्घता का उन्हें भान है। दूसरों का जीवन भी अधिक परिपूर्ण व सुन्दर होने की उनकी चाहत समष्टीकेन्द्रित धारणा से अनभिज्ञ नहीं है। जीने के सभी प्रकार के भावों और अभावों से वे परिचित हैं। कवयित्री के रूप में भी उन्होंने संघर्ष के ताने-बाने संवेदनशील होकर संभाला है। समझदारी उनकी कविता का स्थायी भाव है और इस बल पर ही उनकी कविता की कतिपय पंक्तियां दिल को छू लेती हैं। उनके दिल की तलहटी में स्त्रीत्व की ममता और त्याग की प्रेरणा झांकती हुई दिखाई देती है, यथा-
‘जब-जब
मैं प्यार के मीठे
सपनों में खो जाती हूं
तब-तब अहसास होता है
मैं एक प्रेमिका हूं
...
जब-जब मैं
जीवन के कठिन पलों को
सफलता से पार करती हूं
तब-तब मैं सि$र्फ एक स्त्री हूं।’ (स्त्री- पृष्ठ-47)
श्रीति द्वारा कविता में सर्वसाधारणों की एक करुणामय संवेदना भी ध्वनित हई है। इस एहसास विश्व को निसर्ग का भी साथ है। नदी, समंदर, पेड़, पत्तियां, चिडिय़ा आदि निसर्ग रूप में यह संभाषण प्रतीकात्मकता के पहलू से व्यक्त हुआ है। उनकी कविता की एक महत्वपूर्ण समझ यानी पति-पत्नी के सह-संबंध की व रुढ़ार्थ की प्रेम कविता ही है। उसे चिंतन का संदर्भ है व शाश्वत प्रेम भावना से आविष्कृत हुई है। साहचर्य से बुना हुआ यह मिलन समारोह एक विशेष व लक्षणीय है। ‘तुम्हारे होने से’ शीर्षक कविता में कवयित्री कहती है-
‘तुम मेरे प्रियकर
मेरे पथप्रदर्शक / सब कुछ
मैं ढूंढती हूं
मेरे आसपास तुम्हें
और तुम हो कि
बन जाते हो परछाई मेरी।’ (पृष्ठ 17)
स्त्री जीवन की समझ से दु:ख का न $खत्म होने वाला एक गहरा किनारा जुड़ा हुआ है। त्याग के पल्लू के पीछे वह दु:ख अविरत छुपाया जाता है। आरंभ से लेकर आज तक स्त्री दासता का यह दिखाऊपन, दुख विमोचन का यह तमाशा व संघर्ष एकतरफा हो रहा है। स्त्री जीवन को निसर्ग द्वारा प्रदान की हुई सहनशीलता से एक पल में वह अपने आपको संवारती व संभालती है। श्रीति राशिनकर की कविताओं का यह स$फर स्त्रियों के भाव विश्व में अनेक अप्रकाशित अंधेरे कोनों को उजाले से निखारने का प्रयास करता है।  उपेक्षा से जूझती हुई स्त्री-शक्ति को वे इस प्रकार रेखांकित करती हैं-
अनेक प्रश्न मेरे अंदर की
स्त्री को जगाते हैं
मेरे अंदर की वृद्घ स्त्री / जागृत होती है / कहती है पगली /
कभी न कभी / मेरा साथ भी तो दोगी / अचानक मेरा मन /
बचपन युवा और वृद्घावस्था / से निकल आता है बाहर /
और / कहने लगता है / तू सि$र्फ शक्ति है /
स्त्री-शक्ति । (‘शक्ति’ - पृष्ठ 81)
श्रीति की कविताओं को पढ़ते हुए कभी-कभी बेचैनी की धुंधली सी लकीर दिल को छू लेती है। आज की नारियों का  तनाव उन्होंने समर्थता से संभाला है। इस तनाव में भी सृजन का बल उन्होंने परख लिया है।$गरीबी से विवश स्त्री के अस्तित्व को निम्न पंक्तियों से देखा जा सकता है-
‘सडक़ पर कचरा बीनती औरत
निकल पड़ती है अलसुबह घर से
---
कागज, टूटी बोतलें और वे तमाम चीजे / जो दूसरों के लिए बेकार होती हैं/
इकट्ठा करती है वह इन्हें खुश हो जाती है / मानो सोना मिल गया हो उसे/
घर जाकर सहलाती है बच्चों को / उन्हीं हाथों से / जिनसे बनाती है अपना भाग्य /
वह नहीं जानती / गंदे हाथों से फैलता है संक्रमण / वह तो सि$र्फ इतना जानती है /
ममता के लिए दो हाथ जरूरी हैं
जिसमें सिमट जाता है पूरा संसार।’ (‘ममत्व’-पृष्ठ 69)
स्त्री चेतना के बारे में कवयित्री के मन में हिलोरे लेती हुई भावनाएं यानी स्त्री के अभ्युदय का सम्मान है।  ‘माँ’, ‘स्त्री’, ‘लड़कियां’, ‘बेटियां’, ‘महिलाएं’ शीर्षकों से उनकी कविताएं पाठकों को एक ऐसा स्थान दिखाती हैं, जहां नारी विमर्श को एक संघर्ष की संज्ञा देकर उसे स्वयंसिद्घा बनने को बाध्य करती हैं। उनकी भाषा सादी, सरल और किसी के भी समझ में आने वाली है। कविता का भाविक अवकाश आंतरिकता से संपन्न है। कवयित्री श्रीमती राशिनकर का प्रयास सराहनीय है।
कुछ तुम्हारी :
संदीप राशिनकर एक सक्षम चित्रकार होते हुए भी कविता क्यों लिखते हैं? इस सवाल का तर्कयुक्त जवाब देना बहुत कठिन है। परंतु उनमें जो संवेदनशीलता है, उसे उजागर करने के लिए जो घटनाएं घटित होती हैं, वे कविता के रूप में कागज पर उतारते हैं। अपने आपको तथा आसपास के सांस्कृतिक व सामाजिक माहौल को व्यक्त करने के लिए वे कविता का माध्यम चुनते हैं। मनुष्य के सार्वकालिक सुख-दु:खों, सामाजिक व राजकीय जीवन एहसासों का वे अन्यार्थ लगाने का प्रयास करते हैं। कविताओं का आशय और संग्रह के सौंदर्यमूल्य में बढ़ोतरी करने में सहायक उनका चित्र-रेखांकन पाठकों को हर्षोल्लासित करता है। उनका पहला काव्य-संग्रह ‘केनवास पर शब्द’ प्रकाशित हुआ और उसने पाठकों के मन में जगह बना ली और अब यह दूसरा संग्रह ‘कुछ मेरी कुछ तुम्हारी’ मन मस्तिष्क पर दस्तक देने आया है। इस नये कविता संग्रह में अलग-अलग विषयों पर उनकी लिखी हुई कविताएं केवल गणित की रचना या ब्रशों की लकीरें न होकर कवि के व्यापक, संवेदनशील, वैचारिक दृष्टि का विवेचन है।
संदीप की कविता एक अलग शैली लेकर पारंपरिक काव्य-व्याकरणिक शब्दों को टाल कर गद्यप्राय शब्दों में समायित हुई है। कवि अपने व्यक्तिगत जीवन में घटित छोटे-मोटे प्रसंगों में समाहित सामाजिक संवेदनाओं के दृश्य कविता में चित्रित करते हैं। वे अपने आपसे संवाद साधते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता, आस्मिता और स्वत्व की गंभीरता को उपादेय मानते हैं। एक ही समय एकाध कविता लाखों लोगों से संवाद कर सकती है और सबसे ज्य़ादा संवाद करने पर बल कविता में होता है, इसका उन्हें भान है। ‘हाट’ शीर्षक कविता में व्यक्त हुईं उनकी भाव-भावनाएं देखी जा सकती हैं। वे कहते हैं-
‘मुझे मुखौटों से नहीं
अपनों से मिलना है
मुझे हाट जाना है / हाट ही बन जाना है।
----
स्वार्थों को नहीं / रिश्तों को टटोलना है
हाट एक संस्कृति है, / स्वभाव है, / विचार है
हाट स्वयं में / भरापूरा संस्कार है!
मुझे समग्र हाट को / $खुद में उतारना है।’ (पृष्ठ 109, 110)
कविता के माध्यम से मनुष्य को खोजने और अपने हिस्से में आए यथार्थ को भेदकर युगसमांतर परिवर्तन करने के लिए कवि निरंतर प्रयासरत रहता है। यथा-
‘पुल जोड़ता है दो किनारों को
दो सिरों को दो दिशाओं को,
पाटता है दूरी बनाता है संवाद
दो दूरस्थ किनारों में!
पुल होते हुए निर्जीव जब साध सकता है
ढेर सारी सकारात्मकता-सहृदयता-सोदरता
तो क्या जीवित होते हुए मानव,
मानव नहीं तो कम से कम
बन नहीं सकता एक पुल!!’ (‘पुल’- पृष्ठ 115)
यह सत्य है कि भावावस्था, चिंतनशीलता आदि कविता के गुणों से उसमें निहित वर्तमान को खोजा जा सकता है। कविता लिखना यानी केवल कला का निर्माण करना नहीं तो सौंदर्यपूर्ण जीवन का भी निर्माण करना होता है। सौंदर्य अनुभव को सही सलामत रखने की क्षमता भी इस कवि में है। -
‘जब तक है श्वास / जीवन है, सरगम है / नदियां हैं, संगम है /
मिलने की बेताबी ले / झरने सा झरा करो /
जब कभी मिला करो / फूलों सा खिला करो!!’ (‘जब कभी’- पृष्ठ 113)
कथाकार के अस्तित्व का निरूपण उसके आसपास की परिधि से होता है। यह कहना अनुचित न होगा कि इंदौर शहर के संरचनात्मक विचारों से संदीप राशिनकर के काव्य-संबंधी अस्तित्व-अनुभव का विकास भी हुआ है। अत: वर्तमान जिंदगी की ओर देखने की उनकी एक निराली दृष्टि है, जो विशेष रूप से उनकी कविता में महसूस होती है। उनकी कतिपय कविताओं में यह जीवनदृष्टि पारदर्शक रूप में खड़ी दिखाई देती है। उनमें मानवीय जीवन को नई शैली प्रदान करने और मनुष्यता की नये रूप से सर्जना करने की अनबूझ प्यास है। उनकी ‘बरक्स’ शीर्षक कविता सर्वसाधारण जनों की एक अदृश्य संवेदना ध्वनित करते हुए विािभन्न एहसासों की ओर निर्देश करती है-
विलोम के बरक्स कुछ तो हो
सिवाय अर्थहीन जयकार के!
माना चल रहा है अंधड़ विकार का अनाचार का
संस्कार की ओट में जला ही ले दीपक सदाचार के
समंदर से पलट कर लिया गंगा ने हिमालय का रुख
जगाने होंगे हौसले अडिग आधार के
विलोम के... जयकार के!
...............
भरभरा कर ढह जाती है सत्ता
पता भी नहीं लगता/अनोखे हो गए हैं तेवर प्रहार के
विलोम के... जयकार के!! (पृष्ठ 133)
संदीप राशिनकर के रेखांकन से कविताओं को एक अनोखा व यथार्थवादी स्वरूप प्राप्त हुआ है। हंस-हंसिनी के जोड़े का संयुक्त रूप से प्रकाशित हुआ यह संग्रह यानी एक अनूठी प्रायोगिक व्युत्पत्ति है, जिसमें चित्रकला व कविता दोनों का निखार देखा जा सकता है। दोनों ने इस संग्रह में हाट, चिडिय़ा, बिटिया, पिता (बाबा) आदि विषयों पर अपनी $कलम चलाई है, यह भी एक संयोग की बात हो सकती है। भावनाओं और अनुभवों को कविता के रूप में व्यक्त करनेवाले अल्पाक्षरत्व व अनेकार्थकता को प्रयोग किया गया है।
‘कुछ मेरी कुछ तुम्हारी’ कृति के परिप्रेक्ष्य में कवयित्री-कवि बने श्रीति-संदीप राशिनकर दंपत्ति को बधाई देता हूं। उनकी आगामी गतिविधियों के लिए मंगलकामनाएं।