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Monday 20 Nov 2017

सैनिक का अंतर्मन

रमाकांत श्रीवास्तव
एल.एफ-1, कनक स्ट्रीट,
 ई-218, त्रिलंगा
भोपाल-462039,
मो. 9977137809

‘लड़ाई हमेशा दो वर्चस्ववादियों के बीच होती है। जैसे कि यह लड़ाई, इसका मतलब यह नहीं कि किसान को वर्चस्वविहीन बना दिया जाए। किसान की ताकत को इतना कम करके आंका जा रहा है कि उसे महत्वहीन बना दिया है। जबकि लड़ाई किसान की धरती पर लड़ी जा रही है।’ विचारों का यह बवंडर भारतीय शांति सेना के एक जवान के मन में 17 अक्टूबर 1987 के दिन उठा था जब जाफना अभियान के पहले दिन भारतीय शांति सेना एलटीटीई के इलाके में घुसी। शांति सेना के जवान संजय चौगलिया ने देखा कि लगभग युद्ध जैसी स्थिति के बीच भी किसान अपने खेतों में जुताई कर रहे थे। अगले गांव में स्थिति एकदम भिन्न थी। सेना के आगे बढऩे पर जवान ने देखा कि दूसरे गांव में बिलकुल नीरवता छाई थी। घर की खिड़कियां तक बंद थीं। दोनों दृश्य युद्ध की दहशत और विषम स्थिति में भी आदमी के जिंदा रहने की जद्दोजहद को दर्शाते हैं। हीरालाल नागर का उपन्यास ‘डेक पर अंधेरा’ बीसवीं सदी की, भारतीय उपमहाद्वीप की ऐसी घटना पर आधारित है जिनमें स्थितियां बेहद उलझी हुई थीं और जिसकी दुखद परिणति देश के संभावनाशील युवा प्रधानमंत्री की हत्या में हुई। उपन्यास हमें उस दुखद अंत के संकेत भर देता है। जहां तक कथा की पृष्ठभूमि है उसका फैलाव भारतीय सेना की दुविधाग्रस्त विषम परिस्थितियों के चित्रण तक है।
पिछली सदी में श्रीलंका में निवास करने वाले तमिलभाषियों के संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) और श्रीलंका सरकार के बीच हथियार बंद द्वंद्व छिड़ा हुआ था। परेशान श्रीलंका ने भारत से मदद मांगी थी। जुलाई 1987 में एक अनुबंध ‘द इंडो श्रीलंका एकार्ड’ में तय हुआ कि भारतीय शंति सेना लिट्टे से हथियार डलवाएगी ताकि जाफना में होने वाले चुनाव निर्विघ्न संपन्न हो सकें किन्तु भारत की शांतिसेना के वहां पहुंचने के एक महीने बीतते ना बीतते वह समझौता बेकार सिद्ध हुआ। स्थितियों ने ऐसा मोड़ लिया कि तीन महीने में लिट्टे ने भारतीय शांति सेना के विरुद्ध ही लड़ाई छेड़ दी। परिणामविहीन राजनैतिक दुष्चक्र में फंसी सेना के जवानों की जिन्दगी के पहलुओं का विश्वसनीय चित्रण हीरालाल नागर के उपन्यास डेक पर अंधेरा में उपलब्ध है।
किसी देश की शांति सेना का जवान दूसरे देश की धरती पर पहुंचकर स्वयं को विडम्बना में घिरा हुआ पाता है तो उसकी दशा क्या होती होगी इसकी कल्पना निश्चिंत जिन्दगी जीने वाले नागरिक के लिए संभव नहीं है। सिविलियन के मन में भी देशभक्ति होती है जो जोश से भरी होती है किन्तु वह ना तो मृत्यु के सामने उससे आंखें मिलाते हुए खड़ा होता है, और ना प्राणों की बाजी लगाकर लक्ष्य की पूर्ति के लिए लड़ता है। युद्ध की भीषणता का अनुभव युद्ध में रत जवान ही जानता है। ‘डेक पर अंधेरा’ उपन्यास में सैनिकों के उहापोह, तनाव, परेशानियों के साथ ही उनके हौसले का चित्रण भी है। सेना की गतिविधियों का चित्रण जिस सूक्ष्मता से रचना में उपस्थित है, उससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि लेखक स्वयं उनका हिस्सा रहा है। स्पष्ट है कि रचना के कथानायक हवलदार संजय चौगलिया के चोले में लेखक मौजूद हैं जो स्वयं लम्बे समय तक भारतीय फौज में था। इंफेंट्री का यह जवान एक संवेदनशील कवि और कथाकार है। संजय चौगलिया के संघर्ष और उसकी दुविधाओं का भोक्ता स्वयं लेखक हैं अत: यह कृति सेना के जवान के विश्वसनीय अनुभवों से रची गई है। लेखक इसे आत्मकथा के रूप में नहीं बल्कि एक रचना की तरह कई कहानियों के माध्यम से कथा कोलाज के रूप में पेश करता है। लेकिन कथानायक के एकतार अनुभवों के कारण यह एक मुकम्मल उपन्यास भी है। प्रकाशक ने इसे उपन्यास के रूप में ही प्रस्तुत किया है।
कथानायक के नाम संजय चौगलिया के पीछे भी लेखक की एक सोच है। महाभारत का संजय धृतराष्ट्र को युद्ध की कथा सुनाता है। इस उपन्यास का नायक भी वही कर रहा है। महाभारत का संजय तो महल में बैठकर केवल कमेन्ट्री करता था लेकिन यह संजय तो चारों दिशाओं की गलियों में घूमने वाला चौगलिया है। यानी ऐसा व्यक्ति जो ऊपर दिखने वाले परिदृश्य की आंतरिक परतों तक पहुंचा हो। अपनी कृति को वह राजनैतिक अथवा तथ्यपरक नहीं मानता और उसे सैन्य गतिविधियों के बीच एक सैनिक की संवेदना की कहानी मानता है। भूमिका में उसने लिखा- ‘यह कथा कोला•ा भारतीय शांति सेना और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम के संघर्ष का दस्तावेज नहीं है और न श्रीलंका और भारत के बीच लागू समझौते का उपलब्धि पत्र। इसे शांति सेना में शामिल एक सैनिक का आत्मरुदन भी ना समझा जाए। यह आंखों देखी, कानों सुनी, आपबीती, किस्से कहानी, किंवदंती, अफवाह और स्वअर्जित अनुभवों की दुनिया का आख्यान है, जिसे मनुष्य होने के नाते लेखक विचार और संवेदना के स्तर पर बयान करता है।’
भले ही लेखक के आग्रह को हम स्वीकार करके इसे उस कोटि के ऐतिहासिक उपन्यासों की श्रेणी में ना रखें किन्तु इसमें आधुनिक भारत की एक ऐसी घटना को आधार बनाया है जिसमें हवन करते हुए भारत के हाथ जले थे। यह बिना संकोच के स्वीकार किया जा सकता है कि सच्ची घटनाओं पर आधारित यह ऐसी साहित्यिक कृति है जो दस्तावेजों का अतिक्रमण करके सेना के जवान की मानसिकता और उसकी आत्मा का आईना बन सकी। यह उपन्यास इस मानी में महत्वपूर्ण है कि ऐसी पृष्ठभूमि पर हिन्दी में कथाकृतियों का अभाव है। सातवें दशक में प्रकाशित मनहर चौहान लिखित ‘सीमाएं’ और जगदीश चंद्र का ‘आधा पुल’ जैसे इक्के-दुक्के उपन्यास हमारी झोली में रहे हैं। राजनैतिक गलतफहमियों से उत्पन्न, अनुमान से अधिक समय तक खिंची युद्ध जैसी स्थिति सेना के जवान के मन को झकझोरती है। नरसंहार जैसी घटनाओं को धैर्यपूर्वक झेल लेना, घिसे-पिटे राजनेताओं या भीषण घटनाओं की तलाश के आखेटकों, मीडिया कर्मियों के लिए संभव हो सकता है किन्तु हिंसक घटनाओं के बीच अनिश्चय और कष्ट झेलने वाले सैनिक की उद्विग्नता और शांति की गहरी प्यास को समझ पाना आसान नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के विदेश मामलों के पूर्व पत्रकार मोहन के. विक्कू ने इस कृति के संबंध में टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘‘इन 25 वर्षों में इस युद्ध को देखा और परखा। श्रीलंकाई विशेषज्ञता के इस बाजार में सभी ने अपनी-अपनी बात कही, सिवाय उस आदमी के जिसने इस युद्ध को दिन प्रतिदिन जिया और झेला- और वह था साधारण भारतीय सैनिक।’’
वह भारतीय सैनिक जो मोर्चे पर है और घर से विदा होते समय के दृश्य को याद करता है और उसे कविता में बांधता है। यह उसका व्यक्ति सत्य नहीं है। दुनिया में कहीं भी युद्ध हो रहा हो या होने वाला हो, अपनी पत्नी या प्रेमिका से विदा होते समय का यह शाश्वत दृश्य है। इस पूरी कविता को हम पढ़ें तो यह अहसास मन को छू जाता है कि यह सच्ची अनुभूति है जिससे होकर एक सैनिक कवि गुजरता है-
घर छोडऩे के पूर्व / कमर कसते सैनिकों की बीवियां / खड़ी हैं दरवाजे पर / निहार रही हैं दहशत में डूबी हवा को / पत्थर से भी ज्यादा सख्त अपने पतियों के आचरण पर / क्षोभ और दुख प्रकट करतीं और / बच्चों पर मुलायम पसीजे हाथ फेरती हुए वे / सीढिय़ों से सडक़ पर उतर आई हैं / बंदूक और घर के बोझ से / टूटती कमर को तनिक सीधा करते हुए सैनिकों ने कहा / ‘ख्याल रखना अपना और बच्चों का’ / चुपचाप आकाश को निहारती रहीं / सैनिकों की बीवियां / ‘अपना ख्याल रखना’ इतना ही बोलीं वे / सूनी होती हुई सडक़ से / ठंडे होते पदचापों को / घर और घर से बाहर / युद्ध की अपनी निर्णायक भूमिका के बारे में सोचते हुए / उन्होंने भी अपनी कमर कस ली।
शांति सेना के जवान की यात्रा मद्रास से जाफना तक की है और फिर जाफना के घटनाबहुल संघर्ष में सेना फंसती है। सेना का धैर्य, उसकी बहादुरी और उसकी दिक्कतों का सूक्ष्म चित्रण, इस किताब की विशेषता है। लगता है कि कथा नायक हमें अपने साथ ही लेकर घूम रहा है। शांति सेना जिस मोर्चे पर, जिस तरह और जब जाती है, कवि हृदय, कथा नायक उसका विस्तृत वर्णन तो करता ही है, यह उस बीच संवेदनशील प्रश्न भी खड़े करता है। चेन्नई से चलकर ट्रिंकोमाली, मर्दनादमडम, बावूनिया, उडविल और जाफना का भूगोल और मौसम पाठक के साथ भी हो लेता है। लेखक इस राजनैतिक सत्य को सामने रखता है कि श्रीलंका में भारतीय शांति सेना को भेजने का एक सुस्पष्ट कारण जाफना में लिट्टे के उत्थान को खत्म करके श्रीलंका के चुनाव को सम्पन्न करवाना था। दूसरा अप्रत्यक्ष लेकिन अधिक जरुरी लक्ष्य था हिन्द महासागर परिक्षेत्र में अमरीका की चौधराहट की मंशा को रोकना। भारत का यह लक्ष्य तो पूरा हुआ लेकिन शांति सेना को न केवल लिट्टे के आक्रमण को झेलना पड़ा बल्कि श्रीलंका सरकार ने भी एक समय के बाद शांति सेना की उपयोगिता को नकार दिया। जो प्रभाकरण प्रारंभ में भारतीय सेना के सैनिकों के साथ मैत्री भाव रखता था, उसने उनके विरोध में चालें चलीं और क्रूरतापूर्ण लड़ाई लड़ी।
यह उपन्यास कथा की प्रभावशाली पृष्ठभूमि के अलावा सेना के जवानों की दशा की ओर संकेत करता है। युद्घ पर आधारित रचनाएं और फिल्में जब रुमानी शौर्य और देशभक्ति के आकर्षण के साथ पढ़ी-देखी जाती हैं तो न केवल इसे तृप्त करती हंै बल्कि हमारा मनोरंजन भी करती हैं। वीरता और देशभक्ति हमारे उच्च भाव हैं और सम्मान के अधिकारी हैं किन्तु युद्घ हमेशा अमानवीय और क्रूर होता है। उसमें शामिल सैनिक का जीवन बेहद कठिन और तनावपूर्ण होता है। अनुशासन की ऐसी जकड़बंदी में वह जीवन गुजारता है जहां फरियाद या असहमति व्यक्त करने की कोई गुंजाइश नहीं है। हमारे देश में आज भी सेना के विभिन्न अंगों में वेतन, पेंशन और सरकार के व्यवहार को लेकर असंतोष देखा जा सकता है। जिन सैनिकों ने खाद्य सामग्री के संबंध में, गलत ढंग से ही सही रोना रोया, उनके परिवारजनों की चिंताओं की जानकारी पूरे देश को है। आज से पच्चीस वर्ष पहले की दशा का बयान रचना के पात्र गरुड़ पांडे ने किया। जब कथानायक घर के हालचाल पूछता है। तो उसका उत्तर है- ‘कहां आल इज ओ के सर! यह अंदर की  बात है। आपको नहीं मालूम। गवर्नमेंट एकोमेडेशन में तो स्थिति काबू में है, मगर सेपरेटेड फेमिली क्वार्टरों में सचमुच गदर है। बनिये लोगों ने जवानों की औरतों को बंधक बना रखा है साले रोज पहुंच जाते हैं, तकाजा करने। टैम से पैसा पहुंचता नहीं, औरतें उधार ले रखती हैं।’
लेखक इतना जरूर कहता है कि गरुड़ पांडे की बात शायद ठीक या शायद ठीक ना भी हो लेकिन कथानायक जब ऐसी घटनाओं को सुनता या झेलता है तो स्थिति का विश्लेषण वह इस रूप में करता है- फौज का अनुशासन जवानों को गूंगा बना देता है, इसलिए कोई किसी के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है। अब भी यही स्थिति थी। कानून में बदलाव आने से रहा। सेना अंग्रेजों के कानून को ही ढो रही थी। सेना का पूरा ढांचा ब्रिटिश सेना ने बनाकर दिया था। यह तो अब भी आभास होता है कि अफसर वर्ग और जवानों के जीवन की सुविधाओं में खासा अंतर होता है।
‘सैनिक का प्यार’ और ‘सैनिक से प्यार’ के कई किस्से हम देख-सुन चुके हैं। कथानायक एक ऐसे प्रकरण को युद्घ के बीच का प्यार नाम देता है। दरअसल ऐसी ही कई संवेदनशील घटनाएं शांति सेना के श्रीलंका अभियान के समय लेखक ने स्वयं देखीं। ‘नायक पन्नी सिल्वन’ की कहानी सैनिक की एक ऐसी ट्रेजेडी है जैसी आज भी घटित होती हैं। निरंतर काम करते रहने और जरूरत के समय छुट्टी ना मिलने पर अपने साथी या अफसर पर गोली चला बैठने वाली घटनाएं होती हैं। एक सैनिक का मानसिक तनाव जब सीमा का अतिक्रमण करता है तो वह अपनी आखरी ताकत ‘हथियार’ का इस्तेमाल कर बैठता है। इन्फैंट्री की सर्चिंग में काम करते हुए पन्नी सिल्वन को श्रीलंका की एक तमिल लडक़ी से प्यार   हो गया। लेखक के शब्दों में- ‘‘जो केले के गाछ की तरह स्वस्थ और हरी भरी थी।’’ लडक़ी की मां मद्रास में रहती थी अत: वह शादी की बात करने मद्रास जाना चाहता था। उसे छुट्टी तो नहीं दी गई बल्कि उसके प्यार का मजाक उड़ाया गया। अंतत: आक्रोश में भरकर उसने अपने अफसर को तीन गोलियां मारकर निपटा दिया।
युद्घ मानवीय चेतना को जड़ बनाता है। हिंसा का बदला बड़ी हिंसा से देना युद्घ का नियम है। लेखक दो प्रकरणों को याद करके अनुभव करता है कि युद्घ कई बेकसूरों को मारता है और अमानवीय यातनाएं भी देता है। गोरखा राइफल के जवानों ने जाफना के एक गांव की पूरी आबादी को कत्ल कर दिया क्योंकि उस गांव की एक औरत ने जीप पर हथगोला फेंका था जिसमें उनका एक आफिसर मारा गया। एक वृद्घ नागरिक को इसलिए यातना दी गई कि सैनिकों का शक था कि वह लिट्टे का जासूस ना हो। ‘खत्म करो साले को’ यह युद्घ के तनाव के दौरान एक सामान्य वाक्य है। शांतिकाल में यह क्रूर वाक्य निंदनीय होता और कानून के विरुद्घ। कवि कथानायक की कविता इसे इन शब्दों में व्यक्त करती है।
शांति सेना के खोजी दस्ते / पकड़ लाए हैं / कुछ घरों से कुछ लोगों को / पूछताछ जारी है... / रात की कुछ घाटियां लांघने / के बाद / अंधेरा चीखने लगता है / उठती है धीरे-धीरे / किसी जिस्म की कराह / कराह जो कंठ से फटकर हवा में झूल जाती है / शैतान अंधेरा क्रूर इंसान की तरह मुस्कुराता है / अब आया न पकड़ में / पहले बोल देता बकरे की औलाद / काहे को मार खाता /
उपन्यास की कविताएं, उपन्यास की पृष्ठभूमि की तरह ही, इस मानी में विशिष्ट हैं क्योंकि ये युद्घ को जीते हुए एक सैनिक ने आसपास घटने वाली घटनाओं के बीच लिखी हैं। युद्घ से अलग रहते हुए युद्घ विरोधी संवेदनशील गूढ़ अर्थ से युक्त दुनिया की कई भाषाओं में महान कविताएं हैं लेकिन मोर्चे पर तैनात सिपाही की त्वरित प्रतिक्रिया- चाहे वह आक्रोश हो, भय या स्थिति से विरक्ति हो- को व्यक्त करने वाली ये कविताएं कुछ भिन्न हैं। रेखांकित करने वाली स्थिति यह है कि सैनिक कवि की कविता कभी उनकी फौज को नागवार लग सकती है। एक सदृश्य संवेदनशील मनुष्य के रूप में कथानायक की सहानुभूति हर घायल सैनिक और नागरिक से है। शांति सेना और लिट्टे की रणभूमि जाफना बनी अत: युद्घ की पीड़ा भी वहीं के लोगों ने भोगी। अपनी सहानुभूति को उसने कविता के रूप में व्यक्त किया।
दौड़ो भाई दौड़ो / मरहम पट्टी और दवाईयां लेकर / जल्दी दौड़ो!
जाफना कराह रहा है अपनी अंतिम प्राणरक्षा के लिए / असंख्य
घावों में बेहोश शरीर / दयनीय चेहरों में / छुपी हुई भय-ग्रस्त आंखें / देख रही हैं तुम्हारी ही ओर / दवाइयों और खाने-पीने की चीजें लेकर / जल्दी दौड़ो जाफना शहर की ओर / यह लड़ाई का नहीं / शांति स्थापित करने का समय है।
इसे कथ्य रुप में एक कहानी बताकर कथानायक ने एक पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेजी जो फौज में सेंसरशिप के रहते रचना पकड़ ली गई और उस पर इंक्वायरी खड़ी हो गई। क्योंकि यह आपत्तिजनक रचना नहीं थी अत: कोई कार्यवाही नहीं की गई लेकिन कंपनी के आफिसर इंचार्ज लेफ्टिनेंट वर्मा ने उन्हें सलाह दी कि इस युद्घकाल में लिखना स्थगित रखो। एक अन्य प्रसंग के संबंध में लेखक ने लिखा है- ‘सेना में आदेश को पत्थर की लकीर समझा जाता है। उसे कोई टाल नहीं सकता।’ अपने लेखन को उसने जारी रखा और अपने अधिकारियों से कहा कि वह प्रेम कविताएं लिखता है। शांति की कामना और युद्घ की अनिवार्यता के द्वंद्व में फंसे सैनिकों की कई मन:स्थितियों और सुखद-दुखद प्रसंगों से भरे इस उपन्यास में सैनिक कवि का दिलचस्प प्रसंग उसकी रचनाधर्मिता और युद्घकाल के टकराव का है। शांति सेना की कार्यवाहियों के दौरान ही ब्रिगेडियर मंजीत सिंह रिटायर हुए और उनके स्थान पर कर्नल बी.के. सिंह ने पद ग्रहण किया। विदाई के अवसर पर सेना के दस्तूर के अनुसार ‘बड़ा खाना’ हुआ। बड़ा खाना सेना का ऐसा अनुष्ठान है जिसमें सेना का जवान अपने सारे तनाव एक तरफ रखकर खाता-पीता और मस्ती करता है। विदा लेने वाले ब्रिगेडियर साहब सभी से मिले। जब कथानायक से उन्हें मिलवाया गया तो इंक्वायरी की बात उन्हें याद आ गई। ‘तो आप हैं हवलदार संजय चौगलिया।’ कमांडर साहब ने धीर गंभीर आवाज में कहा और मुस्कुराकर बोले- ‘और क्या लिखते हैं आप?’ फिर उन्होंने कहा- ‘तो वह आपकी ही इंक्वायरी थी।’ अंतत: उन्होंने बढ़ावा दिया- यू कीप इट अप।‘डेक पर अंधेरा’ उपन्यास को पढक़र पाठक भी यह कहने को उत्सुक हो सकता है- तो आप हैं हीरालाल नागर। कीप इट अप।