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Saturday 18 Nov 2017

लोकरंग का दसवां आयोजन


इस वर्ष 11-12 अप्रैल को संपन्न हुए दसवें लोकरंग आयोजन में सूरीनाम (हालैंड )के मशहूर सरनामी भोजपुरी पॉप गायक राजमोहन जी अपने साथियों सहित, अपने व्यय पर इस आयोजन में पधारे और दोनों रात अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। राज मोहन की गायकी में भारत से मारीशस, सूरीनाम आदि देशों में भेजे गये गिरमिटिया मजदूरों के दर्द को बखूबी उभारा गया। ‘दूई मु_ी मजूरी’, ‘रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे’ और ‘सात समंदर पार ले जाई के’ जैसे आंखें नम करने वाली गीतों को जब राजमोहन ने सुनाया तो दर्शकों ने स्वयं को पूर्वांचल के कटु यथार्थ से अपने को जोड़ लिया। राज मोहन अपने साथी सोरद्ज (सूरज) सेवलाल और पवन माहरे के साथ, पधारे थे।     दसवें लोकरंग आयोजन को कई दृष्टियों से ऐतिहासिक माना जा सकता है। एक तो यही कि बिना सरकारी या किसी कारपोरेट सहयोग के  इस आयोजन को केवल जन सहयोग के बल पर किया गया । दूसरा यह कि बिरजिया (आदिम) आदिवासी समुदाय, लातेहार, झारखंड की एक ऐसी आदिवासी टीम को मंच पर उतारा गया, जिसकी आबादी महज 6,000 से 7,000 ही बची हुई है।  ए.के. पंकज के नेतृत्व में आयी इस टीम ने बिरजिया, करम, सरगुल और महादेव नृत्य प्रस्तुत किया। गाजीपुर के पारंपरिक भोजपुरी धोबिया नृत्य की टीम, जीवनलाल चौधरी के नेतृत्व में लोकरंग में पधारी थी। इस टीम ने कई देशों में अपनी प्रस्तुतियों से मन मोहा है। अवधी लोक समूह, फैजाबाद ने अवधी फरुवाही विधा को भिन्न तरीके से प्रस्तुत किया और बुद्ध, कबीर, अम्बेडकर आदि के विचारों को जनता तक पहुंचाने का काम किया। जयपुर से पधारे चंदनलाल कालबेलिया लोकनृत्य समूह ने विविध प्रकार की राजस्थानी लोक संस्कृतियों की झलक पेश की । हिरावल, पटना ने अपने क्रांतिकारी जनगीतों के माध्यम से जनता को उद्वेलित किया । ‘गइया बैरन बवाल किए जाय रे’ गीत ने सम सामयिक यथार्थ और पाखंड पर करारा प्रहार किया तो चंदन तिवारी, आरा ने अपने पुरबिया तान से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।  बंगाल के दीपांकर दास बाउल ने बाउल गान के माध्यम से सूफी, संत और नाथ संप्रदाय की संस्कृतियों से साक्षात्कार कराया। लोकरंग का दसवां आयोजन महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन और दलित चेतना के मशहूर कवि हीरा डोम को समर्पित था। परिवर्तन समूह, ग्वालियर ने नौटंकी शैली में मिथिलेश्वर की कहानी पर आधारित नाटक -‘बाबूजी’ प्रस्तुत किया जिसको नौटंकी शैली में रूपांतरण एवं निर्देशन, जाने-माने रंगकर्मी, फिल्म एवं संगीत निर्देशक, जफ़र संजरी ने किया है। दूसरी रात, रंगनायक द लेफ्ट थिएटर, बेगूसराय ने लोक नाट्य-बहुरा गोडऩ प्रस्तुत किया। इस वर्ष विचार गोष्ठी का विषय था-हाशिए का समाज और लोक संस्कृति। इस गोष्ठी में देश के जाने-माने आलोचक प्रो. चौथी राम यादव, लोक संस्कृति मर्मज्ञ, तैयब हुसैन , आदिवासी संस्कृति के जानकार, ए.के.पंकज, प्रमुख आलोचक, शम्भु गुप्त, डॉ सर्वेश जैन, डा. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा , मदनमोहन, इरफान (राज्य सभा टीवी), सृंजय (कहानीकार, आसनसोल), रामजी यादव, शाह आलम, विद्याभूषण रावत, दीपक सिन्हा (रंगकर्मी, बेगूसराय), शिवकुमार, अखिलेश्वर पाण्डेय (कवि/पत्रकार, जमेशदपुर), मनोज कुमार सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता, गोरखपुर), सहित कई साहित्यकारों  ने भाग लिया।