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Saturday 18 Nov 2017

शिक्षण: कुछ अनुभव


जगमोहन चोपता

अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन
काला भवन, अपर बाजार रूद्रप्रयाग
जिला - रूद्रप्रयाग
उत्तराखण्ड- 246171
मो. 9456591218

बीते कुछ सालों में स्कूलों, कार्यशालाओं में शिक्षक साथियों के साथ संवाद करने के खूब सारे मौके मिले हैं। इस दौरान एक बात समझ में आई कि अभी भी अधिकांशत: भूगोल शिक्षण को लेकर काफी कुछ परम्परागत तरीके से ही शिक्षण हो पा रहा है। इसको कुछ अनुभवों के जरिये आपके साथ साझा करना चाहता हूं।
भूगोल की कार्यशाला में एक शिक्षक साथी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे पांचवी में पढ़ते थे तो उनके स्कूल में गुरूजी ने बच्चों को ग्लोब दिखाया और उसके बारे में बताया था। ये इत्तेफाक था कि उस दिन वे स्कूल नहीं आ पाये थे। पूरे स्कूल में ग्लोब की चर्चा थी। बच्चे उत्सुकता से ग्लोब के बारे में किस्से कहानी बता रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उस दिन उन्होंने स्कूल न आकर बड़ी भूल कर दी। मुझसे रहा नहीं गया और डरते-डरते गुरूजी जी से ग्लोब को देखने की इच्छा जाहिर की। गुरूजी ने मुझे देखा और कहा-‘जा अन्दर ऑफिस में मेज पर रखा है। जाकर देख आ।’ संयोगवश उस दिन मेज पर ग्लोब की जगह गुरूजी का हेलमेट रखा था। मुझे लगा यही ग्लोब है। उसको छूने की बड़ी इच्छा हो रही थी। लेकिन गुरूजी के डर से ऐसा नहीं कर पाया। करीब छह साल बाद बारहवीं में मुझे पता लगा कि जिसे मैं ग्लोब समझता था वह हेलमेट था और ग्लोब कुछ और है।
दूसरी कहानी है एक प्रशिक्षण की। गर्मियों की छुट्टी में स्वेच्छा से राज्य के 27 शिक्षक सामाजिक विज्ञान के शिक्षण पर सात दिवसीय कार्यशाला कर रहे थे। मानचित्र में दिशाओं की पहचान को लेकर काफी चर्चा हुई। साथ ही आकाश में आकाशीय पिण्डों को संकेतक के तौर पर इस्तेमाल करने को लेकर चर्चा हो रही थी। धु्रव तारा की स्थिति को लेकर बातचीत करते हुए इस दौरान कुछ शिक्षक साथियों का मानना था कि धु्रवतारा सुबह और शाम को दिखने वाला चमकीला तारा होता है। इसको लेकर प्रशिक्षण में कुछ विडियो और लेख का उपयोग भी किया गया जिसके माध्यम से धु्रवतारा को लेकर सामाजिक मान्यतायें और वैज्ञानिक तथ्यों को समझा जा सके। लेकिन अब भी एक शिक्षक साथी का मानना था कि धु्रवतारा सिर्फ  सुबह और शाम के वक्त दिखाई देता है। सात दिन हुई इस कार्यशाला में संवाद, साथ मिलकर काम करने के दौरान उनसे काफी संवाद हुआ। जिसमें उनको उन्हें तब भी काफी कठिनाई महसूस हो रही थी कि धु्रवतारा पूरी रात दिखाई देने वाला तारा है।
रात को खाना खाने के बाद धु्रवतारा का अवलोकन करना था। गर्मी के मौसम में पहाड़ी स्थानीय आसमान काफी साफ  रहता है। कार्यशाला स्थल से दो पेड़ों के बीच से सप्तऋषि मण्डल और धु्रवतारा दिखाई दे रहा था। हमने दिन में हुई चर्चा के बाद शिक्षक साथियों को धु्रवतारा ढ़ूंढने के लिये कहा। सभी उसको देखने में जूझ रहे थे इस दौरान वे दिन की बातों का भी सहारा लेने की कोशिश कर रहे थे। आखिकार सभी ने धु्रवतारा को पहचान लिया। इसके बाद सबमें काफी उत्साह था इसको लेकर और काफी सूकुन भी था।
तीसरी कहानी है रूद्रप्रयाग के एक उच्च प्राथमिक स्कूल की। जहां कक्षा 6, 7, 8  के 23 बच्चों के साथ नक्शों पर संवाद किया जा रहा है। बच्चे नक्शे के बारे में बता रहे हैं कि नक्शे में क्या-क्या होता है। नक्शे में सीमा रेखा को लेकर बच्चों में स्पष्टता नहीं थी। वहां संवाद कर रहे शिक्षक ने कोशिश की कि सीमा को समझने के लिये कमरे से बातचीत की शुरूआत की। उन्होंने बच्चों से सवाल किया कि इस कमरे की सीमा क्या है। सीमा किसी जगह को कैसे अलग-अलग करती है। गांव में छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेत की सीमा को बांटने के लिये पत्थर लगाया जाता है। जिसे ओडा कहते हैं। ओडा को लेकर चर्चा के दौरान यह बात आई कि गांव में ओडा को लेकर कई बार झगड़ा हो जाता है। घरों में लोग झगड़ा होने पर गालियां देते हैं। कई बार गांव में पंचायत लग जाती है।
चर्चा में बच्चों ने बताया कि गांव और जंगल की सीमा को मुंडेर बनाकर अलग-अलग किया जाता है। तभी संवाद करने वाले व्यक्ति ने सवाल किया कि अगर कोई इस मुंडेर को खिसका दे या उसको और दूर कर दे तो क्या होगा? बच्चों ने बताया कि उन्हें जेल हो सकती है। जुर्माना भी हो सकता है। इस पूरी चर्चा को उन्होंने नक्शे में बनी सीमा रेखाओं जोडऩे की कोशिश की। इस प्रकिया में बच्चे भी काफी सहज थे और उनको समझने में आसानी हो रही थी। इन्हीं सीमाओं की लड़ाइयों की गांव में होने वाले खेत की लड़ाइयों से तुलना कर पा रहे थे।
अब ये तीन कहानियां अलग-अलग जगहों की है। ये क्या कहना चाह रही हैं? इन कहानियों के कई मायने हो सकते हैं लेकिन यहां इनको सुनाने का मेरा मकसद बहुत ही सीधा साधा है। इन कहानियों को अगर सामाजिक विज्ञान विषय या भूगोल से जोडक़र देखा जाय तो कुछ बातें स्पष्ट होती नजर आती हैं।
पहली बात,तीनों कहानियों में एक चीज बहुत ही गहरे से उभर कर आती है कि इन विषयों को पढऩे, इनके बारे में जानने के लिये बहुत उत्सुकता रहती है। इस उत्सुकता के कारणों की ओर जाये तो ऐसा लगता है कि इन विषयों में होने वाली चर्चाएं या उनके संदर्भ कहीं न कहीं आम जीवन से जुड़े होते हैं। या यूं कहें कि रोजाना हमारे आस पास होने वाले परिवर्तन, उनके कारण और किसी खास भू क्षेत्र में उसके मायने हमें इस ओर समझने के लिये उत्सुक करते हैं।
दूसरी, जो कि इसके बिल्कुल उलट है वह यह कि इन विषयों को उतना रोचक तरीके से पढ़ाने की अभी बहुत गुंजाइश है जो इनके मूल में हैं। जबकि इन विषयों को पढऩे-समझने वालों को ये बहुत बोर और उबा देने वाला लगता है। इसमें पठन सामग्री से लेकर इनके प्रस्तुतिकरण में काफी सुधार की गुंजाइश लगती है।
तीसरी बात, इन कहानियों से समझ में आती है कि जब भी शिक्षक या शिक्षा में काम कर रहे व्यक्तियों द्वारा इन विषयों को जीवन से जोडऩे, इन विषयों से निहित दक्षताओं को पाने की कोशिश के लिये थोड़ा सा रूटीन से हट कर प्रयास होता है जैसा तीसरी कहानी में हो रहा है, तो परिणाम बहुत ही उत्साहित करने वाले मिलते हैं। लेकिन ऐसा काफी कम हो पा रहा होता है।
चौथी बात, इन विषयों को लेकर हमारे बहुत सारे पूर्व के अनुभव होते हैं। जो हमें समाज के द्वारा मिलते हैं। ये अनुभव कई बार इन विषयों को बेहतर समझने में मदद करते हैं तो कई बार समाज में प्रचलित मान्यताओं या किवंदतियों के रूप में हमारे मन मस्तिष्क में इतने गहरे से घर कर जाती है कि वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण और सोचने-समझने को बहुत ही जोरदार तरीके से रोकती है। जैसा दूसरी कहानी में लग रहा है।
हमारे इन अनुभवों (जो कई बार सही नहीं होते हैं) के चलते हमारे विषयों को समझने को लेकर एक खास तरह का आग्रह होता है। यही आग्रह समाजिक विज्ञान विषय या भूगोल को उसकी प्रकृति के अनुसार समझने-जानने को रोकता है। यह सिर्फ  रोकता ही नहीं बल्कि उसकी गलत व्याख्या तक कर देता है। ऐसे में इस विषय का अपना रोमांच कहीं सिमट कर अपने पूर्व ज्ञान के खात्मे के डर में तब्दील हो जाता है और हमें नया कुछ जानने समझने के दरवारे बंद कर देता है।
इन बातों के बाद लगता है कि आगे क्या? एनसीएफ 2005 में सीखने को सृजनवादी या रचनावादी नजरिये से देखने की बात की पुरजोर वकालत की गई है। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि बच्चे को उसके परिवेश में सीखने-समझने के ज्यादा से ज्यादा मौके मुहैया कराया जाय। इसी डॉक्यूमेंट में सामाजिक विज्ञान शिक्षण के बारे में कहा गया है कि इस विषय की मूलभूत दक्षताओं को समझने के लिए बच्चों को प्रोजेक्ट कार्य, भ्रमण, आदि के जरिये परिवेश से समझने जाने की बात की गई।
इस विषय को जानने समझने के लिये जितने ज्यादा संदर्भ, बच्चों के अनुभवों को स्थान दिया जाये उससे कक्षा शिक्षण रोचक हो सकता है। शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को स्कूल, गांव घर के नक्शों को बनाने, गांव के आंकड़ों को उसमें दर्शाने के लिये प्रयोग किया जा सकता है। इस काम में बच्चों को थोड़ा समय और धैर्य की जरूरत होती है।
नक्शों और ग्लोब का कक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा उपयोग सीखने समझने के लिये काफी उपयोगी हो सकता है। बच्चों के साथ कक्षा, स्कूल, गांव का खाकाचित्र, इस प्रक्रिया में बच्चों को शुरूआती खेल से शुरू कर उसको कक्षा शिक्षण की प्रक्रियाओं से जोडऩे की जरूरत लगती है। साथ ही अन्य विषयों के शिक्षण के दौरान भी नक्शों और ग्लोब का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जा सकता है। जैसे हिन्दी की कक्षा में यदि किसी कविता को पढ़ा जा रहा है तो क्या इसमें आये स्थानों के नाम को नक्शे या ग्लोब में ढूंढने के लिये कहा जा सकता है।
इस विषय को बेहतर समझने के लिये अवलोकन बहुत कारगर टूल के तौर पर लगता है। स्कूल और उसके आसपास के परिवेश की चीजों के अवलोकन को लेकर बच्चों के साथ खूब सारी गतिविधियां की जा सकती हैं, जिसको धीरे धीरे सूरज के उगने, तारों की स्थिति के अवलोकन तक ले जाया जा सकता है। खोजबीन विधा द्वारा शिक्षण इसमें बहुत कारगर लगता है। जिसमें बच्चे और शिक्षक किसी विषय को लेकर खोजबीन करते हैं। इसमें सवालों को बनाने से लेकर उनके जवाबों की तह में जाने और फिर निष्कर्ष निकालने की कोशिश की जाती है। बच्चे और शिक्षक जब समुदाय में जाकर इस तरह से काम करते हैं तो सीखने की प्रकिया सहज हो जाती है। और इससे बच्चों को चीजों को छूने, जानने, आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया में बहुत कुछ सीखने समझने का मौका मिलता है। साथ ही किसी भी निष्कर्ष से पहले उसको जांचने परखने का मौका मिलता है। इससे सीखना सच में सार्थक हो जाता है। खोजबीन विधा में भूकम्प को लेकर खोजबीन कर रहे उत्तरकाशी के एक स्कूल के बच्चों ने 1990 में आये भूकम्प में हुए नुकसान की पड़ताल की तो पता लगा कि इस गांव में हताहत होने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा है। शुरूआत में लग रहा था कि गांव में महिलायें ज्यादा होगी। लेकिन जब बच्चों ने इसके कारणों का पता लगाने के लिए गांव के लोगों से पूछताछ की तो पता लगा कि कारण कुछ और ही है। गांव के बुर्जुगों ने बताया कि महिलायें अपने बच्चों और परिजनों को बचाने के लिये बार-बार घरों के अन्दर आई जिसकी वजह से उनकी संख्या बढ़ी है। यह बहुत ही दर्दनाक सत्य था जिसको सतही आंकड़ों से नहीं जाना जा सकता। इस तरह की पड़ताल से इस विषय को और बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है। विषय को जानने समझने के लिये कारणों की पड़ताल और गहराई में जाकर की जाए तो इस विषय को पढऩे समझने का आनंद बढ़ जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बच्चों को खुद खोजने, करने और उसका निष्कर्ष निकालने के मौके मिलते हैं जिससे वे सहजता से सीखते हैं