Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

बड़े अनमोल गीतों के बोल

डॉ.सुनील केशव देवधर
ए 201, कुणाल बिलेजा
एलएमडी चौक, पेट्रोल पंप के सामने
बावधन, पुणे-411021
मो. 9823546592
फिल्म- मीर
गीत- जिन्दगी हंसने गाने के लिए है
गीत- साहिर लुधियानवी
संगीतकार- सपन जगमोहन चक्रवर्ती
मनुष्य का जीवन क्या है, और उसके जीवन का लक्ष्य क्या है, ये दो बड़े प्रश्न उम्रभर मनुष्य के साथ चलते हैं दोनों प्रश्नों के उत्तर उसके पास है, लेकिन ‘सारा जीवन बीत गया, जीने की तैयारी में’ के कारण दो पल ठहरकर इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की फुरसत ही नहीं मिलती।
जिन्दगी हंसने गाने के लिए है, पल दो पल, इसे खोना नहीं, खो के रोना नहीं, कहकर गीतकार किस ओर संकेत करता है। हंसने गाने का अर्थ क्या है और पल दो पल के लिए भी इसे न खोने देने का कारण क्या है, और अगर वह पल खो भी जाए तो, ‘खो के रोना नहीं’ का आशय है, ‘बीति ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले।’
तुलसी दास कहते हैं- ‘बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा’ यानि बड़े भाग्य से मिला यह मनुष्य जन्म। तो इसकी सार्थकता क्या है। हंसने गाने के लिए है, का अर्थ खाओ पियो मौज करो लगाना, शायद गीत के मूल विचार के साथ थोड़ा अन्याय होगा। क्योंकि अगली पंक्तियों में गीत कहता है, ‘तेरे गिरने में भी तेरी हार नहीं कि आदमी है अवतार नहीं’ और हमारे यहां तो अवतार भी मानव जीवन के संघर्ष के प्रतीक बन कर चले हैं। गिरना और गिरकर संभलना जीवन का अनिवार्य क्रम है, शायर कहता है-
‘गिरते हैं शह सवार ही मैदान-ए-जंग में
वो तिफ्ल क्या गिरे, जो घुटनों के बल चले।’
बच्चा घुटनों के बल चलता है, लेकिन जब घुटनों के ऊपर उठता है तो गिरता अवश्य है। उसका यह गिरना और गिरकर फिर उठना चलने के प्रति उसकी इच्छा का परिणाम है। मनुष्य को हर परिस्थिति से निभाना आना चाहिए। अभावों के बीच रहना और जीना, थोड़े में काम चला लेना और उस अभाव का दुख न मनाना ही इन पंक्तियों के संकेत की सार्थकता है। इस दुनिया में सच और झूठ के  बीच संघर्ष सदा ही चलता रहा है। सत्य और असत्य,  ह$क और हासिल की लड़ाई हमेशा रही है। फिर तो राम का संघर्ष हो या हुसैन की कुर्बानी। लेकिन सच और झूठ के बीच की आदर्श स्थितियां और है, और साधारण आदमी के जीवन के अव्यवहारिक पक्ष की परिस्थितियां अलग हैं।
तो क्या इसे मान लिया जाए कि जहां सच न चले वहां झूठ सही, जहां ह$क न मिले वहां लूट सही। किसी विशेष परिस्थिति और प्रयोग में यदि थोड़ी देर के लिए इसे मान भी लिया जाए लेकिन अंतत: एक सभ्य समाज की स्थापना के मानव स्वप्न को इस तरह नहीं देखा जा सकता। ये माना कि आज समाज में आदर्श आचरण का बखान तो है पर उस पर चलने का विधान कहीं नजर नहीं आता। इस प्रसंग में साहिर लुधियानवी की नज्म याद हो आती है- गांधी और गालिब की जन्म शताब्दी के संबंध में उन्होंने लिखा-
‘गांधी हो या गालिब हो, खत्म हुआ दोनों का जश्न
आओ इन्हें अब कर दें दफन।’
इस नज़्म का यह शेर गीत की पंक्ति ‘यहां चोर है सब कोई साधु’ की वकालत करता ही जान पड़ता है-
खत्म कर तहजीब की बातें, बन्द करो कल्चर का शोर,
सत्य, अहिंसा सब बकवास, तुम भी $कातिल हम भी चोर,
खत्म हुआ दोनों का जश्न,
आओ इन्हें सब कर दें दफ्ऩ।
तमाम स्तरों पर गांधी विचार और दर्शन को, अनेक लोगों की मत भिन्नता के बावजूद लोग मानते हैं, दूसरा गांधी फिर होना अब असंभव ही है। ‘सुख ढूंढ ले, सुख अपराध नहीं’ वाली बात सही है, और गांधी की तरह समाज के लिए सुख का त्याग अवश्य ही एक आदर्श भावना है, लेकिन सुख प्राप्ति की चाह कोई अपराध भी तो नहीं बशर्ते सुख प्राप्त का मार्ग गलत नहीं होना चाहिए। जीवन का सारा झगड़ा इसी गलत मांग और मार्ग का है, जो हंसने गाने नहीं देता।