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Monday 20 Nov 2017

कुँवरनारायण की कविताओं में सामाजिक-राजनैतिक विषमता

 

  अमरनाथ प्रजापति

शोधार्थी, हिंदी विभाग
 कमरा संख्या.101, विंग.सी, एनआरएस हॉस्टल
हैदराबाद विवि,हैदराबाद -500046 मो. 8985035590

कुंवरनारायण की कविताओं में मानवीय जीवन के बुनियादी सरोकार प्रकट होते हैं। उनकी कविताओं का भावबोध अपने समकालीन रचनाकारों से बिल्कुल भिन्न है। उसमें इतिहास, संस्कृति, समाज और राजनीति के विविध पहलुओं पर गहराई से चिंतन है। उनकी अभिव्यक्ति में न तो भावावेश की व्याकुलता है और न बौद्धिकता की दुरुहता, बल्कि उसमें संवेदना, बुद्धि, मन और  प्रज्ञा का एक समिश्रण है। वे भावों में विह्वल या आक्रोशित नहीं होते, बल्कि उसे बौद्धिक आग में तपाकर पैना और नुकीला कर प्रस्तुत करते हैं। आज की राजनीति और समाज की संरचना को समझने तथा मनुष्य के जटिल जीवन को कविता में अभिव्यक्ति के लिए भावपक्ष, विचार-तत्व और बुद्धि-तत्व को समान रूप से महत्त्व देते हैं। उन्हीं के शब्दों में कवि मूलत: विचारक नहीं, आवश्यकत: विचारक भी है। उसका काम हमें बौद्धिक बनाना नहीं, बुद्धिमता के प्रति संवेदनशील बनाना है। हमारी समझ के उपकरणों को पैना रखना है ताकि हम वास्तविकता को बुद्धि, मन और प्रज्ञा के विभिन्न स्तरों पर साथ-साथ ग्रहण कर सकें, कोई एक क्षमता दूसरों को दबाकर बर्बर या दूसरों से दबकर दुर्बल न हो जाए, मेरी दृष्टि में आज की कविता का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है।1
कुँवरनारायण की अनेक कविताओं में सामाजिक और राजनैतिक जीवन-संघर्ष की प्रतिध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। राजनैतिक व्यवस्था के भ्रष्ट एवं छद्म रूप और उसमें फंसे हुए लाखों लोगों की अभिशप्त जीवन के नग्न यथार्थ को उन्होंने बारीकी से प्रस्तुत किया है। उनकी कविताएँ न्याय व्यवस्था की विडम्बनाओं पर करारा चोट करती हैं जो सत्ता के चंगुल में गिरफ्त है। देश के अनेक शीर्ष न्यायालयों में किसी भी मुकदमे को एक रस्म और रीति की तरह निभाया जाता है। उसमें पाखंड और चालाकी का बोलबाला है। मुकदमे की तारीख बदलती रहती है, और फैसले तब आते हैं जब लोग लड़ते-लड़ते थक जाते हैं या मर जाते हैं। इस तरह के न्याय व्यवस्था का यथार्थ चित्र मुकदमे कविता में करते हैं-
जिन्हें सुनाई गयी
मौत की सजा
कब के मर चुके थे
जिन्हें रिहाई दी गयी
पूरी सजा काट चुके थे 2
आज जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं उसकी असलियत और भ्रष्ट चेहरा को कुँवरनारायण बेनकाब करते हैं। लोकतंत्र की न्यायिक व्यवस्था किस तरह चतुर, चालाक और साधन-सम्पन्न लोगों के दलदल में फंसी हुई है, उसे सफलता की कुंजी कविता में देख सकते हैं। पूरी कविता न्यायिक व्यवस्था के छद्म रूपए राजनीतिक उलट-फेर, बुद्धिजीवियों की चालाकी और बेकसूरों को जानबूझकर फंसाए जाने ब्यौरा का प्रस्तुत करती है। दो लोगों की लड़ाई-झगड़े में तीसरे, चौथे, पाँचवें आदि लोगों को किस प्रकार फंसाया जाता है और अंत में अपने को निर्दोष साबित करने की कलाबाजी और जालसाजी मुखौटा का चित्र इस कविता में उभरकर सामने आता है-
उस वक्त वहां दो ही थे
लेकिन जब गोलियाँ चलीं
मारा गया एक तीसरा जो वहां नहीं
चाय की दुकान पर था
पकड़ा गया एक चौथा
जो चाय की दुकान पर भी नहीं
अपने मकान पर था, उसकी गवाही पर
रगड़ा गया एक पाँचवाँ जिसे किसी छठे ने
फंसवा दिया था, सातवें की शिनाख्त पर
मुकदमा जिस आठवें पर चलाए फलस्वरूप
सजा नवें को हुई 3
ऐसे भ्रष्ट तंत्र, कुचक्रियों और नकली चेहरों के बीच आम जनता विवश और अभिशप्त जीवन जी रही है। यह सब जानते हुए भी उनके अन्दर न प्रतिरोध का सामथ्र्य है और न ही कोई सार्थक उपाय ही। हर आदमी की जुबान बंद है। चापलूसी, चालाकी, भय, आतंक, अत्याचार आदि ने सत्य, न्याय और ईमानदारी का गला घोंट दिया है। हालात रघुवीर सहाय की कविता रामदास जैसी है। सबको पता है कि भ्रष्टाचार और दुराचार के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब मानसिक प्रताडऩा और हत्या है। ऐसे में कुँवरनारायण ने सम्मेदीन की लड़ाई कविता में सम्मेदीन को एक सकारात्मक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है जो खतरों को जानते हुए भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अकेला लड़ रहा है-
भरपूर उजाले में रहे उसकी हिम्मत
दुनिया को खबर रहे
कि एक बहुत बड़े नैतिक साहस का
नाम है सम्मेदीन 4  
कुँवरनारायण की अनेक कविताएँ सामाजिक जीवन की विडम्बनापूर्ण स्थितियों को व्यक्त करती है। इन कविताओं में मानवीय जीवन की जटिलता और विकलता उभरकर सामने आती है । कुँवरनारायण आज के समय और समाज की विडम्बनापूर्ण जीवन के तंतुजाल में बहुत कुछ देख लेते हैं तथा उसमें से अपनी सामग्री टटोलकर उसे शब्दबद्ध करते हैं। आज पूंजीवाद और बाजारवाद आम मनुष्य के जीवन शैली पर पूरी तरह हावी है। सत्ता के साथ उनका गठजोड़ आम आदमी की नियति को किस तरह दबोच लिया है, उसकी सच्चाई शिकायत कविता में साफ  दिखाई पड़ती है, जिसमें आदमी का मोलभाव और कीमत व्यापारिक वस्तुओं की तरह किया जा रहा है-
अगर तुम मालामाल हो
तो हर आदमी एक बिकाऊ माल है
आज जबकि हर चीज का दाम सिर्फ  बढऩे की ओर है
आदमी की कीमत में भारी छूट का शोर है 5
स्वत्रंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी देश की बदहाली, लूट-खसोट, दमन, शोषण जस की तस बनी रही। राजनीतिक बदलाव तो हुआ पर सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था और आम लोगों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। समाज में उत्पीडन, अन्याय, भ्रष्टाचार उसी तरह रहा, जिससे अनेक रचनाकार अन्दर से दुखी एवं व्यथित हुए। कुँवरनारायण ने भी इस आतंरिक पीड़ा को अपनी कविताओं में व्यक्त किया, किन्तु छटपटाहट और बेचैनी के बजाय वैचारिक और बौद्धिक रूप में। मुक्तिबोध इस अभिव्यक्ति को अंतरात्मा की पीडि़त विवेक चेतना कहते हैं। ऐसे पीडि़त आत्मचेतना ने कुँवरनारायण की रचनात्मकता में व्यापक अर्थ विस्तार दिया। कृष्ण दत्त पालीवाल के शब्दों में -कवि भावुक नहीं है वह बौद्धिक स्तर पर उत्पीडऩ यातना के कारणों पर विचार करता है। इसी चेतना से कुँवरनारायण में जीवनानुभूतियों के विस्तृत विविध अर्थ खुलते हैं। 6 समाज में यह दमन, शोषण और लूटपाट का सिलसिला आज भी उसी तरह जारी है.
लूटें आज भी जारी हैं
अरबों तक पहुंचेगी
अगर डालरों में भी आँकी जाए
उस लूट और पाट की कीमत 7   
आज का समय और समाज संवेदनहीनता, निष्क्रिय चेतना, निजी स्वार्थ, लोभ, छल, प्रवंचना आदि के गिरफ्त में चला जा रहा है। आम आदमी की आवाज का कोई अर्थ नहीं बचा है। हर तरफ नकली मुखौटा लगाकर शोषण, हिंसा और दुराचार का बढ़ावा मिल रहा है। लोगों को अपने मूल कर्तव्यों का बोध नहीं रहा। सरकारी व्यवस्था के नाम पर जालसाजी, झूठ, भ्रष्ट, षडयंत्र में लोग लिप्त हैं जिससे आम लोगों का जीवन संकटग्रस्त और असुरक्षित है। इन्तिजाम कविता में कुँवरनारायण ने अस्पतालों में सुरक्षा और सहायता के नाम पर होने वाले छद्म नकाबपोशों का वास्तविक चेहरा उघाडक़र रख दिया है।
मैं अस्पताल गया
लेकिन वह जगह अस्पताल नहीं थी
वहाँ मैं डॉक्टर से मिला
लेकिन वह डॉक्टर नहीं था
             ......    
फिर वहाँ एक अधमरा बच्चा लाया गया
जो बीमार नहीं, भूखा था 8
यहाँ पर कुँवरनारायण अस्पताल में होने वाली कालाबाजारी, अमानवीयता और घृणित आकांक्षाओं का पर्दाफाश करते हैं  जहाँ इलाज के नाम पर हत्या, लोभ, निजी स्वार्थ की लिप्सा में लोग अंधे हैं। यह आज के समय और समाज की कुत्सित और भयावह तस्वीर है। अत: हम देखते हैं कि कुँवरनारायण ने अपनी कविताओं में राजनैतिक और सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। वे न्याय व्यवथा और सत्ता के भ्रष्ट और क्रूर रवैयों  की बारीकी से पड़ताल करते हैं तथा समाज में आम लोगों की बदहाली, शोषण और प्रताडऩा को उजागर करते हैं।
सन्दर्भ :
1. परिवेश : हमतुम, कुँवरनारायण,पृष्ठ.7 ;भूमिका से   
2. कोई दूसरा नहीं, कुँवरनारायण, पृष्ठ. 105
3. कोई दूसरा नहीं, कुँवरनारायण पृष्ठ. 61
4. कोई दूसरा नहीं, कुँवरनारायण पृष्ठ. 18
5. कोई दूसरा नहीं, कुँवरनारायण पृष्ठ. 114
6. पूर्वाग्रह, संपादक. प्रेमशंकर शुक्ल  जुलाई दृसितम्बर 2014, पृष्ठ.28
7. हाशिए का गवाह, कुँवरनारायण पृष्ठ.35
8. अपने-सामने, कुँवरनारायण, पृष्ठ.28