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Wednesday 22 Nov 2017

कैकेयी: विभिन्न रामकाव्यों के संदर्भ से

डॉ शोभा निगम
बैरन बाजार, रायपुर
मो. 09826947776  

अपने दुष्ट एवं कठोर स्वभाव के लिये विख्यात कैकेयी का रामकथा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उल्लेखनीय है कि राम के वनवास का एवं दशरथ की मृत्यु का कारण बनी कैकेयी का नाम आज भी भारतीय जनमानस में उस औरत के लिये लिया जाता है जो परिवार पर अपने कटु एवं स्वार्थी प्रवृति के लिये विपदा लाती है। वैसे परवर्ती रामकथाओं में कैकेयी राम को वनवास देने के कारण प्रशंसित भी हुई है।
वाल्मीकि-रामायण में दशरथ की तीन प्रमुख रानियों में केवल कैकेयी के मायके का ही कुछ विस्तार से वर्णन मिलता है। कैकेयी भारत के पश्चिम भाग पर स्थित केकय देश (सिंधुदेश के निकट) के राजा अश्वपति राजसिंह की पुत्री थी। इसके एक भाई युधाजित् का उल्लेख रामकथाओं में मिलता है।
यह केकय-कन्या स्वभाव से कुछ उद्दंड और जिद्दी थी (अपनी माता के समान) किंतु उतनी बुरी भी नहीं थी। बूढ़े दशरथ को वह अपने रूप और यौवन से ही नहीं, अपने प्रेम एवं कुछ अन्य गुणों से भी मोहित किए हुए थी। वह वीरांगना थी, युद्ध-भूमि में वह दशरथ के साथ जाती थी। साये की तरह उनके साथ लगी रहती थी। देवासुर संग्राम में जब दशरथ युद्धभूमि में गिरकर मरणासन्न हो गये थे, तब कैकेयी ने अनेक प्रकार से प्रयत्न करके उनके जीवन की रक्षा थी (वा.रा.अयो.कां.319)। वस्तुत: इसी से संतुष्ट होकर अवधेश ने उसे दो वर दिये थे जिससे उसने अपने पुत्र भरत के लिये अयोध्या का सिंहासन और राम के लिये वनवास मंागा था। परवर्ती कुछ रामायणों के अनुसार युद्धभूमि में उसने अपने हाथ को रथ के पहिये की टूटी धूरी में डाले रखा था ताकि उसका ढीला हो चुका पहिया निकल न जाये। इस पर प्रसन्न दशरथ ने उसे दो वर मंागने कहा तो वह समझ नहीं पाई कि क्या मंागे। उसे किसी चीज की कमी भी तो नहीं थी। तब उसने संभवत: पति को प्रसन्न करने के लिये कहा था...या फिर नियति ही उसके मुख से कहला गई कि आपके प्रदत्त मेरे दो वर आपके पास मेरी धरोहर रहे, फिर कभी मांग लूंगी।
अस्तु, अपने उद्दंड स्वभाव के अनुरूप कैकेयी अपनी सपत्नियों के प्रति कुछ कठोर थी। विशेषकर पटरानी कौशल्या तो उससे सदा ही तिरस्कृत होती रही किंतु राम के प्रति उसकी ममता कम नहीं थी। निश्चय ही इसमें स्वयं राम के सद्गुणों का भी कम योगदान नहीं था किंतु सत्य यही है कि वह राम को भरत से कम प्यार नहीं करती थी। कहीं कोई द्वेष, कोई ईष्र्या, कोई सौतेलापन उसके मन में राम के प्रति नहीं था।
राम के प्रति कैकेयी के प्रेम का बड़ा प्रमाण प्रारंभ में ही मिलता है जब वह मंथरा से राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनती है। तब इस बात पर उसका ध्यान ही नहीं जाता कि मंथरा कितनी कडुवाहट से यह समाचार कह रही है। तभी तो यह शुभ समाचार सुनते ही यह भरत-माता उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्ण चन्द्रलेखेव शारदी अर्थात् शरद-पूर्णिमा के चन्द्रमंडल की भांति उद्दीप्त हो उठी और अतीव संतुष्ट हो मुस्कुराते हुए उसने कुब्जा (मंथरा) को पुरस्कार के रूप में एक सुंदर दिव्य आभूषण यह कहते हुए प्रदान किया-मंथरे! त्ूाने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया है। बता इसके लिये तेरा और क्या उपकार करूं? किंतु कैकेयी का दिया बड़े से बड़ा पुरस्कार मंथरा के मन की उस आग को कैसे शांत कर सकता था जो राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर ईष्र्या ने उसके भीतर लगाई थी? कौशल्या की दासी की नई पीली रेशमी साड़ी मानो आग की लपटें बनकर उसके हृदय को तप्त कर रही थी। जब उसके सामने अपने को सदा बौनी समझने वाली कौशल्या की दासी ने इतराते हुए अपने तन की पीली साड़ी का पल्लू लहराते हुए बताया कि कल राम का राज्याभिषेक होने वाला है, इसी खुशी में महारानी कौशल्या ने उसे यह उपहार दिया है, तब मानो मंथरा के सीने में संाप लोटने लगा। अब उसके सीने से यह संाप-लोटन तभी हट सकती थी जब राम के स्थान पर भरत राजा हो। अत: कैकेयी के मायके से साथ आई उसकी यह मुंह-लगी दासी कैकेयी को तरह-तरह से भडक़ाती और डराती भी है, ताकि राम के स्थान पर भरत को राजा बनाने की बात कैकेयी राजा दशरथ से करें।
प्रारंभ में मंथरा की बातों का कैकेयी पर कोई असर नहीं पड़ा। बल्कि वह राम की प्रशंसा करते हुए ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते भी राम को ही युवराज के योग्य बताती है। यह भी कहती है कि राम कौशल्या से अधिक मेरी सेवा करते हैं, उन्हें राज्य मिला तो भरत को ही मिला समझो क्योंकि राम अपने भाइयों को भी अपने ही समान समझते हैं। कैकेयी यहां आश्चर्य से पूछती है कि राम के अभिषेक की बात सुनकर तू इतना जल क्यों रही है? (वा.रा.अयो.कां.8.14-19)
प्राय: सभी रामकथाओं में जली-भुनी मंथरा ही कैकयी को राम के राज्याभिषेक का शुभ समाचार देती है और यह सुनकर कैकेयी पहले प्रसन्न होती है फिर मंथरा के राम-विरोधी वचन सुनकर उसे झिडक़ती है। तमिल कंब रामायण के रचयिता कंबर इस प्रसंग में लिखते हैं-राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर मंथरा ने कैकेयी के शयन कक्ष में ऐसे प्रवेश किया मानो बुरे काल का कोई बुरा ग्रह हो। कैकेयी उस समय शयन कर रही थी। उसके पास पहुंच कर उसने कैकेयी के मृदु चरणों का स्पर्श किया और उच्चस्वर में रुदन करते हुए वह बोलने लगी...आपका विभव मिट गया...सौभाग्य समाप्त हो गया! कौशल्या उत्कर्ष पा गई (अयो.कां 145)! कैकेयी को इस पर आश्चर्य हुआ कि यह कह क्या रही है। वह पूछती है-कौशल्या तो पहले ही उत्कर्ष पा चुकी। राजा दशरथ के समान जिसका पति हो और जिसका पुत्र भरत के समान हो उसके समान उत्कर्ष और किसका होगा? (वही,146) कैकेयी यह भी कहती है कि मेरे चार पुत्र शत्रुनाशक परम धनुर्धर हैं। इनमें भी राम को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए वह मंथरा को फटकारती है कि जिसका राम जैसा पुत्र हो ऐसी मुझ पर क्या कभी विपदा आ सकती है? (वही,147) ध्यातव्य है कि यहां कैकेयी राम को अपना और भरत को कौशल्या का पुत्र कह रही है! च्ंाद्र झा की मैथिली रामायण में मंथरा के चीखते हुए रोने पर कैकेयी कहती है- तुम मेरे कानों की बरदाश्त के बाहर शोर मचा रही हो। अब अधिक बोलोगी तो दासी को बुलवाकर तुम्हारे कूबड़ की पिटाई करवाऊंगी। इस पर मंथरा रुठते हुए कहती है- मेरा गला सूख रहा है पर पानी नहीं पिऊंगी (अयो.कां.129)।
उपेन्द्र भंज रचित ओडिया रामायण वैदेही विलास में कवि इस सारे नाटक के विषय में लिखते हैं-मंथरा कंठागतप्राणा सी कटे हुए वृक्ष के सदृश्य कैकेयी के समक्ष जा गिरी। वह कहती है-ऐसा लग रहा है मैंने जहर खा लिया है। सारी बात सुनकर कैकेयी जब कहती है कि राम ज्येष्ठ हैं, अत: राज्य के वे ही अधिकारी हैं, तब मंथरा कहती है-इससे क्या होता है। बलवान असुर देवताओं से पहले पैदा हुए इसीलिये वे पूर्वदेव कहलाते हैं। वे देवताओं के बड़े भाई कहे जाते हैं। किंतु बड़े भाई होते हुए भी छोटे भाई इन्द्र स्वर्ग के राजा बन गये। उसी तरह तुम्हारा पुत्र भी छोटा होते हुए भी राजा बन सकता है (17.12)।
वाल्मीकि ने यहां मंथरा द्वारा किये गये कैकेयी के मानस-परिवर्तन का बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण बतलाया है। परवर्ती भक्तिपरक रामकथाओं में यह परिवर्तन देवताओं के कहने से देवी सरस्वती करवाती है किंतु संभवत: यहां व्यर्थ ही देवताओं और वाक्देवी को घसीट कर अपयशी बनाया गया है। मंथरा के तर्क ही यहां कैकेयी के बदलने के लिये पर्याप्त थे। वह कहती है, ‘आज राम राजा होंगे, कल उनका पुत्र राजा होगा, ऐसी स्थिति में भरत तो सदा के लिये राज-परम्परा से अलग हो जाएंगे! फिर, सौतेला भाई होने के कारण तुम्हारा पुत्र भरत तो वैसे भी राम का सहज-शत्रु है, उसे राम अवश्य ही देश से निर्वासित करवा देंगे या फिर मरवा डालेंगे। राम से भरत ही छोटे हैं, लक्ष्मण, शत्रुघन का क्रम बाद में आता है अत: राम को खतरा तो सबसे अधिक भरत से ही है। राम के राजा बनने पर तुम्हें भी हाथ जोडक़र उनकी और उनकी माता की सेवा में रहना होगा।’
भविष्य के इस भयंकर चित्र को दिखाकर मंथरा कैकेयी को दशरथ के विरुद्ध भी भडक़ाती है। वह राम के अचानक अभिषेक की तैयारी को राजा की सोची-समझी चाल बताते हुए कहती है-
अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुशु।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहितकण्टके।। (वा.रा.अयो.कां.7.26)
राजा का हृदय इतना दूषित है कि भरत को तो तुम्हारे मायके भेज दिया और कल प्रात: ही अवध के निष्कण्टक राज्य पर वे राम का अभिषेक करेंगे।
अब मंथरा का दांव एकदम सही पड़ा। कैकेयी मानो खुली अंाखों से निकट भविष्य में स्वयं को कौशल्या का तथा भरत को राम का दास बनते देखने लगी....नहीं वह ऐसा कदापि नहीं होने देगी। अब तक सारे अंत:पुर, सारे अवध और अवधेश पर भी राज करने वाली वह भला कौशल्या की दासी कैसे बन सकती थी? राम ठीक है, पर उसका प्यारा पुत्र राम का दास बने यह उसके जीते जी कैसे हो सकता है? अब या तो मरण है या अपनी इच्छा का जीवन। क्या करूं? उसने मंथरा से ही पूछा...और तब मंथरा ने उसे ऐसी पट्टी पढ़ाई कि सारा कुछ उलटपलट हो गया।  
कंब रामायण में भी कैकेयी के झिडक़ने के बाद भी मंथरा चुप नहीं हुई। भरत के प्रति अतिप्रेम दिखलाते हुए वह कहती है,‘वह लाल मुख वाली सीता और काले मुख वाला राम जब सिंहासन पर बैठेंगे तब आपका लाड़ला कोरी जमीन पर खड़े रहेगा! कैसी मां हैं आप?..इस पर भी आप आनंद मना रही हैं? कौशल्या ने चालाकी से अपने पुत्र को राज्य दिलवा दिया और आपने अपने पुत्र को निर्धन बना दिया! भरत मरा नहीं पर मृतक से भिन्न नहीं है। वह जन्मा ही नहीं, ऐसा मानना चाहिये। हे भरत! आज राजा तुम्हारे प्रति कू्रर हैं। तुम्हारी माता भी क्रूर है। मेरे तात! अब तुम क्या करोगे।’ इस तरह मंथरा तरह-तरह से नाटकीय प्रलाप करती है (अयो.कां.152-53,157)।       
यहां जिज्ञासा होती है कि जब सब राम से प्रेम करते थे तो मंथरा को राम से इस प्रकार का बैर क्यों था? कंबर इसका कारण बताते हैं कि मंथरा इसलिये नाराज थी क्योंकि कभी बालपन में राम ने खेलते हुए उसे गुलेल से मारा था (वही,138)। वैसे यह कारण कुछ बचकाना सा लगता है।
अस्तु, अंतत: यहां मंथरा कैकेयी पर मनोवांछित प्रभाव डालने में समर्थ रही। कंबर लिखते हैं-अब वह ऐसे दिख रही थी मानो लक्ष्मी की बड़ी बहन ज्येष्ठा (दरिद्रता, अभाव और संकट की देवी) हो जो यह जानकर इधर आई कि जानकी नामक देवी कमला अपने बढ़ते दु:ख के साथ अयोध्या छोडक़र जायेगी और हमारा अब यहां स्थान हो जायेगा (वही,185)। आगे की कथा वही है। राजा को वचनबद्ध कर कैकेयी मनचाहा वर मांगती है। कवि इस समय कैकेयी के विषय में लिखते हैं-दुनिया में जो भी निर्मम और निष्ठुर है, कैकेयी उनमें प्रथम है। कैकेयी मानो सर्प है जिसकी जीभ शब्द नहीं, जहर उगल रही थी...और तब सर्प-दंशन की शक्ति से क्षीण हुए राजा हाथी के समान गिर पड़े (वही ,196)। संास रोके नि:स्पंद से पड़े वे चित्र के समान प्रतीत हो रहे थेे (वही, 199)। पर राजा की इस स्थिति का कैकेयी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंतत: राजा से अपनी बात मनवा कर ही उसने दम लिया।
ओडिय़ा रामायण वैदेही विलास में एक नई बात का उल्लेख है कि कैकेयी को दशरथ ने शंबर युद्ध के समय ही प्रसन्न होकर वर दिया था कि उसका पुत्र ही राजा होगा। मंथरा की पढ़ाई कैकेयी दशरथ से वही वर मंागती है। वह दशरथ से कहती है, क्या बालकों के रेत के खेल के समान आपका वचन व्यर्थ हुआ जो अब राम को राजा बना रहे हैं (17.18)? राम को राजा न बनाने के लिये यहां एक नया तर्क कैकेयी देती है-राम के लिये महिपति की पदवी उचित नहीं है क्योंकि वे मही के दामाद है। सास के लिये दामाद की पत्नी होना क्या उचित होगा (वही,17-19)? कैकेयी की जिद को देखकर कवि लिखते हैं-पूर्व जन्म में कैकेयी शायद पिशाची रही होगी, तभी तो अभी पिशाची के समान आग उगल रही है। जैसे बहरी स्त्री एक ही बात में लगन लगाये रखती है वैसे ही कैकेयी एक ही बात रटती रही कि राम शीघ्र ही वन जावें (वही 25)।
देवताओं की साजिश
हमने ऊपर लिखा है परवर्ती भक्तिपरक रामायणों में देवताओं पर कैकेयी की मति पलटने का आरोप लगाया गया है। इससे कैकेयी का दोष कुछ कम हुआ है। श्रीधर की मराठी रामायण रामविजय में उल्लेख है कि राम के राज्यतिलक की रात्रि ब्रह्मा ने विकल्प (विघ्नबाधा उत्पन्न करने वाला देव) से कहा कि राजतिलक में विघ्न उत्पन्न करो। किसी में प्रवेश कर काम बिगाड़ो। किंतु अवध में सब इतने धर्मशील थे कि विकल्प के समझ नहीं आया कि किसमें प्रवेश करूं। किसी तरह उसे मंथरा मिली जो राम से बैर रखती थी अत: वह उसमें प्रविष्ट हो गया। किंतु मंथरा अकेली क्या कर लेती अत: बाद में वह कैकेयी में भी प्रविष्ट हुआ।  
मानस के अनुसार देवताओं के आग्रह पर सरस्वती यह काम करती है। वह पहले मंथरा को पकड़ती है-नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि। अजस पिटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।(अयो.कां.12) मंथरा की बातों में जब कैकेयी नहीं आती तब देवतागण कैकेयी को वश में करते हैं सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि।।(अयो.कां.16)
तुलसी ने यह प्रसंग बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया है। यहां कैकेयी का मानस-परिवर्तन दैवप्रेरित होते हुए भी अत्यंत स्वाभाविक लगता है। कैकेयी की मंदमति दासी मंथरा जब नगर को सजाया जाता हुआ देखती है तो कारण जान जल सी जाती है कि राम का कल राजतिलक है...और तत्क्षण सोच में पड़ जाती है कि होइ अकाजु कवनि बिधि राती।। अधिक देर नहीं लगती राजतिलक को असफल करने की योजना बनाने में।
अस्तु, यहां भी कैकेयी प्रसन्नता प्रगट करती है कि राम का राजतिलक होने जा रहा है। यह तो सूर्यवंश की रीत है कि जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यदि सचमुच कल राम का तिलक होगा तो मैं तुझे मुंहमंागा पुरस्कार दूंगी, यह भी कैकेयी प्रसन्नता की रौ में कहती है। पर फिर देवताओं की माया के वश में पड़ी कैकयी मानो भिलनी के गान से मोहित हिरणी के समान मंथरा के जाल में फंसती जाती है...और शीघ्र ही मंथरा की इस बात में विश्वास करने लगती है कि तुम अब दूध में गिरी मक्खी हो गई हो, इस महल में रहना है तो तुम्हें अपने लाल के साथ कौशल्या की सेवकाई करनी होगी!...आगे मंथरा उसे इस काल्पनिक दु:ख से उबरने हेतु दो वरों की याद दिलाती है जिससे सौत का सारा आनंद कैकेयी की झोली में आ जायेगा।
हठ का परिणाम        
किंतु कैकेयी की झोली में क्या आया? आजीवन पछतावा, वैधव्य, पुत्र की घृणा और इतिहास में कलंक! जिस पुत्र के राजा होने की कल्पना में सुखरस लेती हुई वह उसके आने की प्रतीक्षा आतुर हो कर रही थी, वही पुत्र उसे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं करता कि तू बांझ क्यों नहीं हुई? तेरे जैसी माता ईश्वर किसी को न दे। तूने मेरे पिता को मारा और मेरे पितृवत् भाई को इतना कष्ट दिया! वह भी मेरे लिये राजमुकुट दिलवाने! मैं इसे कभी ग्रहण नहीं करूंगा। ...फिर पूरे चौदह वर्ष माता की चाही हुई राज्यलक्ष्मी की ओर वह आंख उठाकर भी नहीं देखता...पता नहीं माता की ओर भी कभी देखता है अथवा नहीं!
कैकयी का उद्दंड स्वभाव अपनी माता के समान था, यह हमने प्रारंभ में लिखा है। रामायण में एक प्रसंग में इसका उल्लेख है। कैकेयी जब अपनी मंाग पर अड़ी ही रहती है, न किसी के तर्क सुनती है, न अपनी ओर से कोई तर्क देती है...बहरी स्त्री के समान बस एक ही रट लगाये रहती है कि मुझे तो अपने मांगे दोनों वर तत्काल चाहिये, तब सुमंत्र कहते हैं कि नीम के वृक्ष से मधु की आशा करना व्यर्थ है। यह अपनी मां पर गई है। इसी संदर्भ में सुमंत्र कैकेयी की माता के संबंध में एक सुनी हुई बात बताते हैं। कैकेयी के पिता अश्वपति को किसी साधु ने पक्षियों की बोली समझ सकने का वरदान दिया था पर साथ ही उनसे यह वचन भी लिया था कि वह यह बात किसी को भी नहीं बताएंगे। एक रात राजा के कानों में एक जृम्भ नामक पक्षी की आवाज पड़ी। पक्षी का अभिप्राय समझ कर राजा को हंसी आ गई। इस पर रानी ने उनसे हंसने का कारण पूछा। राजा वचनबद्ध थे अत: उन्होंने उसे कुछ नहीं बताया। इस पर रानी ने हंसने का कारण जानने की इतनी जिद पकड़ी कि वह आत्महत्या करने की धमकी देने लगी। तब राजा फिर उसी साधु से मिले। इस पर साधु ने उनसे रानी को कुछ न बताने कहा और ऐसी जिद्दी रानी को महल से बाहर निकाल देने की सलाह दी। राजा ने ऐसा ही किया। यहां सुमंत्र एक सुंदर बात कहते हैं-पितृन्समनुजायन्ते नरा मातरमगंना अर्थात् पुत्र पिता के समान होते हैं और कन्याएं माता के समान(वा.रा.अयो.कां.35.28)। रंगनाथ रामायण में सुमंत्र यह भी कहते हैं कि तुम केकय-तनया नहीं हो सकती। तुम्हारी मां ने अवश्य किसी राक्षस से तुम्हें जन्म दिया होगा (रं.रा.1420)।
       अस्तु, राजा दशरथ कैकेयी के पिता के समान दृढ नहीं हो पाये। मां के समान जिद्दी कैकेयी अपनी बात मनवा कर ही दम लेती है। किंतु अंतत: वह भी मां के समान निर्वासन भुगतती है, यद्यपि यह निर्वासन महल में रहते हुए ही उसे भुगतना पड़ा। पति, पुत्र एवं समस्त अयोध्यावासी उसे इस कृत्य के लिये कोसते हंै। भरत के झिडक़ने के पहले कैकेयी को किस-किस ने नहीं झिडक़ा था। जो मंत्रीगण, गुरुजन तथा कौशल्या आदि सपत्नियां उसे कभी कुछ बोलने का साहस नहीं रखते थे, उन्होंने क्या-क्या नहीं कहा उसे...पर वह जैसे इन सबके प्रति बहरी हो गई थी। पुत्रमोह में डूबी वह राज्यलुब्धा भविष्य के जैसे एक दिव्य आनंदलोक में जी रही थी। भरत ने क्षणभर में उसे इस दिवास्वप्न से घसीट कर कठोर धरती पर ला पटका जहां उसका सब कुछ लुट गया। पिघले शीशे के समान भरत के शब्द उसके कानों में प्रवेश कर रहे थे। किंतु अब बहुत देर हो चुकी थी। चिडिय़ों ने उसका सारा खेत उजाड़ दिया था। उपेक्षा और तिरस्कार के बियावन में भटकती कैकेयी को पता नहीं कितनी देर बाद होश आया होगा कि अब एक राम ही उसे कुछ आसरा दे सकते हैं। संभवत: इसीलिये उसने स्वयं ही राम को मनाने जा रहे भरत के साथ चित्रकूट जाने का मन बनाया होगा। पता नहीं किस मुंह से उसने भरत के सामने यह प्रस्ताव रखा होगा और किस मन से भरत ने उसे साथ चलने की स्वीकृति दी होगी! ...उल्लेखनीय है कि राम से मिलने जाते समय भरत भरद्वाज मुनि के आश्रम में उनसे मिलने रुके थे। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार भरद्वाज मुनि से सबका परिचय कराते समय जब भरत ने कैकेयी का परिचय कराया तब उसका परिचय देते हुए कहा था कि स्वभाव से ही क्रोधी यह अशिक्षित बुद्धि वाली, मेरे सारे संकट की जड़, यह पापिनी ममैतां मातरम् मेरी माता है...यह सुन तब निश्चय ही शर्म से गहरे पाताल में केकय-तनया गड़ गई होगी! यद्यपि भरद्वाज भरत से कहते हैं कि तुम कैकेयी के प्रति दोष-दृष्टि मत रखो क्योंकि राम का वनवास भविष्य में सुखद होगा यह जगत के हित में होगा (वा.रा.अयो.कां.92.30)।
मानस में भी भरद्वाज कैकेयी को बचाते हुए भरत से कहते हैं-
तुम्ह गलानि जियं जनि करहु समुझि मातु करतूति।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ।। (अयो.कां.206)
राम और कैकेयी के संबंध
राम प्रारंभ से ही कैकेयी के प्रति प्रेमपूर्ण थे। अपनी माता कौशल्या से बढक़र वे कैकेयी का आदर करते थे। वनगमन के समय भी लक्ष्मण जहां कैकेयी को बुरा भला कहते हैं, राम लक्ष्मण को ऐसा कहने से मना करते हैं। वे लक्ष्मण से (और कैकेयी से भी) कहते हैं कि केवल कैकेयी के कहने से ही वे वन जा सकते थे। बाद में भी वे कभी कैकेयी का निरादर नहीं करते। वन में जब चित्रकूट में वह सबके साथ आती है तब राम अन्य माताओं के समान ही उससे प्रेम से मिलते हैं। मानस में तुलसी लिखते हैं कि चित्रकूट में प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायं भगति मति भेई। राम सबसे पहले कैकेयी से ही मिले। उसके चरणों में झुक कर काल करम बिधि सिर धरि खोरी, सारा दोष काल ,कर्म और विधाता के सिर मढ़ते हुए उसे संात्वना देते हैं। यह देख वह पछताती है। काश धरती फटती और वह उसमे समा जाती या यमदेव ही कृपा करते! पर विधाता मांगने पर कब मौत देता है?    
वनवास से लौटने के बाद भी राम आदरपूर्वक कैकेयी से मिलते हैं। 14 वर्ष के लिये वन में तपस्वी बना कर राम को भेजने के बाद पुत्र को वैसे ही तपस्वी का बाना पहने नंदीग्राम में तपस्यारत देख कैकेयी के राज्यलोभ से ग्रस्त मन का रहा-सहा विकार निश्चित ही समाप्त हो गया होगा। हां, मन में यह कसक अवश्य होगी कि मेरे कारण राम को इतने कष्ट उठाने पड़े! इस कांटे का दंश उसके हृदय को अवश्य पीडि़त कर रहा होगा। राम के 14 वर्ष बाद वन से लौटने पर सारी अयोध्या दिवाली मना रही थी तब कैकेयी भी प्रसन्न थी किंतु किस मुख से उसने राम सीता और लक्ष्मण का सामना किया होगा? वाल्मीकि ने तो इस विषय को केवल यह कहते हुए छोड़ दिया है कि राम सभी माताओं से प्रेम से मिले किंतु कुछ अन्य कवियों ने इस मिलन का सुंदर चित्रण किया है।
मानस में राम सबसे प्रेम से मिलते हैं। पर राम मिलत कैकई हृदयं बहुत सकुचानि, राम से मिलते समय कैकेयी के हृदय में बहुत संकोच है। प्रभु कैकेयी के मन की लज्जा समझ रहे थे इसीलिये मिलन-समारोह के अनन्तर वे सबसे पहले कैकेयी के महल में जाते हैं, प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
मैथिलीरामायण में उल्लेख है कि वन से लौटने के बाद कैकेयी राम को राज्यभार ग्रहण करने की आज्ञा देती है-आपके राज्यसुख का अपहरण करने वाली मैं ही हूं। मैंने बड़ी बदनामी झेली। दुनिया ने मेरी निंदा की। चौदह वर्षों तक मन में दु:ख सहती रही। जो हुआ सो हुआ। अब भी सूर्यवंश की परम्परा को बचाना है। अब यह माता आज्ञा देती है कि राज्य ग्रहण करो...तब राम राज्य ग्रहण करते हैं।
कृतिवास बंगला रामायण में लिखते हैं-राम के आने का समाचार सुन कैकेयी रोने लगी। सब राम से मिलने गये पर वह नहीं गई। उसके मन में चिंता भी हुई कि यदि राम पहले के समान मुझसे संभाषण नहीं करेंगे , मुझे मां कहकर नहीं पुकारेंगे तो क्या होगा? तब मैं अवश्य प्राण त्याग कर दूंगी...और तब एक जहर का लड्डू हाथ में लिये वह बैठ गई। तभी राम वहां आये। उसके चरणवंदन कर बोले-मां! चौदह वर्ष बाद स्वदेश आया हूं। वन में बड़ी विपत्ति में फंस गया था। तुम्हारे आशीर्वाद से सबसे उबर गया हूं। इस पर लज्जित कैकेयी कहती है-मैं तुम्हारे सम्मुख दोषी हूं। देवताओं की कार्यसिद्धि के लिये तुम वन गये और मुझे निमित्त बना गये....आगे कृत्तिवास की कैकेयी सुंदर बात कहती है- पुत्र! मैंने सदा ही तुम्हें भरत से अधिक चाहा है। तुमको जिसने कुबोल कहा, वह तो तुम्हारी माया थी। तुम तो सर्वज्ञ हो। सबके सुख-दु:खदायक हो। एतेक दुर्गति कैले जानिया बिमाता। तुमने जो मेरी इतनी दुर्दशा की वह केवल मुझे विमाता समझ कर की ना? यह सुन राम बेचारे लज्जित हो सिर झुका कर बैठे रहे (ल.कां.699)।  
एक जिज्ञासा यहां यह भी होती है कि बाद में भरत का रवैया मां के प्रति कैसा था? गीतावली में तुलसी कहते हैं-कैकेयी जौलौं जियत रही। तौलों बात मातु सो मुंह भरि भरत न भूलि कही। (उ.कां.37) अर्थात् जब तक कैकेयी जीवित रही तब तक भरत ने भूल कर भी उससे मुंह भर बात नहीं की। हां, राम ने उसे माता से बढक़र माना और कौशल्या ने भी उससे बैर नहीं रखा। राम के रुख को देखकर सिया और लक्ष्मण सभी ने उसका सम्मान किया। जैन रामायण में भरत भी कैकेयी को अंत में क्षमा कर देते हैं। यहां भरत राम के अयोध्या आने के कुछ समय बाद ही प्रवज्या ग्रहण करते हैं। तब उनसे विनय कर कैकेयी भी उनके साथ प्रवज्या ग्रहण करती है (भाग 3 ,अध्याय 73) ।
संस्कृत नाटकों में कैकेयी        
यहां उल्लेखनीय है कि कैकेयी के चरित्र में परवर्ती संस्कृत नाटककारों ने अत्यंत परिवर्तन किया है। कुछ नाटकों में कैकेयी स्वयं अपने पुत्र के लिये राज्य तथा राम के लिये वनवास का वर नहीं मांगती है। यहां कोई अन्य कैकेयी के नाम से छलपूर्वक राम को वनवास हेतु भेजता है। जैसे भवभूति के महावीर चरित नाटक में शूर्पणखा, राजशेखर के बालरामायण में रावण का नाना माल्यवान एवं मुरारि के अनर्घराघव में जामवंत चाल चलकर ऐसा करने में सफल होते हैं। इस तरह यहां कैकेयी पूर्णत: निर्दोष सिद्ध होती है।
भास के प्रतिमा नाटक में कैकेयी दशरथ से दोनों वरदान एक विशेष उद्देश्य को लेकर मांगती है। भरत को वह बाद में बताती है कि तुम्हारे पिता दशरथ को अंधे मुनि ने पुत्रवियोग में मृत्यु का शाप दिया था। मैंने तुम्हारे पिता को ऋषिशाप से मुक्त करने के लिये स्वयं को अपराधिनी बनाकर भी राम को वन भेजा, राज्य लोभ से नहीं। किंतु पुत्रशोक हेतु कैकेयी अपने पुत्र को भी तो वनवास दे सकती थी? राम को ही क्यों दिया? भरत जब यही प्रश्न उससे करते हैं तो वह कहती है कि तुम इतने समय से ननिहाल में थे। तुम्हारा पुत्र-वियोग उन्हें सह्य हो गया था। इस पर भरत फिर कहते हैं-ठीक है। फिर वनवास की अवधि चौदह वर्ष क्यों निश्चित की। चौदह दिन भी तो कर सकती थी? तब दु:खी हो कैकेयी कहती है-मैं चौदह दिन ही कहना चाहती थी किंतु भावी पुत्र-वियोग के कारण मानसिक असंतुलन से मेरे मुंह से चौदह वर्ष निकल गया। भरत मां की बात पर विश्वास नहीं करते। व्यंग्य से कहते हैं-इसी को कहते हैं पांडित्य-चातुर्यं याने बात करने की चतुराई! आगे वे पूछते हैं-क्या गुरुजनों को यह बात ज्ञात थी? इस पर सुमंत्र बताते हैं कि वशिष्ठ, वामदेव प्रभृति गुरुजन यह बात जानते थे। अब कहीं जाकर भरत को माता की बात पर विश्वास होता हेै और वे माता से कहते हैं-भ्रातृस्नेह से क्रुद्ध होकर जो मैंने आपका अपमान किया है उसके लिये लज्जित हूं, क्षमापार्थी हूं। आपको प्रणाम करता हूं (4.15)।
जैन रामायण में भी कैकेयी जानबूझकर भरत के लिये राज्य मांगती है। वैसे यहां कथा कुछ अलग है। यहां दशरथ अपनी वृद्धावस्था का विचार कर प्रवज्या लेना चाहते हैं। दशरथ का निर्णय सुनकर भरत भी उनके साथ प्रवज्या लेने का हठ करते हैं ताकि वन में वे पिता की सेवा कर सके। यह सुनकर कैकेयी चिंतित हो जाती है कि यदि पति और पुत्र दोनों ही महल में न रहे तो उसका भविष्य क्या होगा? वह कैसे जियेगी? तब वह दशरथ से भरत के लिये राज्य मांगती है (जैन रामायण ,खंड 2 ,पृ.370)।
आधुनिक हिंदी साहित्य में कैकेयी
आधुनिक हिंदी कवियों ने कैकेयी के चरित्र का उद्दात्तीकरण किया है। मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना साकेत में कैकेयी के मानस-परिवर्तन में मंथरा द्वारा एक पंक्ति कहलवाई है जो बार-बार उसके कानों में गूंजती है, भरत से सुत पर भी संदेह बुलाया तक न उसे जो गेह। राम के राज्याभिषेक जैसे भव्य आयोजन में राजा ने आखिर भरत को क्यों नहीं बुलाया? क्या उनको भरत पर संदेह था? रानी के मन पर इसका बड़ा गहरा असर पड़ता है और उसका मन राजा और राम दोनों की ओर से पूर्णत: फिर जाता है।
गई दासी पर उसकी बात ,दे गई मानो कुछ आघात
भरत से सुत पर भी संदेह बुलाया तक न उसे जो गेह !
पवन भी मानो उसी प्रकार शून्य में करने लगा पुकार
भरत से सुत पर भी संदेह बुलाया तक न उसे जो गेह।
गंूजते थे रानी के कान, तीर-सी लगती थी वह तान-
भरत से सुत पर भी संदेह बुलाया तक न उसे जो गेह।      
आधुनिक हिंदी साहित्य में कैकेयी के नाम से तीन काव्य भी मिलते हैं जिनके रचनाकार हैं, चंादमल अग्रवाल, केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ एवं ेशेषमणि शर्मा। राधेश्याम द्विवेदी ने कल्याणी कैकेयी के नाम से एक काव्य लिखा है। इनमें कैकेयी को जनकल्याण और राष्ट्रहित साधते बताया गया है। प्रभात की कैकेयी मानवता के रक्षा-हित के लिये राजा दशरथ से आग्रह करती है कि राम को वन भेजें।
इस तरह हम देखते हैं कि दशरथ की यह प्राणसखी कैकेयी परवर्ती रामकाव्यों में क्षम्य रही...क्योंकि अंतत: उसके कृत्य से दशानन का नाश हुआ। यद्यपि जनमानस में आज भी उसका नाम बुरी माताओं में ही गिना जाता है जैसा कि हमने लेख के प्रारंभ में लिखा है।
(लेखिका सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं एवं वर्तमान में भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य कर रही हैं।)