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Wednesday 22 Nov 2017

बेघर होने की त्रासदी: डार से बिछुड़ी

मुन्नी गुप्ता

असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी विभाग)
प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता
मो. 9339966805

कृष्णा सोबती के कथा साहित्य की यात्रा शुरू होती है- डार से बिछुड़ी से। यह उपन्यास सन 1958 में ही प्रकाशित हो चुका था। प्रथम रचना के प्रकाशन के साथ ही कृष्णा सोबती के हिस्से ख्याति आ लगी थी क्योंकि प्रकाशन के साथ ही डार से बिछुड़ी ने अपने तरोताजापन से हिन्दी पाठक को चौंका दिया था। परंपरागत शैली से हटकर कथ्य की अलग बुनावट ने पाठक वर्ग पर अपना प्रभाव डाला, इसलिए डार से बिछुड़ी के प्रकाशन के साथ ही उनकी रचनाओं पर नजर रखी जाने लगी। बहुत कम ऐसे लेखक होते हैं, जिनकी पहली रचना के साथ ख्याति उनके खाते में दर्ज हो जाती है। कथाकार कृष्णा सोबती ऐसे ही लेखकों में शुमार हैं, जिनकी गिनी-चुनी रचनाओं ने ही उन्हें प्रशंसा और प्रसिद्धि दिलाई और उनकी रचनाएँ लीक से हटकर मानी जाने लगीं। गौरतलब हो कि सिक्का बदल गया कहानी के आने के बाद ही कृष्णा सोबती कथा लेखिका के रूप में चर्चित हो चुकी थी। डार से बिछुड़ी कहानी निकष पत्रिका में विशेष कृति के रूप में सबसे पहले प्रकाशित हुई थी, जिसके संपादक धर्मवीर भारती थे। संपादक महोदय ने शब्दों के साथ छेड़छाड़ किये बगैर इसे ज्यों का त्यों छापा था। शब्दों के आलोक अपनी पुस्तक में कृष्णा सोबती लिखती हैं - संपादक के रूप में भारती मेरे उस रचनात्मक समय के लिए महत्त्वपूर्ण थे। डार से बिछुड़ी को विशेष कृति के रूप में प्रकाशित करना मुझे अपनी पंक्तियों के प्रति एक सादा, सच्चा आत्मविश्वास मिलना था। डार से बिछुड़ी में सुदूर उत्तर-पश्चिम के सीमा-प्रान्त की अपरिचित लेकिन अति परिचित लगनेवाली जिंदगी को गूंथा गया है। कृष्णा सोबती विभाजनकालीन दौर की जीवंत साक्षी रही हैं। उस दौर को करीब से देखा, समझा और महसूस किया था। इससे पहले की बहुत-सी घटनाएं उन्होंने देख, सुन रखी थीं, जिसमें से एक सिक्ख और फिरंगियों के युद्ध की घटना थी। सिक्ख और फिरंगी युद्ध की जाने कितनी कहानियाँ हमने सुन रखी थी। गुजरात के चिल्लियां वाले मैदान में सिक्ख और फिरंगियों के बीच जो घमासान युद्ध हुआ था, जिसमें फिरंगियों की पूरी तरह से विजय हुई थी, उसी ऐतिहासिक वृत्तान्त को कथा की पृष्ठभूमि में गूंथा गया है।
कथा की नायिका पाशो खत्री परिवार की बेटी है।  पाशो अपनी नानी-मामी के साथ रहती है। खत्रियों के परिवार की पाशो जब बड़ी हुई तो शेखों के घर पटरानी बन बैठनेवाली माँ की लांछना सर पर थी। इसलिए पाशो को लेकर नानी, मामा और मामियों की अतिरिक्त सजगता और सावधानियाँ थीं। उसे न तो माँ का प्यार मिला, न उनके संरक्षण में पली-बढ़ी, न शिक्षा थी,  न पिता की छांह, न कोई सहेली संगी। माता-पिता के स्नेह से वंचित नानी, मामा-ममियों के बीच पली-बढ़ी, जैसे-जैसे वह बड़ी हुई उस पर पहरा उतना ही सख्त हुआ। उसके आने-जाने का हिसाब रखा जाता, तनिक सी देर हुई नहीं कि माहौल में घबराहट आ घुलती। डांट-फटकार, गाली-गलौज, कुटना-पीटना तो रोज का काम था। उसकी सज-धज, पहनाव-ओढ़ाव पर सबकी कड़ी निगाहें जमीं रहतीं। गले तक दुपट्टे को देख निगाहें गड़ जाती। पीढ़ा ले बर्तन-भांडे में लगाती तो मामियों की आवाज गूंजती- नखरे तो देखो लाडो के पीढ़ा ले भांडे मलने बैठी है! अरी बुरों की, पीढ़े पर बैठती है भले घर की बहू-बेटियां! वह घरवालों के लिए कुलबोरनी, नासहोनी, अभागिन बन गयी थी क्योंकि खत्रियों की बेटी और पाशो की विधवा माँ अपने परिवार की मान-मर्यादा को मिट्टी में झोंक शेखों के घर की पटरानी बन बैठी तो उस माँ की जाया घरवालों को कैसे सुहाती। रोक-टोक, ताने-उलहाने रोज-रोज घुट्टी की तरह जबरदस्ती इसलिए डाले जाते ताकि पाशो भी अपनी माँ की राह न चल निकले। नानी उसे कहती है- इस मुँह उसका नाम न लूँ बिटिया। उसी की करनी तुझे भरनी थी। तेरे दोनों मामू उसे कितना मानते थे। यह लोक-जहान जानता है, पर वह नासहोनी तो घर-भर का मुँह काला कर गयी। माँ के कारण ही मामा-मामियों के परिवार में उसे काफी तकलीफ  दी जाती थी। नानी-मामियां उसे शक की दृष्टि से देखते थे। परिवार में उसकी स्थिति नौकरानी और बेजुबान गाय से अधिक नहीं थी। हर समय पहरेदारी के बीच उसे रहना पड़ता। आग लगे तेरी जवानी को ! रांबयां, खोल इसका फुनगियोंवाला परांदा।  उसका एकमात्र यही दोष था कि उसकी माँ इस छोटी-सी बच्ची को छोडक़र शेख जाति के एक सज्जन के साथ भाग गयी थी। माँ के इस कुकर्म से समूचे क्षत्रिय कुल पर जो कलंक लगा, उसी का फल पाशो को भोगना पड़ा। रोज-रोज के उलाहने और फब्तियों से पाशो का जी छलनी होता रहा। एक दिन पड़ोस के एक लडक़े करीमू के हाथ में पाशो की चमकी का रुमाल देखकर बड़े मामू ने लडक़ी की खूब  पिटाई की और उसे मौहरा (जहर) देने की साजिशें होने लगी। पाशो को इसकी भनक लग चुकी थी और वह रातों रात कोठों के रास्ते शेख जी के घर जा पहुँची। मामू के झगड़े के डर से शेख ने उसे अपनी उम्र के दोस्त दीवान जी के घर भेज दिया और वहाँ दीवान जी के घर में उसका खूब स्वागत होता है और वह दीवान जी के घर दीवान जी की बनकर रहने लगी। लेकिन दीवान जी की मौत के बाद उसकी स्थिति एक वस्तु से अधिक कुछ न थी। दीवान जी के बाद बरकते (दूर का भाई) के लिए वह मनोरंजन के सिवा कुछ न थी। बरकते की माँ कहती है- पली-पलाई है री मालन मेरे बेटे को खुश करना सीख।
भारतीय समाज व्यवस्था में विधवा की स्थिति एक वस्तु से अधिक कुछ नहीं रही। उसका जीवन अभिशप्त बन रहता है। पाशो के विधवा होने पर उसके जीवन की त्रासदी की शुरुवात होती है। दीवान जी के जाने के बाद दीवान जी के छोटे भाई ने उसे अपनी संपत्ति समझ अपने लिए रख लिया।
 तेरा तो नाम-चाम सब मेरा है री पगली! और हाथ बढ़ा मेरा पल्ला खींच लिया, तो भी न काँपी, न चिल्लाई, ऐसे पड़ी रही कि पानी की मार से गली-गलाई काठ होऊं।
  पड़ी रही, उठी नहीं?  विधवा स्त्री की दुर्दशा और बेबसी को पाशो के माध्यम से कृष्णा सोबती ने स्पष्ट किया है। आज भी पितृसामाजिक व्यवस्था में विधवा सुरक्षित नहीं है। बरकत दीवान जैसे बहुतों के लिए वह वस्तु से अधिक कुछ नहीं है लेकिन इतने से ही पाशो के जीवन का अभिशाप कहां खत्म होने वाला था। बरकत दीवान अपने ऋण को चुकाने के लिए उसे एक बूढ़े के हाथ बेच देता है। डोली वालों की हांक पर घर के धनी बाहर निकल आये, रुक्का पढ़ थलथली आवाज में बोले- अच्छा, अच्छा सो भला! शुकर है बरकत दीवान ने मेरा ऋण तो चुकाया!
 फिर पाशो के घूँघट पर आँखें गड़ा कहा-
  भागभरी, यह घर-बाहर संभाल और द्रोपदी बनकर सेवा कर मेरी और मेरे बेटों की। द्रोपदी, खैर मना इस अच्छे घर पहुँच गयी, नहीं तो बरकत कसाई एक बार नहीं, सौ बार तुम्हें बेच खाता। बूढ़े पर पाशो की विनती का कोई असर नहीं होता। भागभरी, गहरी बात कहता हूँ, सीधी राह चलेगी भला! तीन-तीन पहरू हैं घर में, भूलकर भी ड्योढ़ी से बाहर पाँव न रखना! समझ रख बीवी, बरकते को घड़ा भर मोहरें दी हैं, तू अब इस घर की दात्त! पाशो इसे अपनी नियति मान लाला के घर को संभालने में लग जाती है। महाभारत में द्रोपदी को एक वस्तु मानकर ही दांव पर लगा दिया गया था और चौपड़ में पाण्डव बाजी हार जाते हैं। द्रोपदी अपमानित होती है, पूरी स्त्री जाति अपमानित होती है। आज भी वह मानसिकता नहीं बदली है। द्रोपदी का अर्थ ही आज क्रय-विक्रय के रूप में लगाया जाता है। चूँकि लाला ने पाशो को एक घड़े मोहरे के बदले खरीदा और बरकते ने उसे वस्तु समझकर अपना ऋण चुकाने का बेहतर माध्यम समझा, इसलिए वह भी द्रोपदी बन गयी और इसलिए लाला उसे द्रोपदी कहता है। लाला के बेटे भी उसे अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। लाला का छोटा बेटा कहता है, मँझले की नवेली, मेरे संग एक बार लश्कर तो चलो। इन कटोरी आँखों पर बड़े-बड़े सरदारों की नजर न ठहर जाए तो कहना।
  पाशो अपने एक गलत निर्णय के कारण एक के बाद एक भँवर में फंसती जाती है। यह रचना आज से साठ वर्ष पहले लिखी गयी लेकिन तब से लेकर आज तक स्त्री का मूल्य पुरुष समाज के लिए एक वस्तु से अधिक कुछ नहीं है। वह आज न तो घर में सुरक्षित है न घर के बाहर। दीवान जी की मृत्यु के बाद पाशो के लिए उसका अपना घर ही उसके लिए असुरक्षित होता जाता है। मनुसंहिता के अनुसार स्त्री परिवार के बीच सुरक्षित रह सकती है। कुंवारेपन में पिता और भाई के संरक्षण में, विवाहोपरांत पति के घर में। लेकिन जब परिवार ही उसके लिए असुरक्षा का घेरा बन जाए, तब स्त्री के लिए दूसरा उपाय क्या है! घर से बेघर हुई पाशो भी हवा में टूटे पत्ते की तरह डार-डार भटकती है और पुरुष के हाथों इस्तेमाल होती रही और अंत में परिवार की डार से आ मिलती है। डार से बिछुड़ी पाशो के लिए उसका हर ठौर-ठिकाना त्रासद ही बना रहा। पाशो पुरुष समाज के लिए मनुष्य नहीं, एक गठरी है, जिसे कोई भी उठाकर चलते बनता है। उसके साथ गुलामों जैसा बर्ताव किया जाता है। उसे द्रोपदी बनाकर घर-भर की सेवा का दायित्व सौंप दिया जाता है। जिस मौत के डर से वह घर से बाहर निकली, उसे न जाने कितनी मौतें मरनी पड़ी। पाशो के रूप में एक असहाय स्त्री का चित्रण है जो परिस्थितियों के समक्ष एक बेजुबान गाय की तरह पड़ी रही। पाशो के अंदर की औरत समय और परिस्थितियों के कारण विद्रोह नहीं कर पाती। ऐसे में एक प्रश्न हमारे सामने कृष्णा सोबती जाने-अनजाने ही छोड़ जाती हैं कि आखिर स्त्री सुरक्षित कहां है? आज यह प्रश्न मीडिया और स्त्री बहस संबंधी मुद्दे में  बार-बार उठाया जा रहा है लेकिन इसका कोई जवाब नहीं है। अपनी जड़ों से टूटकर भागने को विवश पाशो अंत तक भागती रही। जिस तरह पतझड़ में टूटे पत्तों का कोई ठौर नहीं होता, कोई भविष्य नहीं होता, वैसे ही पतझड़ में डार से विलग हुई पाशो का भी कोई और ठौर नहीं रहा। कोई भविष्य नहीं रहा। वह भी परिस्थिति के हाथों बहती चली गयी।
अनुभव से मथकर निकले नानी के इन बोलों ने उस पर कोई असर न छोड़ा था कि संभलकर री एक बार का थिरका पाँव जिंदगानी धूल में मिला देगा। और अंत तक बहते-भटकते परिस्थितियों के हाथ की कठपुतली बनी पाशो समझ ही गयी। सच ही सब धूल हुआ। इस अभागी की लाज, शरम, इज्जत, आबरू। वह स्वयं अपनी इस स्थिति का विश्लेषण करती है- आँगन के बीचों-बीच छोटे कुएँ की चरखनी पर लज लटकती थी। गागर उठा नीचे बहा दी तो जान पड़ा,  मैं भी चरखनी पर चढ़ी लज हूँ। कभी इस गागर, कभी उस गागर और सचमुच ही पाशो तूफानी दरिया में भटकते तिनके सी कभी यहां, तो कभी वहाँ। आज दीवान जी के घर तो कल मंझले के लेकिन अगर गहराई से सोचा जाए तो उसकी जिंदगी में थिरकने जैसा था ही क्या? अपनी माँ कहलानेवाली छवि को एक बार देख लेना चाहती थी और उसकी यह इच्छा स्वाभाविक ही थी। चाहती, किसी दिन चुपके से खोजों की हवेली जाऊँ और किसी झरोखे से अपनी माँ कहलाने वाली की एक झलक तो पाऊं।
परिस्थिति के हाथ की कठपुतली बनी पाशो अपनी स्थिति से लडऩे या उबरने की कोशिश भी छोड़ चुकी थी। एक बार अपनी जड़ से उखड़ी पाशो ने समझ भी लिया था कि विरोध का मतलब मौत है, इसलिए भटकती जिंदगी ने उसे परिस्थितियों का दास बनना सीखा दिया था, जो सामने मिला उसे ही अपनी किस्मत माना, तूफान ने जिधर फेंका, उसे ही अपना आश्रय समझा, जहाँ गयी वहीं की होकर रही।
नवेली, तुम्हें अपने संग ले जाऊँगा। तुम मेरे पास रहोगी।
डरकर सिर हिलाया।
यह न कहो। यह न कहो।
इस अभागी को अब इस घर से न निकालो।
संवेदनशील सहृदयी पाशो सबके दु:ख को अपना दु:ख मानती और प्रार्थना करती है- मैं तो पराये घर हूँ, पर इस घर के कर्ता-धर्ता की यह दशा! ऐसे हाल-हीले किसी के न हो! कोई पड़ा-पड़ा अकेले मरने की बाट जोहे। उसने अपने क्रय-विक्रय के अपमान को भूलकर बीमार लाला की सेवा में कोई कसर न उठा रखी। सेवा-सत्कार पाकर सिर हिला लाला बोला, दीवानों की, मैं जी भर तृप्त हुआ। रब्ब तुम्हें बहुत-बहुत सुख-चैन दे।
    कृष्णा सोबती ने अपनी इस कृति में जिस चाव से पाशो जैसे चरित्र की रचना की है, वह समाज से अलग नहीं बल्कि इसी समाज के चेहरे से हमें रूबरू कराया है। बहुत से पाठकों और आलोचकों ने पाशो को एक दुर्बल विवश चरित्र माना है। अगर परिवेश और परिस्थितियों के बीच रखकर उसका आंकलन करे तो पाशो की जो छवि उभरती है वह उसके परिवेश और परिस्थितियों के कारण है। कुएँ से निकलकर दलदल में धंसने से तो अच्छा है कुएं का अँधेरा। चारों ओर युद्ध का माहौल, दूसरे स्थान तक पहुंचने का कोई सुरक्षित साधन नहीं। मौत को गले लगाना तो जीवन से भागना है और पाशो भागती नहीं बल्कि विषम परिस्थितियों के बीच जूझते हुए भी एक उम्मीद की आस जलाये रखती है।
दीवानों के घर कब जाना हुआ था बाबा? वहाँ की कोई खोज-खबर?
इस बार उधर का पैंडा नहीं मारा बेटी !
कोट की ओर कब जाना होगा?
अपनी ओढऩी का छोर फाडक़र बाबा की ओर बढ़ा दिया। शेख के यहां मेरी माँ को सौंप देना बाबा।
कृष्णा सोबती ने पाशो की रचना के जरिये स्त्री जीवन के समक्ष जन्म से मौजूद खतरों और उसकी विडंबनाओं को रेखांकित किया है। स्त्री-जीवन की विडंबना है उसका स्त्री होना, तिस पे भी उसका असहाय और निर्बल होना।
    डार से बिछुड़ी का प्रकाशन समय 1958 है। यानी आज से साठ वर्ष पहले भी स्त्री की स्थिति जहाँ थी, आज भी वहीं हैं। समय बदला जरूर है पर स्त्री के लिए समाज और परिवार पहले से ज्यादा असुरक्षित और भयावह ही हुआ है। आज भी एक ऐसा परिवेश नहीं बन पाया है, जहां वह अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें। इस तथ्य को कृष्णा सोबती ने आज से छ: दशक पूर्व ही रेखांकित कर दिया था। पाशो के लिए मामा-मामी का घर ही असुरक्षित हो जाता है। स्त्री की अपनी इच्छा, अभिलाषा कुछ नहीं। स्त्री के लिए घर की, बाहर की दुनिया तब तक सुरक्षित न रहेगी जब तक बरकत, करीम, मंझले और छोटे की मानसिकता में स्त्री महज चीज के रूप में रहेगी। पाशो की जिंदगी में तूफान का मूल कारण फत्तेहअली का बेटा करीमू ही था,  जिसके हाथ में पाशो का चमकी का रूमाल देखा गया और उसी के कारण पाशो को ठिकाने लगाने की साजिशें होती हैं और उसी वजह से पाशो को घर से बेघर हो दर-दर भटकना पड़ा। ऐसी समाज व्यवस्था में जहां स्त्री, स्त्री न होकर कोई सामान हो, मनुष्य न होकर पशु हो, चीज हो, जिसे जिसका मन हो उठाकर ले जाए, अपनी सुविधानुसार उसकी खरीद बिक्री करें, उसे मात्र कोख समझे, वह स्त्री के अनुकूल नहीं। यदि समाज ही ऐसा है, जिसमें स्त्री मनुष्य न होकर पशुवत जीवन जीने के लिए विवश है, तब समाज के सभी सदस्यों की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है कि वे ऐसा समाज बनाये, जिसमें सभी मनुष्य की तरह सम्मानपूर्वक जी सकें, यही जनतांत्रिक संदेश कृष्णा सोबती अपनी प्राय: रचनाओं के जरिये रखती हैं।