Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

नेट पर लिखी डायरी के कुछ अंश

 

 शैलेंद्र शांत
द्वारा, जीवनदीप अपार्टमेंट
तीसरी मंजिल, 36, सबुजपल्ली, देशप्रियनगर,बेलघरिया
कोलकाता-700056
मो. 9903146990

28.05.15
लगातार गर्मी का कहर जारी है। चैन से सोना-बैठना मुश्किल हो गया है। हम जानते हैं कि यह प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ का नतीजा है। नदी,तालाब, कुंओं के प्रति हमारी उदासीनता,पेड़ों-जंगलों की बेरहम कटाई का अपराध हम करते चले आ रहे हैं। सुविधाएं गांवों तक पहुंचाने की जगह उन्हें उजाड़ कर कंक्रीट के जंगलों के विस्तार पर हमारा ज्यादा जोर है। योजनाकारों की अदूरदर्शिता का बुरे परिणाम हमें झेलना पड़ रहा है। इसमें न सूरज का दोष है न पृथ्वी का, हमारा है। न जाने कब हम चेतेंगे?

3.05.15
सफेद बाल वालों के जलवे
सफेद बाल वालों के जलवे के बारे में न पूछिए। मेरे तो मजे ही मजे हैं। दो-तीन साल से लगातार सफेद बालों की वजह से वरिष्ठ नागरिक के लिए आरक्षित सीट पर बैठने का सुअवसर पा रहा हूं। कभी कोई काकू तो कभी दादू के प्यारे संबोधन के लिए सीट छोड़ देते हैं। भीड़ भरी बसों में इस मौके को छोड़े भी कौन। पर आपकी कसम खुद से ज्यादा बुजुर्गों को देखते ही मैं यह सीट जरूर छोड़ देता हूं कि बस दो एक स्टाप के बाद ही उतरना है। पर आज तो एक नए अनुभव से गुजरना पड़ा। एक महिला ने मुझे 70 साल का बता दिया। कागजी तौर पर कल  58 का हो रहा हूं। हुआ यूं कि आज बंडेल से मिलने आए थे राहुल शर्मा। कविता से प्रेम है उन्हें, उसे साधने की कोशिश में हैं। आगरपाड़ा स्टेशन पर मिले हम। यहीं चाय पी रहे थे साहित्य चर्चा करते हुए। उसी दुकान पर चार महिलाएं आईं एक पुरुष के साथ। उन्हीं में से एक ने कहा-अब जीने की इच्छा नहीं। मैंने पूछा आपकी उम्र क्या हुई है अभी, अब तो लोग 80-90 तक आराम से जी लेते हैं। उन्होंने बताया कि वह 61 की हो गईं हैं। मैंने उन्हें समझाया घबराइए नहीं, अभी तो आप स्वस्थ दिख रही हैं। इसी बीच उनके साथ की महिला से जो 50 के आस-पास की होंगी, मैंने पूछा, अच्छा यह बताइए, मैं कितने का लग रहा हूं तो उनका जवाब था-65-70 का। इतना सुनकर मैं ठहाका लगाने से खुद को रोक नहीं पाया। मैंने उनके साथ वाली 61 साला महिला को कहा- अब आप ही बताइए, दस-पांच साल से पहले मैं जाने वाला हूं- आप निराश नहीं होइए, मजे से रहिए। वह मुस्करा पड़ी।

26.04.15
कल पहली बार धरती को हिलते-डुलते महसूस किया और आज दूसरी बार। कल लेटा हुआ कुछ सोच रहा था। आज दोपहर का खाना खाते वक्त भी ध्यान कहीं और था। शायद संप्रति हमारी जिंदगी उलझनों से भरी है। पर मौत का अंदेशा भी सुकून नहीं देता, उल्टे चैन छीन लेता है। जाने क्यों अधूरेपन का एहसास से भर देता है। लाचारी पर हम आह भर कर रह जाने को विवश हुए जाते हैं। ऐसे में वह गाना भी याद आ जाता है- यहां कल क्या हो, किसने जाना। पर हर किसी के जिंदगी का सफर सुहाना भी कहां होता...
   
25.04.2015
ममता राज का लोकतंत्र!
कोई 11 बजे गए मतदान करने पुत्र जी, मालूम हुआ कि उनका वोट पड़ गया है। कैसे का जवाब कौन देता। लौट आए। बताया-बूथ के अंदर कुछ लोग मारपीट भी कर रहे थे, कुछ मनपसंद उम्मीदवार का बटन दबा रहे थे। अपन साढ़े सात बजे वोट डालने गए तो पता चला उस बूथ पर माकपा व भाजपा के एजेंट नहीं थे। उन्हें धमका कर बैठने ही नहीं दिया गया। बाद में समाचार चैनलों पर मारपीट, बम धमाके, गोलीबारी, फर्जी मतदान की अनंत खबरें। एक व्यक्ति की मौत और कई जख्मी। इस तरह हुआ आज नगरपालिकाओं के लिए मतदान।
भूकंप के झटकों ने भी लोकतंत्र के प्रहरियों को हतोत्साहित नहीं किया। फर्जी मतदान करने में उन्हें थोड़ी और सहूलियत हो गई।

30.03.15
शरीफ लोग नहीं रहने के बाद ही क्यों याद करते हैं उनकी शराफत, उनका समर्पण, उनका साहित्य, संस्कृति, समाज के प्रति किया गया योगदान? शहर की संस्थाओं को भी तभी क्यों उमड़ता है उन पर प्यार? लेखक संगठनों के सचिव-महासचिवों की तभी क्यों खुलती है नींद? वाह, क्या खूब है हमारी यह परंपरा!

27.03.15
दुनिया एक रंगमंच ही है। और हम सभी अपनी-अपनी छोटी-बड़ी दुनिया के छोटे-बड़े किरदार। रोना-गाना-हंसना हमारी फितरत है। गिरना-संभलना-चलना भी हमारी नियति। पाने-खोने का सिलसिला एक भ्रम। परदा उठता रोते हुए, गिरता है बेहद खामोशी से। किरदार हैं हम सभी-कभी संवाद भूल जाते हैं, कभी अदाकारी। तालियों और गालियों में गजब का अंतरसंबंध है, इसे हर मंजा अदाकार जानता है। हां, बहुत से लोग इस बात को समझना ही नहीं चाहते-इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल।
आज विश्व रंगमंच दिवस है जी, संभव हो तो किसी प्रेक्षागृह में जरूर चले जाइएगा।

26.03.15
जी,सच्ची बात है -मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं। जी, मैं जानता हूं आपकी खामियां, बुराइयां, लाचारियां, पर मुझे इनसे कोई वास्ता नहीं। मुझे तो आपमें छुपी अच्छाई से ही है मतलब। उसे तलाश कर मुझे बहुत खुशी होती है। मैं कामना और कोशिश करता हूं कि यह गुण तो मुझमें होने ही चाहिए। अब जब आपसे कुछ न कुछ हासिल ही होता है मुझे तो आपसे कैसे करूं कोई शिकायत....
22.03.15
वे जो उपजाते हैं। उनका सही मूल्य दिलवाने की व्यवस्था कर दें, यही बड़ा उपकार होगा अन्नदाताओं के प्रति। खाद, पानी, बिजली, डीजल, कीटनाशक के दाम तो कम आप करा सकते नहीं। बिचौलियों-महाजनों से मुक्ति भी आप दिला नहीं सकते। आप उनकी जमीन हड़पने के लिए कानून-बिल का खेल नहीं खेलिए कृपया। बस उचित कीमत दिला दीजिए पीएम जी।

13.03.15
और जीने दो!
जिस तरह आप अपनी आस्था के साथ जीना चाहते हैं, उसी तरह मुझे आप मेरे विश्वास के साथ जीने दीजिए ।

01.03.15
आज ही एक सज्जन की पोस्ट पढ़ी। शिकायत यह कि मैंने उनकी किसी किताब का प्रूफ पढऩे में मदद नहीं की न अपने सहयोगी को ऐसा करने दिया। इस महापुरुष को पत्रकारिता की सेवा में लगे लोगों की व्यस्तता का शायद अंदाज ही नहीं। और एक संपादक से प्रूफ पढऩे का उम्मीद रखते हैं। कोई पुस्तक दिखाने की सलाह देता है और वे प्रूफ तक उतर आते हैं। सालों बाद उस अपराध के लिए फेसबुक पर एक पोस्ट भी डालते हैं। एक मोहतरमा, जो हिंदी की प्रोफेसर हैं, अनुवाद भी करती हैं, किसी पुरस्कार मिलने की खबर अपने पैड पर ही लिखा कर अपने चेले से भिजवाती हैं। ऐसी खबर नहीं देने से नाराज। कुछ सेठ अपनी जीवनी भी लिखवाना चाहते हैं, मना कर देने पर नाराज। जेबी संगठन चलाने वाले भी नाराज। जाहिर है, ऐसे लोगों के लिए मैं अच्छा आदमी नहीं। बहुत बुरा, घमंडी और दो टके का तो हूं ही। सज्जनों-देवियों आप ऐसे ही प्रेम-पुष्प बरसाते रहे। और खुश रहें।

24.02.15
तुमको बहुत-बहुत बधाई!!
वे पिता बन गए और आपने दी बधाई दिल खोल कर। शुक्रिया आपका। इसके साथ ही साथ मां बनी एक स्त्री यह आप भूल गए। उस मां को भी बहुत-बहुत बधाई! आपकी तरफ से मैं दिए देता हूं। बधाई जननी! तुमको बहुत-बहुत बधाई!!

23.11. 2014
पारिवारिक यात्रा से वापसी हो गई। पहली बार भांजी से मुलाकात के बहाने गुडग़ांव भी जाना हुआ। एक पसरे हुए कंक्रीट के जंगल में हल्की जेब वालों का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता होगा। नागरिक परिवहन सेवा लगभग नदारद। यह मेट्रो की मेहरबानी है कि गाजियाबाद से गुडग़ांव का सफर कुछ आसान हो चला है। वरना हर कदम पैसा फेंको, तमाशा देखो वाला मंजर है। खैर, सालों बाद भांजी व दूसरे परिवारजन से मिल कर अच्छा लगा। दिल्ली के पास जा कर भी किसी से मिलने का समय नहीं निकाल पाया। मेट्रो से गुजरते दरियागंज जरूर याद आया। कभी यहीं से दिनमान-सारिका निकलती थी। रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से मिलने का सुअवसर यहीं मिला था। और भी बहुत सारी यादें सुगबुगा उठीं। पर इस बार किसी भी नामवर ने दिल को पुकारा ही नहीं। हां, ज्योतिपर्व प्रकाशन के कर्ता-धर्ता कवि अरुण चंद्र राय से जरूर मुलाकात हुई। वे गाजियाबाद के प्रताप विहार में दीदी के घर आए। दो किताबें कविता की भेंट की। विजय कुमार की मेरी प्रिय कविताएं और किरण अग्रवाल की धूप मेरे भीतर।
30.10.14
सुबह-सुबह शारदा सिन्हा का गाया एक गाना सुना तो भोजपुरी फिल्मों के कई गाने याद आ गए- विरह वेदना से भरे। रोजी-रोटी के लिए परदेस गए मजूरों की घरवालियों की तड़प-पीड़ा को अभिव्यक्त करते गाने। इधर तो भोजपुरी फिल्मों के गाने फूहड़ता और अश्लीलता के मानो पर्याय हो चले हैं। बड़ी तकलीफ होती है इस गिरावट को देख कर।