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Monday 20 Nov 2017

पूर्वाग्रह


रमेश शर्मा
गायत्री मंदिर के पीछे , बोईरदादर
रायगढ़  (छग)़ 496001
मो.  9752685148

उसके पांवों में हल्के चोट के निशान अब भी साफ  दीख रहे थे। उसकी एड़ी के ऊपर की साफ-साफ दीखने वाली चमकीली त्वचा का ख्ुारदुरापन रह रह कर मुझे पिछली घटनाओं की याद दिलाता रहा। समय किस तरह तेजी से बीत जाता है यह मैं पहले भी कई बार महसूस कर चुका था और आज फिर से महसूस हो रहा था।
 तुम मॉउथ आर्गन अच्छा बजा लेते हो कहते हुए उसने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाना चाहा । मैंने सिर हिलाकर हामी भरी पर ऐसा करते हुए मुझे बड़ा अजीब सा लगता रहा क्योंकि मॉउथ आर्गन बजाना तो मैंने कब का छोड़ दिया था । मुझे आश्चर्य हुआ और ख्ुाशी भी हुई कि संगीत से उसका नाता अब भी खत्म नहीं हुआ है। इसका मतलब पिछली घटनाएं उसे अब भी याद होंगी, मैं मन ही मन सोचने लगा। अगर वह पूछ बैठी तुम्हारा मॉउथ आर्गन कहां है? उसने कह दिया चलो सुनाओ कोई अच्छा सा धुन ! तो क्या जवाब दूंगा ?  कैसे उसे कह पाऊंगा कि संगीत से मेरा नाता कब का टूट चुका है !
 इस बार यहां खूब बर्फ पड़ रही है - बातचीत का सिलसिला मैंने दूसरी दिशा में मोडऩा चाहा।
हां, कहते हुए उसने सिर्फ हामी भरी।
मैं सोच रहा था कि इस बात से वह उछल पड़ेगी पर मेरा अंदाजा गलत निकला। तो क्या यहां की सुन्दर  और खूबसूरत वादियों से उसने भी अपने को अलग सा कर लिया है? मेरे मन में सवाल उठने लगे। समय के साथ चीजें बदल जाती हैं, परिस्थितियां चीजों को किस तरह गड्ड मड्ड कर देती हैं, मन के भीतर इस तरह की बातें आने जाने लगीं और मैं सावधान हो गया। ऐसी सावधानी जो मुझे उसके साथ बरतनी थी, जिसका उसे अंदाजा नहीं था।
कितने दिन रुकोगे यहां? - उसने फर्श को दाएं पैर की अंगुलियों से कुरेदते हुए आंखें नीची कर इस तरह पूछा जैसे मेरे आने जाने से उसे कुछ फर्क पडऩे वाला हो।
कह नहीं सकता, शायद कुछ दिन लगें या हो सकता है कल ही जाना पड़े ।
कल ही मतलब ?
मेरे जवाब से जैसे वह चौंक पड़ी, फिर अपने को संभालते हुए कहने लगी - लोगों का आना जाना तो लगा रहता है यहां ! इस हिल स्टेशन में लोग सैर सपाटे के लिए आते हैं फिर चले जाते हैं ! तुम भी आए हो तो जाओगे ही ! क्या फर्क पड़ता है लोगों के आने जाने से ? कहते कहते वह थोड़ा रूक गई । लगा जैसे उसके चेहरे पर दर्द की आड़ी तिरछी रेखाएं बनने बिगडऩे लगी हैं जिसे वह छुपाने की नाकाम कोशिश करती रही । ख्ैार !  तुम इतने दिनों बाद इस शहर में आए हो और मैं तुमसे वापस जाने की बात पूछने लगी। मुझे तुमसे इस तरह नहीं पूछना चाहिए ! चलो अपनी सुनाओ, इतने सालों में तुमने  क्या किया? इतने दिन कहां रहे ? तुम्हारा घर परिवार? एक ही सांस में जैसे वह सब कुछ पूछ लेना चाहती थी ।
मुझे अच्छा लगा कि वह मुझे सिर्फ अपने हॉटल का कस्टमर भर ही नहीं समझ रही। कॉलेज के दिनों की दोस्ती के लिए अब भी उसके मन में मेरे लिए थोड़ा स्पेस बचा है । वह आज एक खूबसूरत और आलीशान हॉटल की मालकिन है। देखकर ही मैं जान गया था। इतने सालों बाद  कॉलेज के दिनों की दोस्ती की धुंधली सी यादों के सहारे मेरे जैसे एक साधारण आदमी की जिंदगी के बारे में जानने की इच्छा रखने के उसके पास कोई कारण थे भी या नहीं थे यह मुझे नहीं मालूम! पर मुझे लेकर सवाल उसके पास बहुत थे। सवाल तो मेरे पास भी बहुत थे उसे लेकर जो उससे मिलने के बाद मेरे मन में पैदा हो रहे थे। वह अपने हिस्से के सवाल पूछ रही थी और मैं अपने हिस्से के सवालों को लेकर चुप था। उसकी मुखरता और मेरी चुप्पी के बीच उसके पास कुछ तो ऐसा था जो मेरे पास नहीं था। वर्षों पहले अपने अपने हिस्से की चीजें छोडक़र हम दूर हो गए थे। उसके हिस्से का प्यार जो उसे मुझसे पाना था और मेरे हिस्से का प्यार जो मुझे उससे पाना था वो चीजें अपनी जगह अंकुरित होने के पहले ही जमींदोज हो गईं। तुम बिलकुल नहीं बदले, अचानक वह कह उठी। कहते हुए उसके चेहरे पर एक तरलता थी, एक ऐसी तरलता जो पहाड़ों की पिघलते हुए बर्फ में होती है। यूं तो मेरी चुप्पी उसे कभी पसंद नहीं आई, मेरा चुप रहना आज भी उसे अखर रहा था। ये सारी घटनाएं जैसे हमें पुराने दिनों की ओर घसीट कर ले जाने की कोशिश में लगी हुई थीं।
उसके इतने सारे सवालों के जवाब देना मेरे लिए नामुमकिन न सही पर आसान तो नहीं था ! रिश्तों का भूगोल कई बार हमें इस लायक नहीं छोड़ता कि इनको लेकर कोई बातचीत आपस में ख्ुालकर संभव हो।  अभी मैं उसके सवालों के जवाब देने की हालत में भी नहीं था इसलिए नींद आने और कल इत्मीनान से बातें करने का बहाना बनाते हुए इस खूबसूरत और आलीशान हॉटल के अपने कमरे की तरफ सीढिय़ां चढ़ता हुआ आगे बढ़ गया। मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता रहा कि वह पीछे से एकटक मुझे ही देख रही है। जैसे उसकी नजरें  मेरी पीठ को छू रही हैं, जैसे उसकी नजरें मेरी पीठ को थपकियां दे रही हैं। अचानक उस वक्त उसे लेकर क्यों मुझे ऐसा लगने लगा कि सब कुछ ठीक दिखाई देते हुए भी सब कुछ ठीक नहीं है। चीजें जिस तरह दिखाई देती हैं ठीक वैसी ही हों यह हमेशा जरूरी भी नहीं होता। इसे अपने जीवन में मैं कई कई दफे महसूस कर चुका था और इन्हें लेकर कई कई दफे धोखा भी खा चुका था।
उन दिनों कॉलेज की छुट्टियां थीं। मैं छुट्टियों में गांव चला गया। उन दिनों पिता जी की तबियत को लेकर मां अक्सर परेशान रहा करती थी। आए दिन उनका बी.पी. और शुगर हाई हो जाने की शिकायत सामने आ रही  थी। लगातार उनका इलाज चल रहा था। घर की माली हालत वैसे भी ठीक नहीं थीं। पिताजी की बीमारी ने परिवार की कमर और तोड़ कर रख दी थी। एक दिन मां ने अचानक कहा था कि बेटा तू शादी कर ले। मैं मां की बात सुनकर भौंचक रह गया था।
मां ! .........पिताजी इस हालत में हैं और तू मेरी शादी की बात कर रही है? तेरा दिमाग तो ठीक है न !
मैं ठीक कह रही हूं बेटा। मेरी बात मान जा, तू शादी कर ले, मैं तेरे लिए लडक़ी भी ठीक कर चुकी हूं। पास के गांव की मालगुजार की बेटी है, सुंदर है, पढ़ी लिखी है और क्या चाहिए तुझे !
क्या? ये क्या कह रही है तू? शादियां इस तरह होती हैं क्या? मैंने इस बारे में अभीे सोचा तक नहीं है। मैं यह शादी कतई नहीं कर सकता मां !
हमारे बीच मेरी शादी को लेकर लम्बा तर्क वितर्क चलता रहा। मां ने बहुत कोशिश की, कि मैं इस शादी के लिए तैयार हो जाऊं पर मैं उस वक्त हरगिज तैयार नहीं हुआ। मेरे लाख कोशिशों के बावजूद मां यह बताने को कभी तैयार नहीं हुई कि आखिर वह ऐसा क्यों चाहती है। मैं पूरे दो महीने गांव में ही रहा, इस दरमियान कुछ दिनों तक मां चुप चुप रही। गांव से शहर लौटने का मेरा समय भी आ गया। विदा लेते वक्त मां ने मुझसे इतना भर कहा कि इस बार तेरा पैसा पहुंचने में शायद थोड़ी देर हो जाय पर चिंता मत करना मैं किसी तरह तेरे खर्च की व्यस्था कर ही लूंगी। और शहर लौटने के तीन महीने बाद ही एक दिन पिताजी की तबियत अचानक बिगड़ गई और मुझ तक उनके इंतकाल का समाचार पहुंचा था।
मैं मारा मारा घर पहुंचा था। किसी तरह पिताजी के क्रिया कर्म का निपटारा हुआ। मां पहले से अब और चुप चुप रहने लगी थी। मां ने फिर कभी मेरी शादी को लेकर मुझसे कोई बात नहीं की। इस बीच लोगों से मुझे पता चला कि पैसे के अभाव में ठीक से इलाज न हो पाने के कारण पिताजी चल बसे। आखिरी समय में पास के गांव के मालगुजार ने मां को पैसे देने से साफ मना कर दिया था। उल्टे कर्ज लौटाने की बात कहकर उसने मां की चिंता और बढ़ा दी थी। उस दिन मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि आखिर मालगुजार की बेटी से मां मेरी शादी क्यों करवाना चाहती थी। जानकर मुझे दुख पहुंचा था। उसी वक्त मेरे मन में सवाल उठने लगे थे....आखिर एक बार उस लडक़ी को देख लेने में हर्ज ही क्या था? संभव है वह पसंद आ जाती और मैं उस लडक़ी से शादी के लिए हामी भर देता। फिर मालगुजार जी जो कि आड़े वक्त में मां के काम आ ही रहे थे उस वक्त पूरी सहायता करते और पिताजी की जान शायद बच जाती !
दरअसल उन दिनों गांव की लड़कियों को लेकर एक अजीब किस्म के पूर्वाग्रह से मैं घिरा हुआ था। गांव की लड़कियां दब्बू होती हैं, गांव की लड़कियां प्रेक्टिकल नहीं होती, उनके साथ जीवन गुजारना बेहद कठिन होता है, इस तरह की बातें अक्सर मैं अपने दोस्तों से सुना करता और धीरे धीरे मैंने एक धारणा बना ली कि अगर मैं शादी करूंगा तो किसी शहर की लडक़ी से ही करूंगा !
झरोखों के उस पार रोशनी में नहाए इस शहर की खूबसूरती को नए रुप में देखने की कोशिश करते हुए रात्रि के बारह बजे तक मैं जागता रहा। मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने सिगरेट जला ली। धुएं का छल्ला उड़ाता रहा। दूर पहाड़ों पर बर्फबारी शुरु हो चुकी थी। दिन की धूप में पिघलने वाली बर्फ पहाड़ के चेहरे को तरल बना देता है। आधी रात को जमने वाले बर्फ के साथ मुझे उसका चेहरा बेहद कठोर होता हुआ दिखाई देने लगा।  
उन दिनों हम बीएससी अंतिम वर्ष में थे। परीक्षाओं के पहले हमने पिकनिक का प्रोग्राम बनाया था। शहर भी यही था, पहाडियां भी यही थीं जहां हम पहुंचे थे। हमारी टोली टुकड़ों में बंट गई थी। हम दोनों साथ हो लिए थे। पहाड़ी चढ़ते चढ़ते हम दूर उंचाइयों पर पहुंच गए थे। एक जगह हम देर तक बैठे रहे। हमने जी भरकर बातें की। उसने मुझे अपनी बातों से हंसाया और मेरी बातें उसे भी हंसाती रहीं। मैं चाहता था कि मेरी शादी एक शहरी लडक़ी से हो।  मेरी नजर में उससे बेहतर शहरी लडक़ी और कौन हो सकती थी। मैं उस दिन चाहता था कि अपने मन की बात हिम्मत से उसके सामने रखूं पर उसकी एक बात ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया था। मेरी हिम्मत जवाब दे गई। गांव के लडक़े बड़े दब्बू किस्म के होते हैं , मैं चाहती हूं जब भी मेरी शादी हो किसी शहरी लडक़े से हो। कहते कहते अचानक वह ठहाका लगाकर हंस पड़ी थी। उसका इस तरह हंसना मुझे कुछ समझ में नहीं आया ।
पहाड़ी पर बर्फबारी शुरु हो चुकी थी। मुझे उस दिन पहाड़ी का चेहरा बेहद शुष्क और कठोर लगा था। हम धीरे धीरे नीचे उतर रहे थे। उतरते उतरते एक जगह फिसल जाने की वजह से उसकी एड़ी के ऊपर हल्की चोट लग जाने की वजह से हमें कुछ देर और रुकना पड़ा। उसकी एड़ी के ऊपर की त्वचा चोट की वजह से थोड़ी खुरदुरी लग रही थी।
यह चोट का निशान हमेशा तुम्हें इस पिकनिक की याद दिलाता रहेगा - मैंने मजाक के मूड में कहा। मेरी बातें सुनकर उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर गई। मैं अपेक्षा कर रहा था कि वह ज्यादा कुछ रिएक्ट करे पर शायद पांव में हल्के दर्द की वजह से वह चुप ही रही। उसने आगे कुछ नहीं कहा, जबकि मेरी इच्छा बनी रही कि हम थोड़ी देर और बातचीत करें।
सभी हमारा इंतजार कर रहे थे। उस दिन खूब गाना बजाना हुआ था। मैंने मॉउथ आर्गन पर मुकेश का गाना- जाने कहां गए वो दिन..... सुनाया था जिस पर खूब तालियां बजी थीं। मॉउथ आर्गन पर बजायी वह मेरी आखिरी धुन थी। उसके बाद आज तक मैंने मॉउथ आर्गन को छुआ तक नहीं। पिकनिक के बाद जब हम विदा हो रहे थे तो एक तरह से ये हमारी अंतिम विदाई थी, पर हमने एक दूसरे को अलविदा नहीं कहा जैसे कि हमें मालूम हो कि हम दस बीस सालों के बाद फिर दोबारा मिल सकते हैं ।और सचमुच बीस सालों के बाद हम दोबारा मिले थे । उसकी एड़ी के ऊपर चोट के निशान देखकर पुरानी बातें एक के बाद एक मुझे याद आती रहीं पर हालात अब बिल्कुल बदल चुके थे।
उसकी कही गई वही बातें आज मुझे फिर से परेशान कर रही थीं। क्या सीरियस होकर उसने ऐसा कहा था, या मैंने उसकी बातों को सीरियसली मान लिया था। ये ऐसे सवाल थे जो मेरे हिस्से आए थे, जो मुझे उससे पूछने थे। क्या इन सवालों के जवाब उससे कभी मैं ले सकूंगा? दूर बर्फ से ढंके पहाड़ों से मैं आधी रात को पूछना चाह रहा था जो पास होकर भी बहुत दूर  लग रहे थे।  आज बीस साल बाद मुझे यकीनन लग रहा था कि सीरियसली ये सब बातें उस दिन उसने कहीं थीं। गांव की लड़कियों को लेकर मेरे अपने पूर्वाग्रह थे तो गांव के लडक़ों को लेकर उसके भी अपने पूर्वाग्रह क्यों नहीं हो सकते थे।
भारी ठंड के कारण रोशनी से नहाई सडक़ों पर अब इक्की दुक्की गाडिय़ां ही नजर आ रही थीं। लगभग पूरा शहर नींद में था। कल क्या कहूंगा उससे। अपने बारे में क्या बताऊंगा उसे। इसकी चिन्ता मुझे खाए जा रही थी। मैंने अब तक शादी नहीं की, इसका कारण वह अगर पूछ बैठी तो क्या जवाब दूंगा? और अगर जवाब दूंगा भी तो क्या वह यकीन कर पाएगी? इसी उधेड़़बुन में, मैं बिस्तर पर पड़ा रहा और पूरी रात बीत गई।
  सुबह मैं नहा धेाकर जल्दी तैयार हो गया। आज मुझे दोपहर बारह बजे यहां से कुछ दूर स्थित एक हॉटल में कंपनी के डीलरों की एक मीटिंग भी लेनी थी इसलिए सभी डीलरों को फोन पर मैंने दोबारा इत्तला कर दी। कंपनी का मुनाफा किस तरह दिन दूना रात चौगुना बढ़े इस बात को लेकर लगभग मेरी पूरी जिंदगी मैं खपा चुका था और मुझे इसमें सौ फीसदी कामयाबी भी मिली थी। इस नाते मुझे जी एम जैसे रसूखदार पद पर तरक्की भी मिली। लोगों का नजरिया आमतौर पर ठाट बाट देखकर ही किसी को जीवन में सफल आदमी मान लेने का होता है  इसलिए उन्होंने मुझे भी एक सफल आदमी मान लिया। मैं अपने नजरिए से इस सफलता को देखता तो मुझे कभी संतुष्टि नहीं मिलती। क्यों ? इसका जवाब अकेले में कई बार ढूंढने की कोशिश करते हुए मैं नाकाम हो चुका था।
  नीचे उतरा तो अपने चेम्बर पर वह नहीं दीखी। उसकी जगह एक सतरह अठ्ठारह साल की लडक़ी को उस चेम्बर में बैठा देखकर मेरे मन में एक जिज्ञासा पैदा हुई कि कहीं यह उसकी बेटी तो नहीं है। उसके नैन नक्श देखकर फिलहाल मुझे तो यही लग रहा था।
मुझे सामने देखकर उसने मुझे पहले ही आवाज दी- अंकल आपका नाम रोहित ठाकुर तो नहीं है? आप रुम नम्बर 103 में ही ठहरे हैं न ?
हां बेटा ठीक पहचाना तुमने, बताओ क्या बात है?
मम्मी ने आपके लिए एक लिफाफा भेजा है, कहते कहते एक सील बंद लिफाफा उसने मुझे थमा दिया।
और तुम्हारी मम्मी? अनायास एक प्रश्न मेरी जुबान से फिसल गया।
उनकी तबियत ठीक नहीं है। रात में अचानक उनकी तबियत बिगड़ गई। डॉक्टर ने घर पर एक हफ्ते आराम करने को कहा है।
और तुम्हारे पापा? जो प्रश्न मैं कविता से करने की हिम्मत शायद कभी जुटा नहीं पाता वही प्रश्न आज उसकी बेटी से अचानक कर गया।
पापा हमारे साथ नहीं रहते। वे तो दस साल पहले ही हमें छोडक़र दिल्ली चले गए। तब से उनका यहां आना जाना नहीं है। उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली है। मैं और मम्मी नाना नानी के साथ रहते हैं।
कई प्रश्नों के जवाब जो आसान नहीं होते, हमें बड़ी आसानी से मिल जाते हैं।
कविता के जीवन की पूरी कहानी उसकी बेटी के उत्तर में ही समाए हुए थे, जिसे जानने की उत्सुकता यहां उससे दोबारा मिलने के बाद मेरे मन में हमेशा बनी रही। मुझे सारे सवालों के जवाब मिल चुके थे।
मुझे खुशी हो रही थी या दुख हो रहा था मैं तय नहीं कर पा रहा था। खुशी आखिर क्यों होनी चाहिए मुझे? शायद ऐसी किसी संभावना के चलते कि कविता के जीवन की टूटी हुई डोर को मैं अपने जीवन से जोड़ सकूं। पर यह तो संभव ही नहीं था। यह प्रेक्टिकल भी नहीं था। फिर खुशी आखिर क्यों होनी चाहिए मुझे? इसलिए कि कविता के जीवन की डोर मंझधार में टूट गई थी। मैं अपने आप से ही सवाल करने लगा। कई बार जीवन में नाकाम हुआ आदमी दूसरे की नाकामयाबी पर भी खुश हो लेता है। ऐसा सोचते हुए मुझे अपने आप पर ही हंसी आ गई। क्रोध भी आया। अंतत: मुझे दिल से लगा कि कविता के जीवन की इस घटना से मुझे खुशी नहीं बल्कि तकलीफ पहुंची है। कई घटनाएं अपने भीतर की संवेदना को टटोलने का अवसर दे जाती हैं हमें जीवन में।  आज अपने भीतर की संवेदना को जिन्दा पाकर मुझे जो खुशी हुई, शायद उस खुशी को पाने के लिए हम अपने जीवन को ही एक रेस में तब्दील कर देते हैं फिर भी वह कई बार नहीं मिलती। मैं लिफाफे को सूटकेस में रखते हुए मीटिंग के लिए निकल पड़ा। मीटिंग में सारे लोग आ चुके थे। मेरे पहुंचने पर सबने मेरा अभिवादन किया। एक एक कर सबने अपनी बातें रखीं। अब एक महिला की बारी थी। लगभग चालीस के आसपास की, दीखने में अत्यंत खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी, उस महिला ने सबका अभिवादन करते हुए कहना आरंभ किया। आजकल लोगों में परफ्यूम और डियोडेरेंट का चलन खूब है, इसलिए इसकी डिमांड भी खूब है। कई बार तो समय पर माल उपलब्ध न हो पाने की वजह से हमें परेशानी हो जाती है। कंपनी को इस पर ध्यान देने की जरुरत है। कंपनी को लेडीज और जेंट्स सीरीज के कुछ नए परफ्यूम और डियोडेरेंट के निर्माण की दिशा में भी सोचने की आवश्यकता है क्योंकि बाजार में प्रतिस्पद्र्धा लगातार बढ़ रही है। कुछ लुभावने ऑफर देने की दिशा में भी हमें सोचना होगा। महिला ने जिस अंदाज में अपनी बातें रखी वह बेहद आकर्षक होने के साथ साथ हमारे लिए विचारणीय भी रही इसलिए इसे मैंने अपनी डायरी में नोट भी किया। अंत में मुझे लगा कि सारी बातें तो हो गईं पर आपस में हम सबका आत्मीय परिचय छूट गया, इसलिए अपना अपना परिचय देने का सबसे मैंने आग्रह कर डाला। सबने मेरा आग्रह स्वीकार करते हुए अपना परिचय विस्तार से देना आरंभ किया। अंत भी उसी महिला के परिचय से हुआ।
मेरा नाम स्वाति राजपूत है। वैसे तो मेरे पति का रियल स्टेट का बिजनेस है, पर मैं खुद अपना कुछ बिजनेस करना चाहती थी इसलिए कंपनी के सारे प्रोडक्ट की एजेन्सी मैंने अपने नाम पर ली। मुझे इसमें पूरी कामयाबी भी मिली। वैसे मेरा मायका एक गांव में है और सभी जानते हैं कि गांव की लड़कियों के बारे में हमारी धारणा आज तक बदली नहीं है। मैं चाहती थी कि अपने जीवन में, मैं भी खुद कुछ करके दिखाऊं इसलिए भी मैं इस क्षेत्र में आई। उसने अपनी बातें पूरी दबंगता के साथ इस तरह रखीं कि किसी ग्रामीण लडक़ी के बारे में वर्षों पहले मेरे मन में बनी धारणा को धराशायी होने में समय नहीं लगा। उसके बारे में आगे जानने की इच्छा मेरे मन में प्रबल हो उठी।
आपका मायका कहां पड़ता है? मैंने पूछा
जी, सुलतानगढ़ जिले के पास अंतापुर गांव पड़ता है मेरा मायका। वहां के मालगुजार ठाकुर पूरनचंद की इकलौती बेटी हूं मैं।
उसका जवाब सुनकर मेरे होश फाख्ता हो गए। लगा जैसे मेरे समूचे जीवन पर एक करारा तमाचा किसी लडक़ी ने जड़ दिया हो। ये तो वही लडक़ी निकली जिसके साथ बीस साल पहले मां ने शादी कर लेने का मुझसे आग्रह किया था और उसे देखे सुने बिना मैंने साफ मना कर दिया था। आज उससे मिलकर मुझे लगा जैसे मुझसे भी एक भारी गलती हुई। मां अगर आज जिंदा होती तो इस भूल के लिए मैं क्षमा मांग लेता, पर आज इस अवसर से भी मैं महरुम हो चुका था ।
   मैं सबसे विदा लेकर भारी मन के साथ अपने हॉटल लौट आया। मुझे मालूम था कि कविता अपने चेम्बर में नहीं होगी इसलिए उस तरफ देखे बिना ही मैं अपने कमरे की सीढिय़ां चढ़ता हुआ कमरे में पहुंच गया। मुझे अचानक याद आया कि सुबह निकलते समय कविता की बेटी ने एक बंद लिफाफा दिया था जिसे मैंने अभी तक खोला नहीं था। दिनभर मीटिंग और वहां स्वाति राजपूत से हुई मुलाकात के बाद कविता वाले प्रसंग से मेरा ध्यान अचानक हट गया था। स्वाति राजपूत से हुई मुलाकात भी मेरे जीवन की एक बड़ी घटना से कम नहीं थी। बंद लिफाफे का ध्यान आते ही मैं सोचने लगा कि आखिर कविता ने लिखा क्या होगा। आनन फानन में मैंने लिफाफा खोला। भीतर एक चि_ी थी, जिस पर लिखा  था...... रोहित! हमारे पूर्वाग्रहों ने हमारे जीवन की सारी मीठी धुनें जैसे हमसे छीन लीं। बीस साल पीछे मुडक़र देखती हूं तो अपनी गलतियों का एहसास मुझे होता है । मुझे उस वक्त पता था कि तुम मेरी तरफ  आकर्षित हो रहे हो , पर मैंने ही तुम्हें ऐसा करने से रोका। मेरे अपने पूर्वाग्रह ने ऐसा करने के लिए मुझे मजबूर किया। पर आज जब सोचती हूं तो मुझे लगता है कि मैं कितना गलत थी। एक शहरी आदमी के साथ भी मुझे आखिर क्या मिला जिल्लत की जिंदगी के सिवा। खैर वह समय अब बीत चुका रोहित ! बीता हुआ समय लौटकर फिर कभी नहीं आता। तुम तो मॉउथ आर्गन अच्छा बजा लेते हो न! पर मुझे तुमसे मिलकर न जाने क्यों ऐसा लगा कि तुमने भी सब कुछ जैसे छोड़ दिया! आखिर ऐसा क्यों रोहित ? जब तक सांसें चलती रहें सुरीली धुनों के साथ जीना तुम प्लीज! इसे कभी जीवन से अलग मत होने देना! चि_ी पढक़र मैं बिस्तर पर निढाल होकर गिर गया। ये कविता का दर्द था या उसकी नसीहत,  इसे जानने समझने की इच्छा अब मेरे भीतर खत्म हो रही थी। अचानक उस वक्त मुझे महसूस होने लगा कि हम अपने अपने पूर्वाग्रह को ढोते आ रहे हैं और उसका एक बड़ा खामियाजा हमें जीवन में उठाना पड़ा है। हम दोनों ही जीवन के अजीब मोड़ पर आकर आज खड़े थे जहां से कोई रास्ता निकलता हुआ नहीं दीख रहा था। फिर भी जीवन में एक नयी सुरीली धुन की तलाश में मुझे अब निकल जाना था, कम से कम कविता की बातों का खयाल रखते हुए ही सही! सो रात की फ्लाइट से घर लौट जाने का फैसला करते हुए मैंने अपना सामान पैक करना शुरु कर दिया ।