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Monday 20 Nov 2017

बिलवा गुड़

रजनी शर्मा बस्तरिया

116 सोनिया कुंज, देशबंधु प्रेस के सामने, रायपुर छ.ग.
मो.  9301836811

‘रंगसा’ ने चिमनी जलाई और मटके को भीतर टटोला। हाँ ‘भेला (डली) गुड़’ तो बीस पच्चीस होंगे ही, मटकी के नीचे तली पर सूखे पैरे (पैरावट) को बिछा कर उसके ऊपर गुड़ के भेले रख रंगसा निश्चिंत हो गई। कल हाट में ये तो बिक ही जायेंगे पर मन में संशय भी था कि इनका रंग बिलवा (काला) होने के कारण इसकी मांग सीमित हैं इसलिए बिक पाएंगे भी नहीं। रंगसा खुद भी (बिलवी) काली थी। पर उसके श्याम रंग और दमकती त्वचा, कसे शरीर सौष्ठव से पूरे व्यक्तित्व में अजीब सी कशिश थी। ऊपर से तीखी जुबान। ‘करेला कड़वा ऊपर से नीम चढ़ा’।
बस्तर के उस गांव में, जिसका नाम सोनारपाल था सच में सोना बरसता था। मालगुजार की पूरी जमीन पर गन्ने की फसल जब लहलहाती और गुड़ बनने का काम शुरु होता तो गांव की रौनक देखने लायक होती। अधिकांश को काम मिल जाता। बच्चे गन्ने का रस पी कर मस्त, स्थानीय कमजोर आदिवासी भी अपने हिस्से की जमीन पर गन्ना उगा कर मालिक की मशीन से रस निकालकर गुड़ तैयार करते थे। पूरा गांव मानो उत्सव मनाता था। आस-पास के दस गांवों में सिर्फ और सिर्फ  सोनारपाल में गुड़ बनता था। अहा कैसी मीठी-मीठी सोंधी खुशबू से आस-पास के दस गांव गमका करते थे।
खेतों में गन्ने के नीचे का कुछ हिस्सा ‘आँख’ (गन्ने की गठान) को छोडक़र ऊपर का शेष हिस्सा काटा जाता था। लहलहाते गन्नों के धारदार पत्ते, जब पुरवाई चलती थी तो इस तरह से सरसराते थे मानो इनकी कोई जुगलबंदी हवा के साथ हो रही हो। इतनी घनी फसल इन गन्नों की होती थी कि एक छोटा बच्चा इनके बीच खो ही जाये। विधाता का खेल देखिये सफेद गठानदार, बदसूरत, तेज कटीले पत्ते वाले गन्ने के भीतर कितनी मिठास होती है। मुझे तो लगता है ‘ऋषि दधिचि’ ने ही गन्ने के रूप में वानस्पतिक अवतार धर इस धरा पर जन्म लिया होगा। तभी तो इसका रस, इसकी तना, इसकी सोई (रस निकालने के बाद सूखा तना), दधिचि की तरह खुद को ईंधन की तरह जलाकर अपने ही रस से स्वादिष्ट गुड़ के रूप में नया जन्म, नयी शक्ल लेना, सिर्फ  गन्ने जैसे दधिचि ही कर सकते हैं और कोई नही।
रंगसा षोडशी ही थी। सांवली त्वचा, आठ-आठ घंटे गन्ने के खेतों में काम करने के बाद ऐसी चमकती, दमकती थी मानो रुप के लापरवाह देहाती सौंदर्य रूपी जल में सूरज की किरणें परावर्तित हो रही हों। रंगसा ने ‘हंसिया’ से गन्नों को काटा और ग_र बनाकर जा पहुंची मालिक के खेत में। उसे अब यह काम लगभग पंद्रह दिनों तक करना होगा। तभी तो गुड़ बन पायेगा।
रंगसा की सखियां, उनके अभिभावकों, सभी का जमावाड़ा मालिक के घर लगा रहता था। बड़े से सीमेंट की टंकी के ऊपर मशीन लगाई गई थी। बीस-बीस कनस्तरों की क्षमता वाली बड़ी कढ़ाई जमीन खोदकर बनायी गई भट्टियों में रस चढ़ाया जाता था। रंगसा जल्दी-जल्दी गन्ना, मशीन में डाली जा रही थी। वही दूर खड़ा ‘मोहना’ को रंगसा ने अपनी ओर ताकते पाया। ऊँह... उसने उचटती सी नजर उस पर डाली और जुट गई पुन: अपने कामों में। अब तो यह रोज की बात हो चली थी। गुड़ से सौंधेपन से रंगसा के चेहरे की लुनाई ‘मोहना’ को देखते और बढ़ जाती थी। गुड़ की चाशनी सी मिठास इन दोनों के नजरों में भर चुकी थी। और गुड़ के चाशनी के तारों से उनके हृदय झंकृत हो चले थे।
रंगसा को ही नहीं वरन और भी आदिवासियों को जल्दी रहती थी कि पहले मालिक उनके गन्ने का रस निकाल दे। क्योंकि सिर्फ मालिक में ही सामथ्र्य था गन्ने की मशीन खरीदने की। बड़ी-बड़ी काली कढ़ाइयों में जब गन्ना रस उड़ेला जाता उसके बाद वह जब खौलता था, तो ऐसा लगता था मानो समंदर में सुनामी की लहरें उठ रही हो। यह खदबदाहट उस इंस्पेक्टर के मन भी रंगसा को देख कर उठ रही थी। उस गांव में गुड़ के रस के मैल (रस के उबलने के बाद ऊपरी परत) से देसी गुड़ की शराब बनती थी, जिसे लेने अनेक अभिजात्य वर्गों, ऊंचे ओहदों पर आसीन लोगों का जमावाड़ा लगा रहता था। शहरी लोलुप नजरें गुड़, गुड़ की शराब पर कम बस्तर बालाओं के अनावृत्त देह को नापने ज्यादा ही आतुर दिखतीं।
    मोहना ने रंगसा के साथ मिलकर सोई (गन्ने की सोटियों को रस निकालने के बाद सुखाया जाता है) जल्दी-जल्दी भट्टी में डालना शुरु किया। खिडिंग नुको (और तेज लडक़ी) गुड़ बनाने वाला मिस्त्री चीखा। रंगसा के नीचे झुकते ही इंस्पेक्टर की लंपट नजरों का अनुलोम-विलोम शुरू हो गया था। ये नजरें अब रंगसा को चुभने लगी तो उसने वहाँ से हट जाना ही उचित समझा।
    आज रंगसा खुश थी मालिक ने वादा किया था कल सबसे पहले उसके गन्नों का रस की खेत कढ़ाइयों पर चढ़ेगा। रंगसा गुनगुनाते जा रही थी ‘‘काय रस रोसा बोदली खोसा, टेबुल देऊनसे बोसा’’। इतने में पीछे से मोहना के हाथों का स्पर्श उसके गालों पर हुआ और मोहना दूर जाकर खिलखिला पड़ा। ‘‘लेकी आपुन मुँह के दोखीस तो’’  (लडक़ी अपना चेहरा तो देखो), अपनी कलाई में पहने गये ककनी के छिलाव में रंगसा ने अपना चेहरा देखा। उसके चेहरे में काला टीका लगा हुआ था। बस्तर में हर कार्य के उत्सव में सहज प्राकृतिक उपलब्ध संसाधनों को ही इस्तेमाल किये जाने की प्रथा है। खेतों में रोपाई के बाद पंक का तिलक (कीचड़), गन्ना पेरानी में कड़ाही का करिया तिलक (काला तिलक), विवाह में देसी हल्दी का पीला तिलक, फागुन में टेसु तिलक और ना जाने क्या-क्या। सांवली रंगसा का चेहरा प्रियतम के साधिकार तिलक से रक्तिम हो चला। भले ही टीका काला क्यों न हो जंगलों की ओर रंगसा ‘तूके बाघ धरे’ (तुझे शेर खा जाये) जैसे लाड़ से भरे झूठे गुस्से से मोहना को दौड़ाती दिखी।
    कल के दिन की प्रतीक्षा में रंगसा सुबह जल्दी ही जा पहुंची मालिक के घर। यह क्या वहां तो पहले से ही गुड़ बनवाने की कतार लग चुकी थी। रंगसा का इंतजार बढ़ता ही गया। आज तो मालिक भी नहीं थे। अंत में रात्रि आठ बजे तक उसकी पारी आई। गन्ने का रस उबल चुका था। अब उसकी चिक्की बन गई थी। हाथों में तेल लगाकर गोल गोल, जल्दी-जल्दी, बड़े लड्डू की शक्ल में रंगसा ने गुड़ के भेले बनाने शुरु कर दिये। बाजू मेंं मालिक के गुड़ बाल्टियों की शक्ल में रखी गई थी। अहा कितना सुंदर उजला, गोरा, अनकापल्ली गुड़। और हमारा बिलवा देहाती गुड़। रंगसा ने खुद को समझाया आखिर बोबो (पकवान) तो इसी गुड़ से बनता है ना हाट में वो बिक ही जायेगा। पूरा परिसर खाली हो चला था। पर रंगसा अपने काम निपटाने के चक्कर में ठहर गई थी। अचानक किसी का लिजलिजा स्पर्श पाकर रंगसा चौंकी। ‘अरे कसन करसीस’ (क्या कर रहे हो) देसी गुड़ की शराब के नशे में धुत्त इंस्पेक्टर भला कहां मानने वाला। उसकी मजबूत पकड़ से अपने आपको छुड़ा नहीं पाई। पीछे गन्ने की सोई के ठेर, बाड़ी में घुप्प अंधेरा, घिघियाने की आवाज....।
    सुबह पूरे गांव में हल्ला मच चुका था कि किसी ने सोई की ढ़ेर में आग लगा दी। पूरी रात होली जली। मानुषगंध की दुर्गंध भी आ रही थी। गन्ने की सूखी सोई की लपटों को पूरे गांव ने देखा था। रंगसा ने अपने स्त्रीत्व की होली जलाने वाले की ही चिता सोई में जला दी। निर्विकार, शांत कदमों से तालाब पार कर गन्नों के खेतों के बीच से रंगसा गुजर रही थी। पत्तों की सरसराहट ने कुछ फुसफुसाया। रंगसा ने उन पत्तों को सहला दिया। हांडी में भरे गुड़ के भेलों को बुचकारते गन्ने के खेतों से विदा ली...। बिलवा गुड़ भी कुछ कह रहे थे... हाँ चलो यहाँ से दूर किसी दूसरे हाट में जहां बस्तर अपने ‘बिलवा गुड़’ की बाट जोहता है नि:शब्द...।