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Monday 20 Nov 2017

शैख कदीर कुरैशी ‘दर्द’ की गज़लें


(एक)

मेरा हमउम्र था, यारो, मेरे आँगन का दरख्त,
‘आम’ का मत कहो, था वो मेरे तन-मन का दरख्त।
रूह को मेरी नचाता था वो राधा की तरह,
हो न हो पहले कभी होगा वो मधुबन का दरख्त।
नित नए अज़दहे आते हैं, लिपट जाते हैं,
जि़ंदगी है मेरी या है कोई चंदन का दरख्त?
सींचते रहिए इसे चाहतों की शबनम से,
सूख जाए न कहीं आपके जोबन का दरख्त।
फूल देता है, मगर, फल नहीं बनने देता,
अ$क्ल इंसान की रखता है ये गुलशन का दरख्त।
दुश्मनी जिससे थी, सर उसका कलम कर देते,
क्यूँ भला काट दिया आपने दुश्मन का दरख्त!
लेके आई है वहाँ ‘दर्द’ को तहज़ीब नई,
ना तो आँगन है जहाँ और न आँगन का दरख्त।

(दो)

बोझ हम समंदर का रूह पे उठा लाए,
जि़ंदगी की धारा से बूँद क्या चुरा लाए!
आदमी में सूरज है, चाँद है, सितारे हैं,
हम ज़मीं की मिट्टी में आसमाँ छुपा लाए।
प्यार एक कोशिश है खुद को भूल जाने की,
लोग इस हकीकत को दास्ताँ बना लाए।
वो महकते तन-मन को यूँ सजा के आए हैं,
जैसे कोई पूजा की थालियाँ सजा लाए।
उम्र के अँधेरों में कुछ तो रौशनी होगी,
जुगनुओं को हम उनकी याद में मिला लाए।
ये जो चंद साँसें हैं वक्त की अमानत हैं,
आप इनको चोरों की हाट में उठाए लाए।

(तीन)

खुदफरेबी का हुनर दिल को सिखाते क्यूँ हो,
रेत पर चाँद की तस्वीर बनाते क्यूँ हो?
तुम तो कहते हो तुम्हें प्यार नहीं फूलों से,
मेज़ पे अपनी ये गुलदान सजाते क्यूँ हो!
कम नहीं आज के इस दौर में जीने के अज़ाब,
हमको दोज़ख के अज़ाबों से डराते क्यूँ हो?
खुशलिबासी भी बुरी चीज़ नहीं है, लेकिन,
खुशमिज़ाजी को लिबासों में छुपाते क्यूँ हो!
रात गाँवों में हुआ करती है, शहरों में नहीं,
आप सो-सो के यहाँ उम्र गँवाते क्यूँ हो?
दिल की टहनी पे ये गाता है, तो क्या लेता है,
‘दर्द’ खुशरंग परिंदा है, उड़ाते क्यूँ हो?

(चार)

इक रंगे-बेखुदी हो, जहाँ तक भी नज़र जाय
$गज़लों को पढ़ो ऐसे के खुशबू-सी बिखर जाय।
दिल में तो उतर जाते हैं अश्आर बहुत से,
है शे’र मगर वो जो कलेजे में उतर जाय!
पक्के मकान बन गए सहरा-ओ दश्त में,
अब $खाक हो उड़ानी तो दीवाना किधर जाय?
बच्चों को पढ़ाने में जवानी गुज़र गई,
फ़िक्रों  में अब उन्हीं की बुढ़ापा भी गुज़र जाय।
परवाज़ में रहता है तखय्युल का परिंदा,
मुमकिन है किसी रोज़ खलाओं में ठहर जाय।
हर रोज़ भला कौन नई शम्अ जलाए,
माज़ी के  उजालों में अगर शाम गुज़र जाय।
हम इसलिए शेरों में मिला देते हैं कुछ दर्द,
के हुस्ने-$गज़ल ‘दर्द’ से कुछ और निखर जाय।

(पाँच)

लफ्जों में ये जज़्बात का इक शीशमहल है,
सर चढक़े बोलता है ये, जादू-ए-$गज़ल है।
शाइस्तगी-ए-हुस्न और पाकीज़गी-ए-इश्क,
उर्दू की $गज़ल हिन्द की तहज़ीब का फल है।
जल्वों के गुलाबों से मोअत्तर थे शबो-रोज़,
कीचड़ में खिला अब तो इक यादों का कँवल है।
खुशियाँ तिजोरियों में नहीं, गुल्लकों में हैं,
ख्वाबों को जमा करना-ये बच्चों का श$गल है!
बचपन में पतंगें नहीं, लूटी थीं किताबें,
अब महफ़िलों  की लूट पसंदीदा-अमल है।
अब बेरुखी हमारी खटकती है क्यूँ उन्हें,
ये बेरु$खी अमल नहीं, ये रद्दे-अमल है।
जी चाहता है अपना त$खल्लुस ही बदल दें,
म$क्तों में ‘दर्द’ का ज़रा ज्यादा ही दखल है!

(छह)

हों वो कुछ भी, मगर, इंसान भले होते हैं,
गम की तहज़ीब में पलकर जो बड़े होते हैं।
घेर लेता है हमें एक हिफाज़त का हिसार,
हाथ जब माँ के दुआओं में उठे होते हैं।
देखते हैं जो फकत अपनी नज़र से खुद को,
लोग दुनिया की नज़र में वो बुरे होते हैं!
खून के रिश्तों से बढक़र हैं शऊरी रिश्ते,
क्योंके वो तर्के-तअल्लुक से परे होते हैं।
नाम मालिक का लिखा रहता है घर के बाहर,
दिल के दरवाज़ों पे भी नाम लिखे होते हैं।
खुश नहीं रह सका इन्सान जड़ों से कटकर,
अपनी जड़ से जुड़े सब पेड़ हरे होते हैं!

(सात)

दिल से होकर कभी उल्फत, कभी नफरत निकली,
पर न तस्कीने-अना की कोई सूरत निकली!
यूँ निकलने को बहुत जिस्म के अरमाँ निकले,
पर अभी तक न मेरी रूह की हसरत निकली।
जन्नतें कितनी खुदा ने हमें बख्शीं, लेकिन,
इब्ने-आदम में ‘निकल जाने की’ आदत निकली।
हम तो समझे थे कि मज़हब है तबस्सुम इनका,
मुस्कुराना तिरे होठों की सियासत निकली!
वो जो जज़्बात बदलते थे लिबासों की तरह,
उनके सीनों में दिलों की जगह दौलत निकली।
वक्त अहसास है, ये तब हमें महसूस हुआ,
जब तेरे हिज्र की इक रात भी मुद्दत निकली!
ज़ाय$का अब कोई जँचता ही नहीं है हमको,
जाने कैसी ये तेरे ‘दर्द’ में लज़्जत निकली।

(आठ)

खुद-ब-खुद जिसकी तर$फ जाए नज़र, जाने दो,
वो जहाँ जा के ठहरती है, ठहर जाने दो!
ये भी मुमकिन है के वो रूह तलक जा पहुँचे,
प्यार को जिस्म के रस्ते से गुज़र जाने दो।
याद आती है उजालों की अंधेरे घर में,
दिल की लौ तेज़ करो, याद को मर जाने दो।
देखना, मौत भी इक रोज़ मरेगी इस पर,
जि़ंदगी को मिरी कुछ और सँवर जाने दो।
बाद में खूब खलाओं में उड़ानें भरना,
पहले ज़ह्नों की खलाओं को तो भर जाने दो!
खुद को तारीख यकीनन कभी दोहराएगी,
ज़ुल्म जिसको भी जो करना है वो कर जाने दो।
मान लेंगे के कहीं चाँद कोई निकला है,
चाँदनी ‘दर्द’ के आँगन में बिखर जाने दो।

(नौ)
महफ़िल  में यूँ तो उनकी किसी पे नज़र न  थी,
दिल की नज़र कहाँ थी, किसी को खबर न थी।
उनकी निगाह में भी $गज़ब का शऊर था,
थी तो शराबियों-सी, बहकती, मगर, न थी।
दोनों तर$फ दिलों में कमी कुछ न कुछ तो थी,
न$फरत इधर नहीं थी, मुहब्बत उधर न थी।
लगता है कोई बद्दुआ हाइल है इन दिनों,
वर्ना मेरी दुआ तो कभी बे-असर न थी।
लो, अब तो सियासत ने फकीरी भी सीख ली,
पहले ये तख्त-तख्त थी, यूँ दर-ब-दर न थी।
दुनिया बनाने वाले बनाया ही क्यूँ इसे,
मुडक़र जो देखने की भी फुरसत अगर न थी।

(दस)

हस्ती की बज़्म में जहाँ देखो वहीं फरेब,
धोखे कहीं नज़र के, नज़ारे कहीं $फरेब।
जब भी किसी ने पाया ह$की$कत का कुछ सुरा$ग,
$खुदसा$ख्ता ह$की$कतें देने लगीं $फरेब।
जितने $फरेब हैं वो सभी रौशनी के हैं,
तारीकियाँ बज़ाते-खुद देती नहीं $फरेब।
वो आसमान भी तो खला का तिलिस्म है,
हो न कहीं अधर में लटकती ज़मीं $फरेब।
बेहुस्न लग रही हैं गुलाबों की मह$िफलें,
दुनिया-ए-रंगो-बू ने दिए वो हसीं फरेब।
महबूब बन के मुद्दतों दिल में बसा रहा,
वो श$ख्स लग रहा है अब इक दिलनशीं $फरेब।
हम अह्ले-‘दर्द’ हैं, ये हमारा उसूल है,
खाते तो हैं $फरेब, पै देते नहीं $फरेब।

(ग्यारह)

हमें जो होता लगे है, वो सब नहीं होता,
मगर, जो होता है, वो बे-सबब नहीं होता।
हुए हैं आप, तो इसकी भी कुछ वजह होगी,
कोई किसी से यूँ ही लब-ब-लब नहीं होता।
मिले हो तुम तो मैं $गैरो का प्यार क्यूँ छीनूँ,
जो बानसीब है, वो बेअदब नहीं होता!
उछाले जाते हैं $कानून शाहराहों पर,
अदालतों में भी इंसा$फ जब नहीं होता!
भरा न ज़$ख्म, मगर व$क्त के असर को सलाम,
जो ‘दर्द’ होता था पहले वो अब नहीं होता।

(बारह)

रास्ते होते हैं दिल से दिल तलक जज़्बों के बीच,
कहकहों से दर्द छुप सकते नहीं अपनों के बीच।
आ गया लो, दिल में फिर उनके खयालों का बसंत,
सुर्ख टेसू खिल रहे हैं कुछ हरे ज़ख्मों के बीच।
रौन$के-बज़्मे-मुहब्बत बढ़ गई, बढ़ती गई,
खिलखिलाकर हँस दिए जब वो हसीं लम्हों के बीच।
होते हैं हर दौर में अज़्मत के पैमाने अलग,
आदमी मुमताज़ हो सकता है हम-अस्रों के बीच।
है खुदा माबूद, वो महबूब बन सकता नहीं,
होती है फित्र्री  मुहब्बत सिर्फ हमजिंसों के बीच।
अपने साए से लिपटने के लिए मजबूर है,
उम्र भर जज़्बे लुटाए जिसने कमज़र्फों के बीच।
सर झुकाए आज तक बैठे हैं इंसानों के ‘दर्द’
बेसबब जंगें हैं जारी चंद कमनज़रों के बीच!

(तेरह)

और इक जि़ंदगी होती है अगर मौत के बाद,
राज़ खुल जाएगा उसका भी, मगर मौत के बाद!
आख़िरत  की खबर इन्साँ को फरिश्तों से मिली,
लौट कर कब कोई आया है बशर मौत के बाद।
सिर्फ हो ‘जिस्म’ हकीकत, कहीं ऐसा तो नहीं,
‘रूह’ हो तो नहीं जाती है ‘सिफर’ मौत के बाद?
काश, ऐसा भी कोई हो के जो सचमुच न मरे,
लोग होते बहुत देखे हैं अमर मौत के बाद।
क्या पता कौन से जन्मों में मिलेगी मंजि़ल,
खत्म होगा न मुहब्बत का सफर मौत के बाद?
जि़ंदगी पर इसे हावी नहीं होने देना,
खुद ही मिट जाएगा ये मौत का डर मौत के बाद।
‘दर्द’ ही क्या, य$कीं होता है ये हर शाइर को,
कद्र उसकी भी बहुत होगी, मगर मौत के बाद!