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Saturday 18 Nov 2017

अपनी नज़र से खुद को देखने वाला शायर : शैख कदीर कुरैशी ‘दर्द’


ज़हीर कुरेशी
108, त्रिलोचन टावर,
संगम सिनेमा के सामने,
गुरुबक्श की तलैया, पो.ऑ. जीपीओ, भोपाल-462001 (म.प्र.)
मो. 09425790565

शै$ख $कदीर कुरैशी ‘दर्द’ एक ‘परफेक्शनिस्ट’ किस्म के कोहनामश्क शायर हैं- जो कई बार अपनी एक-एक $गज़ल पर छह-छह महीने तक काम करते देखे गए हैं। संभवत: यही कारण है कि उनकी $गज़लों की संख्या उतनी भी नहीं है, जितनी उनकी आयु के वर्ष हैं। उनकी $गज़लों का फलक व्यापक और बहुआयामी है। वे अपने अशआर में आज की गतिमान जि़न्दगी को विभिन्न कोणों से देखते-परखते हैं।
‘दर्द’ साहब की $गज़लों की जो सबसे बड़ी विशेषता है- वह है उनकी आम-फहम भाषा। वे उर्दू के शायर होते हुए भी, भाषिक रूप से हिन्दी मुहावरे के का$फी निकट हैं। उनकी अधिकाँश $गज़लें हिन्दी-उर्दू की साझा संस्कृति का एक अनुकरणीय उदाहरण मानी जा सकती हैं।
प्रारंभिक और पारंपरिक तौर पर प्रेम, प्रेम की शिद्दत, प्रेम की उदात्तता में रचे-बसे उनके शेरों का सौन्दर्य-बोध देखते ही बनता है। यथा-
वो महकते तन-मन को यूँ सजा के आए हैं-
जैसे  कोई  पूजा  की  थालियाँ सजा लाए।
लेकिन, जल्दी ही ‘दर्द’ साहब को इक्कीसवीं सदी की माशूका की अविश्राँत मुस्कान भी ‘होंटों की सियासत’ नज़र आने लगती है। शेर मुलाहिज़ा $फरमाइए-
हम तो समझे थे कि मज़हब है तबस्सुम इनका,
मुस्कुराना  तिरे  होंटों  की  सियासत निकली।
अंतत: अशरीरी प्रेम को $खारिज करते हुए, ‘दर्द’ साहब ओशो रजनीश के देह-सिद्धान्त को ही खूबसूरत शेरी लिबास पहना कर अपना भाव मुकम्मल करते हैं-
ये भी मुमकिन है के वो रूह तलक जा पहुँचे,
प्यार  को  जिस्म के रस्ते से गुज़र जाने दो!
इस सदी के जटिल आदमी का मनोजगत अबूझ है। वह कहता कुछ है, करता कुछ है। सीधे रस्ते चलने वाले कवि को यह अच्छा नहीं लगता। लगभग इसी भाव-भूमि पर ‘दर्द’ साहब का एक नाराज़ मनोवैज्ञानिक शेर-
दुश्मनी जिससे थी, सर उसका $कलम कर देते,
क्यूँ भला काट दिया आपने दुश्मन का दर$ख्त!
‘दर्द’ साहब के अशआर में आज की राजनीति की खिडक़ी से झाँकते हुए शेर आटे में नमक के बराबर हैं। धर्म का राजनीति में घालमेल ‘दर्द’ साहब को भले ही पसंद न हो, लेकिन, यह वर्तमान राजनीति का बहुत बड़ा सच है। अपने एक शेर में ‘दर्द’ साहब इसी भाव-भूमि का शेर कुछ इस तरह कहते हैं-
वो समझते हैं कि न$फरत से मिटेगी न$फरत,
आग  से  आग  बुझाते हैं, बड़े नादाँ हैं!
चन्द पैसों की $खातिर, अपने मुल्क को छोड़ कर जाने वाले अप्रवासियों को भी शै$ख $कदीर कुरैशी ‘दर्द’ अच्छा नहीं समझते। उनके अनुसार, ऐसे लोगों के यादों के पेड़ अंतत: सूख जाते हैं। शेर-
खुश नहीं रह सका इंसान जड़ों से कट कर,
अपनी  जड़  से जुड़े सब पेड़ हरे होते हैं।
आज का समय विश्व-बाज़ार का समय है। बाज़ारवाद ने जि़न्दगी के नैसर्गिक परिवर्तनों को ‘यूज़ एण्ड थ्रो’ के संघर्ष में बदल दिया है। ‘दर्द’ साहब जि़न्दगी में ऐसा परिवर्तन नहीं चाहते। इसी भाव-भूमि पर उनका एक स्वाभिमानी शेर-
बाजार अगर चाहे तो हम को $खरीद ले,
$खुद के लिए बाज़ार बनाने से रहे हम!
तेज़ी से बदलती हुई टेक्नालोजी के साथ, आज के आदमी का मानस भी बदल रहा है। शै$ख $कदीर $कुरैशी ‘दर्द’ बदलते हुए समय के साथ बदलना नहीं चाहते। अपने कुछेक अशआर में वे नए-नए तजरुबों से भी सीखने से हिचकते हैं। अपनी नज़र से खुद को देखने को भी वे बुरा नहीं समझते। उनके ऐसे ही दो शेर-
तजुर्बों से भी कभी  कुछ नहीं सीखा हमने,
हम  तो  जैसे  हैं, हमें वैसा बना रहने दो।
देखते हैं जो $फ$कत अपनी नज़र से $खुद को,
लोग  दुनिया  की नज़र में वो बुरे होते  हैं!
कुल मिला कर, शै$ख $कदीर कुरैशी ‘दर्द’ एक ऐसे शायर हैं जो संख्या में नहीं, गुणवत्ता व सार्थकता में विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार-
हर शेर इक किताब हो, कोशिश है हमारी,
अंबार  किताबों  के  लगाने  से रहे हम।
‘दर्द’ साहब की तरह, लगभग हर तीसरे शायर को यह गुमान हो सकता है। लेकिन, अशआर पाठक या श्रोताओं तक पहुँचना भी तो एक शर्त है!