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Thursday 23 Nov 2017

कहाँ से कहाँ तक

विजय रंजन
4/14/41 ए महताब बाग,
अवधपुरी कालोनी-फेज-2,  
फैजाबाद (उ.प्र.)-224001
मो. 9415056438
हने को तो कहता था वह कि सन् 42 के आन्दोलन से पहले आजादी की लड़ाई में तीन बार जेल गया था वह.... कि लाहौर अधिवेशन में कुल आवास व्यवस्था का चारज नेहरु जी ने ही स्वयं उसे सौंपा था... कि मोतिहारी के दंगों के समय गाँधी ने बुलावा भेजा था काका के माध्यम से औ..र आजादी की लड़ाई में किसने क्या, क्यों, कैसे  किया...इसका लेखा-जोखा भी उसके पास था। हाँ, लोग-बाग चाहे चिढ़ाने के लिए या चाहे उससे प्रभावित होकर जब उसे ‘किसना नेता’ या ‘किशन जी’ कह दिया करते थे तब वह बहुत खु्श नजर आता था।
लोग-बाग उससे प्रभावित होते भी क्यों न ? आजादी की लड़ाई हो या राजनीति, धर्म-दर्शन या आइंस्टीन का सापेक्षतावाद या न्यूटन के गति के नियम, .. विषय कोई भी हो वह सभी पर दो-चार घंटे लगातार धाराप्रवाह भाषण दे सकता था। फार्म में आने पर अंग्रेजी, उर्दू , संस्कृत के तत्सम शब्द,  लैटिन के फ्रेज, फारसी के शे’र भी अक्सर उछाल देता था वह। बंगाली से बंगाली, पंजाबी से पंजाबी...बंजारों से बंजारी भाषा में बातें करते सुना था उसे मैंने भी।
पहनने के नाम पर हमेशा खादी का धुला सफेद सेट जिसमें गाँधी टोपी शामिल नहीं होती थी और पैरों में चप्पल- सादी सी भूषा थी उसकी।  हाँ, उँगलियों में एक-दो हीरों-जड़ी अँगूठी अक्सर पहने रहता था वह।
कुल मिला कर इतना तो ज्ञान था ही उसके पास कि किसी को अपने प्रभाव में लेने में उसे दो-चार मिनट से अधिक का समय नहीं लगता था।
मेरी पहली भेंट किशन नेता से कब हुई थी ? याद नहीं है।  बस, इतना ही याद आ रहा है कि तब वह फारेस्टर था आसपास ही किसी रेंज में।
एक बार बताया था किशन ने ही,  हाईस्कूल की पढ़ाई छोड़ कर तीन साल घर पर रहा था मैं.....काम नेतागिरी नहीं, देश की आजादी की लड़ाई ....यह क्या कम बड़ा काम थी जिसमें उस समय का सदुपयोग किया था मैंने। .........एक बार अपने एक रिश्तेदार के घर गया था मैं। वहाँ कई हमउम्र लडक़े भी आए थे जिनमें कोई कह रहा था कि उसे सीए कोर्स में 65 प्रतिशत माक्र्स मिले तो कोई अपने बीए पास करने की फिलासफी का गुणगान कर रहा था और कोई अपनी एमएससी की साइंस लैब की धमाचौकड़ी का बखान... तभी मुझे कुछ फील हो गया। वापस लौट कर इण्टर से एमए तक की पढ़ाई पूरी कर ली मैंने। ... कई बरस बाद मेरे सगे चाचा ने, जो दो बैलों की जोड़ी निशान वाले राजा फलां को हरा कर जिला परिषद के चेयरमैन बने थे, मुझे फारेस्टर बनवा दिया था।
कभी-कभी स्मृतियाँ प्याज के छिल्कों सी उघरती चली जाती हैं। किशन जी से मेरी आखिरी भेंट के 18-20 साल बाद प्याज के ऐसे ही छिल्के छितरा उठे थे आज जब मेरी क्लीनिक पर एक 32-34 वर्ष की अनब्याही जवान लडक़ी और वेषभूषा से अधपढ़ प्रतीत लँगड़ा लडक़ा आया था।
आप किसी किशन नेता को जानते हैं? मैं उनका लडक़ा हूँ चन्द्रभूषण और ये है मेरी सौतेली बहन गीता।
 किशन नेता ? वो जो फारेस्टर थे?
 जी हाँ, वहीं। मगर फारेस्टरी छोड़ दी थी उन्होंने। बुआ की शादी के समय जब आरओ ने तीन दिन से अधिक की छुट्टी देने से इन्कार कर दिया तो पिताजी ने इस्तीफा दे दिया यह कह कर कि ‘आपके यहाँ बहन-बेटियों की शादी होती होगी नीलामी की तरह कि तीन दिन में सारा प्रबन्ध हो जाए । मेरे यहाँ तो महीने भर से अधिक लगते हैं शादी की तैयारियों में ..... यह लीजिए मेरा इस्तीफा’।  तभी से घर पर ही रह रहे थे वे। अब वे पागल हो गए हैं। .... पहले पिताजी अक्सर आपका नाम लिया करते थे।
 अयँ ?  किशन नेता पा...गल ?
 जी हाँ ! अर्से से नींद नहीं आ रही थी उन्हें। कभी घंटों बोल बन्द...कभी अकेले ही अकेले बुदबुदाना-बड़बड़ाना... कभी कहीं चल देना उठ कर.... पिछले बरस चले गए थे न जाने कहाँ... अ_ारह दिन बाद वापस आए थे दाढ़ी-वाढ़ी बढ़ाकर। कहते थे लखनऊ में नारी अधिकारों के सेमिनार में धुआंधार भाषण  दिया था। नामी-गिरामी महिला-नेताओं ने आभार प्रकट किया था उनका.... समाज-कल्याण मंत्री भी सहमत हुए थे उनके तर्कों से और राजी हो गए थे ऐसा कानून बनाने के लिए कि हिन्दुओं में कन्यादान की रस्म पर रोक लगा दी जाए, दहेज लडक़ी वाले नहीं वरन् लडक़े वाले दें, लडक़ी के माँ-बाप पर भी रोक लगे कि कन्या का विवाह उनके द्वारा तय न किया जाए.....।
डॉ0 साहब ! पिछले चार दिनों से बड़ी परेशानी है घर में । तोड़-फोड़ .....हर तरह का उधम....छ: आदमियों से उन्हें बँधवा कर आया हूँ आपके पास।... गीता को देखते ही आगबबूला हो जाते हैं वे .... गीता को कैसे छोड़ता वहाँ अकेले इसीलिए अपने साथ ही ले आया हूँ। आसपास में केवल आप ही दिमाग के डॉक्टर हैं...वह भी पिताजी के पहचान वाले। चन्द्रभूषण परेशान था अपने पिताजी की हालत से।
तुम्हारी माँ कहाँ हैं ?  मैंने उनकी घरेलू स्थिति जाननी चाही।
 गीता की माँ बहुत पहले ही मर चुकी हैं। उसके बाद पिताजी ने मेरी माँ से शादी की। वह भी मर चुकी हैं पाँच-छ: साल पहले।..... आपको चलना पड़ेगा साहब हमारे घर पर। वह बहुत कातर हो गया था।
यूँ क्लीनिक छोड़ कर मैं जाता तो नहीं था कहीं मगर किशन नेता को देखने तो जाना ही था।
बड़ी दयनीय स्थिति थी उनकी।  देर तक मुझे घूर कर देखते रहने के बाद बुक्का फाड़ कर रो पड़े थे वे ।
जाँच करने पर पता चला था कि मैड्यूला में सूजन है। तुरन्त ही तीन कैप्सूल और एक इंजेक्शन दिया था मैंने। कुछ देर बाद श्लथ हो गए थे वे।
 नींद न आने की बीमारी कब शुरु हुई।
 मेरी माँ के मरने के तीन माह पहले से जब मौसी की शादी हुई।  ‘मौसी की ्शादी’ कहते हुए चन्द्रभूषण कुछ अटक-सा रहा था।
मुझे लगा था कि  किशन के पागलपन का कोई सम्बन्ध है अवश्य ‘मौसी की शादी’ से।  
 तुम्हारे पिताजी का रोग काफी बढ़ चुका है। सही इलाज के लिए पागलपन का कारण जानना जरूरी है। जो जानते हो वह यदि डॉक्टर से छुपाओगे तो सही दवा नहीं हो पाएगी।  मैंने कहा था।
 डॉक्टर से क्या छुपाना ? साफ-साफ बताओ न !  पहली बार गीता बोली थी।
लेकिन चन्द्रभूषण चुप ही रहा था।
उसकी चुप देखकर गीता पुन: बोल पड़ी थी, रज्जो मौसी भइया की सगी मौसी हैं। पहली बार वे मेरे घर आई थीं नवीं पढऩे। उनके गाँव में स्कूल आठवें तक ही था। मैं तब आठवीं में थी। क्लास में ज्यादा अन्तर न होने पर भी देखने में वे मुझसे बड़ी दिखती थीं।
उनके आने के बाद से अक्सर ही पिताजी और नई अम्मा में झगड़ा होने लगा था।
एक रात पिताजी की तेज आवाज से मेरी नींद उचट गई।
पिताजी नई अम्मा से कह रहे थे , रज्जो तुम्हारी सगी बहन है मगर उसकी सूरत मिलती है तुम्हारी सौत सुशी से । बदचलनी के सन्देह में कत्ल मैंने ही करा दिया था सुशी का.... उस कत्ल का प्रायश्चित्त करने के लिए मैं रज्जो को अपनाना चाहता हूँ। तुम इसमें बाधा न बनो वर्ना....!
नई अम्मा रोने लगी थीं मगर उनके रोने से क्या होता ?
एक बार नई अम्मा ने पिताजी के बक्से में रखा गुलाबी रुमाल देखा जिस पर आर कढ़ा हुुआ था। नई अम्मा ने उसे निकाल कर छुपा दिया। इसी पर पिताजी ने कुटम्मस कर दी थी उनकी। कई दिन तक बवाल चला था।
गीता लगातार बिना रुके बोले चली जा रही थी। जैसे बहुत कुछ बताना चाह रही थी वह मुझे।
 हाँ, नई अम्मा उस पिटाई के बाद बहुत बीमार हो गईं, चल भी बसीं .... मगर नई अम्मा के मरने के कुछ ही दिन पहले रज्जो मौसी की शादी कहीं दूसरी जगह हो गई वर्ना क्या पता वह मेरी एक और नई अम्मा बन ही जातीं।  इतना कह कर गीता चुप हो गई थी।
 और कुछ?  मैंने कुरेदा था गीता को।
 हाँ, ये जो पिटारीनुमा बक्सा है पिताजी के सिरहाने वाला। इसे पिताजी हमेशा अपने साथ ही रखते हैं। किसी दूसरे को इसमें हाथ तक नहीं लगाने देते। इसमें रज्जो मौसी का कुछ सामान है।  कहते हुए आँखें नीची कर ली थीं उसने।
मैंने बक्से को अपनी तरफ खींच लिया था।
 1,2,3 नम्बर एक सीध में कर लें तो बक्से का ताला खुल जाएगा।  कह कर घर के अन्दर चली गई थी गीता।  
ताला खोलने पर बक्से में- चार पुरानी गुलाबी चूडिय़ाँ, एक कोने पर अंग्रेजी का आर अक्षर लिखा गुलाबी रुमाल, गुलाबी रंग की ही एक जोड़ी पुरानी सी सैण्डिल, कुछेक पत्र एक गंदले सफेद कपड़े में लिपटे हुए, साथ ही एक पॉलीथीन बैग में गीता का गुटका, स्वामी रामतीर्थ-दर्शन नामक एक पुस्तक और एक पुराना अखबार जिसमें वीमेन लिव सेमिनार के बैनर तले किशन नेता की तस्वीर छपी थी, कुल इतना सामान था।
तुम्हारी मौसी क्या गीता पढ़ती थी?  मैंने पूछा चन्द्रभूषण से।
गीता का गुटका बाबा का है उनकी निशानी। दर्शन वाली पुस्तक पिताजी लाए थे कहीं से।  चन्द्रभूषण ने बताया था।
कहाँ रामतीर्थ दर्शन, गीता और कहाँ प्रेमिका की निशानियाँ-रुमाल,  सैण्डिल....सब एक साथ !
विचित्र केस था।
पहली पत्नी की हत्या, दूसरी पर अत्याचार... साली से प्रेम.... नारी अधिकारों का समर्थक होकर..... बेटी से नाराजगी..... सारी कडिय़ाँ जोडऩे पर इतना निश्चित हो गया कि किशन जी का पागलपन दो परम विपरीत प्रवृत्तियों को एक साथ समोने और अप्राप्त को प्राप्त करने की उत्कट आकांक्षा को परम लिप्तता की सीमा तक सँजोने की प्रतिक्रिया का स्वाभाविक परिणाम था।
प्रेस्क्रिप्शन देकर मैं वापस चला आया था दूसरे दिन रोगी का हाल बताने आने का निर्देश देकर।
चन्द्रभूषण आया भी था दूसरी सुबह मगर हताश ...निराश।
उसने बताया था, देर रात जब सब सो गए थे, किसी समय पिताजी सारे बंधन तोड़ताड़ कर कहीं चले गए।.... न जाने कहाँ गए होंगे वे।  उसकी आँखें डबडबा आई थीं।
भला मैं क्या बता पाता उसे कि किशन कहाँ से कहाँ तक जा पाएंगे ?
किशन जी जैसे लोग कहाँ से कहाँ तक जा सकते हैं तब से आज तक इसका अनुमान लगाने में असमर्थ ही रहा हूँ मैं।