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Monday 21 May 2018

गजल

डॉ. बी.पी. दुबे
होटल, संगम के समीप चौराहा, 5 सिविल लाइन, सागर (म.प्र.)

आदमी का आदमी से मतलबी व्यवहार है
सांच का सौदा कहां अब झूठ का व्यापार है
धार्मिक मंचों का भी तो हाल पहले सा नहीं
हरिकथा में प्रदूषित संगीत की भरमार है

लुट रहे लाचार होकर धर्म-भीरू लोग सब
ढोंगियों का पाठ-पूजन बन गया हथियार है

और क्या अंजाम होगा डूब जाने के सिवा
साजिशों के हाथ में जब वक्त़ की पतवार है

अंधेरों से हो रही हैं उजालों की संधियां
ऐसा लगता वक्त सूरज का अभी बेकार है

कुछ भी कहना व्यर्थ है जब न्याय बहरा हो गया
झोपड़ी के भाग में महलों का अत्याचार है।