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Saturday 18 Nov 2017

स्पष्ट करो

सतीश कुमार सिंह
पुराना कॉलेज के पीछे
( बाजारपारा ) जांजगीर
जिला  जांजगीर -चांपा
(छ.ग.) 495668
मो. 94252 31110
स्पष्ट करो
स्पष्ट करो खुद को
न देना पड़े कोई
स्पष्टीकरण यहाँ तक
स्पष्ट करो ।

ये जो खेतों की क्यारियों के
पानी से बचने के लिए
पैंट को ऊपर चढ़ाकर
तुम्हारी यहाँ से वहाँ
कूदने की अदा है
धरती को पसंद नहीं
मिट्टी के लाल
सारी गड़बड़ी बस यहीं है ।

एक विचार से दूसरे विचार तक
कूदते -फांदते
तुमने अपनी क्या हालत बना ली
कि ठीक ठीक सूरज के सामने
खड़े होने के बावजूद
तुम्हारी छवि
धुंधली नजर आती है
झरने का ताजा पानी पीने
और उससे मुँह धोने पर भी
न ताजगी महसूस करते हो
न साफ होता है तुम्हारा चेहरा ।

बिना खुद को स्पष्ट किए
भीतर के सूरज की अरूणाई
पके हुए दूध की बालाई
कहाँ झलकेगी मुखाकृति पर ।

विचार हो या भावना
घृणा हो या प्रेम
बिना इसे स्पष्ट किए
कोई कहीं नहीं पहुंचता ।

ठीक ठीक जगह

पहुँचने के लिए जरूरी है
पारदर्शी और स्पष्ट होना
हालांकि इसके खतरे बहुत हैं
लेकिन जीवन को पाने का
सूत्र भी एकमात्र यही है
इसलिए आज ही यह निश्चय करो
स्वयं को स्पष्ट किए बिना
न जियो न मरो ।

लिखना समाचार मालूम हो

। श्री हरि ।
लिखना समाचार मालूम हो , लिखने के बाद
इसी शब्द से ही तो फूटते थे
अंतर्देशीय लिफाफे में
बाबूजी के बोल ।

परदेस में पढ़ते हुए
माँ बाबूजी के पत्र बाँचते
उनका समूचा चेहरा
उभर आता था आँखों में ।

प्रेम पत्र के लिए
आते थे मुलायम और खुशबूदार कागज
कई बार इसे खरीदने के
पैसे भी नहीं होते जेब में
तब भी नहीं मुरझाता था प्रेम पुष्प और न ही झरती थीं इसकी पंखुरियां
अंतस के जल से यह
और खिल जाता था
जब इसी बीच
तुम्हारा पत्र मिल जाता था ।

जिसने भी
फिल्मों में पत्र को
पढ़ते हुए मुखमंडल को झलकाने का प्रथम प्रयोग किया
उस कलाकार का अभिनंदन ।

यह अक्सर होता रहा मेरे साथ
जाने क्यों ?
पत्र को पाते ही एकांत के लिए भागता था शहर से बाहर
टूटे पुल के नीचे बैठकर
बार बार पत्र पढ़ते
कहीं जुड़ता
कहीं टूटता बिखरता
लौटता उदास कदमों से
अच्छी खबर होने के बावजूद
भारी मन के साथ ।

भीतर भीतर बातें करना
किसी लकीर को बोलकर
कई कई बार पढऩा
अब कहाँ आता है
पत्र की महक के साथ
रिश्तों की सीढ़ी चढऩा ।


देखना जरा गौर से

नहीं तुमने नहीं देखा ठीक-ठीक
भरी दोपहरी में
आलू प्याज की बोरी को ठेलते
मजदूर की आँखों में ।

मैं फिर कहता हूँ
तुमने गाढ़े धुएं के बीच
रेलयार्ड के पीछे
चावल उबालते उस स्त्री को
नहीं देखा
जिसके सूखे स्तन से लटका

मरियल बच्चा
रह रहकर रिरिया रहा है ।

सच कहता हूँ
तुमने नहीं देखा है
डस्टबिन और कचरे के ढेर में
रोटी तलाशते बचपन को
भूख की तड़प से बिलबिलाते
मंदिरों की सीढिय़ों पर
छाती में हाथ बांधे बूढ़े बूढिय़ों को।

देखने और देखकर निकल जाने में
बहुत अंतर होता है मित्र
तुमने देखा होगा यह सब
मगर कहाँ देखा है देखने की तरह
इस बार जरा इन्हें देखना गौर से
कुछ तो देखने के दर्द को ढोना
कवि की तरह रात भर रोना ।


यहाँ एक स्त्री है

यहाँ एक स्त्री है
इसलिए तहाकर रखे हैं
घर के सारे कपड़े
करीने से सजे हैं
घर के उपयोगी साजो सामान ।

सुबह से देर रात तक
घर के ही बाहर भीतर चलती
पूरी पृथ्वी का
परिक्रमा कर आती वह
बावजूद इसके
भोर में फिर खिलता
उसके चेहरे पर
ताजातरीन गुलाब ।
यहाँ एक स्त्री है
जिसकी अधपकी नींद में
दूध के उबल जाने का भय है
बच्चों के टिफिन
बड़ों के नाश्ते की चिंता
छत पर सूखते बड़ी, पापड़
अचार, मुरब्बा, मिर्च-मसाला को
जेहन में लादे लथपथ ।
जाने कितने बोझ से दबी
जिंदगी उसके लिए
अब भी अजनबी
तानों झिड़कियों के बीच
मीठे बोल को तरसती
झूठी प्रशंसा से छली जाती
यहाँ एक स्त्री है
यह धरती जिसके दुख की
खाता बही है
जो होकर भी कहीं नहीं है ।