Monthly Magzine
Monday 20 Aug 2018

रंजू के लिए कुछ कविताएं (रंजू मेरी जीवन संगिनी का नाम है)


प्रदीप मिश्र दिव्याँश
 72, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, डाक: सुदामानगर, इन्दौर- 452009 (मप्र)
मो. 919425314126
(एक)

जिस सुबह तुम नहीं होती हो घर में
घर की सुबह नहीं होती है
सोता रहता है घर
दोपहर बाद तक
कई बार तो शाम ढले तक
हर सुबह
सबके लिए उगता है सूरज
और मेरे लिए तुम ।

(दो)
इंतजार कर रहा था
मेरी खिडक़ी से
किसी न किसी रात
चाँद के साथ
तुम भी उतर आओगी
जीवन में
तुम तो सूरज बनकर दाखिल हुई
मेरे जीवन में
मुख्य दरवाजे से
ढोल-धमाके के साथ
आते ही घोषित कर दिया
प्रेमिकाएँ उतरतीं हैं
चाँद के साथ खिड़कियों से
सुबह होने से पहले ही
छोड़ जातीं हैं साथ
पत्नियाँ सूरज की तरह
उगती हैं जीवन के क्षितिज पर।

(तीन)
ढूंढता रहता हूँ अपनी चीजों को घण्टों
थक कर आवाज़ लगाता हूँ तुमको
तुम्हारे आते ही मिल जाती हैं चीजें
तुम्हारी आवाज़ आती है
खाना परोसूँ
और लग जाती है भूख
लाख थका-मांदा पहुँचता हूँ घर
दरवाजा खोलते ही
तरोताजा कर देती हो
अपनी मुस्कान से
कठिन से कठिन दिनों को भी
कर देती हो फुर्र
मेरे बालों उँगली फिराते हुए
क्या तुम कोई जादूगरनी हो?

कहने को हुआ प्रेमिका
तो तुम माँ की तरह नजऱ आयी
माँ कहना चाहा तो बहन की तरह नजऱ आयी
बहन कहने को हुआ तो तुम दोस्त बन गयी

सचमुच जादूगरनी हो तुम
तुम्हारे जादू में ही छिपा है
मेरे जीवन का सारा मर्म।