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Friday 24 Nov 2017

गदल : संवेदना और दृष्टि

मधुरेश
372, छोटी बमनपुरी,
बरेली-243003 (उ.प्र.)
मो. 093198-38309
रांगेय राघव विलक्षण कल्पना-शक्ति वाले लेखक थे। आगे चलकर नई कहानी के दौर में, जिसे ‘भोगा हुआ यथार्थ’ कहा गया, रांगेय राघव का रचना-संसार उसके जबरदस्त प्रतिवाद का उदाहरण है। उनका विपुल साहित्य और उसमें रचे-बसे उनके अनेक पात्र वस्तुत: उनकी इसी अद्भुत और कभी-कभी अविश्वसनीय सी लगती कल्पना शक्ति के आधार पर ही इतने जीवंत और विश्वसनीय लगते हैं। अपनी लंबी उपेक्षा से आहत, ‘मेरी प्रिय कहानियां’ की भूमिका में उन्होंने लिखा कि उनके यहां ‘गदल’ जैसी अनेक कहानियां हैं, लेकिन आलोचकों ने उन्हें कभी देखने और पहचानने की कोशिश नहीं की।
अपनी बहुविध रचनात्मक सक्रियता के बीच रांगेय राघव ने कहानियां भी पर्याप्त संख्या में लिखी हैं। दो खण्डों में संयोजित उनकी कहानियों के संपादक अशोक शास्त्री ने इस ओर संकेत किया है कि रांगेय राघव ने अपनी अधिकतर कहानियां सन् ‘44 और 51’ के बीच लिखी हैं। इस दौर में कुल जमा उन्होंने 71 कहानियां लिखीं जबकि दूसरे दौर में 51 से 62 के बीच, ग्यारह वर्षों की अवधि में उनकी लिखी कहानियों की संख्या कुल 18  है। यह ठीक है कि उनके पहले दौर में ‘देवदासी’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘मृगतृष्णा’ आदि अनेक महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय कहानियां लिखी गईं, लेकिन ‘गदल’, ‘तबेले का धुंधलका’, ‘कार्तिकेय’, ‘कुत्ते की दुम और शैतान’ आदि उनके परवर्ती दौर की ही कहानियां हैं।
अपनी उपेक्षा से आहत होकर कहा उन्होंने कुछ भी हो, सच्चाई यही है कि ‘गदल’ जैसे उनके यहां अकेली कहानी है, समूची हिन्दी कहानी में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ (1915) से शुरू करके आज तक प्राय: एक शताब्दी में लिखी गई चंद श्रेष्ठ एवं उल्लेखनीय प्रेम कहानियों में से एक है।
रचनात्मकता के संदर्भ में रांगेय राघव की क्या और कैसी भूमिका थी, ‘गदल’ इसके लिए एक उदाहरण की तरह है। राजस्थान के भरतपुर के पास बैर नामक जिस गांव में रांगेय राघव रहते थे कहानी उसी के आसपास के क्षेत्र में घटित एक वास्तविक घटना पर आधारित है। अपने विपुल और अबाध लेखन के लिए सामग्री की तलाश में रांगेय राघव की सतर्क नजर रहती थी। रांगेय राघव की पुत्री श्रीमती सीमन्तनी राघव ने इस तथ्य का उल्लेख किया  है कि कहानी बैर के एक पड़ोसी गांव-भौंडा गांव में घटित वास्तविक घटना पर आधारित है। उनके घर के सदस्य जैसे युवा भृत्य सरवन-श्रवण कुमार अग्रवाल ने उन्हें यह घटना सुनाई थी। रांगेय राघव को उस घटना में अनंत संभावनाएँ दिखाई दी। राजस्थानी क्षेत्र का ग्रामीण परिवेश, गूजर समाज, स्त्री-मन और वर्षों पुराना ‘कारज’ का किस्सा। घटना की जानकारी के बाद जब रांगेय राघव ने स्वयं उसके बारे में खोजबीन की तो पता चला कि घटना सच्ची है भले ही वह इसी रूप में घटित न हुई हो। अपनी छानबीन में रांगेय राघव को यह भी पता चला कि घटना से संबद्घ व्यक्तियों में एक स्त्री का नाम सचमुच गदल था। बाकी सब कुछ लेखक की रचनात्मक प्रतिभा का चमत्कार है। बाद में कहानी पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा- ‘गदल’ मेरी एक पुरानी विचारदृष्टि में से निकली धारा का एक बिन्दु है। अत: जिनको लगा कि ‘गदल’ मेरी एक आकस्मिक रचना है, यह उनकी भूल है।
रांगेय राघव जयशंकर प्रसाद से कहीं गहरे में प्रभावित थे- भले ही उन्होंने उनकी ‘कामायनी’ के उत्तर में अपनी काव्य-रचना ‘मेधावी’ लिखी हो। अपनी कहानी ‘गदल’ के प्रसंग में रांगेय राघव की यह टिप्पणी प्रकारान्तर से, इस प्रभाव ग्रहण की प्रक्रिया की ओर भी संकेत करती है किन्तु ‘गदल’ केवल उस बाह्य जीवन का ही चित्रण नहीं है उसमें एक स्त्री का हृदय बोलता है और शायद इसी यथार्थ ने भूमि बनाई। मैं भावपक्ष का अनुरागी हूं, मनुष्य ढूंढता हूं- यह भूमि पर नींव खुदी और चरित्र का व्यवस्था में से ऊपर लाने का पक्षपाती हूं। यही इसकी इमारत बन गई। बस इतनी-सी है यह गदल की कहानी। (मेरी प्रिय कहानियां, भूमिका, संस्करण 2009, पृष्ठ-111)
इस बात के लिए रांगेय राघव की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उनके पात्र प्राय: लेखकीय विचार-दृष्टि से स्वतंत्र और मुक्त अपना स्वायत्त जीवन जीते और  अपनी भाषा बोलते हैं। अपने पात्रों की इस निर्माण-प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए अपने उपन्यास, ‘मुर्दों का टीला’ (1948) के प्रसंग में वे लिखते हैं, ‘‘खेद है आपको यहां ‘दास’ दासों की सी बात करता मिलेगा। उसकी परिस्थिति प्रकट है। वह उस काल के दार्शनिकों की सी शिक्षित बहस नहीं कर सकता। न वह वैज्ञानिक भौतिकवाद मानता है न ही द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक व्याख्या ही’’ (मुर्दों का टीला, भूमिका, संस्करण 1963)
रांगेय राघव अपनी अनेक रचनाओं में, ‘धरती मेरा घर’ और ‘कब तक पुकारूं’ आदि, औपनिवेशिक भारत में अपराधी समझी जाने वाली जनजातियों को केन्द्र में रखकर कथा बुनते हैं। गूजर, नट, कंजर, लोहपीटे आदि ऐसी ही जनजातियां थीं जिनके सामाजिक मूल्य एवं जीवनशैली वृहत्तर समाज से भिन्न और अलग थे। गदल भी राजस्थान और उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र की गूजर जाति की एक प्रौढ़ा है। किसी बाहरी दुनिया से अधिक वह अपने समाज की रीति-नीति और जीवन-शैली को ही जानती है। प्रेम उसके लिए सबसे बड़ा जीवन मूल्य है जिसके लिए वह बाहरी दुनिया के रीति-रिवाज, कानून-व्यवस्था और नैतिक मूल्य दृष्टि की कोई चिंता नहीं करती है। वह अपने मन और अपने ही समाज से निर्देशित-संचालित स्त्री है जिसके बाहर उसके लिए किसी और सत्ता का जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं है।
रांगेय राघव की यह कहानी ‘गदल’- पहली बार 1955 के ‘कहानी’ विशेषांक में छपी थी, जो वस्तुत: अक्टूबर 54 में ही प्रकाशित हो गया था। इसके बाद हिन्दी में जैसे प्रेम कहानियों की एक बाढ़ सी आ गई। फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ उर्फ ‘मारे गए गुलफाम’, शेखर जोशी की ‘कोसी का घटवार’, मन्नू भंडारी की ‘यह सच है’, कमलेश्वर की ‘नीली झील’ आदि इसके बाद एक छोटी-सी कालावधि में लिखी गई। ‘गदल’ के प्रकाशन के बाद ‘कहानी’ के एक  अंक में शिवदानसिंह चौहान का एक लम्बा पत्र छपा था, जिसके कहानी का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘उसने कहा था’ के बाद एक वैसी ही कहानी के रूप में उसका स्वागत किया था।
कहानी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होकर धीरे-धीरे खुलती और विकसित होती है। अपने भरे-पूरे परिवार, जवान बेटों और नाती-पोतों को छोडक़र पैंतालीस वर्ष की विधवा प्रौढ़ा गदल उसी गांव के एक पैंतीस वर्षीय विधुर लौहरा मौनी के यहां जा बैठी है। गांव के और लोगों की तरह उसके अपने लडक़े भी सोचते  हैं- इस उमर में ऐसा करके उसने सचमुच खोरियों की नाक कटवा दी है। एक बार रास्ते में मिल जाने पर वे जैसे-तैसे उसे घर भी ले आते हैं। गदल अपने देवर डोड़ी से पूछती है ‘अब कुनबे की नाक पर चोट पड़ी तो सोचा तब न सोचा जब तेरी गदल को बहुओं ने आंखें तरेर कर देखा। और कौन किसकी परवाह करता है।’ (कहानी वार्षिकांक 55, पृष्ठ79)
गदल का यह आरोप ही वस्तुत: उसके पूरे चरित्र की कुंजी है। डोडी को उसे ‘तेरी गदल’ कहकर अपनी हैसियत की याद दिलानी होती है। आगे चलकर, डोड़ी के प्रति अपने इस अदृश्य और मौन लगाव को लेकर वह टिप्पणी करती है, जब छोटी थी, तभी मेरा देवर लट्ठ बांध मेरे खसम के साथ आया था। इसी के हाथ देखती रह गई थी मैं तो। सोचा था मरद है, इसकी छतर-छाया में जी लूंगी- वही जब मेरे आदमी के मरने के बाद मुझे न रख सका तो क्या करती? फिर अपने लडक़ों को उलाहना-सा देते हुए वह कहती है, ‘अरे, मैं न रही तो इनसे क्या हुआ? दो दिन में काका उठ गया न? इनके सहारे रहती तो क्या होता?’ (वही, पृष्ठ 83)
शिकायत उसे लडक़ों-बहुओं से न हो ऐसा नहीं है। लेकिन उसकी सबसे दुखती रग यही है कि तीस बरस उसने गुन्ना के साथ काट दिए। जो आग उसके मन में कहीं सुलगी थी, उसका ताप और धुआं उसने कभी बाहर नहीं आने दिया। अब उसका पति गुन्ना भी नहीं रहा। डोड़ी की पत्नी और बच्चों में से भी आज कोई नहीं बचा है। लेकिन फिर भी डोड़ी ने उसके मन को जानते-समझते हुए  भी समाज के भय से उसकी उपेक्षा की है। बच्चे समझेंगे कि काका का अम्मा के साथ पहले से ही नाता था। अपने अंदर भय की इस बेहद कच्ची और पोली दीवार को ढहाकर वह गदल को अपनाने में हमेशा संकोच करता रहा। उसकी इस उपेक्षा की कुंठा ने गदल से वह करा लिया जो शायद वह स्वयं भी नहीं करना चाहती थी।
गदल में डोड़ी का यह प्रेम किसी विशाल जड़ों वाले बरगद की तरह मन की धरती में बहुत गहरे तक समाया हुआ है। ऐसा नहीं है कि डोड़ी गदल से प्रेम नहीं करता। तीस बरसों तक, एक ही घर में वे इसी तरह रहते रहे हैं- अपने दायित्वों और नैतिक मर्यादाओं से बंधे हुए। लेकिन गुन्ना की मृत्यु के बाद जैसे वह सोई पड़ी आग, आशा की नई संभावनाओं की कुरेदने से नए सिरे से जाग उठी है। अब उम्र, मर्यादा और दायित्व कुछ भी उसे दबा पाने के लिए नाकाफी है। एक ही स्थिति को लेकर दोनों की प्रतिक्रियाएं भिन्न हैं। गदल स्थिति को अस्वीकारती है, उसके प्रति विद्रोह करती है जबकि डोड़ी उसे चुपचाप सहने की कोशिश करता है। गदल स्थिति से विद्रोह करके बच जाती है जबकि डोड़ी उसे चुपचाप बर्दाश्त करने की कोशिश में टूट जाता है। लेकिन लोगों को यही लगता है कि उस रात ढोला सुनने जाने पर उसे ठंड लग जाने से उसकी मौत हुई है। इस रहस्य को वह अपने साथ लिए ही चला जाता है कि एक दिन ढोला उसने तब सुना था जब भैया गुन्ना की सुहागरात थी और उसके बाद आज जब गदल उसे छोडक़र मौनी के यहां जा बैठी है।
गदल अपनी स्थिति से कोई समझौता नहीं करती। बदली हुई परिस्थिति में, पति की मृत्यु के बाद, वह निहाल और उसकी बहू से निभकर चलने वाला रास्ता नहीं पकड़ती। उसे लगता है कि ऐसा कुछ करने पर उसके आत्मसम्मान और अधिकार-भाव को चोट लगेगी। और फिर क्या  बेटों-बहुओं की चाकरी के लिए ही वह इस घर में पड़ी थी? उसका छोटा बेटा नरायन जब मौनी के यहां उससे डंड वसूलने पहुंचता है, उसे ड्योढ़ी पर ही रोक वह अपने कड़े और हंसुली उतारकर उसके आगे फेंक देता है। मौनी की भाभी दुल्लो, जो उसकी पत्नी जैसी ही है, के कटाक्षों का वह तुर्की-ब-तुर्की जवाब देती है। जब दुल्लो उस पर तोहमत लगाती है कि इस बहाने उसने अपना जेवर अपने बेटी के पास भिजवा दिया है, घुटना आखिर पेट की ओर ही मुड़ता है, तो वह हंसकर कहती है, वाह जिठानी! पुराने मरद का मोल नए मरद से तेरे घर की बैया ही चुकवाती होंगी। गदल तो मालकिन बनकर रहती है समझीं! बांदी बनकर नहीं। चाकरी करूंगी तो अपने मरद की, नहीं तो विधवा मेरे ठेंगे पर, समझी! तू बीच में बोलने वाली कौन? (वही पृ. 80)
डोढ़ी के मरने की खबर उसे गिर्राज ग्वारिया से लगती है। जब पति को खिलाकर वह खाने जा रही है तो उन दोनों की बातें उसके कानों में पड़ती है। जब वह सब कुछ छोडक़र मौनी के यहां जा बैठी थी तो कोई उसे रोक नहीं सका था। अब जब डोढ़ी की मृत्यु की खबर सुनकर वह फिर लौटने को तत्पर है तो मौनी के लाख मना करने पर भी वह रुकती नहीं है। जिससे रूठकर, जिद और ठस्से में उसने यह सब किया था जब वही नहीं रहा तो फिर इस सबका अर्थ ही क्या है? अपने बेटों की वह इस बात के लिए भी ले-दे करती है कि बाप के कारज में उन्होंने सिर्फ पच्चीस आदमी ही जिमाए थे। कानून का तर्क उसके गले नहीं उतरता। इस  बार डोढ़ी के लिए वह ऐसा हरगिज नहीं होने देगी। वह दरोगा को रिश्वत देती है और खूब धूमधाम से कारज की तैयारी शुरू करवाती है। मौनी अपने अपमान और जगहंसाई का यह नायाब अवसर छोडऩे को तैयार नहीं है। जब कारज चल रहा होता है, रिश्वत खाए दरोगा का आदमी पहुंचता है कि दावत बंद कर दो, बड़े दरोगा आ गए हैं। राज्य और कानून का विधान गदल उतना नहीं समझती जितना संस्कारों और बिरादरी का विधान जानती-समझती है। आए हुए अतिथि क्या बिना खाए लौट जाएंगे? यह भी संभव नहीं है कि उसी घर में वे लोग अपमानित हों और वह देखती रहे। रिश्वत लिया हुआ दरोगा अब जैसे इन लोगों को पहचानता ही नहीं है। स्थिति की गंभीरता देख निहाल गदल को समझाने की कोशिश करता है- वे लोग रूकेंगे नहीं, गोली चलाएंगे।
‘तू न डर’ छत पर नरायन चार आदमियों के साथ  बंदूकें लिए बैठा है।’ दोनों ओर से गोलियां चलती है। गदल चिल्लाकर अतिथियों से कहती है- ‘सौगंध है खाकर उठना’ (वही पृ. 85) से लालटेन बुझ जाने से अंधेरा छा जाता है। कोख की सौगंध दिलाकर वह नरायन और बहू-बच्चों को पिछले दरवाजे से निकाल देती है। बंदूक हाथ में लेकर वह स्वयं गोली चलाती रहती है। पेट में गोली लगने पर गिरते हुए वह गहरे संतोष के साथ बड़े दरोगा से कहती है, ‘कारज हो गया दरोगा जी। आत्मा को शांति मिल गई।’ (वही)
जब दरोगा उससे उसके बारे में पूछता है कि वह है कौन तो बहुत धीमे स्वर में वह कहती है ‘जो एक दिन अकेला न रह सका, उसी की...’ और उसका सिर लुढक़ जाता है। उसके होठों पर मुस्कुराहट ऐसी ही दिखाई दे रही थी, जैसे अब पुराने अंधकार में जलाकर लाई हुई पहले की बुझी लालटेन...’ (वही)
कहानी में निहित सारी नाटकीयता के बावजूद गदल का चरित्र लेखक के अपने सोच से स्वतंत्र बहुत सहज रूप में विकसित हुआ है। प्रेम के विस्फोट की कोई कालगत सीमा नहीं होती। धीरे-धीरे मन की मिट्टी को काटते रहने पर भी इस विस्फोट का कहीं कोई आभास नहीं होता। पता तब चलता है जब पूरी की पूरी कगार एक आकस्मिक धक्के से पानी में धड़ाम से गिरती है।
गदल के चरित्र का विकास उसके समूचे परिवेशगत संदर्भों के बीच हुआ है। अपने समाज की रीति-नीति से टकराते हुए, उन्हें बनाते-बिगाड़ते हुए ही वह विकसित होती है। प्रशासन और पुलिस तंत्र की सारी क्रूरता, अपने में वास्तविक होने पर भी उसे बहुत प्रभावित नहीं करती। उसकी वास्तविकता के अपरिचय ही वस्तुत: गदल के चरित्र का अपना वैशिष्ट्य है। अपनी धरती और उसकी मिट्टी  से बहुत गहराई से जुड़ी होने के कारण ही वह उसक मुहावरे और बोली-बानी का ऐसा सार्थक और जीवंत उपयोग कर पाने में सफल होती है। उसके ठस्से, जिद, स्वाभिमान, दृढ़ता और अधिकार-भाव के संदर्भ में उसकी मिट्टी की गंध में रची-बसी उसकी भाषा दूर तक उसका साथ देती है। उसकी यह भाषा ही उसके चरित्र को प्रामाणिकता और विश्वसनीयता देती है।