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Tuesday 21 Nov 2017

कुमार विनोद गणित के प्रोफेसर हैं इसलिए इस सवाल का जवाब वे ही बेहतर दे सकते हैं

ललित सुरजन
कुमार विनोद गणित के प्रोफेसर हैं इसलिए इस सवाल का जवाब वे ही बेहतर दे सकते हैं कि उनके हाल में प्रकाशित गजल संग्रह में अठहत्तर रचनाएं किस हिसाब से हैं, पचहत्तर, अस्सी या सौ क्यों नहीं? लेखक से यह पूछने का भी मन होता है कि एक तरफ गणित का अध्ययन-अध्यापन तथा दूसरी ओर कविता और गजल का लेखन। इन दो विपरीत धाराओं के बीच वे संतुलन किस तरह स्थापित कर पाते हैं। संभव है कि गणितज्ञ-लेखक उनके अलावा और भी हों, किन्तु उनका परिचय पढक़र किंचित आश्चर्य  होता ही है। वह यूं कि गणित को एक रूखा विषय माना जाता है जिसमें रस के लिए कोई स्थान नहीं होता। गणित का अध्येता अंकों, रेखाओं और बिन्दुओं में ही हर वक्त उलझा रहता है तथा इस दुनिया के बाहर उसका कोई सरोकार नहीं होता, ऐसा हमें लगता है। यह एक गलतफहमी भी हो सकती है। किन्तु जो अन्य विषय हैं उनमें मनुष्य और प्रकृति के बीच एक सीधा और प्रत्यक्ष संबंध दिखाई देता है जो गणित में नहीं है। फिर भी यह मानना होगा कि अगर गणित न होता तो हम प्रगति की इतनी सारी मंजिलें पार न कर पाते। बिना गणित के चन्द्रमा पर भला कैसे पहुंचते? और समुद्र से लेकर आकाश तक के बहुत सारे रहस्यों से परिचय कैसे पाते?
बहरहाल, कुमार विनोद इसी वर्ष प्रकाशित अपने नए गजल संग्रह सजदे में आकाश  में गजल विधा को लीक से हटकर शिल्प और कथन दोनों दृष्टियों से एक नए रूप में सामने लेकर आते हैं। उनकी प्रयोगधर्मिता की एक झलक इस शेर में मिलती है-
जमाना मेल का है और तुम खत पर ही अटके हो
जो $गालिब को भी इंटरनेट मिला होता, तो क्या होता।
इस एक शेर में एक अनोखा अंदाज है। आज के मुहावरे में इसे बिंदासपन कहा जा सकता है। एक तरफ कवि गालिब की परंपरा से खुद को जोड़ रहा है, दूसरी तरफ वह खुले मन से आधुनिक प्रविधि को अपना रहा है। वह किसी बंधे-बंधाए सांचे में खुद को कैद करके नहीं रखना चाहता, बल्कि समय के साथ-साथ चलने में विश्वास रखता है।
कुमार विनोद के विचारों में टटकापन है, भाषा में ताजगी है और बिम्ब गढऩे में उनकी प्रयोगशीलता अनोखी है। एक दूसरा शेर देखिए-
सूरज अपने पास कोई अच्छी-सी घड़ी क्या रखता है
या वो अपने मोबाइल पर समय देखकर चलता है।
इस गजल में कवि ने एक साथ बहुत से नए बिम्ब गढ़े हैं और मेरा मन कर रहा है कि पाठक इन्हें पढ़े। आगे ये दो शेर और देखिए-
बारिश से बचने को क्या चिडिय़ा भी छाता रखती है
या बारिश थम जाने का ‘वेट’ उसे भी रहता है।

शाम ढले इक दिन बगिया में मुझको मिल गए जुगनू जी
बोले, पिछले कई दिन से बिजली का संकट रहता है।
एक ओर जहां कवि गालिब के जमाने में इंटरनेट का रूपक रचता है, वहीं यहां सूरज के हाथ में मोबाइल दे देता है और जुगनू के मुख से बिजली संकट का वर्णन करवाता है। अगर इसे आधुनिक भावबोध नहीं तो और क्या मानें? मुझे कुमार विनोद की यह बात अच्छी लगी कि वे बहुत आसानी से और बहुत मजे में नए शब्दों को अपनी गजलों में इस तरह पिरो लेते हैं कि किसी भी तरह से रसभंग नहीं होता और न कहीं अनाधिकार चेष्टा प्रतीत होती है। एक गजल में वे बहुत कम लफ्ज़ों में अपनी बात करते हैं-
साथ मेरे खूबसूरत हमस$फर
तेज बारिश और ऑटो का सफर।
इसमें बारिश, खूबसूरत, हमसफर- ये सारे संज्ञाएं पुरानी हैं, लेकिन ऑटो का सफर लिखकर कवि एक ऐसी तस्वीर हमारे सामने रख देता है जो बिल्कुल आज की है। प्रसिद्ध उपन्यासकार शंकर के उपन्यास चौरंगी में कहीं एक कवितांश आता है- स्कूटर पर बैठ चली घूमने शामों की नायिका। यह पचास साल पहले अपने समय का नया प्रयोग था। कुछ वैसा ही प्रयोग हमारे कवि ने ऑटो में घूमने को लेकर किया है।
अपने समय में एक आम नागरिक को सामान्य दिनचर्या में भी जो जद्दोजहद करना पड़ती है, उसका एक बिम्ब जुगनू द्वारा बिजली संकट के बखान में था, तो कवि की कल्पना में सूरज को भी अपना काम निभाने के लिए कुछ न कुछ उठापटक करनी पड़ती होगी। यह शेर पढि़ए-
सूरज इतना ईंधन-पानी आखिर  कहां से लाता है
क्या उसको भी इन सबका कुछ बिल-विल भरना पड़ता है।
सूरज तो सूरज है, लेकिन उसे प्रतीक बनाकर कवि ने वर्तमान जीवन के एक पहलू को इस शेर में उजागर कर दिया है। एक और शेर है जिसमें विनोद आधुनिक टेक्नालॉजी के प्रभाव का खूबसूरती से उल्लेख करते हुए बतलाते हैं कि सोशल मीडिया कैसे हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है।
$खत लिखने का दौर गया जी, वक़्त है मेल स्काइप का
वाट्सएप भी मन लुभा रही है अब आगे क्या होगा जी।
कुमार विनोद की गजलों में प्रकृति के चित्र बार-बार आते हैं। जैसे- सूरज, चन्द्रमा, जुगनू, नदी, झरना, तितली, फूल आदि। इनके बिना वैसे भी कहां किसी कवि का काम चला है? कुमार विनोद की विशेषता यह है कि वे इन उपादानों को नए रंगों से भर देते हैं। जैसे इस शेर को ही लें-
जेठ दुपहरी में सूरज ने डॉक्टर को जाकर बोला
आंख सुबह जल्दी खुलती है नींद मुझे कम आती है।
कौन नहीं जानता कि गर्मी में दिन लम्बे होते हैं और रातें छोटी। परन्तु इस शेर में सूरज डॉक्टर से नींद कम आने की शिकायत करता है तो एक स्थापित सत्य बिल्कुल नए और बेहद रोचक ढंग से पाठक के सामने आ जाता है। इस तरह के कुछ और चित्र आप देखिए-
कांपती चिडिय़ा ने सूरज से दिसंबर में कहा
काम चल जाएगा मेरा एक चम्मच धूप से।
कहां दरकार सूरज को किसी छुट्टी की रहती है
नदी को भी कहां फुर्सत वो संडे को भी बहती है।
समंदर ने लिखा इक रोज अपनी डायरी में यूं
किनारे तोडक़र दरिया बहे अच्छा नहीं लगता।
अलग-अलग गजलों से उठाए गए इन तीनों शेरों में एक चम्मच धूप, नदी का संडे को बहना और समंदर का डायरी लिखना- इन नए बिंबों से पाठकों को एक नया आस्वाद मिलता है। कवि ने बचपन को लेकर भी कुछ अच्छी गजलें कही हैं। नीचे दिए शेर में बाल मनोविज्ञान का सिर्फ दो पंक्तियों में ही अर्थप्रवण वर्णन किया गया है-
बच्चा बोला शोर करूं तो डांट मुझी को पड़ती है।
छत पर बैठी चिडिय़ा भी तो कितना चीं-चीं करती है।
एक दूसरे शेर में बच्चों की कल्पनाशीलता और उनकी सृजनशीलता को वह एक नए रूप में प्रस्तुत करता है-
वो बच्चे भी किसी इंजीनियर से कम कहां थे जी
घरौंदा रेत का कोई, जिन्होंने भी बनाया था।
इन गजलों की चर्चा करते हुए पुस्तक के पन्ने बार-बार पलट रहा हूं। हर पन्ने पर कोई न कोई ऐसा शेर नजर आता है जिसे पाठकों के साथ साझा करने का लोभ हो रहा है। लेकिन बेहतर तो यह होगा कि पाठक इन गजलों को पढ़े और खुद अपनी राय कायम करें। मैंने जैसा कि प्रारंभ में कहा इन रचनाओं में भाषा, शैली और बिंब इन तीनों स्तर पर जो प्रयोगशीलता है उसने मुझे प्रभावित किया है। कुमार विनोद अपने कंधों पर जमाने का दर्द लेकर नहीं चलते, फिर भी इन गजलों में पर्याप्त संकेत हैं कि वे वर्तमान समय की विसंगतियों को ठीक से पहचान रहे हैं। उनकी रचनाओं में दार्शनिक भाव भी अनेक स्थानों पर है। एक गणितज्ञ से जैसा कि अपेक्षित हो सकता है वे प्रकृति के जटिल रहस्यों को समझने की कोशिश करते हैं। उनसे अगर कोई यह कहता है कि ईश्वर ने यह दुनिया बनाई है तो वे प्रकारांतर से पूछते हैं कि फिर उसको याने ईश्वर को किसने बनाया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जब जीवन के तार उलझ जाते हैं तो मनुष्य किसी अज्ञात शक्ति के सामने समर्पण कर देता है।
यह कैसे हो सकता है कि कविता की किताब में प्रेम कविताएं न हों! इस संग्रह में प्रेम पर जो गजलें हैं उन्हें मैं दो कोटियों में रखना चाहूंगा। कुछ तो पारंपरिक किस्म की हैं तथा अन्य बहुत से कवियों-गजलकारों द्वारा लिखी गई रचनाओं से बहुत भिन्न नहीं है। दूसरी कोटि की गजलें मानो एक संकोच के दायरे में रहकर कही गईं हैं। कुछ-कुछ गुलजार की ‘‘हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो’’ की तर्ज पर। जैसे एक शेर में तितली भौंरे को साथ डांस करने के लिए बुलाती है और भौंरा शरमा जाता है। इसमें कुमार विनोद ने एक नया बिंब तो गढ़ा ही है, मन की बात कहने में सकुचाने का भाव भी इसमें है। इसी तरह अन्यत्र वह किसी के सम्मोहन में बंधता तो है, लेकिन उसकी शॉल को हल्के से छूकर रह जाता है। इस कोटि की रचनाएं बहुत कुछ पाठक की कल्पना के लिए छोड़ देती हैं।
कुमार विनोद का पहला गजल संग्रह 2010 में प्रकाशित हुआ था। इसके पूर्व वे एक कविता संग्रह भी प्रकाशित कर चुके थे। सात साल के अंतराल में यह नया संकलन आया है। मैंने पुराने संकलन बेरंग हैं सब तितलियां की रचनाओं को भी उड़ती नजर से देखा है। उस गजल संग्रह पर शहरयार ने प्रशंसात्मक टीका की थी। मैं कहना चाहता हूं कि इस दौरान कवि ने अपना विकास किया है। यह नया संकलन आश्वस्त करता है कि कुमार विनोद भविष्य में इससे भी बेहतर रचनाएं लेकर आएंगे। मैं विशेषकर यह देखना चाहूंगा कि सामाजिक जीवन के जिन प्रश्नों को उन्होंने सजदे में आकाश में प्रकारांतर से उठाया है, आने वाली रचनाओं में और शिद्दत के साथ, मुकम्मल रूप में सामने आएंगे। यह जो कठिन समय है इसमें जो शब्द शिल्पी हैं वे ही जन-जन की पीड़ा को बेबाकी से अभिव्यक्त कर सकते हैं और जनता को उनसे ऐसा करने की प्रतीक्षा भी है।
गज़़ल संग्रह : सजदे में आकाश
गज़़लकार : कुमार विनोद
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-2648212, 098718 56053
मूल्य : 140 रुपए