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Wednesday 22 Nov 2017

अक्षर पर्व का दिसम्बर-16 अंक मिला। यह अंक उसी तरह महत्वपूर्ण है जैसा अगस्त-16 का था।

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया, ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर, भोपाल-39 (म.प्र.)

अक्षर पर्व का दिसम्बर-16 अंक मिला। यह अंक उसी तरह महत्वपूर्ण है जैसा अगस्त-16 का था। अगस्त वाले अंक में दुर्लभ राष्ट्रीय कविताएं थीं, जिनकी जानकारी बहुतों को नहीं थी। इसी प्रकार इस अंक की युद्ध संबंधी रचनाएं हैं जिनमें हिंसा के विरुद्ध मनोभावों के अनेक रूप अंकित हैं। भाषा तो भावों की अनुवर्तिनी है। वह वैसा ही रूप और स्वर हासिल कर लेती है जैसी भावना रचना में होती है। रचनाकार किसी युग के हों उन्होंने हिंसा को कभी स्वीकार नहीं किया। उनमें पीड़ा भी है और आक्रोश भी। स्वार्थों ने सदैव मनुष्यता के साथ खिलवाड़ किया है वाद और युग कोई भी हो। युद्ध के अतिरिक्त अन्य कविताएं भी अच्छी हैं- विशेषकर अनिल अग्निहोत्री और आनंद तिवारी की रचनाएं जो गांवों और अभावग्रस्त पीडि़तों को दिग्दर्शन कराती हैं।
कहानियों में चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी ‘संध्या शूल’ मन को छूने वाली मार्मिक कहानी है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष प्रभावी है। वेदप्रकाश अमिताभ को कहानी ‘उसकी लड़ाई’ छोटी होकर भी भारतीय दलित वर्ग की नारी की दशा का परिचय देती है। वह पुरुष की प्रताडऩा का सदैव शिकार रही है। कमलकिशोर की कहानी आजकल के कवि सम्मेलन का सजीव चित्रण है। शशिकांत सिंह का व्यंग्य संबंधित व्यक्ति के स्वरूप और आचरण का ऐसा रोचक चित्र प्रस्तुत करता है कि पाठक सीधे उस व्यक्ति से जुड़ जाता है। व्यक्ति सामने आ जाता है। लेखों में यदुवंश यादव और कालूलाल कुलमी के आलेख बहुत अच्छे हैं। तथ्यों का बड़ी गहराई से विश्लेषण किया गया है। लेख पढक़र ‘अपवित्र आख्यान’ पढऩे की लालसा जागृत हुई। उदयप्रकाश अपने ढंग के अनूठे चित्रक और लेखक हैं। मुझे ऐसा याद आ रहा है कि मैंने मधुरेश जी का रविन्द्र कालिया संबंधी लेख कहीं पढ़ा है। यह मेरा भ्रम भी हो सकता है। मधुरेश जी मंजे हुए लेखक हैं।
हमेशा की तरह तुम्हारी प्रस्तावना में इतने संदर्भ होते हैं कि पाठक को शोध की ओर जाने की पर्याप्त सामग्री मिल जाती है। पता नहीं तुम इतना सब कैसे पढ़ते और याद रखते हो। यहां तो ‘सुबह जो पढ़ा, शाम को सब सफा’ की स्थिति है।