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Thursday 23 Nov 2017

अपने-अपने ‘महाभारत’


महेंद्र राजा जैन
‘सन्दर्भ’ 8 ए, बंद रोड  एलेनगंज  इलाहाबाद 211002                                                     मो.  09415347351

ग्लासगो (स्काटलैंड) में पीटर ब्रुक के ‘महाभारत’ के मंचन के 30 वर्ष पूरे हो चुकने के बाद केरोल सत्यमूर्ति की काव्य पुस्तक ‘महाभारत : ए माडर्न रिटैलिंग’ (प्रकाशक- नार्टन) प्रकाशित हुई थी।  केरोल महाभारत से इस कदर प्रभावित हुईं कि महाभारत के अंग्रेजी में अब तक जितने भी अनुवाद उपलब्ध हैं, उन्होंने पढ़ डाले। वे मानती हैं कि महाभारत विश्व साहित्य का अनुपम ग्रन्थ है। उन्हें अपनी यह कविता पुस्तक लिखने की मुख्य प्रेरणा के. गांगुली के पांच हजार पृष्ठों के महाभारत के संस्करण से मिली। केरोल सत्यमूर्ति की पुस्तक की  समीक्षा ‘हिन्दू’ में पढऩे के बाद यह पुस्तक पढऩे की मेरी इच्छा बलवती हो उठी और मैं यह पुस्तक मंगाने की बात सोच ही रहा था कि प्रकाशक व्दारा डाक से भेजी गयी समीक्षार्थ प्रति मिली।
महाभारत - ए माडर्न  रिटैलिंग की समीक्षा से पता चला कि महाभारत युद्ध का नहीं शान्ति का ग्रन्थ है। विदेशों में जब भी महाकाव्य पर चर्चा होती है तो सबसे पहले होमर के इलियड और ओडिसी का ही नाम याद आता है। केरोल का मानना है कि इलियड और ओडिसी से महाभारत कई गुना बड़ा तो है ही, मानवता के कल्याण की दृष्टि से भी वह अधिक महत्वपूर्ण है। महिला पात्रों की ही बात लें तो देखते हैं कि महाभारत की महिलाएं महाभारत की घटनाओं में होमर की महिलाओं की अपेक्षा अधिक परिश्रमी, क्रियाशील और प्रांजल तो होती ही हैं, नैतिक दृष्टि से भी महाभारत अन्य देशों के महाकाव्यों की दृष्टि से अतुलनीय हैं। केरोल की यह पुस्तक दो वर्ष पूर्व ब्रिटेन के प्रतिष्ठित फारवर्ड पुरस्कार के लिए भी नामित की गई है (यह पुरस्कार ब्रिटेन में कविता के लिए दिया जानेवाला सबसे बड़ा पुरस्कार है। कुछ वर्ष पूर्व नोबेल पुरस्कृत आयरिश कवि सीमस हीने की भी एक काव्य कृति इस पुरस्कार के लिए प्रकाशक व्दारा भेज दी गई थी, यद्यपि नोबेल पुरस्कार की राशि लगभग एक लाख पौंड की तुलना में फारवर्ड पुरस्कार की राशि केवल दस हजार पौंड थी। उस समय तक हीने को नोबेल पुरस्कार मिल चुका था पर उन्हें फारवर्ड पुरस्कार नहीं मिला)।
बचपन से एक शब्द ‘महाभारत’ सुनता आया हूँ यानी जहां कहीं भी किसी भी विषय पर लंबा विवाद, दो पक्षों में, परिवार में, जम कर वाक्युद्ध हो रहा हो, तो लोग कहते हैं कि ‘महाभारत’ यानी युद्ध छिड़ा हुआ है। जब ‘भारत में महाभारत’ पढऩा शुरू किया तो अपनी भूल का ज्ञान हुआ। महाभारत के सम्बन्ध में अभी तक जो धारणा थी उसके विपरीत इस पुस्तक से पता चला कि महाभारत युद्ध का नहीं शान्ति का ग्रन्थ है। लेखक ने इस ठीक ही ‘शांति का महाआख्यान’ कहा है। यह पुस्तक लिख कर लेखक ने कुछ प्रदेशों में, जातियों में प्रचलित इस अंधविश्वास को भी झुठलाया है कि पारिवारिक सुख-शान्ति के लिए महाभारत को घर में नहीं रखना चाहिए।                   
‘महाभारत’ चंद्रवंशियों के दो परिवारों कौरव और पांडव के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है। इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगों और उपनिषदों के गुह्यतम रहस्यों का निरूपण तो किया ही गया है, इसके अतिरिक्त भी इसमें न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्ध नीति, योग शास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र तथा धर्म शास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। मानव जीवन की विसंगतियां, दिन-प्रतिदिन के कार्यकलाप भी इससे अछूते नहीं रहे हैं।
महाभारत विश्व का सबसे बड़ा/लंबा साहित्यिक ग्रन्थ है। हालांकि इसे साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है किन्तु आज भी यह प्रत्येक भारतीय ही नहीं सभी देशों के लोगों के लिए एक अनुकरणीय स्रोत है -  साहित्यकारों के लिए भी,  और इसकी पुष्टि यह शोध ग्रन्थ करता है। महाभारत भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रन्थ तो है ही , एक लाख दस हजार श्लोकों में यह प्राचीन भारत के इतिहास की गाथा भी है। यह यूनानी काव्य इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुना अधिक हैं। महाभारत की मूल परिकल्पना में अठारह की संख्या का विशिष्ट योग है। कौरव और पांडव के बीच हुए युद्ध की अवधि 18 दिन, दोनों पक्षों की सेनाओं का सम्मिलित संख्या बल अठारह अक्षोहिणी, इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी अठारह और सम्पूर्ण ग्रन्थ अठारह पर्वों में।
यह महाकाव्य ‘जय’, ‘भारत’ और ‘महाभारत’ इन तीन नामों से प्रसिद्ध है। वास्तव में वेद व्यास ने सबसे पहले एक लाख श्लोकों में ‘भारत’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जिसमें उन्होंने भारतवंशियों के चरित्रों के साथ-साथ अन्य कई महान ऋषियों, चंद्रवंशी-सूर्यवंशी राजाओं के उपाख्यानों सहित कई अन्य धार्मिक उपाख्यान भी डाले। उसके बाद उन्होंने 24,000 श्लोकों का केवल भारतवंशियों को केन्द्रित कर ‘भारत’ काव्य बनाया। इन दोनों रचनाओं में धर्म की अधर्म पर विजय होने के कारण उन्हें ‘जय’ भी कहा जाने लगा। महाभारत में एक कथा आती है कि जब देवताओं ने तराजू के एक पासे में चारों ‘वेदों’ को रखा और दूसरे पर ‘भारत’ ग्रन्थ को रखा तो ‘भारत’ ग्रन्थ सभी वेदों की तुलना में सबसे अधिक भारी सिद्ध हुआ। अत: ‘भारत’ ग्रन्थ की इस महानता को देख कर देवताओं और ऋषियों ने इसे ‘महाभारत’ नाम दिया। तब से यह ‘महाभारत’ नाम से सबसे अधिक प्रसिद्ध हुआ।
महाभारत की प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों में कई भिन्न-भिन्न श्लोक मिलने के कारण कहा जाता है कि ‘महाभारत’ का  आधुनिक  रूप कई अवस्थाओं से गुजर कर बना है। यह भी कहा जाता है कि महाभारत की कहानी को ही बाद में मुख्य यूनानी ग्रंथों इलियड और ओडिसी में बार-बार अन्य रूप से दोहराया गया। महाभारत को समय-समय पर ‘इतिहास’ कहा गया है जिसका अर्थ होता है ‘इस प्रकार हुआ’  या ‘ऐसा हुआ’ - यह ठीक ही है। इस सन्दर्भ में ध्यान देने की बात यह है कि ‘पुराण’और ‘इतिहास’ ये दोनों शब्द क्रमश: ‘प्राचीन’ और ‘हाल की घटनाओं’ के लिए प्रयुक्त किये गये थे और दोनों ही शब्द इतिहास के द्योतक हैं जो समय-समय पर हुआ। आदि पर्व और भीष्म पर्व आदि में भी कहा गया है कि यह ‘इतिहास’ है। यदि रचयिता का उद्देश्य कविता या कहानी लिखना होता तो वह इसे महाकाव्य या कथा कहता। कुछ लोगों का यह भी कहना है, जो बड़ा ही हास्यास्पद है, कि चूंकि महाभारत कविता में लिखा गया है, अत: यह इतिहास नहीं है। वे यह भूल जाते हैं कि प्राचीन काल में  प्राय: सभी ग्रन्थ कविता में ही लिखे जाते थे। तथ्य यह है कि वेद व्यास ने महाभारत युद्ध के पहले से ही यह ‘इतिहास’ लिखने की योजना बना ली थी। इसीलिए युद्ध के समय उन्होंने युद्ध सम्बन्धी प्रत्येक बात का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण लिख डाला। यदि यह कथा या उपन्यास होता तो वेदव्यास को प्रत्येक बात, बहुत-कुछ अनावश्यक,लिखने की क्या जरूरत थी। यह भी ध्यान देने की बात है कि इसमें पचास से अधिक राजाओं और उनके परिवार रानियों, संततियों, रिश्तेदारों आदि का विवरण है। यदि यह केवल उपन्यास यानी  उपाख्यान या आख्यान ही होता तो अधिक से अधिक चार या पांच राजाओं का उल्लेख ही पर्याप्त होता और उन्हीं की कथा को क्रमश: विस्तार दिया जाता।
अन्य वैदिक साहित्यों के समान ही यह महाकाव्य भी पहले वाचिक परम्परा द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुंचा और बाद में मुद्रण कला के विकसित होने के पहले से ही इसके बहुत से अन्य भौगोलिक संस्करण हो गए, जिनमें बहुत सी ऐसी घटनाएं हैं जो मूल कथा में नहीं दिखती या फिर किसी अन्य रूप में दिखती हैं। कुछ इतिहासज्ञों और सामान्यजन का भी मत है कि महाभारत एक काल्पनिक कथा है जो महर्षि वेद व्यास के उर्वर दिमाग की उपज है, क्योंकि उनकी राय में ऐसा विशाल युद्ध नहीं हो सकता, लेकिन अन्य विद्वानों की शोधों से स्पष्ट है कि ‘यथार्थ’ और ‘मिथ’ में अंतर है।
महाभारत से प्रेरित कितनी रचनाएं हैं- क्या कोई बतला सकता है? शायद नहीं। वस्तुत: यह स्वयं अपने आप में शोध का विषय है और जब तक कोई इस विषय पर अपना शोध पूरा करेगा, तब तक न जाने कितनी और रचनाएं लिखी जा चुकी होंगी केवल हिंदी या भारतीय भाषाओं में नहीं वरन दुनिया भर की भाषाओं में भी। इस बात की पुष्टि इस पुस्तक के आठवें खंड ‘महाभारत का विश्व वितान’ से होती है। फिर भी इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि प्रभाकर श्रोत्रिय की यह पुस्तक महाभारत पर अब तक लिखी गई अनेक पुस्तकों में शीर्ष स्थान पर रखी जा सकती है। यह इस विषय पर लिखी गई पुस्तकों में अप्रतिम है और हिंदी में बहुत बड़ी कमी की पूर्ति करती है।
पूरे भारतीय साहित्य में यानी सभी भारतीय भाषाओं में किस-किस प्रकार महाभारत और उसके प्रसंगों एवं पात्रों पर लिखा गया है -  यह जानने के लिए यह ग्रन्थ महाभारत सम्बन्धी एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ का काम देता है। लेखक के इस निष्कर्ष से असहमत होने का कोई कारण नहीं कि विभिन्न देश-काल में महाभारत के ढाँचे या स्वरूप में,  उसके प्रेरणास्वरूप अनेक मूल्यवान रचनाएं लिखी गईं ... वे स्वयं ‘महाभारत’ नहीं, ‘अपने अपने महाभारत’ हैं। जब कोई बड़ी कृति विभिन्न लेखकों, भाषाओं,  देशों और संस्कृतियों में जाती है तब उसके मूल स्वरूप में वे अपनी-अपनी अवधारणा, संस्कृति और धर्म की कुछ न कुछ बातें जोड़ ही देते हैं। यह उस कृति से अपने को जोडऩे की इच्छा का सूचक भी है और वही उस कृति का लाभ उठा कर अपने धर्म, समाज, संस्कृति, भाषा आदि का प्रचार और समृद्धि भी है। महाभारत पर भी कुछ जानने के लिए इस का उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि महाभारत की विशालता और दार्शनिक गूढ़ता न केवल भारतीय मूल्यों का संकलन है बल्कि हिन्दू धर्म और वैदिक परम्परा का भी और सारे महाभारत की विशालता का अनुमान उसके प्रथम पर्व में उल्लिखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है - जो यहाँ (महाभारत) में है वह आपको संसार में कहीं-न-कहीं अवश्य मिल जाएगा,जो यहाँ नहीं है वह संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। हिंदी ही नहीं, क्या संसार की किसी भी भाषा में ऐसी कोई दूसरी पुस्तक है जिसमें किसी भी महान ग्रन्थ यानी क्लासिक के सम्बन्ध में इस प्रकार विश्लेषण किया गया हो? निश्चित ही नहीं। पुस्तक में मुझे सबसे अधिक रोचक पीटर ब्रुक व्दारा ‘महाभारत’ के मंचन पर लेखक व्दारा विश्लेषण लगा जिसके लिए अलग से एक पूरा परिच्छेद ( 16 पृष्ठ )  दिया गया है। इसमें पीटर ब्रुक व्दारा अपने नाटक में महाभारत की कथा में किये गये परिवर्तन, महाभारत का संक्षिप्तीकरण, कुछ चुने हुए प्रसंगों को लेना और उन प्रसंगों पर बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से लेखक, जो स्वयं एक नाटककार है, द्वारा विवेचना- यह पुस्तक की उपलब्धि है। पुस्तक की उपयोगिता बढ़ जाती यदि पुस्तक के अंत में विषयानुक्रमणिका दे दी जाती।  इंडेक्स न होना इस पुस्तक की एक कमी है। छह सौ से अधिक पृष्ठों की इस पुस्तक में किसी को महाभारत के सम्बन्ध में यदि कुछ जानना हो कि इस पुस्तक में है या नहीं, यदि है तो कहाँ, किस पृष्ठ पर, तो वह निश्चय ही पहले पुस्तक के शुरू में दिया गया अनुक्रम देखेगा। अनुक्रम में उसे परिच्छेदों के शीर्षक से कुछ सहायता अवश्य मिलेगी, पर उस परिच्छेद के अतिरिक्त भी तो पुस्तक में उस विषय पर लेखक ने कहीं कुछ लिखा है या लिखा होगा - यह कैसे पता चलेगा? लेखक ने ठीक ही लिखा है कि हम चकित रह जाते हैं यह देख कर कि पांच हजार साल पहले एक ऋषि-कवि ने इक्कीसवीं सदी के हमारे जीवन के सरोकारों, चिंताओं, द्वंद्वों, विषमताओं, विश्वासों, अनुभूतियों, आवश्यकताओं को कैसे जान लिया। आजकल अविवाहित मातृत्व एक ज्वलंत प्रश्न है। महाभारत की भी एक थीम ‘अविवाहित मातृत्व’ है। क्या इस ग्रन्थ से इस विषय पर कुछ पता चलता है? महाभारत से प्रेरित जिन दर्जनों पुस्तकों की इस ग्रन्थ में चर्चा की गई है- क्या उनमें या उनमें से किसी में भी इस विषय पर भी कुछ लिखा गया है? यह जानने के लिए क्या कोई इस पुस्तक का एक-एक पृष्ठ पलटे?  इस पुस्तक से हमें यह भी जानने को मिलेगा कि हिंदी का प्रथम मौलिक नाटक कौन सा है या महाभारत की प्रामाणिक प्रति कहाँ मिली थी। पर कैसे?
रामायण हिन्दुओं का बहुत पवित्र मान्य ग्रन्थ है। भारतीय सभ्यता का प्रतिबिम्ब देखना हो तो रामायण और महाभारत के आदर्श में देखना चाहिए, किन्तु वर्तमान काल में रामायणी साहित्य तो प्राय: धर्म के घेरे में ही कैद है। धर्म की दृष्टि से पाठक उसे पढ़ते, उस पर विचार करते और उसी दृष्टिकोण से निष्कर्ष भी निकालते हैं, किन्तु जिन्हें समाज और साहित्य के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध की कुछ भी यथार्थता का ज्ञान है, वे रामायण को साहित्यिक दृष्टि से भी देखते हैं। ऐसे मनीषियों में प्रभाकर श्रोत्रिय का नाम सबसे पहले आता है जिन्होंने संभवत: पहली बार साहित्यिक दृष्टि से महाभारत का विवेचन कर महाभारत के सम्बन्ध में अब तक सदियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन कर कि महाभारत युद्ध काव्य है , ‘भारत में महाभारत’ के माध्यम से उसे ’शान्ति काव्य’ सिद्ध करने का प्रयास किया है।
 पुस्तक के कवर की डिजाइन पुस्तक की विषय-वस्तु के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लेखक ने भले ही इस पुस्तक में महाभारत को शान्ति के प्रतीक के रूप में चित्रित किया हो, पुस्तक के कवर की डिजाइन पूरी तरह रक्तरंजित है, वह युद्ध की प्रतीक है। पुस्तक में ‘हरिवंश पुराण’ के सन्दर्भ में  नेमिनाथ को जैन धर्म का चौबीसवां तीर्थंकर बतलाया गया है। यह तथ्यात्मक भूल है। नेमिनाथ चौबीसवें नहीं, बाईसवें तीर्थंकर थे। आश्चर्य है कि भारतीय ज्ञानपीठ के प्रकाशन में इतनी बड़ी भूल कैसे छप गई।
अज्ञेय का व्यक्तित्व/कृतित्व इतना विशाल रहा है कि ओम थानवी व्दारा संपादित ‘अपने अपने अज्ञेय’ में 104 लेखकों द्वारा अज्ञेय पर लिखे गए संस्मरणों के एक हजार से अधिक पृष्ठों की एक-एक पंक्ति ध्यानपूर्वक पढऩे के बाद भी मेरे लिए अज्ञेय सही मायने में अज्ञेय ही रहे। इसी प्रकार ‘भारत में महाभारत’ के लगभग साढ़े छह सौ पृष्ठ की एक-एक पंक्ति ध्यानपूर्वक पढऩे के बाद भी कहना पड़ता है कि मैं महाभारत को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ, महाभारत मेरे लिए अगूढ़ ही रहा है।
पुस्तक के दूसरे टाइटल पृष्ठ पर ‘दूसरा संस्करण 2015’ छपा है। इसके अतिरिक्त पूरी पुस्तक में कहीं भी न तो लेखकीय वक्तव्य यानी ‘आरम्भ’ (भूमिका) से और न ही किसी प्रकार के प्रकाशकीय वक्तव्य से पता चलता है कि पहला संस्करण कब छपा - आज से 50 वर्ष पहले या छ: माह पहले? पहले संस्करण में क्या कुछ गलतियाँ रह गई थीं जिन्हें संशोधित किया गया या उसके छप चुकने के बाद लेखक को कोई और जानकारी हुईं जो इस दूसरे संस्करण में जोड़ दी गईं या पहला संस्करण ही ज्यों का त्यों छापकर उसे दूसरा संस्करण घोषित कर दिया गया? यदि मेरा अनुमान सही है तो इसे ‘दूसरा संस्करण’ नहीं ‘पुनर्मुद्रण’ कहा जाना चाहिए। पुस्तक आदि का एक तरह का एक बार में होने वाला मुद्रण या किसी साहित्यिक पुस्तक का अलग-अलग प्रकार से प्रकाशित किया जाना ‘संस्करण’ कहलाता है। कोई पुस्तक जितनी बार जितने तरह से छापी जाती है, वह सब अलग-अलग संस्करण हैं। ‘नया संस्करण’ पुस्तक का वह रूप है जिसमें पुस्तक के पाठ्य में कुछ सुधार किया जाता है या उसमें कुछ मैटर घटाया /बढ़ाया जाता है। पुस्तक की छपाई का विवरण सामान्यत:पुस्तक के टाइटल पृष्ठ के पीछे दिया रहता है। यदि पहले की छपी हुई कोई पुस्तक ज्यों-की-त्यों फिर से छापी जाती है, तो उसे ‘पुनर्मुद्रण’ कहते हैं।