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Tuesday 21 Nov 2017

थपेड़ों से टकराती जिजीविषा की कश्ती

 बी.एल. आच्छा
36, क्लीमेन्स रोड,
 सरवना स्टोर्स के पीछे,
मो. 094250-83335

योंतो हर नदी को पहाड़ी-चट्टानी रास्तों से टकराते हुए ही रास्ता तलाशना होता है। हर बीज जमीन की कठोर परत को फोडक़र ही आकाश देखता है। मुश्किलों के बियाबान में कई जिंदगियां सूख जाती है, पर वे यात्राएं संदेश बन जाती है, जिनमें जितनी यातनाएँ होती हैं उतनी ही जीवट भी। अगरचे उनके संघर्षों का घेरा व्यक्ति के वृत्त से निकलकर सामूहिकता में अपने को बड़ा बना दे तो वह समय को भी चुनौती दे जाता है। लेकिन यह वृत्त यदि पारिवारिक घेरे में सामान्य नैतिकता को जीते हुए किसी मंजिल को साधता है, तो वह भी अपना संकल्प भरा संदेश तो दे ही जाता है। सदाशिव कौतुक की आत्मकथा ‘‘जितना मुझे याद रहा’’ इसलिए पढ़ी जानी चाहिए कि कच्ची ईंट और कच्चे शब्दों से शुरू होकर इस शिल्पी ने जीवन के ताप से कारीगरी और साहित्यकार का सपना साकार किया है और इसका वृत्त भले ही ‘सिलावट’ का पिछड़ा परिवार रहा हो, पर उसमें अपने गाँव, परिवेश, समाज, सामाजिक विषमता, अपने समय की गरीबी के दुख द्वन्द्व, कुत्साएँ और नैतिकताएँ उस काल को ही नायक बना देती हैं। अपने सारे विद्रूप, अभावपरक किंतु जीवट से बदलते परिदृश्यों में। इस आत्मकथा में सारे संघर्षों के दारूण परिदृश्यों में पारिवारिक सुख के सृजन के साथ जीवन का संगीत अपने सारे कसैलेपन में मिठास की आस जगाये शब्दों के शिल्प में ढला है। शिल्प भले ही अपनी बुनावट में सहज हो, पर इनके भीतर का दुख अपने करूणा जल से सभी को मर्म-संवेदी बनाता है। फिर यह ‘व्यक्ति-वृत्त’ से निकलकर अपने समय की पीड़ाओं और संघर्षों में जीते लोगों का वृहत् वृत्त बन जाता है। दरअसल यह जीवन के थपेड़ों में एक सामान्य से व्यक्ति की जीवट की कथा है, जिसमें अपने समय और व्यक्तिगत संघर्षों के आहत स्वर भी है और नियति के चक्र भी।
    यह आत्मकथा उस साहित्यकार की है, जो जीवन संघर्षों में शब्द को सहचर बनाकर संवेदनशील बना रहता है और ईंट-गारे में विकसित होती जीवन की तपश्चर्या में सुखों के कंगूरे सिरजने की जिजीविषा को साकार करता है। इसीलिए उसके सारे दु:खों का जीवनचक्र ही शब्द बन जाता है और सारे शब्द सृजन में दुखों का ताप ही पाठक से जोड़ता है। यद्यपि इस आत्मकथा में घटनाचक्र ही ज्यादा हैं, पर फूटता उनसे करूणा-जल ही है। वे साहित्यिक स्पर्शों और सादृश्यों में उतने ही खिल पाएं हैं, जितनी अपनी व्यथाओं के गीलेपन में। उपलब्धि यही है कि जीवन के सारे दुष्चक्रों में जीवन का संगीत और संवेदना का जल बुझा-बुझा नहीं है, वह हमेशा नया प्रस्थान ढूँढता है।
    आत्मकथाकार ने अपनी जन्मभूमि के सारे रूखे-सूखे परिदृश्यों में भी इस अनुराग को संजोया है, जो विस्थापित होकर बार-बार अपने गाँव लौटता है, माँ की गोद की तरह शरण का सुख उपजाता है। लेखक स्वयं पिछड़े परिवार का है, गँवई जीवन की कसमसाहटों का जीवंत अनुभव है। पर लेखक ने गाँव के जीवंत समाजशास्त्र में उन सबको याद किया है, चाहे वे मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के गोगावाँ ग्राम के छोटे से चौक के हों, रावभाट मालवी, ब्राह्मण, कहार, अनुसूचित जाति के हों या नदी-नाले के बीच बसे गांव के भूगोल के। छब्बूसेठ, गोविन्द सेठ, टुण्डादाजी, अब्दुल, मंगूसा सेठ, गंगाराम भाई, ठाकुर केसरी सिंह, डॉक्टर रघुनाथ कानूनगो, भीलू उस्ताद, छज्जूदाजी बडवा, तोताराम दाजी, हजारी सेठ, युसुफ सेठ, हाबा पटेल, सोलंकी ऐसे नाम हैं, जो गाँव की जीवंतता, अपने-अपने कामकाज और करतब को सामने लाकर गाँव के आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक, व्यापारिक परिवेश को बुनते हैं। यही नहीं गाँव के मंदिर-मस्जिदों के साथ सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल भी कायम करते हैं।
    लेखक ने अपने परिवार के मिट्टी-गारे के आशियाने के साथ तीन-चार पीढिय़ों में एक साथ रहते कुनबे को सारे रिश्ते-नातों, अभावों-क्लेशों, भूख-भटकावों, दिहाड़ी-मजदूरी से लेकर सिलावटी कामकाज, काम के लिए दौड़-धूप, ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के या कामकाज की   उपलब्धता के लिए ईष्र्याभाव-दाँवपेंच, विधवाओं की दुर्दशा, साहूकारी के दुष्चक्र के साथ चित्रित किया है। यह वह समाजशास्त्र है ग्रामीण अर्थव्यवस्था का, जिसके फेर में प्रेमचन्द के गोदान का गोबर भी शहर की ओर मुखातिब होता है। पर 1936 का यह विस्थापन देश में हर कहीं पसरा है, चाहे लमही हो या गोगावाँ। आत्मकथाकार ने सौ साल से ऊपर की दादी का कर्ममय स्नेहिल चरित्र दिया है, जो शिक्षा से कोसों दूर होकर परिवार के लिए खटने वाले मातृत्व के व्याकरण में स्मरणीय बन जाता है। लेकिन फाके के दिनों के ये दृश्य केवल एक घर के नहीं है अधिकतर घरों के हैं -काले पड़ गये केले, चौथाई सड़े हुए आम जिसे फुटेला कहते थे, हमारे लिए आनंददायक थे।
कवेलुओं से टपकने वाली बूंदों से जमीन पर कीचड़ न हो इसलिए घर के सारे बर्तन रख देते थे। बर्तनों में बूँदें गिरती तो उन टप-टप बूँदों का अनूठा संगीत सुनाई देता था और ये परिदृश्य आज भी केवल गँवई समाज के नहीं है बल्कि शहरों में सडक़ रेल किनारे बसी झोपडिय़ों में आम हैं।
    लेखक का जीवन पूरा का पूरा एक घटनाचक्र है। इन चक्रों के भीतर के चक्कर हैं - शिक्षा का अभाव, चेचक से एक आँख चले जाना, गले में भैंस की अर्थव्यवस्था की घंटी, लोक-लाज के मृत्युभोज, पुराने कपड़े बेचने का धंधा, ठगी डॉक्टर की नौकरी का चंगुल, मामा के यहाँ हैण्डलूम की साड़ी बुनने का प्रशिक्षण, भाँग-गाँजे की पुडिय़ा बेचने का कार्य, टाइम कीपरी में मेट के फर्जी मस्टर रोल, बेरोजगारी में विवाह की विवशता, तांत्रिकों का मायाजाल, सिलावटी के कच्चे-पक्के होते गुर, मूँगफली बेचने के ठेले, इन्दौर में बेलदारी के काम, झुग्गी झोपड़ी की बस्तियों में प्लाट पर झोपड़ी, भाई-पड़ोसियों के बीच गालियों का युद्ध और पुलिसिया रपटें, सगाई-विवाह के पचड़े, ठेकेदारी के काम और न जाने क्या-क्या ! अगरचे थोड़ी स्थिरता भी आई तो दामाद की मृत्यु और बेटी के तलाक। ये सब तो घटनाचक्र मात्र हैं, पर इनके भीतर उन छोटी-बड़ी कमी के दर्द है जो स्केन ही नहीं होते, बल्कि जीवन और शब्दों को झनझनाते हुए या विवेक का पल्ला थामे हुए सवाल जरूर करते हैं - विपदा का पहला निशाना गरीब ही क्यों होता है? और भीड़ पर भी गोली चलती है तो गोली गरीब पर ही वार करती है और गरीब ही मरता है, सूखा पड़ता है तो गरीब पहले मरता है, बाढ़ आती है तो गरीब का ही मकान बहता है, कहीं चोरी होती है तो पहले गरीब पर ही शक की सुई आती है। बड़ा आदमी करोड़ों के घपले-घोटाले करता है। मिलावट करता है, शोषण करता है, फिर भी बच जाता है।
    ये फलसफे ही इस करम और भूख की आर्तता को साहित्य की ओर संयोगवश धकेल देते हैं, हारमोनियम-तबले संगत बिठा देते हैं, शब्दों के बंद कविता की कच्ची-पक्की राह दिखाते हैं। शिक्षक का छोटा सा जीवन कच्चे विवेक को आँच देता है। भाई-बहनों के बीच दायित्व का बोध घटनाचक्रों से छिल-छिलकर भी हार नहीं मानता। जीवन का शब्दों में यह रूपांतरण कवि को उस मुकाम पर ले जाता है जहाँ वह कच्ची ईंटों को कांट्रेक्टर में बदल देता है और शब्दों का संवेग साहित्य का अनुष्ठान बन जाता है और इस अनुष्ठान में इन्दौर का साहित्यिक परिदृश्य ही नहीं, देश के दिग्गज साहित्यकार भी इस अनुष्ठान को आशीष देते हैं। लेखक ने ‘सीता-स्वयंवर’ खंडकाव्य से लेकर अब तक अनेक विधाओं में लगभग चालीस पुस्तकों का सृजन किया है। इस आत्मकथा में उम्र के साठ तक के पाठ हैं, उसका शिखर अभी प्रतीक्षित है।
    इस आत्मकथा की विशिष्टता उसके जीवन-संतापों के विवरणों के गीलेपन में तो है ही, जो कभी-कभी आत्महत्याओं के नुकीले सिरे तक जाकर नये संकल्प में बदल जाती है। पर इनकी पेशबंदी में लेखक ने लोकविश्वासों, कहावतों-मुहावरों, स्नेह-सौगातों, स्वार्थी साहित्यिक प्रपंचों, जातीय विश्वासों, पारंपरिक रिवाजों, मालवी-निमाड़ी जीवन रागों, संतों की वाणियों, दैवी-विश्वासों, ओझा-तांत्रिक उपचारों, पशु-पक्षियों के व्यवहारों, संगीत भजन मंडलियों के बीच उपजे भक्तिभावों को भी ताना-बाना दिया है, जिससे आत्मकथाकार का जीवन ‘व्यक्ति’ से आगे बढक़र अपने समय और समाज का साक्षात्कार कराता है।
    एक और खासियत यह भी कि चट्टानों से मार खाती हुई जीवन की धारा हर बार किसी फलसफे तक, किसी बोध तक ले जाती है, जहाँ यह धारा या तो कहावत-मुहावरों की संजीदगी में बदल जाती है या ऐसे सूक्ति वाक्यों का सृजन करती है जो व्यक्ति के जीवन को साहित्यकार में रूपांतरित कर देते हैं -1)पराजित जीवन जीते हुए विजय का स्वप्न देखना मात्र कल्पना थी। 2)प्यास बढ़ती है तो सागर का उबाल भी बढ़ता है। और जब खाना नहीं होता तब भूख ज्यादा ही सताती है। 3)    बीज में ताकत होनी चाहिए जो पत्थर को फोडक़र बाहर आ सके। 4)    जीवन एक भयंकर सुरंग भी है, विचित्र विचार निरंतर पीछा करते रहते हैं जिसने एक बार यह विश्वास कर लिया कि जीवन असीम है वह कभी उदास नहीं होगा। 5) प्रेम मनुष्य के मन का एक ऐसा आविष्कार है जो सबको अच्छा लगता है। 6)    विपत्तियों की जड़ें अज्ञानता में होती है। 7)सामथ्र्य के बिना मनुष्य बिना जड़ों का वृक्ष होता है। 8) मैंने जीवन से मुश्किल शब्द हटाया और उसकी जगह मजबूती शब्द लिखना आरंभ किया। 9)मेरे एक हाथ में प्रार्थना थी और दूसरे में पुरूषार्थ।
    यही नहीं जीवंत मुहावरेदानी हर दुख-सुख में जीवन के घटनाचक्र के साथ दौड़ती चली आती है। पागल हाथी अपनी ही फौज को कुचलता है, जब तक जीना है तब तक सीना है, कश्ती बची तो किनारा मिलेगा, जैसे वाक्य लोक विश्वासों की तरह ही आत्मकथाकार के जीवन में रचे बसे हैं। लेकिन वह उन दृश्यों का भी नियोजन करता है जो शब्दों में बंधकर साहित्यिक कार्य के सामने प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। बचपन की भूल में पत्थर फेंकने से कौए का जमीन पर आ टपकना और कौओं का महीने भर तक एकजुट हमला लेखक को खौफ  का एक पाश्र्व देता है, तो कौओं को पोहे का रोजाना नाश्ता कराने वाले की शवयात्रा में असंख्य कौओं का काँव-काँव करते बिदाई देना दूसरा पाश्र्व देता है। एक पाश्र्व अन्याय के बदले का सामूहिक संघर्ष और दूसरा प्रेमिल भाव के लिए भावनात्मक श्रद्धांजलि। कौओं के अन्तर्बोध के ये पाश्र्व मानव-समूह के आगे मूल्यों के प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
    इस आत्मकथा की भूमिका भी कई दृष्टियों में महत्वपूर्ण है। इसमें वे अनुभव-मणियाँ है जैसे समुद्र की लहरों में कसमसाकर सीपियाँ और मोती किनारे पर बिखरकर अपनी चमक पैदा करते हैं। कहीं कहीं हल्के से दंश जरूर व्यक्त हुए हैं पर आत्मकथाकार ने जीवन के सहयात्रियों के कद को नीचा करने के लिए अपनी प्रतिभा को संवारा नहीं है। अलबत्ता कचरा फेंक संस्कृति के उपभोक्तावादी बाजार में मानवीय संवेदना के रोबोट में बदलती जाती प्रवृत्तियों से वह व्यथित अवश्य है। इन उबड खाबड़ राहों में आत्मकथाकार ने मनुष्य, मनुष्यता और जीवन विवेक को तलाशा है। उसने अर्थ की राह को भी पुष्ट किया है और अर्थ की सत्ता के सुनामी स्वभाव को भी। पर साहित्य उसके लिए आंतरिक उबाल है, हवा के बहने, बरसात के होने और अन्न के उपजने के मानिन्द। निश्चय ही साहित्यिक शिल्प के कंगूरों के बिना भी इस आत्मकथा में जो पीड़ा का संसार बसा है और उससे टकराते हुए जो सोपान तय किये हैं, उसकी जीवट एक प्रतिबोध है।