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Thursday 23 Nov 2017

युद्धरत आम आदमी का लोक संवाद

सुरेश सेन निशान्त
गाँव सलाह, डाक घर सुन्दर नगर 1
जिला-मण्डी,
हिमाचल प्रदेश-175018
मो. 9816224478      

विनय मिश्र के दोहों का संग्रह ‘इस पानी में आग’ इतने आत्मीय दोहों से भरा पड़ा है कि इसे पढऩे का, बार-बार पढऩे का मन करता है। ऐसा मेरे साथ ही नहीं अपितु बहुत से पाठकों के साथ हुआ होगा। इस कवि का अपनी बात कहने का तरीका इतना सरल और सहज है कि पढऩे और उन्हें आत्मसात करने में पाठक को कोई कठिनाई नहीं होती। मैंने कुछ दोहों का पाठ अपने घर में आई औरतों के सामने किया इन औरतों के संग मेरी माँ और बहन भी बैठीं थीं, उन्हें दोहे बहुत पसंद आये। मेरी माँ कहने लगी क्या ये दोहे कबीर या रहीम के हैं? किसी असाक्षर द्वारा ये कहा जाना इन दोहों की बहुत बड़ी सफलता है। इससे इन दोहों के जन तक पहुँचने की एक कुव्वत भी झलकती है। जो इन दोहों को लोकधर्मी और जनप्रिय भी बनाती है।
    मैंने विनय मिश्र की कवितायें भी पढ़ी हैं बहुत ही सहज और सरल, दिल को छू लेेने वाली हैं। ऐसा वही कर सकता है जिसकी अपने लोक में गहरी पकड़ हो तथा अपनी रचना के लिए खाद, पानी तथा खनिज वह उस लोक से प्राप्त करता हो जिसको वह डूबकर जीता हो।
सोचो तो ये है नदी, देखो तो है रेत।
इस मंजर का खूब है, मुझमें इक संकेत।।
ऐसा दोहा वही लिख सकता है जिसे अपने लोक और प्रकृति की गहरी समझ हो तथा लोक की जो एक लय है उस लय का निर्वहन करते हुए जो अपनी रचना को एक नई ऊँचाई पर ले जाये। वैसे तो आजकल की अधिकतर कविताएँ गद्यात्मक होती हैं जिनमें न अपनी धरती की महक होती है न उसका कोई ज्ञान ही। बस फेसबुक पर आठ-दस कविताओं का पाठ कर तैयार किया गया शब्दों का एक जाल- भर होता है। दुख की बात ये है कि आजकल ऐसी ही कविताएँ पुरस्कृत भी हो रही हैं तथा कुछ विशेष लोगों के द्वारा चर्चित भी।
    जहाँ तक विनय मिश्र की बात है इनकी रचनाएँ समाज की विद्रूपताओं को बहुत ही गहरे ढंग से छूकर अपना आकार ग्रहण करती हैं।
मेरे घर के सामने, कुचल गया मासूम।
अगले दिन अखबार से, मुझे हुआ मालूम।।
मुरझाई खुशियाँ मिलीं, सोये मिले सवाल।
काँटों में यह जिन्दगी, आज हुई बेहाल।।
ये दोहे जीवन की बुराइयों पर पैनी नजर रखते हुए अपने वर्तमान की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हैं। यहाँ निराशा भरे दोहों में भी जन की आशा है। ये दोहे, हारे हुए तथा निराश आदमी के दोहे नहीं, समाज की विद्रूपताओं से लडऩे वाले युद्धरत और बहादुर आदमी के दोहे हैं जो जीवन के जटिल प्रश्नों से एक व्यापक दृष्टि के साथ टकराते हैं तथा अपनी सादगी के कारण पाठक को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसकी एक बानगी देखिए:-
है मौसम के हाथ में, फिर से आज गुलेल।
चिडिय़ों का मरना यहाँ, फिर से होगा खेल।।
यहाँ न अमूर्त अनुभव है न भाषिक खिलवाड़ अपितु तमाम घेरेबंदियों को तोड़ कर मानवता से गहरा जुड़ाव है। एक जिद है, यह जिद ही कवि को एक लड़ाकू स्वभाव देती है कि वह बुराई के साथ किसी भी दबाव में समझौता न करे और न ही एक पर्यटक की तरह दुनिया के संघर्ष को दूर से निहारता रहे बल्कि उसका हिस्सा बन कर स्वयं संघर्ष करता रहे। विनय मिश्र दोहे लिखते हुए किसी भी एंगल से रूढि़वादी विचारों से हाथ नहीं मिलाते अपितु कबीराना ढंग से अपने सामाजिक परिवेश में पाई जाने वाली विद्रूपताओं पर चोट करते हैं, उनसे दो-दो हाथ करते हैं। यह सब कुछ एक फैशन की तरह नहीं बल्कि वे एक नये ढंग से आज के सोशल स्पेस को रचते हैं। इसलिए ये दोहे एक गम्भीर अध्ययन की मांग करते हैं। इन दोहों को पढ़ते हुए ही जाना जा सकता है कि कवि के आगे क्या संकट थे। भारतीय समाज में पूँजीवाद का जो विकास हुआ है उसका सामना मिलजुल कर किस तरह किया जाए? तथा अपने लोक को, अपनी प्रकृति, अपने आस-पास के वातावरण तथा जीवन के बुनियादी रंग को किस तरह से हाथ से फिसलने न दिया जाए। इसके अलावा कवि ने एक और चीज का ध्यान रक्खा है वह चीज है हमारी राजनैतिक चेतना के प्रति सजगता। किसी भी कवि को असाधारण रूप से सजग होकर अपने आस-पास होने वाली किसी भी घटना या दुर्घटना का आकलन करना होता है। ये काम सुनने में जितना आसान लगता है करने में उतना ही कठिन है यही बातें कवि की दृष्टि का निर्माण करती हैं तथा उसकी रचना को नई दिशा देती हैं। यही दिशा विनय मिश्र की रचनाओं में है जो उनके इस दोहा संग्रह को पठनीय बनाती है।
हम दोनों हैं एक ही, कुनबे के इंसान।
उसको गीता याद है, मुझको याद कुरान।।
दिन की थी तैयारियाँ, लेकिन आई रात।
एक छलावा हो गई, खुशहाली की बात।।
एक बात यह भी स्मरणीय है कि ये दोहेे कहीं भी ईश्वर की ओर नहीं मुड़ते अपितु जरूरत पडऩे पर उसकी सत्ता को ही चुनौती देते हैं। कवि अक्सर असाधारण बात को भी बेहद सरल ढंग से अपने पाठक के सामने रखता है। विनय मिश्र की यह सरलता उन्हें नागार्जुन और त्रिलोचन की परम्परा से जोड़ती है जहाँ बहुत ही तार्किक ढंग से सच्चाई के दृश्य पाठकों के सामने रक्खे गए हैं और जो हमारी चेतना को झिंझोड़ कर रख देते हैं।
समकालीन संदर्भों और सामाजिक व राजनीतिक चेतना के प्रति कवि की असाधारण सजगता इस दोहा संग्रह को एक महत्वपूर्ण कृति तो बनाती ही है, साथ ही मेरी दृष्टि में लोक संवादी होना इन दोहों की विजय भी है।