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Friday 24 Nov 2017

चांद, चांदा, चंद्रपुर

विनोद साव
मुक्तनगर, दुर्ग 491001
मो 9009884014
कभी किसी संजोग को देखकर हँसी आ जाती है, वैसी ही हँसी आ गई थी। सामने दो सहयात्री बैठे हुए थे अनायास ही वे दोनों हमारे मामा गांव के निकल आए थे। उनमें एक परगनिहा थे और दूसरे ने अपना नाम जमीर अख्तर बताया। एक हिंदू और दूसरे मुसलमान, परगनिहा ने थोड़ी देर तक घूरने के बाद मेरा नाम पूछ लिया था और फिर अनुमान सही निकल जाने पर खुशी से उछल पड़े थे। जमीर परिचित नहीं थे पर अपने गांव में सेवानिवृत्ति के बाद आकर स्थायी रूप से बस गए थे। यह जानकर उन्हें भी खुशी हुई। उस पर तुर्रा ये कि परगनिहा और जमीर एक ही गांव के होते हुए भी आपस में अनजाने थे, क्योंकि परगनिहा लंबे समय से अपने गांव के पास के इस्पात उद्योग वाले शहर भिलाई में रह रहे थे। उनका गांव आना जाना कम हो गया था। वे औद्योगिक शहर में लौह निर्माण के साथ अपने बच्चों का निर्माण भी कर रहे थे। साथ ही कंपनी द्वारा आबंटित मकान पर कार्मिकों का स्वामित्व हो, इस आन्दोलन से जुड़ गए थे। वे बता रहे थे कि आजकल सरकारें सार्वजनिक उद्योगों को निजी घरानों को बेचने के लिए झट से तैयार हो जाती हैं पर जो कार्मिक कंपनी के मकानों में बरसों से किराये पर रह रहे हैं उन्हें उनको लीज़ पर देने से कतरा रहीं हैं। पहले कुछ लोगों को दे दिया है फिर अचानक बंद कर दिया यह आश्वासन देकर कि आगे फिर कभी देंगे, पर मामला खटाई में है और हम लोग आन्दोलन पर आन्दोलन किए जा रहे हैं। हर तरह के मंत्रियों और अधिकारियों से मिले हैं, वे आश्वस्त करते हैं, पर हैं सब वही ढाक के तीन पात। ऐसा लगा कि परगनिहा में मांगें रखने और आन्दोलन चलाये रखने का एक जूनून है उन यूनिस्टो की तरह जो इस आस में मोर्चा बांधे रखते हैं कि ये सुबह कभी तो आएगी।
दूसरे सहयात्री जमीर अख्तर केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, मुंबई विमानतल से छ: साल पहले सेवानिवृत्त होकर छत्तीसगढ़ के अपने गांव में रहने लगे थे। गांव की बोली में रच बस गए थे जिसका प्रमाण था उनका अचानक हिन्दी बोलते बोलते छत्तीसगढ़ी बोल उठना। छत्तीसगढ़ के गांवों में ईसाई और चर्च दिख जाते हैं पर मुसलमान और मस्जिद नहीं। यहां ज्यादातर मुसलमान शहरों में होते हैं। किसी गांव में किसी का मुसलमान निकल आना अचम्भा देता है। अमूमन छत्तीसगढ़ के गांवों में मस्जिद देखने में नहीं आती और न ही किसी वक्त में अजान के स्वर सुनाई देते हैं। पर कोई रह जाता है तो वह गांव-गंवई के ठेठपन में इतना घुलमिल जाता है कि उसके मजहब को पहचान पाना मुश्किल होता है। जमीर उत्साह से भरे इन्सान थे जिन्हें अपने बच्चों को ऊँची शिक्षा दिला पाने पर फख्र था। बच्चों को सही मुकाम तक पहुँचा देने की अपनी सफल गाथा को वे अक्सर सुना बैठते थे, उसने घर का बना कुछ निकाल लिया था जिसे हम सबको बाँटा। हम तीनों ने खाया। मैंने भी पत्नी की रखी हुई गेहूं, सूजी, तिल, गुड़ और घी से बनी खुरमी जो जैन साहब के लिए बनाई गई थी उसमें से थोड़ा सा निकाल लिया और उसी तरह बाँट दिया था। हमारी हिन्दी-छत्तीसगढ़ी मिश्रित बातों को सुनकर ट्रेन की बर्थ में ऊपर लेती हुई एक सुन्दर लडक़ी सुन सुन कर हंसती थी और देखा करती थी। अब वह नीचे आ गई थी, उसने अपने बैग से झिल्लियों में करीने से बंधे हुए अलग अलग नमकीन निकाल लिए थे, जिन्हें निकालकर उसने भी हमारे बीच सबको बांट दिया था। मैंने उसके आकर्षक नमकीन और उनके स्वाद को पकड़ते हुए उससे पूछा गुजराती? उसने सिर हिलाया हाँ! मैं रायपुर की हूं और बंगलोर जा रही हूं वहां पढ़ती हूं। रायपुर जो छत्तीसगढ़ की राजधानी है और इसलिए वह हमसे निकटता महसूस कर रही थी। अब वह भी हमारी बातचीत में मज़े लेने लग गई थी। टीटी आ गए थे, मैंने टिकट दिखाते हुए पूछा मुझे जाना चंद्रपुर है पर टिकट बल्हारशाह तक है। वे बोले कि चंद्रपुर बल्हारशाह से चौबीस किलोमीटर है आपको दूसरी ट्रेन पकडऩी पड़ेगी। आप बल्हारशाह से पहले चांदाफोर्ट पर उतर जाइए वहां स्टापेज है और वह चंद्रपुर से लगा हुआ है। यह मेरे लिए नई जानकारी थी जो ज्यादा सुविधाजनक थी।
मोबाइल पर रिंगटोन था जिसमें जैन साहब का नाम दिखा था हाँ! कहाँ तक पहुंच गए हैं विनोदजी आप? अपने मेहमान की उन्हें चिंता थी। मैंने टीटी वाली बात उन्हें बता दी। तब वे बोले बिल्कुल बिल्कुल। आप चांदाफोर्ट उतर जाइए वहां स्टेशन के बाहर आपको कार खड़ी मिलेगी मैं ड्राइवर से कहे देता हूं।
चांदाफोर्ट इस नाम को सुनकर अपने छात्र जीवन में एटलस में छपे नक्शे याद आ गए जिसमें मध्यप्रदेश के नक्शे में छत्तीसगढ़ की सीमा से जुड़े महाराष्ट्र का नक्शा दिखा करता था। इस पार छत्तीसगढ़ का राजनांदगांव जिला और उस पार महाराष्ट्र का चांदा जिला। आज भी इन दोनों जिलों के बीच आपसी संबंध हैं, रिश्ते नाते जुड़े हैं। मजदूरों और कामकाजी जनों का आना जाना लगा है, दोनों ही जिलों के सिवान पर बसे मानपुर और गढ़चिरौली कस्बे इन्हें आपस में जोड़ते हैं। यह नक्सल प्रभाव में है पर बसें व अन्य वाहन आते जाते हैं। चांदा अब चंद्रपुर हो गया है। गढ़चिरौली अब अलग जिला बन गया है। राजनांदगांव से चंद्रपुर के लिए नियमित चलने वाली बसें इन दोनों जिलों के संबंधों को आज भी पुख्ता करती हैं।
दुर्ग से ट्रेन में जाने के लिए निकल पड़ा था क्योंकि दुर्ग-चंद्रपुर बस बंद होकर अब राजनांदगांव से चल रही हैं। बसें जितनी देर में पहुंचती हैं उनसे आधे समय में सुपरफास्ट ट्रेनें चंद्रपुर पहुंचा देती हैं। कोरबा-यशवंतपुर एक्सप्रेस में गोंदिया से नागपुर न जाकर नागभीड होते हुए चंद्रपुर, छत्तीसगढ़ से दक्षिण भारत को जोडऩे वाली सभी ट्रेनें नागपुर होकर दक्षिण की ओर प्रवेश करती हैं पर यह अकेली ट्रेन है जो दक्षिण जाने के लिए नागपुर न होकर गोंदिया से कट जाती है। नागपुर से बल्हारशाह जाते समय चंद्रपुर पड़ता है और गोंदिया से बल्हारशाह लाइन पर है चांदाफोर्ट। नए रास्तों पर चलते समय गंतव्य तक जाने का उत्साह बना रहता है जो मुझमें था जिसे मैं सहयात्रियों में बांट रहा था। हम जिस ट्रेन में बैठे थे उसका नाम वैनगंगा एक्सप्रेस है वह आल्हादकारी क्षण था जब एक बार पुल के ऊपर वैनगंगा ट्रेन दौड़ रही थी तब पुल के नीचे वैनगंगा नदी बह रही थी। वैनगंगा आगे जाकर वर्धा नदी में विलीन हो जाती है जिसके आसपास चंद्रपुर बसा है। इन दोनों नदियों के संगम के बाद इनका नया नामकरण हो जाता है प्राणहिता और तब यह गोदावरी में जाकर समाहित हो जाती है।
सौंदड, वडसा, नागभीड, मूल मारोडा जैसे कस्बाई रंग के स्टेशन पड़े थे उसके बाद आया चांदाफोर्ट। नागभीड में छोटी बोगियां भी खड़ी दिखीं। नागभीड से नागपुर तक छोटी लाइन रेल गाडिय़ां भी पिछले सौ बरसों से चल रही हैं। यह पूरा क्षेत्र विशाल चंद्रपुर जिले में आता है। आदिवासी क्षेत्रों के रेलवे स्टेशन वैसे ही साफ.सुथरे और हवादार लग रहे थे जैसे अंबिकापुर जाते समय सरगुजा अंचल के स्टेशन लगते हैं।
फरवरी के महीने में रेल पटरियों के किनारे सूखते पेड़ों के जंगल थे पर पलाश के चमकने का यही मौसम था और सूखे पेड़ों व पत्तों के बीच टेसू के रंग अपनी छटा बिखरा रहे थे। पलाश यानी टेसू के रंग को देखकर होली के रंगों की याद हो आती है और ह्वदय होलियाने लगता है। रंगों के अविष्कार से पहले पलाश के फूलों को ही पानी में डुबाकर होली खेलने के लिए नैसर्गिक रंग तैयार किए जाते थे। यह एक ऐसा फूल है जो अपनी छटा से ऋतु वसंत के साथ होली पर्व के रोमान को और भी बढ़ा जाता है।
राजनांदगांव और बस्तर जिले के समानान्तर बसे चंद्रपुर जिले के जंगल और अदिवासी जीवन भी वैसे ही दृश्य पैदा करते हैं सिवाय बस्तर के बीहड़पन को छोडक़र। छत्तीसगढ़ की तुलना में महाराष्ट्र में शिक्षा, कला और उद्योगों का विकास अधिक हुआ है। इसलिए अपने अधिकारों के प्रति चेतना और सतर्कता यहां अधिक दिखती है। आदिवासी स्त्रियां यहां अधिक सुघड़ और परिष्कृत जान पड़ती हैं।
लंबी यात्रा में चलने वाली ट्रेन में सहयात्री आने वाले स्टेशनों को आसानी से नहीं बतला पाते हैं और कारपोरेट जगत में काम करने वाले नवजवान तो और भी नहीं जानते कि ट्रेन भारत भूमि के किस क्षेत्र में दौड़ रही है क्योंकि उनकी दुनिया मोबाइल, लेपटाप और वाकीटाकी के भीतर घूम रही होती है। सूर्यास्त हो गया था। मैंने रुकी हुई ट्रेन से उतरकर एक छोटे से स्टेशन वडसा में अपने झोले में कुहनी टेककर ऊंघ रहे एक मुसाफिर की ओर दौडक़र पूछा, तब उन्होंने बताया कि बस इसके बाद चांदाफोर्ट है।
कितना? आधा घंटा लगेगा? मैंने पूछा
बरोबर वे मराठी के बहुचलित शब्द के साथ सिर हिलाकर बोले।
आखिर कुल साढ़े छ: घंटे की यात्रा के बाद चांदाफोर्ट आ ही गया। शाम के सात बज गए थे। मैंने अपना बैग उठाया और सहयात्री परगनिहा, जमीर और गुजराती लडक़ी से हाथ मिलाते हुए यात्रा को आनंदमय बना देने के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त की और उतर गया। चांदाफोर्ट साफ सुथरा और प्यारा सा स्टेशन है। गाड़ी से उतरकर अपनी ट्रालीबैग खींचते समय देखकर अचंभित हुआ कि यह केवल एक प्लेटफार्म वाला स्टेशन है। यहां से फकत गोंदिया और बल्हारशाह की ओर आने जाने वाली कुछ यात्री और द्रुतगामी गाडिय़ां चलती हैं। दूसरे स्टेशनों की तरह इसके बाहर पार्किंग स्थल नहीं है यहां तक सायकलों के लिए भी नहीं। कोई किला तो आसपास दिखा नहीं पर यह अपने समय का रजवाड़ा तो है।
ट्रेन में चढ़ते समय जैसे अपने मामागांव के दो सज्जनों के अनायास मिल जाने से हँसी आई थी वैसे ही यहां स्टेशन से बाहर निकलते समय हँसी आ गई थी। कभी पोर्टब्लेयर और बैंकाक विमानतलों पर गाइड को अपने नाम की तख्ती लिए देखा था वैसे ही यहां सिंगल प्लेटफार्म वाले स्टेशन के बाहर सफेद कम्पूटराइस्ड प्रिंटेड शीट में स्वागत के शब्दों के साथ अपने नाम को देखा तो हँसी आ गई। यह जैन साहब का विनोदपूर्ण अंदाज था विनोद साव की अगवानी करवाने का। वर्दी धारी चालक ने अपनी कार का दरवाजा खोल दिया और ट्रालीबैग को पीछे ले लिया था।
स्टेशन पर एक उम्रदराज सरदार जी ने भी हाथ मिलाया था। मैंने उन्हें ड्राइवर के साथ आया समझा था पर वे उसी ट्रेन से उतरे थे जिस ट्रेन से मैं उतरा था। उन्होंने अपना परिचय दिया कि मैं सुखचैन सिंघ हूं और भिलाई स्टील प्लांट के पावर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में एजीएम था। आजकल चंद्रपुर फेरो एलाय स्टील प्लांट में पावर इंजिनियरिंग के काम को देखने के लिए मुझे यहां बुलाया जाता है। यह जैन साहब की बड़ी विशेषता रही है कि उनके कार्यकाल में जिन भी क्षेत्रों के विशेषज्ञ उन्हें मिले वे चाहे जहां भी चले जाएँ वे उन्हें छोड़ते नहीं हैं। उनकी सम्मानपूर्वक सेवाएं लेते रहे हैं। उनके ऐसे ही विशेषज्ञों की सूची में एक मैं था जो कभी भिलाई में उनके साथ सीएसआर विभाग में उनका सहायक प्रबंधक रहा था। वे निरंतर ऊँचे पदों पर पदोन्नत होते रहे पर अपना अनुग्रह अपने विशेषज्ञ अधीनस्थों पर बनाए रखे। यह याद कर फिर हँसी आ रही है कि एक बार मुझे लेखक जानकर एक अधिकारी महोदय ने जैन साहब को कहा था कि ये साव जी तो साहित्यकार हैं ये आपके साथ क्या काम करेंगे? तब जैन साहब ने यह कहकर सम्हाला था कि हमने इनको काम करने के लिए थोड़ी रखा है, काम करने वाले तो बहुत मिलते हैं।
कार में ड्राइवर और सिंघ साहब दोनों से बातें जारी हैं। चांदाफोर्ट से चंद्रपुर स्टेशन सात किलोमीटर है। चांदाफोर्ट स्टेशन में एक प्लेटफार्म है तो चंद्रपुर में दो। इस जिले में मुख्य स्टेशन बल्हारशाह ही है, बल्हारशाह जंक्शन उत्तर से दक्षिण भारत जाने वालों का प्रवेशद्वार है। यह विदर्भ अंचल में आता है। इस बीच जैन साहब के फोन भी आते हैं विनोद जी, अभी आप गेस्टहाउस जा रहे हैं फिर हम खाना साथ में खायेंगे।
गेस्टहाउस के सहायकों ने मेरे बैग को आबंटित अपार्टमेंट में रख दिया था। मैं मुख्य हाल में सिंघ साहब के साथ चाय पीते और टीवी देखते हुए बतिया रहा हूं, एक और उप महाप्रबंधक राकेश कुमार दिख जाते हैं जो कभी भिलाई में हमारे साथ थे। जैन साहब फुर्ती से आते  हैं। मझोले कद, सांवले रंग और स्वस्थ शरीर पर जामुनी रंग की टीशर्ट पहने हुए हैं। घने बाल, घनी मूंछें, तेज टन्नक आवाज़ और खिली हुई मुस्कान के साथ वे गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं कैसे हैं विनोद जी? रास्ता तो अच्छे से कट गया होगा?
सुनील कुमार जैन एक विलक्षण व्यक्तित्व और इस्पात जगत के टेक्नोक्रेट हैं जो अपनी योग्यता के दम पर जिन पदों में पदोन्नत होते रहे उन पदों में पदस्थ अक्सर वे सबसे कम उम्र अफसर होते रहे हैं। भिलाई प्रबंधन ने उन्हें अपनी एसेट की तरह रखा था। यह पहली बार था जब वे भिलाई से बाहर होकर भारतीय इस्पात प्राधिकरण यानी सेल की एक दूसरी यूनिट में एक्सीक्यूटिव डाइरेक्टर होकर आए थे और फेरो एलाय स्टील प्लांट, चंद्रपुर के प्रधान हो गए हैं। जैन साहब बताते हैं कि यह प्लांट फेरो मैंगनीज, सिलिका मैंगनीज बनाकर इस्पात संयत्रों को आपूर्ति करने वाला देश का अकेला प्लांट है। पहले यह महाराष्ट्र शासन के अधीन था जिसे 2011 से सेल ने ले लिया है। जैन साहब को यहां आए साल भर ही हुए हैं पर अपनी कर्मठता के बल पर यह पहली बार है जब वे इस नुकसान में चलने वाले प्लांट को उसकी पहली तिमाही में लाभ दिला पाए हैं। उन्होंने बताया कि यह छोटा प्लांट है आप इसे आधे-पौन घंटे में कल घूम लेंगे। तब मैंने उसके फर्नेस में चढक़र प्लांट के विहंगम दृश्य पर एक नजर डाल ली थी।
स्वाधीनता से पहले देश के भावी विकास की नीतियां तय करने के लिए नेहरू ने हिन्दुस्तान की खोज नामक ग्रंथ को लिखा था। वे कहते थे कि मेरा समाजवाद कोई वायवी समाजवाद नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक समाजवाद है। इसलिए ही पहली पंचवर्षीय योजना में देश के प्रौद्योगिकीय विकास के लिए सार्वजनिक उपक्रमों की आधारशिला उन्होंने रख दी थी जिससे हजार सालों तक पराधीन रहने वाले इस देश में जल्दी समृद्धि आई और देश ने आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी। अब आज के पूंजीवादी सोच में अपने पसन्दीदा सेठों को उपकृत करने के लिए इन्हीं सार्वजनिक उपक्रमों को लक्ष्य कर निशाना साधा जा रहा है।
जैन साहब अपनी ड्यूटी से फुरसत पाकर विचार, साहित्य और भाषा की दुनिया में चले आते हैं। हम लोगों ने भिलाई में कितनी ही बार हिन्दी अंग्रेजी के तमाम वैचारिक साहित्यिक कृतियों को उन्हें पढ़ते हुए देखा था। वे तेजगति से एक साथ दो तीन पुस्तकों को पढ़ लेते हैं फिर भी उनकी स्मरण शक्ति में कोई कमी नहीं। जितना पढ़ा सब उन्हें याद रह जाता है। उनका मानना है कि प्रशासन और उद्योग जगत के ऊँचे पदों पर आसीन लोगों को भाषा, साहित्य और विचारों की दुनिया से अपनी संलग्नता बनाए रखनी चाहिए। इनकी संवेदनाएं किसी भी जिम्मेदार प्रतिनिधि को और भी बेहतर टेक्नीशियन बनाती हैं। यहां आते समय उन्होंने कहा था कि आप तो यायावर हैं, आइये फिर एकाध बार चंद्रपुर, और मैं आ गया था जैन साहब की सोहबत पाने और उनसे बौद्धिक चर्चा करने को आतुर होकर।
गेस्ट हाउस में ईडी साहब का अपना एक अलग डाइनिंग हाल था। वहां आमिष-निरामिष सुस्वादु भोजन और रस भरी मिठाइयां भी हमारी वैचारिक गहमागहमी में खलल नहीं डाल सकीं।  ज्ञान की प्यास और संवेदना की आस से प्राप्त बड़ा अमृत शायद कुछ भी नहीं होता। इसीलिए महापुरुषों की वाणियां अमृत वाणी कही जाती हैं।  वे अचानक पूछ बैठते हैं जेएनयू को आप कितना जानते हैं? बस यही सर कि यह माक्र्सवादियों का गढ़ रहा है और यहाँ से निकले छात्रों ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में रचनात्मक और जनधर्मी हस्तक्षेप किया है, मैंने धीरे से कहा। वे जोश में बोलते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि जेएनयू में शिक्षा का स्तर इंटरनेशनल रैंकिंग पर है। उसके मुकाबले हमारे देश के दूसरे विश्वविद्यालय काफी पीछे हैं। वे थोड़ा रूकते हैं और ये लोग हैं कि बिना मतलब उसके पीछे पड़े हैं। बस यही एक विरोध दिखता है कि उन्हें नेहरू नहीं चाहिए। वे बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं ़अब पी.सांईनाथ का चेला कन्हैया दे रहा है इनको जवाब।
खाना खाकर वे घर जाते समय कहते हैं कल शाम आप बंगले पर आइये, गेस्टहाउस, स्टील प्लांट, उनका बंगला, जीमए क्लब और भी कुछ सुविधाएँ सब लगभग एक ही परिसर में स्थित हैं थोड़े जंगल और हरियाली के बीच। इनके झूमते वृक्षों के भीतर कलरव करते हैं विहंग। गेस्टहाउस के कर्मचारी बताते हैं एक अजगर भी मस्ती में घूमता रहता है पर किसी इन्सान को नुकसान नहीं पहुंचाता।
जैन साहब कार भेजने की बात कहते हैं लेकिन मैं पैदल चला आता हूं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण बंगले के गेट पर ही मुझे रोक दिया गया। फोन लगाकर अंदर पूछने की कोशिश हुई पर कोई जवाब नहीं आया। मैं गार्ड को मोबाइल में अपने साथ जैन साहब की एक फोटो दिखाता हूं। वे हंसते हैं ठीक है जाइए। जैन साहब अकेले रहते हैं, उनकी पत्नी रायपुर में सेवारत हैं व भिलाई में रहती हैं। एक बिटिया है जो बंगलोर में भाषाशास्त्र  पर ऊँची शिक्षा ले रही हैं। वे खुद इस वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले हैं। वे पोहा और कटहल का अचार खाते खिलाते समय भी अपनी वैचारिक दुनिया में निमग्न हैं। उनके साथ पढ़े हुए मित्र बताते हैं कि वे कभी इन्दौर कालेज में वायलिन बजाकर महफिल जमा दिया करते थे। वे फिल्मों, सुगम व शास्त्रीय संगीत पर, गीतों और गज़़लों पर बड़ी विस्तार से बातें करते हैं। मेहदीहसन व लतामंगेशकर पर जान छिडक़ते हैं। कहते हैं कि देखिए, कलाप्रेमी नेहरू जी ने कैसे लताजी को लालकिले से गवाकर उनके गैर फिल्मी गीत को अमर कर दिया।
वे बंगले के परिसर को घुमाते हैं। टेकरी और जंगल में बसा उनका बंगला किसी मुख्यमंत्री निवास की तरह दिखता है। ऊँचे तारों की दीवारें हैं। वे बताते हैं हरिण, भालू कई तरह के जानवर उन्हें दिख जाते हैं। मोर की आवाज़ गूंजती रहती है। देखने वालों ने यहां कोई बाघ भी देखा है। इस बंगले को घूमते समय मुझे आज ही देखे ताडोबा टाइगर सफारी पार्क की याद आ रही थी। जैन साहब ने ऑनलाइन बुकिंग करवा दी थी और ड्राइवर सुबह चार बजे ही मुझे लेकर चालीस किलोमीटर दूर ताडोबा के जंगल में ले गया था। जहां सफारी बस में चार घंटे घूमकर आ गया था। अनेक वन्यजीवों के बीच कुत्तों की तरह भौंकने वाला हिरण देखा था -बार्किंग डियर। वहां एक स्थान पर बाघ के पंजे के निशान देखने के बाद थोड़ी दूर जाकर बाघ को पानी पीते हुए भी अच्छे से देखा था।
मैं जैन साहब से मिलकर शाम चंद्रपुर शहर को अकेले घूमता हूं। यहां महानगरपालिका है और यह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर जैसा है पर यहां रौनक कुछ ज्यादा है, ब्रिटिश शासन के दौरान रखे अपने नाम चांद के अनुरूप। बल्कि इनके कारों के शोरूम तो रायपुर से भी अधिक भव्य दिख रहे हैं। ड्राइवर बताता है यहाँ लोगों के पास पैसा अधिक हो गया है साहब। स्टील प्लांट है, यह शहर आसपास उगने वाले कपास, अनाज और कई फ़सलों का वाणिज्यिक केंद्र बन गया है। कोयले की कई खानें तथा शीशे का सामान बनाने के उद्योग शामिल हैं। रेशम के कपड़े और अलंकृत चप्पलें जैसी विलासवस्तुओं के उत्पादन के लिए भी नाम कमा गया है। पास के बल्हारशाह में पेपर मिल है। मैं कुछ चौराहों में उतरकर शहर के चित्र लेता हूं। इन चौराहों पर कुछ किलेनुमा ऐतिहासिक द्वार बने हैं। ये जटपुरा गेट अचलेश्वर गेट कहलाते हैं। अचलेश्वर यहां गोंडवाना शासनकाल की भव्य स्थापत्यकला का एक अच्छा नमूना है। यहां के कर्ताधर्ता बताते हैं कि यह उपेक्षित सा पड़ा था पर अब स्थानीय प्रशासन ने इसकी सुधि ली है। यहां गोंड शासक की समाधि भी है। 12वीं से 18वीं शताब्दी तक चंद्रपुर गोंड वंश की राजधानी था। बाद में नागपुर के मराठा भोंसले ने इसे जीत लिया। भारत के स्वतंत्र होने तक यह ब्रिटिश मध्य प्रांत का हिस्सा था। इस जि़ले के प्राचीन स्थल वैरंगढ, कोसल, भद्रावती और मरकड हैं। चन्द्रपुर पर काफ़ी लंबे समय तक हिन्दू और बौद्ध राजाओं का शासन रहा है। बाद में गोंड राजाओं ने इस पर अधिकार कर लिया था। आज भी यहां की बहुसंख्यक आबादी गोंड है और दूसरे क्रम पर हैं अम्बेडकरवादी पर शहर की रौनकता में कोई कमी नहीं है, अन्यथा दूसरे राज्यों में आरक्षित इलाके बड़े बेतरतीब और अविकसित रह जाते हैं। महाराष्ट्र में जनचेतना उसकी पिछड़ी जातियों में भी खूब है। विदर्भ के नागपुर और चंद्रपुर इसके उदाहरण हैं। कितनी उपमाएं मिली हैं इस शहर को, चाँद, चांदा फिर चंद्रपुर। चंद्रपुर का अर्थ है, चंद्रमा का घर। मैं इस चन्द्रमा के घर से अपने घर की ओर लौट रहा था।