Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

अरुण कमल की कविताएं और बाजारवाद


विवेक शॉ  द्वारा विनोद शॉ
पो.आ.बल्लावपुर, जिला-बर्दमान- 713323
मो. 9331804969

सांस्कृतिक विघटन के युग में उपभोक्तावादी संस्कृति का सर्वत्र जबर्दस्त प्रभाव है। बाजारीकरण की प्रक्रिया तीव्र गति से समाज पर अपना असर फैला रही है। उपभोक्ता संस्कृति के वर्चस्व को बढ़ाने में ऐसे लोगों की भूमिका सबसे अधिक है जो अपने कैरियर को तथा अपने निजी जीवन को ज्यादा महत्व देते हैं। ऐसे लोग हमारे समाज के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। जब तक समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं, तब तक उपभोक्तावाद की जड़ों को तहस-नहस करना संभव नहीं है। अरुण कमल की कविताएं उपभोक्तावाद के खिलाफ चल रही मुहिम को आगे बढऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हंै। उनकी कविताएं समकालीन मानव की आधुनिक सोच को पकड़ती हैं। डॉ. हरि शर्मा अरुण कमल के काव्य संसार के बारे में लिखते हैं- ‘‘अरुण कमल जैसे कवि की कविताओं का विश्लेषण करते हुए विश्लेषक को सतर्क रहकर परिवेशगत यथार्थ की बात करनी होगी। उनकी कविताओं का यथार्थ सामाजिक यथार्थ के समीप होकर भी एक निश्चित दिशा की ओर अग्रसर है। कवि के लिए कविता लिखना महज एक मजबूरी नहीं वरन समाज के सही पथ निर्देशन के लिए वह जरूरी और निश्चित लक्ष्य को लेकर रचना करता है।’’1 अरुण कमल की कविताएं समाज के प्रति प्रतिबद्घ हैं। उनकी कविताएं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाने में सदैव सजग रहती हंै। उनकी कविताओं में आत्मसंघर्ष, और बाह्यसंघर्ष दोनों मौजूद हैं। उनका मानना है- ‘‘जो बाह्यसंघर्ष है उसी का प्रसार है आत्मसंघर्ष, उसी का एक्सटेंशन है आत्मसंघर्ष और अन्तत: आत्मसंघर्ष और बाह्यसंघर्ष ये दोनों मिल जाते हैं और तब जाकर एक श्रेष्ठ कवि की रचना, एक श्रेष्ठ रचना की रचना होती है।’’2
बाह्य के साथ संघर्ष करके ही आत्मसंघर्ष का जन्म होता है। अरुण कमल मानते हैं कि आत्मसंघर्ष बाह्यसंघर्ष के बिना संभव नहीं है। उनकी कविता आज के सामाजिक यथार्थ से संघर्ष करती हुई नजर आती है। उनकी कविताओं में जनसाधारण की आकांक्षा, पीड़ा, समस्या एवं संघर्षक्षमता की छवि देखने को मिलती है। अरुण कमल की कविताओं में उपभोक्तावाद तथा तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ एक तीखा आक्रोश है। परमानंद श्रीवास्तव ने लिखा है-  ‘‘अरुण कमल की कविता जीवन की जड़ों को पुष्ट करती कविता है जिसकी शक्ति का स्रोत कविता में ही नहीं, कविता के बाहर यथार्थ में भी है। वह दुनिया को पहले से अधिक सुंदर और अधिक अर्थमय बनाने वाली कविता है और जरूरत के अनुसार दुनिया को बदलने वाली कविता है।’’3 अरुण कमल जीवन में घट रहे परिवर्तन को अपनी कविता में उतारने का प्रयास करते हैं। मौजूदा हालात को बेहतर बनाने की कोशिश में लगे हैं। आज उपभोक्तावाद की तेज दौड़ में मानव बहुत सारी मूल्यवान वस्तुओं से दूर होता जा रहा है। चारों तरफ संचार साधनों की धूम है। ऐसे में लोगों का भावनात्मक रिश्तों से विश्वास उठता जा रहा है। भावनाओं का संचार होना बंद हो गया है। सांस्कृतिक और मानवीय मूल्य खत्म हो रहे हैं। लोग बाजार के छलावे में जी रहे हैं और उन्हें लगता है कि  बाजार उन्हें जो दिशा निर्देश कर रहा है वह बिल्कुल सही है। इसके परिणामस्वरूप मानव अपने ही परिवार से कटता जा रहा है। एकांकीपन उसके जीवन की नियति बनती जा रही है। व्यक्ति घर की खोज के लिए भटक रहा है-
दुनिया में इतना दु:ख है इतना ज्वर
सुख के लिए चाहिए बस दो रोटी और एक घर
और वही दिन-ब-दिन मुश्किल पड़ रहा है।4
घर ही वह स्थान है जहां सुख और शांति की प्राप्ति हो सकती है। परंतु आज व्यक्ति उसका ही त्याग कर रहा है। सुखी होने के वास्ते वह जानता है परंतु जानबूझकर अपने रास्तों को कठिन बनाकर मुश्किल में जी रहा है।  बाजार ने लोगों में आगे बढऩे की जिस प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया है उससे संबंधों का विघटन हो रहा है। कवि के लिए यह महत्वपूर्ण बात है कि वह आम आदमी की स्थिति को भली-भांति समझने की क्षमता रखे। अरुण कमल अपनी कविता में एक साधारण स्कूल मास्टर की दशा का वर्णन  बहुत गहराई से करते हैं। अपने भविष्य को लेकर चिंतित शिक्षक दिन-रात मेहनत कर धन अर्जन में लगा है। वह धन कमाने में इतना तल्लीन हो जाता है कि अपने बच्चे की पढ़ाई की उपेक्षा कर बैठता है। शिक्षक की संतान ही अगर ठीक से नहीं पढ़े तो समाज के दूसरे वर्ग से क्या अपेक्षा की जाए? अपनी रोजी -रोटी कमाने में व्यस्त शिक्षक इस बात पर ध्यान नहीं रख पाता कि उसका बच्चा क्या पढ़ रहा है और कैसे पढ़ रहा है? अचानक जब वह अपने बच्चे को पढ़ाने बैठता है तो उसका हाथ उस पर उठ जाता है-
आज जब पढ़ते-पढ़ाते मैंने तुझे
मारा मेरे बच्चे
तब क्यों भर गई मेरी आंखें
नम क्यों हो गए मेरे नाखून तक।5
स्कूल मास्टर जब बच्चे को पढ़ाने बैठता है तब वह उसे उसकी कमजोरी के लिए मारता है। उस वक्त शिक्षक को अपनी कमजोरी नर आती है। बाजार लोगों को असंतुष्टि का जीवन जीने को बाध्य करता है। मास्टर को इस असंतुष्टि के जीवन जीने के दौरान यह अहसास होता है कि उसने अपने ही घर के उज्जवल भविष्य को अंधेरे में ढकेल दिया।  बाजार लोगों को सबकुछ पाने की अंधी दौड़ में दौड़ाता जा रहा है। वह लोगों को संतुष्ट होने से रोकता है।  बाजारआधुनिक मानव को यह संदेश देता है कि संतुष्ट होने से जीवन में ठहराव आ जाएगा और हमारी प्रगति रुक जाएगी। इसलिए ठहराव को तोडऩे के लिए गतिशील होना होगा। स्कूल मास्टर भी गतिशील होता है और उसकी असंतुष्टि ही उसके जीवन की सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।
समकालीन परिदृश्य में जहां  बाजारवाद का नारा चारों तरफ गूंज रहा है। मानव उत्तर आधुनिक हो गया है। वह स्वकेन्द्रित एवं आत्मघाती बन चुका है। मनुष्य एक अंधी दौड़ में है जहां न तो उसे अतीत में झांकने की फुर्सत है और न भविष्य के विषय में सोचने एवं निर्णय लेने की चिंता है। मानव सिर्फ भोगवादी बनकर भोग रहा है। अरुण कमल कहते हैं कि ऐसी स्थिति में जहां मनुष्य  भोग-विलास की दुनिया में फंसा हुआ है, यदि वह मुसीबत में फंसे अपने भाई को याद रता है तो आश्चर्य की बात है-
कहां होगा मेरा भाई इस वक्त
उसका शरीर गुंध रहा होगा हवा में
वह किसी डोंगी की तरह काट रहा होगा
हवा के भंवर।6
उपभोक्तावाद निजी स्वार्थ की भावना को बढ़ावा देता है। उपभोक्तावाद के केन्द्र में मनुष्यता के लिए कोई स्थान नहीं है। उपभोक्तावाद मनुष्य के साथ समाज का संबंध विच्छिन्न करना चाहता है। ऐसे में यदि आत्मकेन्द्रित व्यक्ति अपने भाई की खबर रखता है तो वह मनुष्यता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
अरुण कमल आज के क्रूर अमानवीय परिदृश्य में विलीन होते जा रहे मनुष्यता की खोज में प्रयासरत है। आज के समय की सच्चाई का वर्णन करते हुए कहते हैं-
इस नये बसते इलाकों में
जहां रोज बन रहे हैं नए-नए मकान
मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूं
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूं ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूं ढहा हुआ घर...
यहां रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहां स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे बसंत का गया पतझड़ को लौटा हूं।7
आज के बदलते परिवेश का सजीव चित्र कवि ने खींचा है। आज हर पल कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहा है। इतना कुछ घट रहा है, इतना कुछ  बदल रहा है कि व्यक्ति की स्मृति कमजोर होती जा रही है। नए के निर्माण से पुराने का अस्तित्व मिटता जा रहा है। कवि उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में मूल्यविहीन समाज में मनुष्यता के नए इलाकों की खोज में निकलता है।
आज मनुष्यता की गिनती विरोधी चीजों में होती है। ऐसे में कवि मनुष्यता एवं मूल्यों को बचाने के लिए साधारण जन का सचेत करता है-
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा आकाश
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर8
बाजार ने समाज के विनाश का तांडव शुरू कर दिया है। अत: इस कम समय में ही मनुष्यता और नैतिक मूल्यों को बचाना होगा।
आधुनिक युग में जो छली है वही बली है। दूसरों को ठगने वाले का बाल भी बांका नहीं होता परंतु ईमानदारी के रास्ते पर चलने वाले को सजा भुगतनी पड़ती है-
केवल शब्दों का फाहा लिये
जाना चाहता हूं उसकी तरफ से
जो सबसे कम•ाोर है
जो अपने कौर के लिए भी हाथ उठा नहीं सकता
जो न शासक बनना चाहता है न शासित
ø ø ø ø ø
बिना कुछ बोले
मैं लौट आता हूं उसके घर
जहां फांसी के हुक्म का इंतजार कर रही है।
एक बहुत बूढ़ी मां।9
--
कवि उस कमजोर वर्ग को लेकर चिंतित है जो इस बाजारवाद के युग में कदम-कदम पर लूटा जा रहा है। इस ‘लूटो और मजा करो’ की संस्कृति में जो खुद को ‘फिट’ नहीं कर पाता उसका हाल बुरा होता है। यह अवस्था उसे गुनाहकार करार देती है।
अरुण कमल इस अवस्था के प्रति अपनी कविताओं में आक्रोश प्रकट करते हैं। आज बाजारवाद मनुष्य की जरूरत को पैदा करने का कार्य करता है। मनुष्य बाजार में उपलब्ध गैर-जरूरी चीजो को अपने रोजमर्रा के जीवन की जरूरतों में शामिल कर लेता है। बाजार लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा बनाने के लिए कर्ज भले उपलब्ध कराता है। मनुष्य अपनी जरूरतों की पूर्ति हेतु कर्ज में डूबता चला जाता है। ऊंचे जीवन स्तर के निर्वाह की इच्छा लिए मनुष्य उधार का जीवन जीने लगा है। इस संदर्भ में अरुण कमल ‘धार’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने में
यह कमीज जो ढाल बनी है
बारिश सर्दी लू में
सब उधार का, मांगा चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक
सब कर्जे का जा
यह शरीर भी उनका बंधक10
अरुण कमल ने अपनी कविता में यथार्थ जीवन का निचोड़ प्रस्तुत किया है। बाजार सिर्फ लोगों का शोषण करना जानता है। वह ऐसी भाषा बोलता है जिसके माध्यम से वह शोषक वर्ग पर दबाव डाल सके। आज साधारणजन बाजार के दबाव में जी रहे हैं। मध्यवर्ग दिखावेपन का शिकार होकर अपना सब कुछ बाजार के इशारों पर लुटाया जा रहा है। दिखावेपन ने उसे उधार का जीवन जीने के लिए विवश कर दिया है। उसका सब कुछ कर्ज में डूबा हुआ है।
कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
0 0 0 0 0
अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार।11
प्रेमचंद ने अपने उपन्यास ‘गोदान’ में कृषक जीवन की विवशता का चित्र खींचा था। आज के आधुनिक युग में काफी बदलाव आया है। पर लोगों की विवशता में कोई बदलाव नहीं आया है। मनुष्य का जीवन तब भी कर्ज में डूबा था और आज भी कर्ज में डूबा है। फर्क इतना है कि कर्ज में डूबा आदमी कल दु:खी था और आज का मानव इस स्थिति में बाजार की चीजों का उपभोग करने से बा नहीं आता। उधार का जीवन जनसाधारण को फिर से गुलामी की स्थिति में लिए जा रहा है।बाजार आराम का जीवन या उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखा कर तरह-तरह के लोन (ऋण) उपलब्ध कराता है। व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसी विवशता का जीवन जी रहा है।
कवि आज के बदलते परिदृश्य पर भी विचार व्यक्त करता है। परिवर्तन विकास का एक सूचक है। कवि यह मानते हैं कि परिवर्तन की गति उचित और दिशा सही होनी चाहिए-
मुझसे बाहर
मुझसे अनजान
जारी है जीवन की यात्रा अनवरत
बदल रहा है संसार।12
परिवर्तन व्यक्ति को शोषण, अन्याय एवं विभिन्न समस्याओं से लडऩे की ताकत प्रदान करता है। पुराने विचारों एवं रुढिय़ों को तोड़ता, परिवर्तन नए एवं सार्थक जीवन का निर्माण करता है। कवि आज की वर्तमान स्थिति के प्रति सचेत करता है, जहां बाजारवाद के युग में परिवर्तन के नाम पर नए खोखले विचारों को प्रश्रय दिया जा रहा है। तरक्की के नाम पर मानवीय मूल्यों एवं मानवीय विकास की तिलांजलि दी जा रही है। कवि इसके विरोध में है। परिवर्तन जरूरी है पर परिवर्तन यदि मानव को पशुता की ओर ले जाए तो वह व्यर्थ है।
संदर्भ
1. शर्मा डॉ. हरि, हिन्दी कविता का वर्तमान परिदृश्य, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2007, पृष्ठ-35
2. कमल अरुण, कविता और समय, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ-182
3. उद्धृत, कविता का तिर्यक, लीलाधर मंडलोई, मेधा बुक्स, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2003, पृष्ठ-69
4. कमल अरुण, पुतली में संसार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2004, पृष्ठ-58
5. कमल अरुण, केवल अपनी धार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, तीसरा संस्करण-1999, पृष्ठ-36
6. वही, पृष्ठ-42
7. कमल अरुण, नये इलाके में, वाणी प्रकाशन, नई दिली, द्वितीय संस्करण- 1999 पृष्ठ-13
8. वही, पृष्ठ-23
9. वही, पृष्ठ-23
10. कमल अरुण, केवल अपनी धार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, तीसरा संस्करण-1999, पृष्ठ-88
11. वही, पृष्ठ-88
12. वही, पृष्ठ-75