Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

फिल्मी दुनिया में प्रेमचंद का योगदान

 

कृष्ण वीर सिंह सिकरवार
आवास क्रमांक एच-3,
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विवि,
एयरपोर्ट रोड, भोपाल-462033 (मप्र)
मो. 09826583363  
एक ऐसा रचनाकार जिसकी तमाम जिंदगी पारिवारिक उलझनें, साहित्यिक लेखन, पेचिश की पुरानी बीमारी, काम के सिलसिले में घर से इधर-उधर भागना, आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये हंस मासिक पत्रिका एवं जागरण साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन करना। अमृतराय के अनुसार .......खानाबदोशों की जिन्दगी, आज यहाँ तो कल वहाँ। (1) जब वे सात साल के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। जब पन्द्रह साल के हुए तब उनकी शादी कर दी गई और सोलह साल होते-होते उनके पिता का भी देहांत हो गया। जब लडक़ों की उम्र खेलने-खाने की होती है तव उनको घर सँभालने की चिंता करनी पड़ी। जी हाँ हम भारतवर्ष के एक ऐसे कथाकार की बात कर रहें हैं जिनका आम पाठकों के लिये लिखा गया साहित्य हमेशा खास रहा।
हंस एवं जागरण पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रेमचंद ने अपनी आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक स्थिति को सुधारने के लिये शुरू किया था, परन्तु इन दोनों पत्रों से फायदा होने के बजाय लगातार नुकसान ही हो रहा था। ऐसी विषम परिस्थिति में बम्बई की अजंता सिनेटोन कंपनी लिमिटेड के डायरेक्टर श्री मोहन भवनानी ने आठ हजार रूपये वार्षिक के अनुबंध पर फिल्मों के लिए कहानी लिखने हेतु प्रेमचंद को आमंत्रित किया; तो उनकी खुशी का ठिकाना ही नही रहा। उन्हें और क्या चाहिये था, यह प्रस्ताव सुनकर तो उनकी लॉटरी ही निकल गई। अत: प्रेमचंद ने अपने आर्थिक तनाव को कम करने के लिये यह बहुमूल्य प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
इस प्रस्ताव की सूचना एवं राय जानने के लिए अपने अभिन्न मित्र जैनेन्द्र कुमार को 30 अप्रैल, 1934 के लिखे पत्र में सूचना देते हंै कि बम्बई की एक फिल्म कंपनी मुझे बुला रही है। वेतन की बात नहीं, कांट्रेक्ट की बात है। 8000 रू साल। मैं उस अवस्था में पहुंच गया हूँ, जब मेरे लिए हां के सिवा कोई उपाय नहीं रह गया कि या तो वहां चला जाऊं या अपने उपन्यास को बाजार में बेचूँ। मैं इस विषय में तुम्हारी राय जरूरी समझता हूं। कंपनी वाले हाजरी की कोई कैद नहीं रखते। मैं जो चाहे लिखूँ, उनके लिए चार-पाँच सीनरियाँ तैयार कर दूँ। मैं सोचता हूँ, क्यों न एक साल के लिए चला जाऊँ। वहाँ साल भर रहने के बाद कुछ ऐसा कांट्रेक्ट कर लूंगा कि मैं यहाँ बैठे-बैठे तीन-चार कहानियाँ लिख दिया करूँ और चार-पाँच हजार रूपये मिल जाया करे। उससे जागरण और हंस दोनों मजे से चलेंगे और पैसों का संकट कट जाएगा।’’ (2)
इस घटनाक्रम का सम्पूर्ण विवरण शिवरानी देवी अपनी पुस्तक प्रेमचंद: घर में, में इस प्रकार व्यक्त करती हैं- बम्बई से फिल्म कंपनी वालों ने बुलाया......मुझसे बोले-चलो बम्बई तुमको सैर करा लाऊँ। मैंने कहा-’कैसी सैर?, आप बोले- फिल्म कंपनी वाले मुझे बुला रहे हैं। मैं बोली-फिल्म कंपनी वाले बुला रहे है, यह ठीक है। पर वहां की आबहवा अच्छी नहीं है, फिर आपका हाजमा कमजोर, वहाँ के जलवायु में आप ठीक रह न सकेंगे......मैं तो आपका वहां जाना अच्छा नहीं समझती। आप बोले-तुम्हीं सोचो, बिना जाये काम भी तो नहीं चल सकता। यहाँ जो कुछ आमदनी होती है, अपने खर्च के लिए हो जाती है। अब यह हंस और जागरण कैसे चले? यह भी तो तुम्हारे साथ दोनों बंधे हुए हैं। मैं बोली-तो फिर इनके लिए भी बम्बई जाना मैं ठीक नहीं समझतीं। आप बोले-अब जो इन हाथियों को गले से बांधा है तो क्या उनको चारा नहीं दोगी? आखिर इनको भी तो जिंदा रखना है.......अब जब इनको बांध लिया है, तो इनको चलाना ही होगा....9  हजार रूपये साल वह देने का वादा करते हैं, और इसके साथ यह भी है कि बम्बई में एक-डेढ़ साल रहने के बाद वह मुझे 9-10 हजार घर बैठे देंगे। मैं घर पर बैठ करके उनके लिये यहां से कहानियाँ भेजता रहूँगा। बतलाओ साल-डेढ़ साल बम्बई में रहना क्या बुरा है? हमेशा के लिए घर बैठे काम मिल जाए तो क्या बुरा है?’’ (3) बात तो शिवरानी देवी सच ही कह रही थी, परन्तु प्रेमचंद को दूसरा कोई उपाय भी इस समय नहीं सूझ रहा था।
अंत में प्रेमचंद फिल्मी नगरी बम्बई के लिए रवाना हो ही जाते हैं, और बम्बई पहुँचते ही सबसे पहले अपनी पत्नी को पहुँचने व ठहरने की व्यवस्था के संबंध में सूचना देते हुए कहते हैं -मैं 31 (मई) को यहाँ पहुँच गया था। तबसे एक मित्र का मेहमान हूँ। कई मकान देखे। पचास रूपये के मकान में तीन कमरे मिलते हैं, पिछत्तर में पाँच कमरे। अभी कोई मकान ठीक नहीं किया, लेकिन आज कल में कुछ-न-कुछ इन्तजाम कर लेना पड़ेगा। अभी मैं नहीं कह सकता कि मैं यहाँ रह भी सकूँगा या नहीं। जगह बहुत अच्छी है, साफ-सुथरी सडक़ें, हवादार मकान लेकिन जी नहीं लगता। (4)
प्रेमचंद बम्बई आ तो जाते है, लेकिन उनका यहाँ की आबोहवा में मन नहीं लगता; तो अपने दिल की बात 4 जून, 1934 के पत्र में फिर शिवरानी देवी को कहते हंै कि- मैं तुमसे विदा होकर बम्बई खैरियत से पहुंँच गया हूँ। यहाँ स्टूडियो का काम भी देखना शुरू कर दिया है......मैंंने भी अभी मकान नहीं लिया है। अभी मकान ले लूँगा तो वह सूना घर मुझे और खाने को दौड़ेगा। इस ख्याल से मैं मकान के लिए सोचता ही नही हूँ। मकान तो उसी समय लूँगा, जब तुम्हारा पत्र आने के लिए आ जाएगा, और मकान ही ले करके सीधा तुम्हारे पास लेने को आऊँगा। (5)
15 जून, 1934 को अपने अभिन्न मित्र जैनेन्द्र कुमार को बम्बई आने की सूचना देते हुए कहते हंै-एक को आ गया, मकान ले लिया, दादर में होटल में खाता हूं और पड़ा हूँ। यहाँ दुनिया दूसरी है, यहाँ की कसौटी दूसरी है। अभी तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ। (6)
आखिर में प्रेमचंद ने बम्बई में एक मकान रहने के लिए ले लिया एवं मकान का किराया, नौकर का किराया आदि के संबंध में अपनी पत्नी को 24 जून, 1934 के लिखे पत्र में सूचना देते हैं-आज मंैने मकान भी ले लिया है, शायद मैं कल अपने मकान में आ जाऊंगा। पचास रूपये महीने का मकान है, एक नौकर बारह रूपये और खुराक पर रखा है, वह सब काम कर लेता है। (7) हालांकि प्रेमचंद का मन अपनी पत्नी व बच्चों के बगैर बम्बई में नहीं लग रहा था। उन्होंने इसका मार्मिक वर्णन अपनी पत्नी को लिखे कई पत्रों में किया है।
बम्बई के हालचाल के संदर्भ में प्रेमचंद अपने कई मित्रों को जानकारी देते हैं। 3 अगस्त, 1934 को जैनेन्द्र कुमार को कहते हैं कि-सिनेमा के लिए कहानियाँ लिखना मुश्किल हो रहा है, लेकिन जरूरत ऐसी कहानियों की है जो खेली भी जा सके, जो एक्टरों के लिए सुलभ हो । कितनी ही अच्छी कहानी हो अगर योग्य पात्र न मिले तो वह कौन खेलेगा।(8) इन्द्रनाथ मदान को 26 दिसंबर, 1934 के पत्र में कहते हंै कि-सिनेमा में साहित्यिक व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया कि इसमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने का कुछ मौका था, लेकिन अब मैं देखता हूँ कि मैं धोखे में था और मैं वापिस अपने साहित्य को लौटा जा रहा हूं।’’ (9)
जयशंकर प्रसाद को फिल्मी दुनिया से हुई मायूसी को 01 अक्टूबर, 1934 के पत्र में इस तरह व्यक्त करते हैं कि-मंै जबसे यहाँ आया हूं, मेरी केवल एक तस्वीर फिल्म हुई है। वह अब तैयार हो गयी है और शायद 15 अक्टूबर तक दिखाई जाय। तब दूसरी तस्वीर शुरू होगी। यहाँ की फिल्म दुनिया देखकर चित प्रसन्न नहीं हुआ। सब रूपये कमाने की धुन में है, चाहे तस्वीर कितनी ही गंदी और भ्रष्ट हो........किसी का कोई आदर्श, कोई सिद्धान्त नहींहै। मैं तो किसी तरह यह साल पूरा करके भाग आऊँगा।’’ (10) स्पष्ट है कि प्रेमचंद बम्बई तो आ जाते हंै लेकिन यहां की परिस्थितियाँ उनके अनुकूल न होने की वजह से उनका मन नहीं लगता। चूँकि वह अनुबंध कर चुके थे इसलिए वह चाहते हुए भी यहां से भाग नहीं सकते थे।
प्रेमचंद के बम्बई पहुँचते ही फिल्म पर काम शुरू हो जाता है; इसका सम्पूर्ण विवरण प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय ने प्रेमचंद के ऊपर लिखी एकमात्र प्रामाणिक जीवनी कलम का सिपाही में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है-मजदूर बनना शुरू हो गया था.......बहरहाल ढाँचा तो यहां पहले से तैयार ही था, बस गोश्त चढ़ाना बाकी था और उसमें मुंशीजी ने कोताही नहीं की। डायलाग में जितनी डाल सकते थे, डाली, जितनी तेजी ला सकते थे, लाये। भवनानी ने भी, जिनकी फिल्मी जिंदगी शुरू ही हो रही थी, खूब जी तोडक़र काम किया, एक मिल मालिक दोस्त की कपड़ा मिल में तस्वीर शूट की गयी, बगैर पूरी बात उस दोस्त पर खोले.......लिहाजा मिल के हजारों मजदूरों समेत वह सीन चित्रपट पर बहुत ही सजीव उतरे, और गो कहानी काफी लचर सी थी, डायलाग ने उसमें काफी जान फूंक दी थी। और तस्वीर जब सेंसर बोर्ड के सामने पहुंची तो बम्बई के बड़े पूँजीपति और मिल ओनर्स असोसिएशन के सभापति सर जीजीभाई ने, जो बोर्ड के भी सदस्य थे और बहुत प्रभावशाली सदस्य थे, डटकर उसका विरोध किया और तस्वीर सेंसर बोर्ड से पास नहीं हो सकी। तब भवनानी और अजंता सिनेटोन के दूसरे लोगों ने बोर्ड के सभापति और बम्बई के पुलिस कमिश्नर किन्हीं मिस्टर विल्सन से अपील की । मिस्टर विल्सन ने कुछ दृश्य काट देने के लिये कहा। कंपनी ने उनकी सलाह पर अमल किया लेकिन तब भी बम्बई के सेंसर बोर्ड ने, जिसमेें बहुत से बड़े-बड़े पूँजीपति भरे थे, फिल्म को पास नहीं किया। लेकिन पंजाब के सेंसर बोर्ड ने फिल्म को पास कर दिया और लाहौर के इम्पीरियल सिनेमा में राम-राम करके उसके दिखाये जाने की बारी आयी।
बम्बई के सेंसर बोर्ड ने फिल्म को पास नहींकिया, यह बात फैल ही चुकी थी। पहले ही रोज, भवनानी साहब का कहना है, साठ हजार मजदूरों की भीड़ सिनेमा के फाटक पर जमा हुई-और सात रोज तक कुछ इसी तरह का हाल रहा, फाटक पर भीड़ की रोकथाम के लिए पुलिस और मिलिटरी का बन्दोबस्त करना पड़ा। आखिरकार पंजाब सरकार ने भी घबराकर उस पर रोक लगा दी।
लाहौर के बाद वह फिल्म दिल्ली में रिलीज हुई। वहाँ भी अनिष्टकारी ग्रहों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। कोई मजदूर फिल्म के एक सीन की ही तरह, किसी मिल मालिक की मोटर के आगे लेट गया और एक अच्छा खासा हंगामा खड़ा हो गया। नतीजा, दिल्ली की प्रान्तीय सरकार ने भी उस पर रोक लगा दी।
यू.पी., सी.पी. में यहाँ-तहाँ यह तस्वीर दिखायी गयी पर कुछ अर्से के बाद जब भारत सरकार ने उस पर रोक लगा दी तो बात खत्म हो गयी। बाद को सन् 37 में एक बार फिर उसके मामले को उभारा गया और किसी प्रकार उसमें और भी कुछ हिंसात्मक दृश्य काट-कूट करके उसके ऊपर लगी हुई रोक हटाने का उपाय किया गया-लेकिन तब तक लोहा ठंडा पड़ चुका था और लोग दिलचस्पी खो चुके थे।’’ (11)
फिल्म में प्रेमचंद ने थोड़ा अभिनय भी किया था, लेकिन न के बराबर। अमृतराय कहते हैं.........भवनानी ने बहुत कह सुनकर मुंशीजी को इसके लिए राजी कर लिया कि वह खुद एक-दो मिनिट के लिए पर्दे पर आये। मुंशीजी को न जाने कैसी लगती है यह बात, लेकिन भवनानी का हठ देखकर वह राजी हो जाते हंै, शर्त एक ही है कि वह अपने रोज के कपड़ों में ही रहेंगे और किसी तरह का कोई मेकअप नहीं कराएंगे। भवनानी इसको भी मंजूर कर लेते हंै और तब मुंशीजी अपनी उटंग धोती और कुर्ते में, जरा सी देर के लिए, मिल वालों और मजदूरों के झगड़े में सरपंच बनकर रजतपट पर आते हैं।’’ (12) दो-तीन मिनट की छोटी सी भूमिका में प्रेमचंद को अपने दैनंदिन जीवन जैसा व्यवहार करना था, फिर भी उनका अभिनय बहुत अच्छा रहा। अन्य अभिनेता इतने बड़े लेखक के साथ काम करके वैसे ही बड़े खुश थे। जब उन्होंने उन्हें अपने बीच एक अभिनेता के रूप में पाया तो और भी गर्व का अनुभव करने लगे।
मजदूर फिल्म की कहानी संक्षेप में यह है कि एक बहुत ही सज्जन और दयालु मिल-मालिक था, जिसकी मृत्यु होने पर उसकी बेटी पद्मा और बेटा विनोद मिलकर मिल को चलाने लगते हंै। दोनों के चरित्र और स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर है। पद्मा अपने पिता के समान बड़ी दयालु, उदार और मजदूरों के हितों का ध्यान रखने वाली है, लेकिन विनोद आवारा, शराबी और अत्याचारी है। वह मजदूरों की उपेक्षा ही नहीं करता, उनके साथ निर्मम व्यवहार भी करता है, जिसके कारण वे हड़ताल कर देते हंै। पद्मा अपने एक मित्र कैलाश के साथ उन मजदूरों के आंदोलन का नेतृत्व करती है। यह देखकर विनोद को गुस्सा आता है और वह पद्मा की पिटाई करता है। मामला पुलिस के पास पहुंचता है और विनोद को जेल की सजा हो जाती है।
मिल को फिर से चालू करने और मजदूरों को काम पर वापस लाने के लिये आखिर गाँव की पंचायत के सरपंच को बुलाया जाता है और वह आकर दोनों पक्षों में समझौता कराता है। पद्मा के अनुरोध पर मजदूर फिर से काम पर आ जाते हैं और वह अपने पिता के समान मिल को फिर से बड़ी कुशलता से चलाने लगती है। इसके बाद उसकी अपने मित्र कैलाश से शादी हो जाती है। इस फिल्म में विनोद की भूमिका एस.बी. नायमपल्ली ने अदा की थी और कैलाश की भूमिका जयराज ने। फिल्म के कुछ अन्य प्रमुख अभिनेता थे-ताराबाई (कैलाश की माँ), खलील आफताब (मिल का मजदूर), अमीना अन्नबी (कामकाजी औरत) और एस.एल. पुरी (मिल का फोरमैन) ।
इस फिल्म में नायिका की भूमिका जिस अभिनेत्री ने की थी, उसका नाम था-बिब्बो। उसका असली नाम इशरत सुल्ताना था। अभिनेत्री के रूप में बिब्बो ने एक आदर्शवादी मिल मालिक की भूमिका अदा की थी और उसका नाम था पद्मा। इस फिल्म में कपड़ा मिलों के शोषित मजदूरों के जीवन का यथार्थ चित्रण किया गया था, लेकिन व्यापक रूप से इस पर प्रेमचंद के आदर्शवाद की पूरी छाप थी। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि अगर मालिक उदार, दयालु और मजदूरों का चिंतक हो तो न केवल मजदूर खुश रहते हैं, बल्कि वे मेहनत भी ज्यादा करते हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बी.मित्रा ने की थी और उसके संगीत निर्देशक थे बी.एस. हूगन। फिल्म की कहानी को पूरी तरह से प्रेमचंद की कहानी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने केवल अजंता सिनेटोन द्वारा सुझाये कथाबिंदुओं को ही अपनी पटकथा में ढाला था और इसके संवाद भी लिखे थे।
मजदूर फिल्म मजदूरों की समस्याओं को उजागर करने वाली सामाजिक फिल्म थी, लेकिन आज यह सिर्फ  इतिहास की चीज बनकर रह गई है। न उसकी पटकथा और प्रिंट मिलते हैं और न ही कोई कतरन, लेकिन प्राप्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि उस जमाने में उसकी काफी चर्चा हुई थी और एशिया नामक प्रसिद्ध पत्रिका तक में उसका बहुत अच्छा रिव्यू छपा था। इस फिल्म की प्रसिद्धि के कई कारण थे, जैसे एक तो यह प्रेमचंद की कहानी पर बनी थी जिसमें उन्होंने अभिनय भी किया था। दूसरे इसमें मिल मालिकों का अत्याचार दिखाया गया था।
फिल्म के विषय में 28 नवम्बर, 1934 के पत्र में प्रेमचंद जैनेन्द्र कुमार को लिखते हुए कहते हैं कि फिल्मी हाल क्या लिखूँ। मिल यहाँ पास न हुआ। लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है। मैं जिन इरादों से आया था, उसमें एक भी पूरे होते नजर नहींआते। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियां बनाते आये हंै उसकी लीक से जौ भर नहीं हट सकते। वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। (13)
मजदूर फिल्म के शीर्षक को विभिन्न जगहों पर अलग-अलग नामों से उल्लेखित किया गया है। कहीं पर फिल्म का शीर्षक मिल तो कहीं मजदूर देखने को मिलता है। फिल्म के शीर्षक को हुए मतभेद को लेकर सव्यसाची भट्टाचार्य खुलासा करते हैंकि जिस फिल्म की पटकथा उन्होंने लिखी उसका नाम अलग-अलग जगहों पर मिल या मजदूर के बतौर उल्लेखित है। फिल्म का मजदूर नाम प्रेमचंद के बेटे अमृतराय ने दिया है; लेकिन बॉम्बे क्रॉनिकल में फिल्म का नाम मिल बताया गया है। इसी नाम से उसे जाना जाता है। (14)
सव्यसाची भट्टाचार्य प्रेमचंद की निर्माणाधीन फिल्मों की जानकारी देते हुए कहते हैं- अजंता सिनेटोन कंपनी ने दिसम्बर 1934 को घोषित किया कि द मिल फिल्म ने उत्तर भारत में काफी मुनाफा बटोरा है; और मुंशी प्रेमचंद अजंता की ओर से 1935 में बनने वाली फिल्मों की कहानी लिखने में व्यस्त हैं। ये आगामी फिल्में कौन सी थीं? निर्माणाधीन तीन फिल्मों में से एक सांगीतिक फिल्म दर्दे दिल थी जिसकी पृष्ठभूमि में समरकन्द था; दूसरी फिल्म मेसोपोटामिया पर कोई प्रहसन थी जिसका नाम आजादी के दीवाने था; तीसरी प्यार की मार नामक भावना प्रधान फिल्म थी। इन फिल्मों में, फिल्मी पत्रकारों के मुताबिक, अजंता सिनेटोन की हसीना (नायिका) अमीना और दो अन्य नर्तकियाँ थीं। इनमें से एक तो लोलिता ही थी जो नौटीगर्ल में परदे पर आई थी। (15)
फिल्मी दुनिया की परेशानियों से उकताकर अपने दर्द को उपेन्द्रनाथ अश्क को 2 जनवरी, 1935 को लिखे पत्र में इस प्रकार व्यक्त करते हंै-.......रही सिनेमा की बात! भई, मैं तो इस जिंदगी से उकता गया हूँ । यहाँ डाइरेक्टरों की जेहनियत ही अनोखी है। अपने सिवा किसी की सुनते ही नहीं। बाजारे-हुस्न (16) की मिट्टी पलीद कर दी। हाँ मिल कुछ अच्छी रही है, लेकिन सच पूछो तो भाई, मुझे अपना वह गोशा-ए-आफियत (17) ही ज्यादा पसंद है। जल्द ही बम्बई से नजात हासिल कर लूंगा और बनारस चला जाऊँगा। (18) 25 जनवरी, 1935 को शिवपूजन सहाय को कहते हैं-मुझे तो यह लाइन पसंद नहीं आई। तीन-चार महीने किसी तरह और कट जाएँ तो घर की राह लूँ। (19)
अपनी दिनचर्या का वर्णन जैनेन्द्र कुमार को 7 फरवरी, 1935 को लिखे पत्र में देते हुए कहते हैं कि-सात बजे उठता हूँ। साढ़े आठ पर घूमकर आता हूं। नाश्ता करता हूँ। नौ बजे अखबार पढ़ता हूँ। कभी घन्टा भर कभी इससे ज्यादा समय लग जाता है। कभी कोई मिलने आ जाता है। ग्यारह बज जाता है। नहा-खाकर स्टूडियो जाता हूँ। कुछ काम हुआ तो क्या, नहीं उपन्यास पढ़ा पाँच बजे लौटता हूँ। हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं को उलटता-पलटता हूँ। चि_ी-पत्र लिखता हूँ, खाता हूँ, और सो जाता हूँ। यही दिनचर्या है। (20)
इसी दिन के एक और पत्र में जैनेन्द्र कुमार को फिल्मी व्यथा के संदर्भ में कहते हैं कि-मजदूर तुम्हें पसंद न आया। यह मैं जानता था। मैं इसे अपना कह भी सकता हूं, नहीं भी कह सकता। इसके बाद एक रोमांस जा रहा है। वह भी मेरा नहीं है। मैं उसमें बहुत थोड़ा सा हूँ। मजदूर में भी मैं इतना थोड़ा सा आया हूँ कि नहीं के बराबर। फिल्म में डाइरेक्टर सब कुछ है। लेखक कलम का बादशाह क्यों न हो, यहाँ डाइरेक्टर की अमलदारी है। (21)
14 फरवरी, 1935 को हसामुद्दीन गोरी, हैदराबाद को कहते हैं कि मैं तो जिंदगी में एक नया तजुर्बा हासिल करने के लिए यहाँ साल भर के लिए आया था। मई में वह मुद्दत खत्म हो जायेगी और मैं अपने वतन बनारस लौट जाऊंगा और हसबे-साबिक्र (पहले की तरह) अदवी मशागिल (साहित्यिक कार्यों) में बकिया जिंदगी सर्फ  कर दूँगा। बम्बई की आबोहवा और फिजा दोनों ही मेरे मुआफिक नहीं। (22)
आखिर में थक-हाककर प्रेमचंद अपने वतन वापिस आने के लिए बम्बई छोडऩे का मन बना लेते हंै व इसकी सूचना अपने मित्रों को देते हंै। 19 मार्च, 1935 को हसामुद्दीन गोरी, हैदराबाद को कहते हैं-मैं पचीस तारीख को बनारस अपने वतन जा रहा हूँ। अजंता कंपनी अपना कारोबार बंद कर रही है। मेरा कान्ट्रैक्ट तो साल भर का था और अभी तीन महीने बाकी है। लेकिन मैं उनकी जेरबारी में इजाफा नहीं करना चाहता। महज इसलिए रूका हुआ हूँ कि फरवरी और मार्च की रकम वसूल हो जाये और जाकर फिर अपने लिटरेरी काम में मसरूफ  हो जाऊँ। (23)
बम्बई को अलविदा कहने के बाद 11 अप्रैल, 1935 को दयानारायण निगम को लिखते हैं-मंैने 4 अप्रैल को बम्बई को खेर-बाद कह दिया और सी.पी. के अजला की सैर करता हुआ 10 को सागर आ गया। यहाँ से निकलकर बनारस चला जाऊँगा। (24) प्रेमचंद ने अजंता सिनेटोन से एक वर्ष का अनुबंध किया था, परन्तु वहाँ की परिस्थितियाँ उनके अनुकूल न होने के कारण अपना अनुबंध बीच में ही छोडक़र वापिस बनारस के लिए रवाना होना पड़ता है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रेमचंद के बम्बई में रूकने की कालअवधि (31 मई 1934 से लेकर 4 अप्रैल 1935) कुल जमा 10 महीने चार दिन थी।
अंत में 14 मई, 1935 के पत्र में जैनेन्द्र कुमार को कहते हैं-बम्बई से क्या लाया? कुल 6300 रू. मिले। इसमें 1500 रू. लडक़ों ने लिये, 400 रू. लडक़ी ने, 500 रू. प्रेस ने। दस महीने में बम्बई का खर्च बड़ी किफायत से भी 2500 रू. से कम न हो सका। वहां से कुल 1400 रू. लेकर अपना सा मुँह लिये चले आये। (25)
प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ विशेषज्ञ व विद्वान आलोचक डॉ. कमल किशोर गोयनका अपनी पुस्तक प्रेमचंद: चित्रात्मक जीवनी में कहते हैं कि प्रेमचंद के साहित्य की यशुगाथा देश के फिल्म निर्माताओं तक पहुंची और अनेक फिल्म निर्माताओं ने उन्हें पत्र लिखे। महालक्ष्मी सिनेटोन बम्बई के निर्माता नानूभाई वकील ने उनके प्रसिद्ध उपन्यास सेवासदन पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव किया। उन्होंने इसे स्वीकार करते हुए 750 रू. पर सेवासदन पर फिल्म निर्माण करने का अधिकार दे दिया। वे फिल्म के मुहूर्त के अवसर पर बम्बई गये और 5 फरवरी, 1934 को उनकी उपस्थिति में फिल्म का मुहूर्त हुआ। उन्होंने इस अवसर पर भाषण दिया जो फिल्म के आरम्भ में जोड़ दिया।
ऋषभ चरण जैन द्वारा संपादित फिल्मी पत्रिका चित्रपट ने 9 फरवरी, 1934  के अंक में प्रेमचंद की एक सप्ताह की बम्बई यात्रा और सेवासदन फिल्म के मुहूर्त का समाचार प्रकाशित किया। वे जब नौकरी करने के लिये बम्बई गये, तब फिल्म को देखकर अपने बड़े पुत्र श्रीपतराय को 28 जून, 1934 को लिखा, सेवासदन देखी, अच्छी किन्तु संतोषप्रद नहीं। (26) पत्रिका में फिल्म का विज्ञापन इस प्रकार वर्णित था।
बस, अब आने ही वाला है !
सेवा-सदन या बाजारे-हुस्न
हिंदी के उपन्यास-सम्राट श्रीयुत प्रेमचन्द जी के
विख्यात उपन्यास सेवा-सदन के आधार पर निर्मित !
सिनेमा-संसार में एक अभूतपूर्व साहस !!
एक महान लेखक के महान कथानक की
महान-फिल्म !!
जिसमें
मिस जुबेदाबानू, मास्टर मोदक, मिस जद्दनबाई
की विभूतिमयी भूमिका है ।    
बुकिंग के लिये लिखिये:-
श्री महालक्ष्मी सिनेटोन,
मेनरोड़, दादर, बम्बई।    
सेवासदन फिल्म के निर्देशक नानूभाई वकील थे। प्रेमचंद ने सेवासदन उपन्यास में जिन वेश्याओं की समस्याओं को सशक्त ढंग से चित्रित किया था, वैसा फिल्म बनाते समय नहीं किया गया। निर्माता और निर्देशक ने सेवासदन की मूल कथा और वेश्यावृत्ति की समस्याओं को लेकर फिल्म में कई छोटे-बड़े परिवर्तन कर दिए गए। व्यावसायिकता की दृष्टि से यह फिल्म सफल रही है, लेकिन इस फिल्म को देखकर प्रेमचंद निराश हुए। इसके बाद वर्ष 1934 में प्रेमचंद की कहानियों पर नवजीवन नाम की आदर्शवादी और प्रेम की भावनाओं को लेकर फिल्म बनी। ए.आर. कारदार ने वर्ष 1941 में त्रिया चरित्र पर स्वामी बनाई जो नहीं चली।
हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का रंगभूमि उपन्यास काफी चर्चित रहा था। वर्ष 1946 में इसी नाम से फिल्म बनी। वैसे तो प्रेमचंद ने रंगभूमि उपन्यास में पूँजीपतियों और मजदूरों के संघर्ष को बहुत ही चतुराई से व्यक्त किया था। फिल्म में भी उपन्यास में दर्शित औद्योगीकरण, मजदूरों और पूंजीपतियों के संघर्ष को इस फिल्म में भी काफी प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया था। सूरदास नामक पात्र को वैसे का वैसा फिल्म में दिखाया गया। सूरदास का चरित्रांकन फिल्म के बहुत निकट पहुँच जाता है, इसलिए साहित्यकारों के लिए यह फिल्म महत्वपूर्ण मानी जाएगी। यहाँ से फिल्म की दुनिया में प्रेमचंद जैसे रचनाकार की प्रतिभा और लेखन शैली का प्रभाव पडऩे लगा। नतीजा यह हुआ कि प्रेमचंद के बाद के कई श्रेष्ठ रचनाकारों की रचनाओं को लेकर फिल्में बनने लगीं।
वर्ष 1959 में प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा पर आधारित श्री कृष्ण चोपड़ा द्वारा निर्देशित हीरा-मोती नामक फिल्म बनी। फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में बलराज साहनी व निरूपाराय थी, जिन्होंने अपने सशक्त अभिनय से फिल्म में जान फूंक दी थी। बैल पशु होकर भी मानव-प्रेम और स्वतंत्रता को समझते हैं, लेकिन मनुष्य नहीं। यह प्रतीकात्मक कहानी है। पशु मूक होकर भी अत्याचार और शोषण का विरोध करते हैं, लेकिन मनुष्य अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ता और विरोध करने का अवसर मिलने पर भी विरोध नहीं करता बल्कि गधे की तरह डरकर कांजी हाउस में पड़ा रहता है। इस प्रकार प्रकार प्रेमचंद ने तत्कालीन देश की स्वतंत्रता में मनुष्य की आजादी पर व्यंग्य किया है। यह कहा जा सकता है कि फिल्मांकन की दृष्टि से दो बैलों की कथा कहानी पर खरी उतरती है।
गोदान प्रेमचंद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। आलोचकों ने इसे ग्रामीण जीवन का महाकाव्य कहा है। वर्ष 1963 में त्रिलोक जेटली इसी नाम से फिल्म बनाते है, लेकिन निर्माता ने पटकथा और पात्रों के चरित्रांकन को उतना महत्व नहीं दिया, जितना देना चाहिए। निर्देशक केवल होरी और धनिया की कथा के माध्यम से भी फिल्म को सफल बना सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक श्रेष्ठ उपन्यास पर बनी फिल्म आखिर में असफल बन गयी। गोदान में घटित घटनाओं के पात्रों के साथ न्याय नहीं किया गया। उपन्यास में गोबर संघर्षशील पात्र है, लेकिन निर्देशक ने फिल्म में गोबर को एक विदूषक की भूमिका दी है। राजकुमार, कामिनी कौशल एवं मेहमूद जैसे अभिनेताओं का सधा हुआ अभिनय भी दर्शकों पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाता है।
वर्ष 1966 में कृष्ण चोपड़ा व ऋषिकेष मुखर्जी के निर्देशन में गबन का निर्माण हुआ। इस फिल्म के मुख्य कलाकार सुनील दत्त व साधना थे। व्यावसायिकता की दृष्टि से यह फिल्म सफल मानी जा सकती है।
प्रेमचंद की मशहूर कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर बनी फिल्म ने आखिरकार सफलता का मुँह देखा। निर्देशक सत्यजित रे ने वर्ष 1977 में इस फिल्म का निर्माण किया। यह कहानी तत्कालीन सामंतवादी ताकतों को व्यक्त करती है। शतरंज के खिलाड़ी को तीन फिल्म फेयर के अलावा वर्ष 1978 में बर्लिन महोत्सव में गोल्डन बीयर अवार्ड मिला। उपन्यास में कहानी वर्ष 1856 के अवध नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीरों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक मानी जाती है। फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में संजीव कुमार, सईद जाफरी, अमजद खान, शबाना आजमी और टॉम अल्टर जैसे सशक्त अभिनेता थे। इसी वर्ष मृणाल सेन ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी कफन पर आधारित ओका ऊरी कथा से एक तेलुगू फिल्म बनाई, जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
दूरदर्शन ने वर्ष 1980 में प्रेमचंद के उपन्यास निर्मला पर इसी नाम से टी.वी. धारावाहिक का निर्माण किया जो सालों साल चलता रहा, तथा दर्शकों ने इसे बेहद पसंद किया। वर्ष 1981 में सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी सद्गति पर फिल्म बनाई। इसके मुख्य कलाकार ओमपुरी, स्मिता पाटिल एवं मोहन आगाशे थे। इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति ब्राह्मणवाद से अपना शोषण होने देता है और शोषण सहते-सहते मर जाता है। मानसिक गुलामी दुनिया की सभी गुलामियों में सबसे बुरी गुलामी है जो मर जाने से भी बुरी है।
वर्ष 2004 में गुलजार ने दूरदर्शन के लिए प्रेमचंद के मशहूर उपन्यास गोदान को लेकर छब्बीस एपिसोड का एक टी.वी. धारावाहिक तहरीर-ए-मुंशी प्रेमचंद शीर्षक से बनाया। इस टी.वी. धारावाहिक में पंकज कपूर, सुरेखा सीकरी जैसे रंगमंच से जुड़े कलाकारों ने अभिनय किया था। यह धारावाहिक दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। इसी धारावाहिक में गुलजार की प्रसिद्ध कहानियों को लेकर भी कई एपिसोड प्रसारित किये।
यह सवाल बार-बार उठाया जाता है कि जिन प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों ने पाठकों को झकझोरा उन पर बनी फिल्में दर्शकों को पसंद क्यों नहीं आयी। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जिन साहित्यकारों ने अपने अमर साहित्य को सृजित किया; उनके लिखे साहित्य पर फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक उस साहित्य को आत्मसात नहीं कर सके। इसलिए जिस प्रकार का साहित्य लिखा गया था वैसी जान निर्माता-निर्देशक फिल्म में नहीं डाल पाये। अत: एक अच्छे साहित्य पर बनी फिल्म भी दर्शकों को पसंद नहीं आयी।
संदर्भ:-
(1) प्रेमचंद: कलम का सिपाही, अमृतराय, हंस प्रकाशन इलाहाबाद, पृष्ठ: 368-369
(2) प्रेमचंद: पत्र-कोश, डॉ. कमल किशोर गोयनका, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ: 66
(3) प्रेमचंद: घर में, शिवरानी देवी प्रेमचंद, आत्माराम एण्ड संस, नईदिल्ली,पृष्ठ: 195-196
(4) वही, पृष्ठ: 468 (5) वही, पृष्ठ: 467 (6) वही, पृष्ठ: 112 (7) वही, पृष्ठ: 469 (8) वही, पृष्ठ: 113
(9) वही, पृष्ठ: 25 (10) वही, पृष्ठ: 87
(11) प्रेमचंद: कलम का सिपाही, अमृतराय, हंस प्रकाशन इलाहाबाद, पृष्ठ: 574-575
(12) प्रेमचंद: कलम का सिपाही, अमृतराय, हंस प्रकाशन इलाहाबाद, पृष्ठ: 575
(13) प्रेमचंद: पत्र-कोश, डॉ. कमल किशोर गोयनका, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ: 116
(14) प्रेमचंद: विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नईदिल्ली, पृष्ठ: 590 (15) वही, पृष्ठ: 595
(16) यहाँ पर प्रेमचंद अपने उपन्यास सेवासदन की बात कर रहे हैं। यह उपन्यास लिखा पहले उर्दू में गया लेकिन छपा पहले हिंदी में। दयानारायण निगम के नाम पत्रों के आधार पर मूल उर्दू पाण्डुलिपि का लेखन काल वर्ष जनवरी 1917 से जनवरी 1918 तक ठहरता है, कुछ ही समय बाद उसका हिंदीकरण हुआ और सेवासदन को प्रेस मे देने के लिए प्रेमचंद 11 जून 1918 को कलकत्ता गये। यह उपन्यास उर्दू में दो भागों में बाजारे-हुस्न के नाम से प्रकाशित हुआ। पहला भाग वर्ष 1921 में तथा दूसरा भाग वर्ष 1922 में लाहौर के दारूल-इशाअत पंजाब ने प्रकाशित किया। हिंदी में पहली बार वर्ष दिसम्बर, 1918 में हिंदी पुस्तक एजेन्सी, कलकत्ता से सेवासदन के नाम से प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद को प्रकाशकों से इस उपन्यास के लिये चार सौ रूपये मिले। इसकी पहली समीक्षा सरस्वती पत्रिका के फरवरी 1919 अंक में छपी, जिसमें प्रकाशक के रूप में महावीर प्रसाद पोद्दार का नाम दिया गया है।
(17) यह उपन्यास प्रेमाश्रम था। सेवासदन की तरह लिखा पहले उर्दू में गया लेकिन छपा पहले हिंदी में। मूल उर्दू पाण्डुलिपि का लेखनकाल 2 मई 1918 से 25 फरवरी 1920 तक है जो कि पाण्डुलिपि पर ही अंकित है। लेखक ने शुरू में इसके दो नाम सोचे थे-नाकाम और नेकनाम। यह उपन्यास हिन्दी में वर्ष 1922 में हिन्दी पुस्तक एजेन्सी, कलकत्ता से प्रेमाश्रम के नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें प्रेमचंद को तीन हजार रूपये का पारिश्रमिक मिला। परन्तु उर्दू में स्थिति खराब ही रही जिसके कारण प्रकाशन में विलंब होता गया उन्हें कोई ढंग का प्रकाशक न मिल सका, जो उर्दू में लिखे गये इस उपन्यास को प्रकाशित करता। वर्ष 22 अप्रैल 1923 को मुंशी दयानारायण निगम को प्रेमचंद लिखते हैं-मेरी कई किताबें निकलने के लिये तैयार हो रही है। प्रेमपचीसी खत्म हो गयी, गोशा-ए-आफियत महज इसलिए नातमान है कि कोई पब्लिशर नहीं है। बड़ी कठिनाइयों के बाद किसी तरह उर्दू में गोशा-ए-आफियत के नाम से प्रथम संस्करण उर्दू में लाहौर के दारूल-इशाअत, पंजाब ने वर्ष 1928 में प्रकाशित किया। तब तक हिंदी में प्रेमाश्रम असाधारण रूप से प्रसिद्ध हो चुका था।
(18) प्रेमचंद: पत्र-कोश, डॉ. कमल किशोर गोयनका, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ: 66
(19) वही, पृष्ठ: 465 (20) वही, पृष्ठ: 117 (21) वही, पृष्ठ: 117 (22) वही, पृष्ठ: 488 (23) वही, पृष्ठ: 489 (24) वही, पृष्ठ: 311 (25) वही, पृष्ठ: 120
(26) प्रेमचंद: चित्रात्मक जीवनी, डॉ. कमल किशोर गोयनका, पीताम्बर पब्लिशिंग प्रा.लि., नईदिल्ली, पृष्ठ: 48- 49