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Tuesday 21 Nov 2017

दो इतिहासों के बीच दर्द और संघर्ष (राजी सेठ की पुस्तक ‘निष्कवच’)

तरसेम गुजराल

444 ए, राजा गार्डन,
पो.आ.- बस्ती बावा खेल,
जालंधर-144021
मो. 09463632855
हर बार लगभग डेढ़ से दो दशक बाद एक युवी पीढ़ी नये सवाल लेकर संघर्षरत होती है। अपने सवालों से निरुत्तर होती हुई व्यग्र और मुख्यधारा के द्वार के सामने बेचैन और लगभग अजनबी। वह अपने विश्वास लेकर आती है और समन्वय के सूत्र तीव्रता से टटोलती और कहीं तोड़ती आती है। उसके भीतर विद्रोह की अग्नि होती है। इतिहास जिसका शमन करने में बेबस होता है। युवा पीढ़ी की कुछ ऐसी ही बेचैनी, मनोवस्था, जद्दोजहद को लेकर दो वृत्तांत ‘निष्कवच’ में राजी सेठ की कलम से साकार हुए हैं।
वृत्तांत एक में मूल्यों का संक्रमण कथानायिका एक लडक़ी के साथ है वृत्तांत दो में कथानायक एक युवा लडक़ा है। राजी सेठ के अनुसार ‘दोनों की अपनी-अपनी अलग नियति और परिस्थिति है, रिश्ता कोई है तो मात्र कालगत अर्थात एक ही देशकाल में जीना,’ युवा पीढ़ी की तल्ख हकीकत की बाबत कहा- ‘यह तो तय है कि हर युग में युवा कहलाती पीढ़ी के अपने संघर्ष हैं जीवन की मुख्यधारा में प्रवेश पा लेने की अपनी बेचैनी, उनका एक अपना इतिहास है, एक उन पर हावी इतिहास, कुछ उनके अपने विश्वास हैं, कुछ मिले हुए विश्वास जिनके बीच जरूरी नहीं कि रिश्ता समन्वय का हो।’
-(निष्कवच : एक आत्म प्रतीति)
अचरज की बात है कि दोनों वृत्तांतों के रचनाकाल के बीच दस साल से ज्यादा का अंतराल है, ‘निष्कवच’ का दूसरा संस्करण 1997 में प्रकाशित हुआ। रचनाकाल के दिनों (1981) हिन्दी साहित्य की आधुनिकता की बहसों से ओतप्रोत रहा। ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्र में माक्र्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रक्रिया का प्रतिफलन देखा। उनके अनुसार विचारों का विकास सामाजिक-भौतिक व्यापार के अनुसार ही निर्धारित होता है। प्रत्येक नया विचार अपने समय की सामाजिक भौतिक परिस्थितियों की उपज होता है। सामाजिक भौतिक अन्तर्विरोध नये विचार का विकास संभव करते हैं और उन दोनों की टकराहट में नई सामाजिक-भौतिक परिस्थितियों के साथ नया ज्ञान भी विकसित होता है। दोनों आख्यानों में अन्तर्विरोध और टकराव मौजूद है। राजी सेठ के लिए ‘रचना आपबीती और जगबीती के बीच का रसायन है, न तो ‘आपबीती’ सामाजिक-भौतिक अंतर्विरोधों के सामने कवच धारण करती है न ही ‘जगबीती’।
‘निष्कवच’ के पहले आख्यान में नीरा नि:संदेह मध्यवर्ग से आती है परन्तु सख्त परिस्थितियों में भी हम उसे कमजोर या दब्बू नहीं पाते। उसके पिता का जिक्र नहीं है। मां से वह ममताभरी गोद नहीं मिली जो अमूमन परिंदों को गोद में सहेज कर रखती है जब तक परिंदे मुक्त आकाश में सुरक्षित उड़ान भरने की हिम्मत या जुगत नहीं पा जाते। खंडित परिवार की उपज नीरा मौसी (आंटी) के पास पालन-पोषण पा रही है। परन्तु इस परिवार में सभी निकट के लोगों के बीच वह अकेली है। अकेली इसलिए कि आंटी के पास गुजर चुका इतिहास है और लड़कियों को बुरी हवा से बचाने और सुरक्षित रखने के अपने तौर-तरीके। कजिन विशाल भी घर में अकेला है परन्तु है बीच में कहीं। कभी परंपरा को ओढ़ता अपनाता कभी विरोध के तल पर सुगबुगाहट में डूबता। स्वीकार अस्वीकार के बीच में कहीं अभिभावक भी तटस्थ भी। डॉ. इन्द्रनाथ मदान अकेलेपन का अध्ययन कर चुके मालूम होते हैं। उनके अनुसार अकेलेपन का बोध बहुत पुराना है, मध्यकालीन है, शायद इससे भी पहले का। उपनिषदों में भी आंका जा सकता हैा। आज का अकेलापन मध्यकालीन या रोमांटिक अकेलेपन से भिन्न कोटि का है। मध्य युग में यह आत्मिक स्तर का है। रोमांटिक युग में वैयक्तिक स्तर पर और आधुनिक युग में स्थिति नियति के स्तर पर। रूसो ने व्यक्ति-स्वातंत्र्य और व्यक्तित्व के अबाधित विकास को अपने लेखन में बहुत जगह दी है। दमन का आश्रय लेने वाले साम्राज्यवाद को कांट (दार्शनिक) ने अनैतिक आचरण  बताया। सात्र्र को एक समय ‘स्व’ के अतिरिक्त सारा अस्तित्व स्वतंत्रता में बाधक लगा था। नीरा में अंसतोष है। जिद्दू कृष्णमूर्ति ने असंतोष को स्वतंत्रता का माध्यम बताया। हम नीरा को गलत ठहराने वाले कौन हैं? यदि  उन्नीसवी शती में एक रूसी क्रांतिकारी आलोचक ने जूते बनाने वाले एक मोची को शेक्सपियर से कहीं अधिक उपयोगी व्यक्ति माना था तो उसका कथन बिलकुल ही गलत और हास्यास्पद नहीं था (भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र/निर्मल वर्मा)
विशाल की भावनाएं भी चोटिल होती हैं तब सोचता है ‘उसके कारण मेरी मां भी छिनती हैं और मेरी मां उसे कभी अपनी मां नहीं लगती।’
वह बासू के बारे में बताता है कि वह अकेला रह सकता था। रह तो मैं भी सकता था पर उसके अकेलेपन और मेरे अकेलेपन में फर्क था। मैं अनवरत अशांत था, वह आत्म संपन्न। मैं एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी व्यस्तता में अपने को बींध कर पहले ही प्रतिबंधित और सुरक्षित कर लेता था। वह बेपरवाह था- फक्कड़ और मुक्त- उसका सब कहीं प्रवेश था- हर किस्म की टोली में। बलियाटिक्स और बीटल्स, हिप्पी और हारे। अगुए और पिछलगुए-सबके साथ। सबमें रहते हुए भी वह अपने स्वत्व को अछूता रख लेता था। (निष्कवच / पृ.सं. 15)
नीरा को किशोरावस्था में बासू का साथ मिला। बासू के आते ही वह शतरंज पसारकर बैठ जाती- जीवन के बहुमुखी अर्थों की वह तड़प, जो मैं किताबों के माध्यम से उसमें जगाना चाहता था, अब जागी थी, फुर्तीले आवेश का यह ग्लेशयर पता नहीं कब से उसके भीतर जमा बैठा होगा, जिसे मैं अवाक् होकर अब बहता देख रहा था।  (पृ.सं. 22)
जब बासू आता, वह ज्यादातर वहीं  बने रहना चाहती थी। ‘पहली बार जब मैंने उसे नाचते देखा तो दंग रह गया था वह सब उसने कब और कहां से सीखा? कहां से पाई ऐसी उत्सर्जित तन्मयता?’ (पृ.सं. / 23)
विशाल नीरा को किताबें लाकर देता है परन्तु उसका कहना है- ‘तुम तो जानते हो मुझे किताबों का शौक नहीं है, आय लाइक ह्यूमन बीइंग्स।’
विशाल उसके उलार को थाम ले चाहता है तो वह कहती है- मेरी जिन्दगी मेरी है- वह किसी की भी मां... जाहिर है मां के नाम से वह बिदक रही है। उखड़ जाती है। क्योंकि उसका संबंध एक खंडित परिवार से था, जिसमें मां की ममता उसे छूकर भी नहीं गई।
फिर वह बासू को ठीक से समझ गई तब कहा- हमेशा ऐसे ही बिहेव करता था जैसा मैं उस पर लदी जा रही हूं तिकड़मी बू्रट।’
बासू नीरा के बारे में कहता है- नीरा बहुत दिलेर है- यह दिलेरी उसके दुर्भाग्य का कारण बन सकती है वह उसे ‘जख्मी पोटली’ भी कहता है और यह भी कि कितनी आग और कितना विषय है उसके भीतर।
बासू क्या इतिहास विमुख है?
पापा इतिहास विमुख नहीं। इतिहास की बात करते करते देश विभाजन के इतिहास पर टिक जाते, उन्होंने विस्थापन देखा है, झेला है। अपने जख्मों को कब तक छिपाएं, कैसे छिपाएं- ‘हम इस देश में धर्म का ठप्पा लगाकर लड़ते बलवाइयों को कभी माफ कर भी देंगे पर अंग्रेजों को तो कभी नहीं। चाहे हमारे लिए वे कितने बड़े कल्चरल कैरियर हैं- कितने बड़े स्केल पर। ठीक है कि ये स्वर्ग उन्होंने ही यहां उतारा है... बिजली, पानी, रेल, टेलीफोन देकर, पर सिविलाइज्ड आदमी का वार भी सिविलाइज्ड होता है। एकदम बारीक, इसे भूल न जाओ। ऐतिहासिक गुलामी ले गये। दिमागी गुलामी छोड़ गये।’ (पृ.सं. / 20)
उनकी इच्छा  है कि यह दर्द अगली पीढ़ी के रेशे-रेशे का हिस्सा बने। वह नई पीड़ी की इतिहास विमुखता से परेशान हैं। ‘इन्हें देखकर कौन कह सकता है कि इनके सामने खड़ी पीढ़ी ही इतिहास के इस हादसे का शिकार  हुई थी... चलो जानमाल के लगे जख्म छोड़ भी दो, उसे देश की आजादी के खाते में ढाल दो पर यह जो बादलों के छंट जाने के बाद भी दासता में बने रहने का अंधेरा है... वह? वह खोट क्यों नहीं दिखाई देता किसी को?’
फैज फेनान ने कहा- हम निरर्थक स्तुतिगानों और घृणित नकल पर समय जाया न करें। इस यूरोप को छोड़ दें जहां लोग मनुष्य की बातें करते थकते नहीं लेकिन जहां भी मनुष्य मिलता है, हर जगह उसकी हत्याएं करते हैं- अपनी गली के नुक्कड़ से लेकर दुनिया के हर कोने में, सदियों से वे तथाकथित आध्यात्मिक अनुभव के नाम पर पूरी मानवता का गला घोंटते रहे हैं। जरा उन्हें देखिए, आज वे परमाणु से लेकर आध्यात्मिक विखंडन के बीच झूल रहे हैं। (कथान्तर / अंक 19)
परन्तु बासू पापा की अंतर्वेदना पर कहता है- ‘आपकी पीढ़ी के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत है और आप उस नफरत में से अपने देश के लिए कुछ कर सकने की ताकत उगाहना चाहते हैं तो आपकी मर्जी... पर मैं उस दु:ख या विद्रोह को फिजूल समझता हूं।’
यहां प्रश्न भी उठाया गया है कि विरासत क्या केवल व्यक्तिगत ही होती है। इतिहास का देश भी तो व्यक्तियों के माध्यम से ही छनकर आता है। पहले का इतिहास ही हमारे इतिहास को बनाता है।
बासू रिश्तों को कमजोरी और अभिशाप मानता है। पहले प्रेम की असफलता को, पीड़ा को नहीं झेल पाता। बी.एस.सी. के बाद आई.टी.आई. कम्पीटीशन पास कर, बड़े यत्न से मिली इंजीनियरिंग की सीट को भी छोड़ सदा के लिए शहर से विलुप्त हो जाता है।
देखा जाए तो वृत्तांत दो के सूत्र उसी उपनिवेशवादी जख्मी भारतीय मानसिकता से जुड़े हैं जिसे पहले वृत्तांत में पापा व्यक्त कर रहे थे। इस नाते दूसरे वृत्तांत का दस साल बाद लिखे जाने पर भी इस रचनात्मकता का  बीज वहीं से फूट निकलता प्रतीत होता है। राजी सेठ कहती हंै- ‘दूसरे वृत्तांत की मूल प्रेरणा की बात करूं तो थोड़ा गहराई से उतरना पड़ेगा क्योंकि उसके प्रेरणास्रोत बहुत से मानसिक दबावों का एक पुंज है जो अरसे मन में सक्रिय रहने के कारण जटिलतर होता गया। यह धारणा कि विदेश (अमेरिका) स्वर्ग है, धनधान्य से भरा, लालसा के योग्य, अत्याधुनिक, वहां से वापसी असंभव  है- मेरे लिए बेचैनी की नींव भी यही थी।’
निर्मल वर्मा ने ‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र की खोज’ पुस्तक में कहा  ‘भारत एक अविकसित एशियाई उपनिवेश की भूमिका अदा करते हुए और ब्रिटेन एक शासक की जो शक्ति, समृद्घि और बौद्घिकता- जैसे उन सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता था जो यूरोप के इष्ट थे। इन छवियों के विकृत  होने का कारण उस असंगत विधि में ही था जिसके सहारे भारत और यूरोप ने एक-दूसरे को देखा था।’ क्या बस इतना ही?
राजी सेठ दूसरे दबाव को लेकर स्पष्ट है- ‘भारतीय और पश्चिमी इन दो संस्कृतियों के भेद-विभेद की सोच में उलझी मानसिकता को शब्दबद्घ करने के लिए अपने को रचनात्मक रूप में प्रस्तुत पाना।’
वृत्तांत दो इसी तनाव से उपजी काफी दिलचस्प, दो हिस्सों में विभाजित पात्र की परेशानकुन अवस्था को शिद्दत से चित्रित करती, बहुत गंभीर, बहुत गठित रचना है।
कथा का आरंभ मां की चिट्ठी से होता है- ‘मां की चिट्ठी अंग्रेजी में आती है। कुछ अटपटी-सी अंग्रेजी, जिसे पढ़ते लगता है कोई अविरल बहती आती नदी झाड़-झंखाड़ में फंसती चली आ रही हो। पानी है तो रुकता नहीं। झाड़-झंखाड़ है तो अपनी धौंस जमाए बिना नहीं रहता।’
राजी सेठ कहती है कि बेटे के अमेरिका प्रवास के चलते वहां जाने और अपनी प्रतिक्रियाओं को आत्मसात करने की सुलभता भी थी।
वृत्तांत दो की आन्तरिकता यह है कि राजी सेठ शिमला (हिमाचल प्रदेश) के लेखक-गृह में रह रही थी। तब अचानक ही ध्यान आया कि 8 जून को उनके बेटे के विवाह की वर्षगांठ है। संदेश भेजना है। जहां रह रही थीं वहां के छोटे से बाजार से मनोवांछित कार्ड नहीं मिला। झुंझलाकर उसे पत्र लिखने को प्रस्तुत  हुई भी- पर बेटे को अंग्रेजी में दो-चार वाक्य के बाद ही लेखनी विचलित हो गई थी।  
वृत्तांत दो का वाचक कह रहा है- ‘मैं जानता हूं, मां अपनी भाषा में चिट्ठी लिखना चाहती है। चाहती है अपने देश और भाषा की गंध मेरे मन में बनी रहे। ऐसा न होने पर मैं देश और भाषा के स्वाद को भूल भी सकता हूं फिर मां मुझे अंग्रेजी में क्यों चिट्ठी लिखती है? इतना कुछ चाहते हुए भी क्यों उस अजनबी भाषा का इस्तेमाल करती हैं?’
(निष्कवच / पृ.सं. 59)
यहीं हम मार्था की अविचल मौजूदगी जान पाते हैं- ‘वह चाहे तो मार्था के रहते अपने और मेरे बीच बन सकते भाषा की निजता के पुल को बनाए रख सकती है पर ऐसा नहीं करती।’
पत्र वैसा ही पड़ा रहता है और रविवारीय मार्था की सफाई अभियान का अवरोधक  होकर झिडक़ी का कारण बनता  है- यह इंडिया नहीं है कि बीवियां चाकरी करती रहें। तुम अपने कागज पत्र खुद संभालो।
अनुत्तरता वहां की हवा में अनुकूल है।
फिर कभी कोरे कागज पर घसीट देना-बहुत जल्दी में हूं। ज्यादातर जल्दी में रहता हूं। फिर कभी एक-एक को, अलग अलग इत्मिनान से लिखूंगा। मोहलत मांग लेना मुक्ति है क्या? ऊपर-ऊपर से सब कुछ सही-सलामत चलता है- काम, उत्पाद, शरीर, समय की पाबंदी, फासले, अनुशासन, नींद अपने पर निर्भरता।
हालत निर्मल वर्मा के अजनबीपन की तरफ ले जाती है ‘मैं एक पहचाना-सा प्रवासी  हूं जो लौट आया है। एक अजनबी-सा भारतीय जो हर जगह संदिग्ध है- खुद अपने सामने सबसे अधिक।’ (बीच बहस में) मृगतृष्णा ने हजारों मृगों को तड़पाया होगा तभी मुहावरे के रूप में बदला होगा मृगतृष्णा। नायक बहुत इच्छाएं लेकर ही प्रशांत जैसे दोस्त का पत्र पाकर विदेश के लिए उड़ा होगा। वहां मुलाकात हुई मार्था से। मानसिक उलझाव को साथ लिए दैहिक संबंध की रेशमी डोर से बांधती मार्था। परन्तु वह न बंध पाता है, न ही मुक्त हो पाता है। बीच में अटके रहने का धरातल पीड़ा भी देता है असमंजस भी।
जाने से पहले पापा ने दोस्तों में से गॉडफादर निकल आने पर शुक्र मनाया था। खबरदार भी किया था कि दोस्त से रिश्ता बराबर का रखे परन्तु प्रशांत किसी कलूटी का पीछा करते शिकागो निकल गया और अपने अपार्टमेंट का किराया भी इसके खाते डाल गया, जिसे मार्था को चुकाना पड़ा।
असमंजस हर जगह-यह बात अलग है कि सदियों से अपने को ऊंची वैल्यूज से जोडऩे की आदत पड़ी है तो असलियत ढंकी रहती है। यहां लोग मुक्त हैं, खुलकर स्वीकार लेते हैं। हमारे सामने सिचुएशन आ जाए तो हम स्वीकारने की इच्छा और नकारने की दंभ में ही फंसे रहते हैं। सोचते कुछ हैं। करते कुछ हैं। (पृ.सं. / 63)
जानता ही नहीं कि मार्था मेरी लाचारी है या उपलब्धि। जो छूट गया हर वक्त तड़पाता रहा। मार्था से कहा- ‘नहीं, एकदम नहीं जान सकती तुम। कितनी छोटी-छोटी बातों के लिए भूखा हो जाता है मन। अपनी पहचान की चीजें ढूंढता है- दुकानें, साइनबोर्ड, रास्ते, आकाश का रंग, आवाजें  बच्चे, बूढ़े, चेहरे का रंग, सब कुछ मिस करता है। आल मोस्ट एवरीथिंग। पर जानती हो क्या मिलता है चारों ओर। सब कुछ एकदम अलग... डिफरेंट। थोड़े दिन तो इंटरेस्टिंग लगता है फिर खालीपन दबोचने लगता है। हर पल लगता है- मैं कहीं और हूं- कहीं बाहर बाहर... और अकेला।’
संयुक्त परिवार थे तो अकेलापन और डिप्रेशन बहुत कम था गहन हृदय की बात चाचा, ताया, दादा, दादी, भाई-बहन किसी से तो कही जा सकती थी। सुख भी साझे थे, दु:ख और मुसीबतें भी। विस्थापन पूंजी का अनिवार्य हिस्सा है। परन्तु इसके पास बचे हैं फासले। सभी से। जितने भी अपने हैं। कुर्रतुल ऐन हैदर ने ‘आग का दरिया’ में दर्ज किया- ‘समय के पैटर्न में तलअत जहां बैठी थी। वही तलअत उसी पैटर्न में एक जगह और मौजूद थी। और दोनों बिन्दुओं के बीच बरसों का फासला था और इस फासले पर मनुष्य केवल आगे की ओर चल सकता है- आगे और आगे। पीछे जाना संभव नहीं। यद्यपि सहस्त्रों, तलअतें अनगिनत टुकड़ों में विभाजित अनगिनत जगहों पर मौजूद थी जैसे आईने के टूटे हुए टुकड़ों में एक ही चेहरे के भिन्न प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं।’
वह महसूस करता है शिद्दत के फासले को।
फासला समझती हो-फासला। डिस्टेंस। हाउ इज इट टु फील द डिस्टेंस इन युअर रिब्स। लगता है आवाज दी तो देर से सुनी जाएगी। चलने लगूं तो देर से घर पहुंचूंगा... चिट्ठी चली तो देर से आएगी... कब-कब क्या-क्या हो जाएगा, पता नहीं। मैं रास्ते में ही अटका रह जाऊंगा। जो कुछ भी मैं यहां रहते हुए देखता हूं- अमीरी-गरीबी, ठाठ-बाठ, झगड़े, दोस्त कुछ भी असर नहीं करता। कुछ अपना नहीं लगता।
(निष्कवच पृ.सं. 80)
गैलिआनू आगे गैरबराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था पर कुपित रहे। कहा- ‘हर एक मिनट में बीमारी और भूख से एक की हत्या करने वाली यह व्यवस्था हमें अपने हिसाब से ढाल लेने और इस अन्याय का हिस्सा बनाने के सभी उपाय करती  हैं। हमें सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही रही है और सब कुछ ठीक चल रहा है।’
(कथान्तर / अंक 19)
जब उसको कम मेहनताने पर काम करने को विवश होना पड़ा। मार्था ने समझाया- ‘ज्यादा पैसे तुम्हें कोई कैसे दे देगा। तुम्हारे पास ग्रीनकार्ड नहीं है। किसी भी मालिक को लग सकता है। तुम्हें काम सिखाने पर पैसा भी लगाए और तुम चल दो।’
उसे पता है कि ग्रीनकार्ड सिकंदर कार्ड है। ‘जब तक मिल नहीं जाता मेरे माथे चीप लेबर’ का ठप्प लगा रहेगा। आत्मसम्मान कहीं बचा होगा तो धुलता रहेगा।’ (निष्कवच / पृ.सं. 81)
विदेश का अकेलापन मात्र अकेलापन नहीं। असुरक्षित होने का एहसास भी है। अक्सर बेसहारा अजनबियों को यह संत्रास झेलना पड़ा है। एक रात तलमार्ग से गुजरते हुए एक लम्बेचौड़े नीग्रो ने इसकी नाक पर जबरदस्त घूंसा जड़ दिया। कॉलर के नीचे से नायक के विंडचीटर को मुट्ठी में भींच लिया। अपनी फौलादी बांह उठाकर हवा में तानने के बाद जमीन पर पटक दिया। यू ब्लडी इंडियन कहकर जूते की नोंक से मुंह पर  भरपूर ठोकर मारी और आगे निकल गया। विडंबना यह कि मार्था के उस देश में पीड़ा से थर्राहट भी निकलेगी तो कोई सुनने वाला न होगा।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी बार-बार अपमानित हुए। पीटर मेरिटजबर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर यात्रा करते हुए उन्हें गोरे ने आदेश दिया कि वह पांच मिनट में डिब्बा खाली कर दे, जब उन्होंने इंकर किया तो पुलिस बुलाकर उन्हें बंडल की तरह बाहर फिंकवा दिया गया। (पहला गिरमटिया / पृ.सं. 118)
महेन्द्र भल्ला का उपन्यास ‘दूसरी तरफ’ (1976) तथा उडऩे से पेश्तर (1987) इंग्लैंड में व्याप्त नस्लभेद का एहसास बखूबी करवाते हैं। निष्कवच वृत्तांत-दो कम पन्नों में गहरे एहसास करवाता है। दो देशों में व्यक्तित्व विभाजन जिस तरह यह वृत्तांत करता है। वह गहरे तक प्रभावित करने वाला हैा। अपने अस्तित्व को प्रश्नांकित करते हुए नायक की सोच पाठक के मर्म को छू जाती है। आखिर क्या है वह अपने आप में- ‘मैं वसीम को दी जाने वाली एक मिसाल हूं, प्रशांत की आवाज से उड़ जाने वाला पता हूं। हब्शी के हाथ की हिंसा हूं, मार्था का खिलौना हूं।’
(निष्कवचन पृ.सं. 100)
जब भी कोई विदेश से लौटकर आता है एक सहज सवाल जुबान की नोंक पर तिर आता है- मेरे लिए क्या लाए? कोई नहीं जानना चाहता कि विदेश में जिन पेड़ों पर डॉलर पौंड लगते हैं, उन पेड़ों को उगाने में, पोषण में कितना पसीना बहा, कितने जख्म खाए?
चिंटू-मिंटू मेरे बक्से को घूरते हैं।  भाभी अतिरिक्त उत्साह में ठिठोली करने लगती है, अब तुम आज ही जी भर कर पूडिय़ां खा लेना लला, कल मुझे पढ़ाने जाना पड़ेगा। मेरे हैंडबैग से निकली चीजों को पापा तीखी निगाह से देखते हैं। भैया की जर्सी के पीछे टिप्पा जांचते एकाएक कह उठते हैं- लगता है धंधा कुछ बढिय़ा नहीं चल रहा?
(पृ.सं. 66-67)
कविता की चंद पंक्तियां स्मरण हो आई-
जहां कोई रास्ता नहीं हुआ करता
वहां भी होती है
एक अदद जमीन
एक अदद जमीन
जहां भी हो
रास्ता बन सकता है।
(शैलेश)
यह क्या सोच रहा है- ‘इतने दिनों बाद घर आया हूं तो लगता है सब कुछ अपनी तर्ज और तराजू पर तुलने में लीन है आया। सभी काम सुचारू रूप से चल रहे हैं मेरे बिना। घर है कि मेरी अनुपस्थिति का अभ्यस्त हो चुका है पूरी तरह जाने से पहले जो जो बातें मेरी उपस्थिति की अंतिम रूप से आश्रित थी, मेरे बिना भी उतनी ही संभव बनी हुई है।’
लौटकर भी फालतूपन का बोध साफ झलक रहा है। और भी गहरा होता है जब उसे लगता है- यह  बेहूदापन कभी जान ही न पाया होता यदि ले-दे गणित की इतनी संकरी सुरंग में से टकराता आया न होता। ...हर रिश्ते में गणित बराबर रखना पड़ता है। देने को तत्पर हो तो ही लेना चल सकता है। मां-बाप, भाई-बंधु, पति-पत्नी जैसे हार्दिक संबंधों में भी हिसाब चलता है। कितना प्यार करते हैं इसकी माप-तौल दिखलाते रहना पड़ता है।’ (निष्कवच / पृ.सं. 71)
भारत में अन्य रिश्तों के अलावा श्यामली है, वहां कोई रिश्ता नहीं, मार्था है।  घर लौटकर क्यों ईंटों से घिरी हरियाली पट्टी में से उस बिरवे की तलाश करता है जो श्यामली की बगीची में से एक हरे संबंध के आदर में लाकर लगाया था? फिर मां ने लिखा श्यामली इसी बात को बीच में रखकर रोती रही- ‘कितना क्रूर हूं, न टूटती चीजों को तोड़ा। न छूटती को छोड़ा। देश भी। धर्म भी। प्यार भी।’
मां से छुपा रहा हूं कि कितने ही सिरे समेटने हैं कि खाली होना चाहता हूं। बिलकुल रीता। अकेला इतना अकेला कि बस ‘मैं’ रहूं जो मैं कभी नहीं होता। कभी नहीं होता ‘यहां’  और कभी नहीं होता वहां। एक पूरा देश है जो मेरी चेतना में ठुंसा-ठुंसा रहता है। एक पूरी संस्कृति। एक पूरा समाज। करने-धरने की एक पद्यति। मार्था के माध्यम से।
‘मार्था के साथ का फैसला मां-बाप को बाहर रख किया गया था। किया नहीं था, स्वत: हो गया था।’
मां के पास हक है पूछने का कि श्यामली से बनते-बनते संबंध को स्लेट पर लिखी इबारत की तरह क्यों पोंछ दिया?
जब कभी मन की व्यथा को पत्र पर उतारना चाहा पापा का ललकारता चेहरा सामने आ जाता। ‘कैसे कहता कि हिज मर्चेन्ट सन हैज लॉस्ट द शोर। कैसे कहता कि किन चीजों से टकरा रहा हूं। अक्सर रात बाहर बितानी पड़ती है। दिन में कैंडी बेचनी पड़ती है। थोड़े से सेंटस का जुगाड़ करने के लिए कारों में पेट्रोल भरना पड़ता है। होटलों में क्राकरी धोनी पड़ती है। फुटपाथ पर कश्मीरी मफलर और गुजरातियों की बनाई कास्टयूम ज्यूलरी बेचनी पड़ती है।’ (पृ. सं. 75)
दहशत से घबराकर उसने मार्था से सवाल किया था- क्या तुम कभी अपना देश छोडक़र कहीं गई  हो? इसका गर्व स्फीत उत्तर है- ‘हमें अपना देश छोडक़र जाना नहीं पड़ता। दूसरे आते हैं।’
मार्था कैसे जान पाती उसके भीतर एक तुला जैसी लटकी है। तुला की एक डंडी सात समंदर पार की किसी अपे्क्षा से बंधी है : दूसरी डंडी पर वह भूगोल, खोह, अंधेरा और अब मार्था। ‘तुला के न्याय पर विश्वास करने बैठूंगा तो भारी को समर्पित हो जाएगी। स्थूलता जीतेगी।’
अपने घर में जहां उसकी फोटो रखी रहती थी, वहां से हटा दी गई। यह किर्च भी उसी को चुभनी थी। औरों ने जो किया सो किया... मां ने भी? मैली  चादर की तरह लपेटकर किसी कोने में ठूंस दिया।
‘मां मां है चेहरे से मन की थाह ले सकती है। लगता है तेरा वहां दिल नहीं लगता। पल-पल ध्यान भटकता है। उत्तर मिला- ध्यान को भटकने की मोहलत कहां होती है? जुते रहना पडऩा है। जुतने की खूबियां तुम नहीं जानती दौड़ते-भागते रहो, मन चाहे कंगाल बना रहे।’
मां को सोच सोचकर एक दूसरा प्रश्न रखा पड़ा- ‘तुम दोनों ने क्या दो ही रहने का फैसला कर रखा है?’
यह अंदाज कितना अलग है, अमूमन रचे जा रहे हिन्दी रचना के उपन्यास से ‘पिता-पन और मां-पन में से  उबरता एक बचपन- मां तो उसी वास्तविकता को सहज मानेगी।’
मां को यह बताते हुए खौलते पानियों से गुजरना पड़ता है कि मार्था से शादी ही नहीं हुई- मार्था एक है। अकेली एक। हरदम एक। एक बिन्दु जिसकी कोई परिधि नहीं।
जीवन की राह के काले गड्ढे क्या पूरे काले हैं?
जीने का गुरुमंत्र अब तो जानने लगा हूं- कुछ पाने की एक माप-धन। कुछ होने की एक माप सफलता। नहीं तो आप कुत्ते हैं। बिल्ली भी नहीं। बिल्लियां तो वहां प्यार-दुलार से पाली जाती है विशेष रूप से तो स्यामी बिल्लियां।
वहां हैफ (हाफ) शब्द प्रचलित है। हैफ मदर। हैफ सन। हैफ फादर, हैफ सिस्टर। इज्जत आबरू खानदान निजीपन में विलुप्त हो गये। मार्था का अबार्शन हुआ। जवाब तलब करने पर कहती है- यह मेरी देह है, मेरा निजी मामला। मेरा ही परमाािधकार। वहां हवा अलग बहती है।भारत में स्त्री के प्रोटेक्टेड होने पर मार्था की तल्ख हकीकत बयान होती है- यह प्रोटेक्टेड की बात तुमने किसे लेकर कही? स्त्रियों को? उन्हें भी इसी तरह अठारह साल की उम्र के बाद रोटी कमानी पड़ती है। घर ढूंढना पड़ता है। साथ रहने को आदमी तलाशना पड़ता है- अठारहवां बीतते-बीतते तो दूसरे अबार्शन की नौबत आ जाती है।  (पृ.सं./92)
एक बार जब नरेटर ने अपना हाथ बढ़ाकर मार्था को थामना चाहा उसने कहा- ‘आयम नाट यु्र प्रापर्ती।’ ‘फेथफुल होना क्या इंडियन की सूली है?’
एक मूल्यों को ध्वस्त करती तथा नई पृष्ठभूमि पर जूझने को वाणी देती कृति का एक पाठ कभी अधूरा भी रह सकता है। पहले पाठ में मन में प्रश्न जागा कि वाचक लौटकर आने पर यहीं भारत में क्यों नहीं रह गया? दूसरे पाठ में अंतिम पृष्ठों पर गहरा ध्यान गया। नरेटर भाई को वास्तविकता बताने की कोशिश कर रहा है कि वहां का सिलसिला कितना अजीब है। 18 साल पूरे हुए नहीं कि सडक़ पर आ जाना पड़ता है। यह नहीं कि एम.ए. करने पर परजीवी होकर बाप की गोदी में चढ़े बैठे रहें। शिक्षा का अर्थ है अपने कमाने की औकात।भाई सुन नहीं रहा। वह अपने साले साहब की विदेश में गोट फिट करना चाहता है। सपनों के बीजों की पोटली लिए दिए हैं। मां का प्रेम अपनी जगह है परन्तु कहती है- कोई जाए पर वहां का होकर न रह जाए।  जाने क्यों एक फिल्म का गीत ‘चिट्ठी आई है, वतन से चिट्ठी आई है।’ बहुत डुबो देता रहा है। इस वृत्तांत की अंतिम पंक्तियां हमारी धमनियों का खून जमा देती है। लेकिन वह है कड़वा यथार्थ। राजी सेठ यदि कथा का कुशल निर्वाह जानती हैं तो उसका अंत भी खूब पहचानती हैं।
-लो जाता हूं चिंटू, जाऊंगा नहीं तो झौंआ भर चीजें कैसे आ पाएंगी। लो जाता हूं भैया। तुम्हारे हाथ में पोटली, सपनों के बीज। जाऊंगा नहीं तो धरती (?) कैसे मिल पाएगी। लो जाता हूं भाभी। पूरियों का स्वाद तुम रखो सहेजकर। मैं हैमबर्गर खाऊंगा। लो जाता हूं मां। तुमने जगाना सीख लिया है मन। ... लो जाता हूं देश। तुम्हें मैं कभी देख-सुन छू नहीं सका...लो जाता हूं मैं। गया नहीं तो सारे झूठ निथर आएंगे। झूठा कहलाऊंगा...
‘निष्कवच’ पढक़र ग्राम्शी का एक कथन याद आया- कला स्वयं ही रुचिकर होती है। उसके औचित्य के लिए किसी बाहरी कारण की जरूरत नहीं। क्योंकि वह जीवन की एक विशिष्ट आवश्यकता को संतुष्ट करती है।  (अपूर्वानंद द्वारा उद्धृत हंस दिसम्बर 93) ‘निष्कवच’ नि:संदेह युवापीढ़ी को लेकर रचे गए दो वृत्तांत हैं। दोनों के मुख्य पात्र जीवन के द्वार पर दस्तक ही नहीं दे रहे, चुनौतियों का सामना करने को तैयार हैं। उनका संघर्ष विपरीत परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष है। दोनों दिए हुए इतिहास को खारिज कर अपना इतिहास रचने को सन्नद्ध हैं। कदम-कदम पर जोखिम जरूर है परन्तु उनमें नकार नहीं है। रचनाकार के नाते राजी सेठ की यथार्थ की पकड़ और अंतर्भेदनी दृष्टि कमाल की है। भाषा की बावत शैलेश मटियानी का कथन याद आता है कि ‘जितना रकबा आदमी का, उतना ही भाषा का है आदमी का कोई सवाल ऐसा नहीं, जो भाषा का सवाल न हो, आदमी खरा है तो भाषा भी खरी होगी।’ साहित्य की खिदमत में एक रचनाकार को भाषा कमानी पड़ती है, तभी उसकी भाषिक संरचना बेहतरीन हो सकती है, नि:संदेह राजी सेठ यह कार्य सम्पन्न कर चुकी है। ‘निष्कवच’ का दूसरा वृत्तांत तो मार्क करने वाली पेंसिल को सांस लेने की मोहलत तक नहीं देता।