Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ पर विचार-गोष्ठी

संस्कृति समाचार

1 मार्च, 2017 को कथाकार रमेश उपाध्याय के 75वें जन्मदिन पर उनकी नयी पुस्तक ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ पर राजस्थान के साहित्यकारों द्वारा जयपुर में एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। विचार-गोष्ठी का आयोजन राजस्थान उर्दू अकादमी तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र साहित्य संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। अकादमी के सचिव मोअज्जम अली और संस्थान के अध्यक्ष ईशमधु तलवार ने रमेश उपाध्याय का स्वागत और अभिनंदन करते हुए उन्हें उनके 75वें जन्मदिन पर बधाई और शुभकामनाएँ दीं। आलोचक डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने पुस्तक पर चर्चा आरंभ की। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं को कथा के रूप में नितांत नये ढंग से प्रस्तुत करने वाली यह पुस्तक मुक्तिबोध की कविताओं को समझने में सहायक होने के साथ-साथ उन पर नये सिरे से विचार करने को भी प्रेरित करती है। कथाकार डॉ. लक्ष्मी शर्मा ने कहा कि ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ नामक चरित्र के जरिये मुक्तिबोध के पूर्ण मनुष्य अथवा परिपूर्ण मनुष्यता के स्वप्नद्रष्टा स्वरूप को रमेश उपाध्याय ने इस पुस्तक में साकार किया है। उसका आधार हैं मुक्तिबोध की कविताएँ, जिनके शब्दों से ही कथा कही गयी है। वरिष्ठ आलोचक राजाराम भादू ने कहा कि रमेश उपाध्याय की यह पुस्तक काव्य-समीक्षा में एक नया प्रयोग है। युवा आलोचक हिमांशु पंड्या ने कहा कि जिस तरह उनकी कहानियाँ पात्रों की व्यक्तिगत विशेषताओं से ध्यान हटाकर उनकी सामान्यताओं के जरिये पाठक को एक बड़े और व्यापक यथार्थ की ओर ले जाती हैं, उसी तरह उनकी यह पुस्तक मुक्तिबोध की कविताओं से निर्मित ‘मुकामुस्व’ के चरित्र के जरिये व्यापक भूमंडलीय यथार्थ को उसकी जटिल समस्याओं के साथ सामने लाती है। कथाकार चरण सिंह पथिक ने कहा कि यथार्थ को कहानी में स्वप्न और फैंटेसी के जरिये सामने लाने में सिद्धहस्त कथाकार ही मुक्तिबोध की कविताओं का ऐसा सार्थक कथा-पाठ कर सकता था। कवि गोविंद माथुर ने कहा कि रमेश उपाध्याय कथाकार बाद में बने, पहले तो कवि ही थे और ऐसी पुस्तक एक काव्य-संवेदना से युक्त कथाकार ही लिख सकता था। वरिष्ठ कवि ऋतुराज ने पुस्तक की संरचना की प्रशंसा करते हुए कहा कि मुक्तिबोध की कविता भारत में माक्र्सवाद की विफलता का महाकाव्य है और रमेश उपाध्याय ने ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ में उस महाकाव्य का भाष्य अथवा विग्रह करते हुए उसी महाकाव्यात्मक विफलता की कथा कही है। इस विचार-गोष्ठी की एक विशेषता यह थी कि इसका कोई अध्यक्ष नहीं था। अत: अंत में अध्यक्षीय भाषण भी नहीं हुआ। अंत में हिंदी और राजस्थानी के वरिष्ठ कवि-कथाकार तथा आलोचक नंद भारद्वाज ने रमेश उपाध्याय के साथ एक सार्थक संवाद किया, जिसमें नंद भारद्वाज ने पुस्तक के संबंध में प्रश्न किये और रमेश उपाध्याय ने उनके उत्तर दिये। नंद भारद्वाज के प्रमुख प्रश्न थे: मुक्तिबोध की कविताओं का कथा-पाठ प्रस्तुत करते हुए आपकी कथा-चेतना प्रमुख रही या आपका वह काव्य-संस्कार, जो शुरू से ही आपके भीतर था? मुक्तिबोध की कविता पर लिखने के लिए कथा का शिल्प अपनाना आपको क्यों जरूरी लगा? आपने मुक्तिबोध की कविता में भूमंडलीय यथार्थ और यथार्थवाद देखा है। मुक्तिबोध का भूमंडलीय यथार्थवाद क्या है? गोष्ठी में ऋतुराज जी ने जो यह कहा कि मुक्तिबोध की कविता भारत में माक्र्सवाद की विफलता का महाकाव्य है, उस पर आपको क्या कहना है? रमेश उपाध्याय ने विस्तार से उनके प्रश्नों के उत्तर देते हुए कहा कि मैंने मुक्तिबोध की जटिल कविता को सरल कहानी बनाकर प्रस्तुत करने का काम नहीं किया है, बल्कि मुक्तिबोध की कविताओं को लगभग उन्हीं के शब्दों में ऐतिहासिक संदर्भों के साथ अपने अर्थ देकर प्रस्तुत किया है। इस प्रकार ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ अंस्र्ट फिशर की पुस्तक ‘माक्र्स इन हिज ओन वड्र्स’ की तर्ज पर कहें, तो ‘मुक्तिबोध इन हिज ओन वड्र्स’ है। मैं नहीं जानता कि इस पुस्तक को लिखने में मेरी कथा-चेतना प्रमुख रही या मेरा काव्य-संस्कार। मैंने यह पुस्तक मुक्तिबोध के निंदकों और प्रशंसकों का खंडन या मंडन करने के लिए भी नहीं लिखी है। मैंने देखा कि मुक्तिबोध स्वप्नदर्शी कवि हैं और उनकी प्राय: प्रत्येक कविता में एक आख्यान होता है। उनकी कविताएँ, खास तौर पर उनकी लंबी कविताएँ कहानियों की तरह सुनायी जा सकती हैं। यही देखकर उनकी कविताओं का कथा-पाठ प्रस्तुत करने का विचार मेरे मन में आया।  भूमंडलीय यथार्थवाद और ऋतुराज द्वारा दिये गये वक्तव्य के संदर्भ में रमेश उपाध्याय ने कहा कि  यह कहना कि मुक्तिबोध की कविता भारत में माक्र्सवाद की विफलता का महाकाव्य है, मेरे विचार से एक बहुत बड़ा, साहसपूर्ण और बहुत ही महत्त्वपूर्ण वक्तव्य है और मैं उनसे सहमत हूँ। मुक्तिबोध की कविता भारत के वाम आंदोलन की माक्र्सवाद और यथार्थवाद की समझ पर प्रश्नचिह्न लगाती है। भारत में माक्र्सवाद को भारतीय और भूमंडलीय यथार्थ को समझकर अपने मौलिक ढंग से लागू करने के बजाय दूसरे देशों और भिन्न परिस्थितियों में अपनाये गये तरीकों के अनुकरण के तौर पर लागू किया गया। भारतीय वाम माक्र्सवाद की इस मूल बात को शायद समझ ही नहीं सका कि जिस तरह पूँजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है, उसी तरह समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था है, इसलिए समाजवादी क्रांति किसी एक देश का मामला न होकर वैश्विक या भूमंडलीय मामला है। मुक्तिबोध ने अपनी भूमंडलीय यथार्थवादी दृष्टि से देख लिया था कि भारतीय वाम का मध्यवर्गीय नेतृत्व समझौतापरस्त होकर वाम आंदोलन को विभाजन और विघटन की तरफ ले जा रहा है। वे इसी मध्यवर्गीय चरित्र की आलोचना अपनी कविताओं में कर रहे थे। इस प्रकार देखें, तो ऋतुराज जी ने अपने वक्तव्य को स्पष्ट करते हुए सही ही कहा है कि यह माक्र्सवाद की विफलता नहीं, बल्कि भारत में माक्र्सवाद की विफलता है।
प्रस्तुति: संज्ञा उपाध्याय, 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली-110063, मो. 09818184806