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Tuesday 21 Nov 2017

मैं व्यंग्यालोचक नहीं होता तो अधूरा होता- बालेन्दुशेखर तिवारी


डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी
2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर, कोलकाता-700110
मो. 09433675671
लीलाधर मंडलोई के शब्दों में -
मैं उन आवाज़ों में हूं जिनमें मुक्ति का गान गूंजता है
मैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूं
मैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरह जीत के लिए मर जाना चाहता हूं।
पिछले माह हिंदी के मूर्धन्य व्यंग्यकार, समीक्षक, आलोचक व साहित्य-शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी जी के देहावसान की दुखद खबर ने संपूर्ण हिंदी जगत को स्तब्ध कर दिया। याद आता है नवंबर 2015 का वह दिन जब अचानक मोबाइल पर एक नया नंबर उभरा और उस पार से एक बुज़ुर्ग विद्वान की आवाज़ गूंजी। ‘रेशमी जी, मैंने आपकी लिखी समीक्षाएं पढ़ीं हैं, अच्छी लगीं, काफी चिंतन-मनन के बाद आप लिखती हैं। मैं दो किताबें भेज रहा हूं, उसकी भी समीक्षा लिखकर मुझे मेल कर दें।‘ बालेंदुशेखर तिवारी जी से पहला संवाद, एक सुपरिचित व्यंग्यकार व सहृदय बुजुर्ग़ साहित्यकार। मुझे खुशी हुई, बहुत ज्यादा! बताया, सर, जब मैं पीएचडी के लिए हिंदी व्यंग्य साहित्य में हरिशंकर परसाई के अवदान पर शोध कर रही थी, तब आपकी व्यंग्य रचनाओं को भी पढ़ा था। मुझे आपकी लेखनी की गहराई व तीव्रता बेहद पसंद है। उस पार से केवल एक विनम्र धन्यवाद। धीरे-धीरे महीने दो महीने में बात हो जाती, एक के बाद एक आपने चार किताबें मुझे भेजीं, समीक्षा लिखने के लिए। लेकिन हर वार्तालाप के दौरान मुझे एक बात स्पर्श कर जाती, आपका बहुत कम बोलना। आशीष देते, लेखन व साहित्य के विषय में संवाद होते, पर मितभाषी थे, निस्संदेह।
आपके व्यंग्य के तीखेपन और उसकी तीव्रता की चोट व धार से मैं बहुत पहले से ही परिचित थी। समाज की विद््रूपताओं को तर्काश्रित प्रासंगिकता के बल पर प्रचलित धारणा से अलग कर बहस के घेरे में डालना, उधेडऩा, सोचने पर बाध्य करना। सन 2005 में वस्तुनिष्ठ काव्यशास्त्र नामक आपकी पुस्तक पाठकों के हाथ लगी, जिसमें संपूर्ण भारतीय व पाश्चात्य काव्य-चिंतन पर व्यापक रूप से विचार किया गया है। काव्यशास्त्र के ग्रंथ अक्सर अपनी बोझिल भाषा एवं विषय-वस्तु के गूढ़-गंभीर विस्तार के कारण पाठकों के लिए दुरूह हो जाते हैं। तिवारी जी की उक्त पुस्तक पाठक की जिज्ञासा और ज़रूरत के साथ पूरा न्याय करती है। विश्लेषण व मूल्यांकन की परिपक्वता को अत्यंत सुबोध व सहज ढंग से प्रस्तुत करती है। इसमें भारतीय काव्यशास्त्र के प्रत्येक महत्वपूर्ण अंग से लेकर पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अहम मुद्दों को अपने बौद्धिक, तर्कशील व जिज्ञासापूर्ण समझ के साथ आपने व्यक्त किया है। यह ग्रंथ काव्यशास्त्र के क्षेत्र में एक ऐसी उपलब्धि मानी जा सकती है जिसमें आपकी आलोचनात्मक चेतना भारतीय व पाश्चात्य विद्वानों की विचारधारा को पूरी तन्मयता, वास्तविकता व साहित्यिक अभिरुचि के साथ उभारती है। जैसे आमतौर पर अलंकारों की चर्चा करते हुए ग्रंथों में किसी अलंकार की परिभाषा के साथ उसके उदाहरण को देते हुए विषय को समेट लिया जाता है। पर तिवारी जी ने उक्त ग्रंथ में चर्चित अलंकारों के साम्य-वैषम्य की भी ब्यौरेवार चर्चा की है। शब्दशक्ति के भेद अक्सर पाठकों व शोधकर्ताओं के लिए खासे सिरदर्द का विषय बन जाते हैं पर उक्त ग्रंथ में बड़े व्यवस्थित व सुबोध ढंग से इन भेदों-उपभेदों को एक सहृदय विद्वान व पाठक की दृष्टि से समझाया गया है। नवोदित विमर्शों के शास्त्र शीर्षक अध्याय में आपने नारी विमर्श से लेकर बाल विमर्श, विकलांग विमर्श से लेकर दलित विमर्श की परिधियों पर चिंतन किया है। आपके शब्दों में - इतने सारे विमर्शों की दुनिया में साहित्य हमारे उत्तर आधुनिक काल में एक साथ ही अग्रसर है। समय की शिला पर विमर्शों की इस मेहंदी के पिसने की तैयारी हो चुकी है। सिर्फ  रंग आने की देर है। विमर्श के इन्हीं प्रसंगों से मौजूदा समीक्षा-दिशाएं ओत-प्रोत हैं। विमर्शों की इस ज़मीन पर सोच और विश्लेषण के नए-नए मानकों का विस्तार अपने आगामी कल के काव्यशास्त्र का आकाशदीप बनेगा।
2016-17 में आपने अनुवाद शास्त्र पर एक नई पुस्तक का संपादन किया। पुस्तक हाथ में आते ही उसमें संकलित अध्यायों में अनुवाद के महत्वपूर्ण तकनीकों, पारिभाषिक शब्दावली, प्रासंगिकता, अनिवार्यता व अपेक्षाओं, संभावनाओं के साथ अनुवाद और स्त्रीवाद, मीडिया व कम्प्यूटर अनुवाद जैसे नवीनतम विषयों पर एकत्रित सामग्री पाठकों की सोच के झरोखों पर दस्तक देने लगी। आपने वर्तमान समाज को अनुवाद का युग मानते हुए भविष्य की अपरिहार्यता के रूप में अनुवाद की असीम संभावनाओं की बात कही है। संपादक के रूप में तिवारी जी का योगदान इस पुस्तक में साकार हुआ है। अनुवाद से जुड़े प्रत्येक विचार, कठिनाई व मंजि़ल पर आपकी सजग सोच की छाप मिलती है। संकलित निबंधों का चयन करते हुए आपने संपादन की अवधारणा को सार्थक रूप दिया है। आपकी विवेचना व विश्लेषण शक्ति सतत गतिशील रही। संपादक की प्रतिबद्धता के प्रति आपकी सावधानी पाठक को अभिभूत कर देती है।
एक कोश के निर्माता के रूप में आपका गहन चिंतन-संसार अपनी समग्रता, जीवंतता व प्रामाणिकता के साथ हिंदी हास्य व्यंग्य कोश नामक ग्रंथ में उभरा है। कोश निर्माता का दायित्व निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी दायित्व है। हास्य-व्यंग्य ने कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से जीवन और जगत की विकृतियों की तीखी आलोचना की है। आए दिन इस विधा की रचनाएं, पुस्तकें प्रकाशित हो रहीें है, इनमें से कई अपने महत्व को दर्ज भी कर रही हैं। पर बहुत कुछ समय की तेज़ रफ्तार में बिखर रहा है, छूट रहा है। तिवारी जी ने पूरी सावधानी व एकनिष्ठा के साथ हिंदी हास्य-व्यंग्य संसार के पोषण व संरक्षण का गुरूदायित्व इस कोश के माध्यम से निभाया है। यह कोश उनके अथक परिश्रम व व्यंग्य विधा के प्रति अतुलनीय निष्ठा को प्रमाणित करता है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि कोई भी कोश तैयार करने में एकाधिक विद्वानों की टीम एकजुट होकर काम करती है पर अकेले तिवारी जी ने अपनी लगन व लंबे अरसे से व्यंग्य विधा से जुड़े होने के महत अनुभव के बल पर टीमवर्क की शक्ति को स्वयं साकार कर दिया है। यह पुस्तक अपने दीर्घाकार में हिंदी के हास्य-व्यंग्यकारों का ब्यौरेवार लेखा-जोखा हमारे हाथों में सौंप देती है। 451 पृष्ठों की यह पुस्तक हिंदी हास्य-व्यंग्य क्षेत्र को सुगठित करने का विचारपरक प्रयास है। एक विस्तृत विषयफलक को समेटते हुए भी कोश निर्माण के मूलभूत सिद्धांतों का पूर्ण रूप से तिवारी जी ने अनुसरण किया है। प्रत्येक अध्याय में लेखक या कृति के आद्यक्षर के रूप में सूची का निर्माण किया गया है। क्रम संख्या, पृष्ठ संख्या, प्रकाशन काल, प्रकाशन केंद्र, विधा आदि पर पूरी सावधानी के साथ कार्य सम्पन्न किया गया है। अत: निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आपनेे हिंदी हास्य व्यंग्य कोश के रूप में एक प्रामाणिक एवं समावेशी कोश का निर्माण किया है।
आपने अपने रचनात्मक उद्देश्य को नवीन संदर्भों व नए प्रसंगों के साथ जोडक़र व्यंग्यालोचन के पार -द्वार कृति में प्रस्तुत किया है। उक्त ग्रंथ में आपकी नवीन उद्भावनाओं ने हिंदी व्यंग्य जगत के प्रत्येक गली-कूचे की खबर ली है। उक्त पुस्तक में आपने भारत में व्यंग्य-कर्म के इतिहास, हिंदी के व्यंग्यकारों की रचनाधर्मिता, आज के प्रतिकूल वातावरण में व्यंग्यकर्म के औचित्य व हिंदी व्यंग्य-लेखन के भविष्य को बेहतर बनाने के प्रति अपनी साहित्यिक दृष्टि व वैचारिक मनोभूमि को उद्वेलित किया है। इस पुस्तक से गुजऱते हुए यह आभास होता है कि तिवारी जी व्यंग्यालोचक के रूप में पारखी भी हैं और पाठक भी। व्यंग्यकार के इरादों और बड़ी चिंताओं से उनका सरोकार है। वैषम्यविरोधी व्यंग्य-लेखन की व्यापकता व गहराई पर उन्हें पूरा विश्वास है। वे व्यंग्यकार की बेचैनी को समझते हैं और स्वयं भी कहीं बेकल से प्रतीत होते हैं।
जिस प्रकार कोई क्रांतिकारी विचारधारा विरोधियों की आलोचना से विफल नहीं होती ठीक उसी प्रकार हास्य-व्यंग्य के माध्यम से हमारी विचार-परिधियों में लगे जंग को खरोचकर निकालने का आपका दुर्दमनीय साहस पाठकों को अभिभूत कर देता है। आपके संपूर्ण रचनात्मक व्यक्तित्व में आपका व्यंग्यकार रूप केंद्रीय रहा परंतु अपनी विचार-शक्ति की प्रतिभा सम्पन्नता के बल पर पटना-रांची के साहित्यिक परिवेश में पूरी शिद्दत से शामिल होने वाले इस विद्वान ने विविध क्षेत्रों में सम्पन्न व समृद्ध साहित्यिक योगदान दिया है। आपके रचना-जगत की विकास-प्रक्रिया ने लगभग पांच दशकों से व्यंग्यात्मक रचनाओं का सुलभ, तेजस्वी व विवेकपूर्ण संसार हमारे सुपुर्द किया। आपकी अध्ययनशील चेतना ने अनुवाद, एकांकी, कविता, व्यंग्यालोचना, प्रयोजनमूलक हिंदी, काव्यशास्त्र आदि पर ऐसे बुनियादी व सक्रिय सामग्री तथा ग्रंथ हमें दिए हैं, जिन्होंने हिंदी जगत के आग्रह व जिज्ञासा में इज़ाफा किया है। जाहिर है, बालेंदुशेखर तिवारी जी ने आधुनिक हिंदी रचना-युग को समझने में हमारी सोच को कुछ और तथ्यपरक, तार्किक व संवेदनशील बनाया है।