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Saturday 18 Nov 2017

प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल : आसमान छूता वृक्ष


विजय गुप्त
संपादक साम्य, ब्रह्म रोड, अम्बिकापुर, जिला- सरगुजा (छ.ग.) 497001,
 मो. 09826125253
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल का जिक्र होते ही स्मृति में एक आसमान छूता, चारों ओर अपनी बाहें फैलाए, सघन वृक्ष लहराने लगता है। उसके प्राणदायिनी झोंकों से हम विद्यार्थियों के चेहरे खिल उठते थे। हम अपने वर्तमान से निकलकर अतीत के आकाश में उडऩे लगते थे। हमारे सहचर होते थे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद, पंत-प्रसाद-निराला-महादेवी और मुक्तिबोध। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह भी चले आते थे। कहीं बहुत दूर से सूर, तुलसी, रहीम, रसखान, घनानंद, देव, भूषण आशीष लुटाते नजर आते थे। हिन्दी साहित्य के महान प्रदेश के नागरिक बन हम पूरे महाविद्यालय में दनदनाते फिरते थे।
हिन्दी साहित्य के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने की मेरी कथा दिलचस्प है। उन दिनों मैं अंग्रेजी साहित्य खूब पढ़ता था। हरिवंश राय बच्चन और रांगेय राघव के हिन्दी अनुवाद के रूप में शेक्सपियर की बहुत सी कृतियां पढ़ चुका था। हेमलेट, रोमियो-जूलियट और जूलियस सीजर को अंग्रेजी में पढक़र शेक्सपियर का मुरीद हो चुका था। अंग्रेजी साहित्य के प्रति दीवानगी को राजपाल प्रकाशन के किशोर साहित्य सीरिज ने भी हवा दे दी थी। उन दिनों रॉबिन्सन क्रूसो और रॉबिनहुड मेरे हीरो रहा करते थे. बी.ए. के बाद दृढ़ निश्चय कर चुका कि अंग्रेजी साहित्य से ही एम.ए. करूंगा। अम्बिकापुर महाविद्यालय से प्रवेश आवेदन फॉर्म भी ले आया था। फॉर्म अच्छे से भरकर अगले दिन अंग्रेजी विभाग में जाने का फैसला कर मैं शाम को शहर भ्रमण करने निकल पड़ा।
घूम-फिरकर शाम को मैं परिवार की पुश्तैनी दुकान ‘पंचशील स्वीट्स’ में बड़े भाई साहब विनय गुप्ता से गप-शप कर रहा था। तभी वहां प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल पहुंचे। मैंने उन्हें सादर प्रणाम किया। उन्होंने गौर से देखा। आशीर्वाद दिया। अचानक पूछा, ‘सुना है, आप अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. करने जा रहे हैं?’
-‘जी सर!’ मैंने कहा।
-‘कल आप कॉलेज में मेरे विभाग में आएंगे (क्षणिक चुप्पी) और हिन्दी साहित्य से एम.ए. करेंगे।’
अगले दिन मैंने शेक्सपियर से माफी मांगी, उनका आशीर्वाद लिया और हिन्दी साहित्य का विधिवत विद्यार्थी बन गया। 1960 और 1970 के दशकों में साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करना सम्मान और गौरव की बात समझी जाती थी। दुर्भाग्य से अब यह नौकरी और डिग्री पाने का खेल हो गया है। कॉलेज के गलियारों में अब म•ााकन यह बात कही जाती है कि जब किसी विभाग में दाखिला न मिले तो बेझिझक हिन्दी विभाग में चले आओ। इसी जुमले को मैं यदि मुहावरेदार हिन्दी में कहूं तो शायद हिन्दी विभाग की लाचार और दयनीय स्थिति स्पष्ट हो जाए : ‘‘यदि आपकी दाल कहीं न गले तो हिन्दी का चूल्हा और बटुआ दोनों तैयार हैं।’’ अपात्र गुरुओं और अयोग्य चेलों ने हिन्दी का बटुआ तो जलाया ही, हिन्दी का चूल्हा भी बुझा दिया।
बाबूलाल शुक्ल उच्चारण और वर्तनी की शुद्धता के प्रति बहुत सचेत रहते थे। व्याकरण की भूलों को वह बर्दाश्त नहीं करते थे। भाषाविज्ञान की कक्षाएं वह स्वयं लेते थे। उन्हीं की कक्षाओं में हम लोगों ने ‘श’, ‘ष’ और ‘स’ के भेद को समझा। ‘क्ष’ का उच्चारण करना सीखा। विराम चिन्हों की प्रयोग विधि जानी। उर्दू के नुक्तों को बरतना सीखा। शब्द कब तीर बन जाते हैं, कब ढाल? कब हंसी बन जाते हैं, कब आंसू? कब घाव बन जाते हैं, कब मरहम? यह सब वाणी के आरोह-अवरोह, तीक्ष्णता-कोमलता, बलाघात आदि से जाना। पहली बार शब्दों की चमत्कारिक शक्ति पर अटूट विश्वास हुआ। कविता पढ़ाते समय प्रोफेसर शुक्ल अत्यंत उर्जस्वित हो उठते थे। विशेषकर प्रसाद,निराला और मुक्तिबोध की कविताएं। निराला की अत्यंत क्लिष्ट, भाव-सघन और अर्थदीप्त कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ उनके अद्भुत पाठ से ही खुली और खुलती चली गई। कहते हैं कि कविता का सच्चा पाठ ही कविता की आत्मा का प्रवेशद्वार है। गायक का पहला सुर ही बता देता है कि वह कच्चा है या पक्का। यदि द्वार नहीं खुला तो भवन की भव्यता क्या दिखेगी और सुर ही नहीं लगा तो गान की दिव्यता क्या हृदय छुएगी। बाबूलाल शुक्ल हृदय छूना और मर्म तक पैठना जानते थे। अपने शिष्यों से ही वह निरंतर अभ्यास और अथक साधना चाहते थे। अब कहां ऐसे सच्चे और ज्ञानी गुरुजन जो अपने निर्दोष और हृदयस्पर्शी पाठ से कविता का जादुई संसार दिखा सकें? सुर-ताल और लय का अद्भुत समायोजन दिखा सकें? वह ‘कामायनी’ पढ़ाते हुए कहते थे कि ‘इड़ा’ (बुद्धि) और श्रद्धा (हृदय) का संतुलन ही कविता की प्राण शक्ति है; जीवन का आधार है। यह संतुलन बिगड़ा नहीं कि भयानक प्रलय, कविता का अंत और जीवन की समाप्ति।
बाबूलाल शुक्ल जीवन और कविता की शक्ति से भरे हुए थे। वह स्वयं कविता नहीं लिखते थे लेकिन हम जैसे नवोदित कवियों के गुरु और प्रेरणास्रोत थे। जब वह ‘अंधेरे में’ की काव्यपंक्ति बाआवाजे बुलन्द पढ़ते थे- ‘कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई’ तो कक्षा में सन्नाटा छा जाता था। हम गहरी उत्तेजना और आवेग से भर उठते थे।  पचास साल पहले लिखी गई कविता में दूरदर्शी कवि की भविष्यवाणियों को आज हम अपने आंखों के सामने घटित होते देख रहे हैं। देश और दुनिया का सच दो शब्दों में सिमट कर रह गया है- ‘आग’ और ‘गोली’। कविता से निकलकर डोमाजी उस्ताद और उसके गुर्गे शक्ति और सत्ता के सभी केन्द्रों पर काबिज हो चुके हैं। वह मुक्तिबोध के साथ अपने प्रिय कवि निराला की इस पंक्ति को अक्सर दोहराया करते थे, ‘शक्ति है उधर, अन्याय है जिधर’। कवियों के बीच समानता और भिन्नता दिखाने का उनका यह ढंग मुझे बहुत भाता था।
वह पाठ्यक्रम पूरा करने के लिहाज से कभी नहीं पढ़ाते थे। वह तो अपने शिष्यों के भीतर भाषा की शक्ति जगाना चाहते थे। कविता की आग जलाना चाहते थे। उन्हें साहित्य साधना के पथ पर खड़ा करना चाहते थे। आज उनके कई शिष्य अशोक गुप्त, वेदप्रकाश अग्रवाल, गीता गुप्त, विजय अग्रवाल और विजय गुप्त कविता की साधना में जुटे हुए हैं। शुक्ल जी से प्रभावित कई लोग जो उनके शिष्य नहीं थे आज साहित्य की कई विधाओं में लेखन कर रहे हैं। उनमें प्रमुख हैं डॉ. रामकुमार मिश्र (आलोचना) नवल शुक्ल (कविता)।
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल का दृढ़ विश्वास था कि साहित्य का शिक्षण तब ही सफल और सार्थक होगा जब नई पीढ़ी अपनी विराट लेखकीय बिरादरी से जुड़ेगी और अपने पुरखों से सीखते-समझते हुए एक नया रास्ता बनाएगी। उन्होंने बड़े प्रेम और जतन से अपने विद्यार्थियों की लेखकीय प्रतिभा को संवारा और विकसित किया। छठवें-सातवें दशक में हिन्दी में युवा रचनाकारों की एक बड़ी तादाद सामने आई थी। यह रचनात्मक विस्फोट एकाएक नहीं हुआ। इसके पीछे माक्र्सवादी विचारधारा, प्रगतिशील आंदोलन, लघुपत्रिका आंदोलन तथा महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों की बड़ी भूमिका थी। हिन्दी के ख्यात और समर्पित गुरुजनों ने नए रचनाकारों को निखारने में अपने को होम कर दिया था। अपनी अग्नि से शिष्यों के स्वर्ण को तपा-तपाकर उन्होंने कुंदन बना दिया था। सागर विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी-विभागाध्यक्ष और सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. प्रेमशंकर बाबूलाल शुक्ल को अपने योग्यतम शिष्यों में से एक मानते थे।
इस योग्यता को अर्जित करने में बाबूलाल जी ने अथक परिश्रम किया था। जीवन के दो मंत्रों को उन्होंने प्राणपण से साधा था- अनवरत अध्ययन और अपने पर सख्त नियंत्रण। परिश्रम और नियंत्रण ने ही उन्हें पेशेगत शुचिता और नीति सम्मत कामकाज का हिमायती बनाया था। इसका अनुभव मुझे दो बार हुआ। पहला, एम.ए. प्रीवियस की कक्षा में अपने विद्यार्थी काल में। दूसरा, अम्बिकापुर महाविद्यालय में हिन्दी के एडहॉक लेक्चरर के रूप में। अध्ययनकाल में प्रो. सरोज कुमार मिश्र पहली बार हम लोगों को आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘चिंतामणि’ पढ़ाने आए। अशोक गुप्त और मैं उन दिनों माक्र्स-एंगेल्स-लेनिन को घोखने में लगे थे। नए-नए माक्र्सवादी बने थे। हम लोगों ने शुक्ल जी को लेकर लगातार मिश्र जी से बहस की। वह हमारे प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे लेकिन हमारे प्रश्नों की बौछार से बहुत परेशान हो गए थे।
कक्षा छूटने के बाद बाबूलाल शुक्ल जी ने हमें बुलाया। हम दोनों उनके कक्ष में पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘‘प्रश्न पूछना अच्छी बात है। आइन्दा प्रश्न पूछना तो मुझसे या डॉ. श्यामसुंदर दुबे से, और किसी से नहीं। जाओ।’’ हमारी शिकायत हो चुकी थी और हम खिन्न मन से मुंह लटकाए हुए विभाग से लौटे। दूसरी घटना तब की है जब मैं एम.ए.हिन्दी के बाद एडहॉक लेक्चरर हो गया। इस बार भी घटना के केन्द्र में प्रो. मिश्र ही थे। वह स्नातक कक्षाओं में मोहन राकेश (प्रसिद्ध नाटककार) पढ़ाते थे। एक दिन मैं बी.ए. अंतिम की कक्षा में पढ़ा रहा था। विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान मोहन राकेश और उनके नाटक ‘लहरों के राजहंस’ की चर्चा चल पड़ी। मैं नया-नया मुल्ला (प्राध्यापक) बना था। ज्यादा प्याज-प्याज कर रहा था। आव देखा न ताव मोहन राकेश जी पर पूरा व्याख्यान धाराप्रवाह दे डाला। छात्र-छात्राओं पर रौब तो गालिब हो गया लेकिन आफत और शामत की जुगलबंद भी हो चुकी थी। मुझसे पहले मेरा दुर्भाग्य हिन्दी विभाग में पहुंच चुका था। बाबूलाल शुक्ल तमतमाए हुए बैठे थे। मुझे देखते ही फट पड़े। ‘क्या समझते हो अपने आपको? तुर्रम खां? महाज्ञानी? दूसरे तो बेवकूफ हैं? है ना? प्रोफेशनल एथिक्स समझते हो कि नहीं?’ किनारे की कुर्सी पर बैठे डॉ. श्यामसुन्दर दुबे जी मंद-मुंद मुस्कुरा रहे थे और आंखों से सांत्वना की थपकियां दे रहे थे। मुझे सनाका मार चुका था। कान की लवे जल रही थीं। चेहरा दुख और क्षोभ से लाल हो चुका था। बस, धरती के फटने का इंतजार था। अचानक घन गर्जना थम गई। शांत और गुरु गंभीर स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘अपना विषय ही पढ़ाया करो! दूसरे का विषय पढ़ाना नीतिविरुद्ध है। जाओ!’’
प्रोफेशनल एथिक्स का पाठ मैंने अपने गुरु से ही सीखा। इसके बाद मैंने कभी दूसरों के कार्यक्षेत्र में दखलंदाजी नहीं की। बाबूलाल शुक्ल जी नीति और आदर्श के तो पक्के थे ही; विभाग और विद्यार्थियों की बेहतरी के लिए बराबर सोचा करते थे। कुछ नया और लीक से हटकर किया करते थे। 1973-74 में एम.ए. फाइनल में एक प्रश्नपत्र विशेष लेखक/कवि पर केन्द्रित होता था। मैंने विशेष अध्ययन के लिए प्रेमचंद को चुना था।
बाबूलाल शुक्ल जी ने उसी वर्ष विशिष्ट लेखक/कवि की जगह ‘छत्तीसगढ़ी’ पढ़ाने का निश्चय किया। हिन्दी की उच्च शिक्षा के अंतर्गत पहली बार एक स्वतंत्र प्रश्नपत्र के रूप में लोक साहित्य का समावेश किया गया। मैंने दुखी मन से ‘छत्तीसगढ़ी’ पढऩा शुरू किया। ‘छत्तीसगढ़ी’ बाबूलाल शुक्ल जी ही पढ़ाते थे। बहुत रम के, आनंद और मनोयोग के साथ। थोड़े दिनों के बाद छत्तीसगढ़ी में मन लगने लगा। शिष्ट नागर साहित्य के साथ लोक साहित्य का अध्ययन मेरे भीतर आकार ले रहे लेखक के लिए बहुत फलदायी सिद्ध हुआ। मैंने लोक-साहित्य और कला की अपूर्वशक्ति और जीवंतता को महसूस किया। यह गुरुवर शुक्ल जी का ही कृपादान है कि लोक का एक सर्वथा नया संसार अपनी विविध छटाओं और चमक के साथ अनावृत्त हुआ। अद्भुत अर्थासंपन्न ध्वन्यात्मक शब्दों से मेरा परिचय हुआ। ‘रिंगी-चिंगी’, ‘सुटुर-पुटुर’, ‘तिडि़मझकास’, ‘रुनुझुनु’ जैसे न जाने कितने शब्द-जोड़ों से मेरी अंतरंगता बढ़ी। नाप-तौलकर, ठोक-बजाकर, बेहद किफायत के साथ मन की बात कहना और चोट भी करना मैंने लोक-साहित्य से सीखा। बहुत हार्दिकता के साथ इस सत्य का अनुभव हुआ कि हिन्दी की बोलियां ही हिन्दी की प्राणशक्ति हैं। वे हिन्दी में ‘गुप्त ऊर्जा’ की तरह समाई हुई हैं। शिष्ट साहित्य लोक साहित्य से मिलकर द्विगुणित शक्ति और अभिव्यंजना से भर जाता है। शास्त्र और लोक एक-दूसरे के पूरक हैं।
बाबूलाल शुक्ल ने अपनी एकमात्र पुस्तक ‘इधर उधर की’ (रचना प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1982) में लिखा है कि ‘‘लोक साहित्य ने आभिजात्य साहित्य का उपकार भी कम नहीं किया है। साहित्यकारों ने हर काल में लोक साहित्य की अनेक रुढिय़ों का अनुसरण कर आभिजात्य साहित्य को नए क्षितिज दिए हैं। इस संदर्भ में हिन्दी साहित्य का उदाहरण दिया जा सकता है। नरपति नाल्ह, विद्यापति, मलिक मोहम्मद जायसी आदि हिन्दी के पुराने कवियों ने विरह वर्णन में बारहमासा की जो शैली अपनाई, वह सीधे-सीधे लोकगीतों से आई थी। आधुनिक हिन्दी साहित्य में अनेक रुढिय़ां ऐसी हैं जो लोक साहित्य से ली गई हैं- निराला की प्रसिद्ध रचनाएं- राम की शक्तिपूजा, पंचवटी प्रसंग आदि लोक साहित्य की अनेक रुढिय़ों का अनुवर्तन करती हैं। हिन्दी के नाटकों का जन्म ही लोकनाट्यों से हुआ है। आज भी अनेक नाट्यकर्मी हैं जो लोक नाट्य की अनेक रुढिय़ों को नाटकों में समायोजित कर रहे हैं। कविता के क्षेत्र में लोक धुनों के प्रयोग हिन्दी के अनेक कवियों में देखे जा सकते हैं।’’ (पृष्ठ-12-13)
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल पूरी तरह लोकरंग में रंगे हुए थे। लोक ने ही उन्हें नागर साहित्य को समझाने की अंतर्दृष्टि दी थी। इस रंग का ही असर था कि शुष्क और रसहीन भाषाविज्ञान की कक्षाएं सरस ज्ञानामृत से भर जाया करती थीं। उनकी पुस्तक ‘इधर उधर की’ में कुल 19 निबंध संकलित हैं। छोटे लेकिन बेहद कसे और गठे हुए। सुघड़ और सुव्यवस्थित। एकदम टंच। जैसे कोई लोकगीत; जैसे इकतारे का तना हुआ तार। नौ निबंध सीधे-सीधे लोक जीवन और साहित्य से जुड़े हुए हैं। तीन निबंध क्रमश: ‘अपनी जमीन की तलाश’, ‘पंडित हीराराम त्रिपाठी’, ‘पं.सुंदरलाल शर्मा’ अपने छत्तीसगढ़ अंचल से जुड़े हुए हैं। ‘अपनी जमीन की तलाश’ डॉ. नरेन्द्र देव के उपन्यास ‘सुबह की तलाश’ की सारगर्भित चर्चा है। उपन्यास का गांव छत्तीसगढ़ का ही गांव है। पंडित हीराराम त्रिपाठी छत्तीसगढ़ के यशस्वी कवि थे। इस महत्वपूर्ण निबंधन से ज्ञात होता है कि भारतेन्दु युग का गहरा प्रभाव छत्तीसगढ़ अंचल पर भी पड़ा था। बाबूलाल शुक्ल ने लिखा है कि ‘‘... काशी का एक लघुसंस्करणीय रूप चित्रोत्पला के किनारे शिवरीनारायण नगर में हमें मिलता है। शिवरीनारायण केन्द्र के नाभि केन्द्र थे भारतेन्दु युग के प्रतिभाशाली साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह। ठाकुर जगमोहन सिंह शिवरीनारायण में तहसीलदार होकर आए थे। शिवरीनारायण में उन्होंने साहित्यकारों का एक दल तैयार किया। इसे हम जगमोहन मंडल कहना समीचीन समझते हैं। ठाकुर साहब की ‘सज्जनाष्टक’ नामक पुस्तिका में उनके मंडल के आठ साहित्यकारों का हवाला है। पंडित हीराराम त्रिपाठी उन आठ साहित्यकारों में एक थे।’’  (पृष्ठ 85)
पंडित सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ की अद्भुत मेधा और बहुविध प्रतिभा के धनी थे। वह साहित्यिक और राजनीतिक योद्धा एक साथ थे। मन, कर्म और वचन से वह सच्चे साहित्यकार और महान देशभक्त थे। स्वदेशी और सत्याग्रह आंदोलन का सूत्रपात कर गांधी जी के नेतृत्व में उन्होंने सर्वप्रथम छत्तीसगढ़ की आजादी का शंखनाद किया। यह सुगठित निबंध पं. सुन्दरलाल शर्मा के जीवन की सारगर्भित संक्षेपिका है। बाबूलाल शुक्ल ने उचित ही लिखा है, ‘पंडित सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ में नवीन सामाजिक चेतना और नवीन जन-जागरण के अग्रदूत भी थे और वैतालिक भी।’ (पृष्ठ-93)
ध्यातव्य है कि उपर्युक्त तीनों निबंधों में यहां का लोक और नागर जीवन अपने सम्पूर्ण सामाजार्थिक परिप्रेक्ष्य में व्यंजित हुआ है। ‘अपनी जमीन की तलाश’ शीर्षक निबंध में डॉ. नरेन्द्र देव के उपन्यास की पड़ताल करते हुए बाबूलाल शुक्ल ने लिखा है कि ‘सुबह की तलाश’ अपनी जमीन की तलाश और पहचान की कथा है। (पृष्ठ 81)। छत्तीसगढ़ी अस्मिता की तलाश और पहचान ही बाबूलाल शुक्ल के जीवन की कथा है। इस कथा रस में डूबकर ही उन्होंने अपने देश और संसार को जाना है।
पुस्तक में संकलित शेष सात निबंध सात रंगों का आभास देते हैं और मिलकर एक इन्द्रधनुष की रचना करते हैं। सरगुजा, छत्तीसगढ़ का ही एक अंग है। उन्होंने यहां के लेखकों की तीन पीढिय़ों को याद किया है अपने निबंध ‘सरगुजा के साहित्य में राष्ट्रप्रेम’ में। नई कविता के बिंब के प्रति आग्रह और दुराग्रह की जांच-पड़ताल की गई है ‘नई कविता के बिम्ब और मूर्तिमत्ता’ में। ‘जनता का साहित्य’ नामक आलेख में उन्होंने जनता और साहित्य के जटिल संबंधों को परिभाषित और व्याख्यायित किया है। प्रसिद्ध नव्य छायावादी कवि रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की काव्य यात्रा की खोज-परख की गई है निबंध ‘प्रत्यूष की भटकी किरण यायावरी’ में। ‘साहित्य रूप और सृजन प्रक्रिया के संदर्भ प्रसिद्ध कवि-आलोचक प्रमोद वर्मा की बहुचर्चित पुस्तक है। इस पुस्तक की गंभीर समीक्षा इसी शीर्षक के अंतर्गत बाबूलाल शुक्ल जी ने की है। ‘असंगत ज्योतिप्रवाह’ निबंध लोकनायक जयप्रकाश नारायण को लेखक द्वारा दी गई भावांजलि है। पुस्तक का अंतिम निबंध है ‘इतिहास : क्रमिक या धारावाहिक।’
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल की एकमात्र प्रकाशित पुस्तक ‘इधर उधर की’ की विधिवत समीक्षा नहीं है। अपने गुरुदेव के अंतर्मन को समझने में इस पुस्तक ने मेरी बहुत सहायता की है। उनके दृढ़ और प्रेरक व्यक्तित्व को मूर्तिमान करने के लिए अपने अनुभव और उनके द्वारा लिखित पंक्तियों का मैंने सहारा लिया है। अपने गुरु को गुरु की ही आंखों से देखने का प्रयास किया है। बाबूलाल शुक्ल अक्सर अपना प्रिय वाक्य दोहराया करते थे कि ‘‘आलस्य मेरा चिर सम्मानित सखा है।’’ वह पढ़ाने में, विद्यार्थियों की हित की चिंता करने में कभी कोई कोताही नहीं बरतते थे। हिन्दी के मान-सम्मान और अभिमान के लिए हमेशा सन्नद्ध रहते थे। आलस वह सिर्फ पुस्तक लिखने में करते थे। वह तो भला हो आकाशवाणी अम्बिकापुर का जिसने रेडियो के लिए उनसे 19 महत्वपूर्ण वार्ताएं लिखवा लीं और उन्हें समय-समय पर प्रसारित किया। आकाशवाणी के साथ रचना प्रकाशन को भी धन्यवाद जिन्होंने अम्बिकापुर आकाशवाणी द्वारा प्रसारित वार्ताओं को पुस्तक का रूप दिया। मैंने इस संस्मरण आलेख में अपने गुरुदेव को समझने का प्रयास किया है। उनके सुदृढ़ और प्रेरक व्यक्तित्व को मूर्तिमान करने के लिए अपने अनुभव और उनके द्वारा लिखित पंक्तियों का सहारा लिया है।
आज भी देश के विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों के ‘आर्काइव्स’ में हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखकों की प्रसारित वार्ताएं पड़ी हुई हैं। पुराने जमाने के टेपों में ध्वन्याकिंत रचनाओं का बहुत बड़ा भाग तो नष्ट हो चुका है और बचा-खुचा नष्ट होने के कगार पर है। यदि हम इन वार्ताओं, परिचर्चाओं, साक्षात्कारों और आमंत्रित श्रोताओं के सामने दिए गए भाषणों को बचा लें और प्रकाशित कर दें तो हिन्दी साहित्य और अन्य जातीय भाषाओं का साहित्य अनमोल दौलत से भर उठेगा। साहित्य इतिहास की कई पहेलियां और उलझनें हल हो सकेंगी। कई बिखरी कडिय़ां जुड़ पाएंगी और एक नया ताजगी भरा संसार सामने आ सकेगा। गल$फहमियों की जबान बंद होगी और कुछ नए रहस्यों से पर्दा भी उठेगा। एक जमाने में आकाशवाणी अम्बिकापुर का $खजाना नायाब और अनमोल रत्नों से भरा हुआ था। साहित्य और संगीत की कई बड़ी-बड़ी हस्तियों ने अपनी रचनाओं से अम्बिकापुर का मान बढ़ाया था। उर्दू-हिन्दी के बड़े और नामचीन शायर जनाब अमी$क हन्$फी का कार्यकाल आकाशवाणी अम्बिकापुर का स्वर्णिम काल था। पूरे देश में यह केन्द्र मशहूर था। उन दिनों संगीत और साहित्य की जुगलबंदी शीर्ष पर थी। बुद्धिजीवियों और कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था। तत्काल स्मृति के आधार पर कुछ नाम यहां लिख रहा हूं- उस्ताद हलीम जाफर खान, उस्ताद सुजात $खान (सितारवादक), उस्ताद रज्जब अली $खां, उस्ताद गुलाम मुस्त$फा, कंकणा बनर्जी (शास्त्रीय गायक), तीजन बाई (पंडवानी गायिका), अहमद-हुसैन-मोहम्मद हुसैन (गजल), गुलाबो (कालबेलिया नर्तकी), सोना बाई (मृदा शिल्पी), मुकुटधर पाण्डेय, त्रिलोचन, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, अमीक हन्फी, विष्णु खरे, भगवत रावत, शिवकुमार श्रीवास्तव (कवि), नईम, बुद्धिनाथ मिश्र (गीतकार), डॉ. श्रीनिवास रथ (उडिय़ा कवि), शकील ग्वालियरी (शायर), डॉ. कमलेश दत्त त्रिपाठी, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी (संस्कृत के उद्भट विद्वान), हबीब तनवीर (नाटककार निर्देशक), बंदे अली $फात्मी (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी), निर्मला देशपांडे (गांधीवादी विचारक), स्वामी आत्मानंद (दार्शनिक संन्यासी), विद्यानिवास मिश्र, डॉ. श्यामसुन्दर दुबे (ललित निबंधकार), शंकर (बांग्ला उपन्यासकार), माइकेल किण्डो (हॉकी खिलाड़ी), कमलाप्रसाद, सुरेन्द्र चौधरी, रामकृपाल पाण्डेय, बच्चन सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, धनंजय वर्मा, क्रांति कुमार जैन, अरुण कुमार (आलोचक), रतन सिंह, इकबाल मजीद, प्रभुनाथ सिंह आजमी (कहानीकार)। इन नामोल्लेख के पीछे मेरा मंतव्य सिर्फ इतना बताना है कि विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों के पास संगीत और साहित्य की अमूल्य थाती रखी हुई है। मूर्खता, जड़ता, अज्ञान और घनघोर लापरवाही के कारण ये अमूल्य थातियां नष्ट होती जा रही हैं। हिन्दी के दो मुख्य प्रगतिशील कवियों ने इन धरोहरों को बचाने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण काम किया है। कुबेरदत्त जी ने दूरदर्शन और कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेजों को प्रकाशित करने की दिशा में प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। उनकी असमय मृत्यु ने एक ऐतिहासिक कार्य पर विराम चिन्ह लिगा दिया। दूसरे कवि हैं लीलाधर मण्डलोई। उन्होंने अपने संपादन में ज्ञानोदय के अंक में आकाशवाणी के खजाने से कुछ महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की हैं। आकाशवाणी के ये ‘आर्काइव्स’ आज भी अपने बचे-खुचे स्वरूप में संगीत और साहित्य के अध्येताओं के लिए शोध-केन्द्र की भूमिका निभा सकती है। एक नई कार्यशाला में तब्दील हो सकती है।
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल आकाशवाणी की उपयोगिता और उसका महत्व समझते थे। वह हमें बताते थे कि अपनी जनता से जुडऩे का सबसे सशक्त, प्रभावशाली और सुलभ माध्यम है रेडियो। वह यह भी समझाते थे कि कैसे रेडियो के लिए वार्ताएं लिखनी चाहिए। स्टूडियो के माइक्रोफोन को कैसे बरतना चाहिए। पढऩे के दौरान विराम चिन्हों पर कहां और कितना विराम देना चाहिए और अपनी सांसों पर कैसे नियंत्रण रखना चाहिए? सांसों पर नियंत्रण का महत्व मैं अपनी संगीत गुरु श्रीमती सुशीला सुर्वे के कुशल मागदर्शन में काफी कुछ सीख चुका था। मुझे आश्चर्य सिर्फ इस बात पर था कि बाबूलाल शुक्ल तो गायक नहीं थे, वह कैसे सांसों के महत्व को इतनी बारीकी से समझते हैं। धीरे-धीरे मैं समझ सका कि कविता गुरुदेव के मन-प्राण में बसी हुई है। वह लय के महत्व और उसके जादुई असर को बखूबी समझते हैं। यही अनुभव मुझे अपने दूसरे गुरुदेव श्यामसुन्दर दुबे जी की कक्षाओं में होता था जब वे कवि बिहारी और घनानंद पढ़ाते थे या सूरदास के पदों की चर्चा करते थे। हिन्दी और संगीत की कक्षाओं में ही मैंने लयकारी सीखी। विलंबित, मद्धम और तार सप्तक की ऊंचाइयां नापी। सरलता और शुद्धता की कला-साधना सीखी।
प्रोफेसर बाबूलाल शुक्ल ने अपनी कक्षाओं को साहित्य और व्यक्तित्व निर्माण की कार्यशाला में बदल दिया था। इस कार्यशाला में वे नए प्रयोग करते रहे। साहित्य को समझने-समझाने के नए सूत्र गढ़ते रहे। नए रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहे। साहित्य के इतिहास के साथ हमें जीवन का पाठ भी पढ़ाते रहे। आज उनके कई शिष्य रचनारत हैं, उनकी अक्षर-स्मृति को अपने हृदय कक्ष में आग की तरह प्रज्जवलित किए हुए। उनकी पवित्र स्मृति को सादर प्रमाण।