Monthly Magzine
Saturday 25 Nov 2017

‘मैं जीवन से लेखन और लेखन से जीवन को जोडऩे और घटाने की कला में पारंगत हो चुकी हूं’

निर्मला डोसी

प्रख्यात रचनाकार सूर्यबाला से बातचीत
ए-5 ओरियन, सेक्टर 1 चारकोप, मंगलमूर्ति हॉस्पिटल के पास कांदिवली पश्चिम मुंबई-67
मो. 9322496620
साहित्य व संस्कृति की तपोभूमि बनारस में जन्म, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हुई शिक्षा, विवाहोपरांत पति के साथ की गई अनेक देशों की यात्राएं, बाद में मुंबई का प्रवास और बीच-बीच में बेटों के पास विदेश जाते रहना, ये जीवन के तमाम जरूरी पायदान, सूर्यबालाजी के लेखन के फलक को विस्तृत करने में सहायक बने हैं। इसलिए ही उनकी रचनाओं का संसार गांव, कस्बों, महानगरों से विदेशों तक फैला हुआ है। चूंकि लेखिका के पास मानवीय अनुभूतियों की महीन पकड़ है और उसे बयां करने का कारगार औजार भी पास है। लेखन कार्य में दुर्लभ अनुशासन भी ऐसा कि रोज नियम से ईशपूजा की तरह कागज कलम को थामना ही है। बावजूद इसके कि बड़े से कुनबे की रिश्तेदारियों को बड़े प्रेम व जतन से निभाने की दुनियादारी भी है। माना कि सेवानिवृत पति का पूरा साथ व सहयोग है, किंतु उनके प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए भी जरूर तत्पर रहना पड़ता होगा। जीवन की संध्याबेला में साथी का सहृदय बने रहना बहुत बड़ी नेमत होती है, जो रचनाकर्म में प्राणवायु का काम करती है। संभवत: उनकी लेखनी के सत्त ऊर्जावान होने का राज भी यहीं हो। वैसे मैं यह प्रमाणिक तौर पर नहीं कह सकती। देखें आज जरा सा पूछने का दुस्साहस कर ही लें-
प्र.हर रचनाकार की सृजन प्रक्रिया का बीज बिंदु पहले कहीं न कहीं मन को छूता है..एक हल्की सी कौंध और फिर घनघोर बरसात तो कभी झिर-मिर, झिर-मिर क्या ऐसा ही कुछ होता है आपके साथ भी?
उ. हां बिल्कुल होता है। अनायास कभी सुना गया कोई शब्द या वाक्य, घटना या चरित्र मन को छू कर, अंदर धंस कर बैठ जाता है और कालांतर में अनायास कागज पर उतरने लगता है। उस क्षण को मैं पारस स्पर्श कहती हूं जब हमारे भीतर दाखिल संवेदना के बीज, रचना का रूप धर कर कागज पर उतरने लगते हैं।
प्र. कौन सी रचना ऐसी रही कि लिखते वक्त लगा कि बेहद पसंद की जाएगी और हुआ भी वही, पर कभी इसके विपरीत भी हुआ हो?
उ.  लिखते वक्त कहीं-कहीं मनचाहा अच्छा लिख जाने का सुख अनिवर्चनीय होता है किंतु यह सच है कि जो रचना जितनी गहरायी से हमारे अंदर उतरी होती है, वह ज्यादाकर पाठकों को भी अधिक भीतर तक छू पाती है। मेरी गौरा-गुनवंती, माई नेम इज ताता, रमन की चाची, ना किन्नी ना आदि कहानियों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है, कुछ रचनाओं का भाग्य भी होता है। वो कब कहां पहुंच जाती हैं, पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
प्र. कथ्य का चयन करके कथानक गढ़ती हैं या कथ्य स्वयं ही सोच में दाखिल हो जाता है?
उ. नहीं, कथ्य दबे पांव चुपचाप मेरे नितांत अनजाने, मेरे अंदर दाखिल हो जाता है और कभी-कभी तो बरसों अंदर दबा पड़ा रहता है, तब एक दिन अचानक उथल पुथल शुरू हो जाती है। कागज पर उतरने की बेचैनी तभी व्यापती है। यह अनुभूति इतनी सूक्ष्म होती है कि मुझे लगता है रचना में हम उसे जस का तस उतार ही नहीं पाते। फिर भी जब एक बार शब्द कागज पर उतरने शुरू हो जाते हैं तो संवाद, चरित्र, स्थितियां सब कुछ अनायास जुटते चले जाते हैं। हमारे अवचेतन में भी एक पाठक या आलोचक होता ही है वह लगातार हमारे लिखे को सुधारता, तराशता जाता है। यह सिर्फ  मेरे साथ ही नहीं, हर रचनाकार के साथ होता है।
प्र. बहुत समय देकर लिखी जा रही रचना जब पूर्णता पर पहुंचती है तो कैसा लगता है? संतोष होता है या उसमें और भी जोडऩा-घटना है ऐसा सोचती हैं आप?
उ. अपनी रचना विशेषत: कहानियों को लेकर मेरा सोचना कभी रूकता नहीं। पूरी हो जाती है तब राहत तो जरूर मिलती है लेकिन वापस पढऩे पर हमेशा कुछ न कुछ काट-छांट करती ही रहती हूं। यहां तक कि कभी-कभी छपने के वर्षों बाद भी हाथ में आने पर सुधारने का मन हो आता है। लेकिन कुछ अंशों को सोच कर अच्छा भी लगता है।
प्र. क्या ऐसा लगता है कि बहुत कुछ अनकहा रह गया?
उ. अनकहे का तो कोई ओर-छोर है ही नहीं निर्मला! उसी अनकहे को लिख पाने की कोशिश ही हमसे लगतार लिखवाती रहती है। कलम की बेचैनी का मुख्य कारण ही यही।
प्र. जीवन की कोई ऐसी घटना, जिसने अप्रत्याशित खुशी से भर दिया हो या ऐसी भी जिसकी टीस आज भी कलेजे को चीर जाती हो?्
उ. दु:ख से ही शुरू करती हूं। पिता के न रहने के कई वर्षों बाद, मेरी मां के बचे-खुचे पैसे भी खत्म हो गए थे। खाली पास बुक लिये मां लौटी थी और चुपचाप उसे पूजा की चौकी पर रख दिया था। तब कैसी तो हूक और दहशत पैठी थी मेरे अंदर। यह कचोट अनायास मेरी एकाध कहानी, उपन्यास में उतर आई है। खुशी वाली लहक भी.. बरसों बरस बल्कि आज तक अंदर बैठी हुई है। मैं उससे उबर नहीं पायी। मैं एमए की प्राइवेट स्टुडेंट थी। जिससे पीएचडी के दौरान स्कॉलरशिप मिलने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी। ऊपर से खुद विभागाध्यक्ष मेरी छात्रावृत्ति काट कर अपने प्रिय छात्र को देना चाहते थे। मैं पूरी तरह ध्वस्त-पस्त, सारी उम्मीदें छोड़ चुकी थी, ऐसे में जब अचानक छात्रवृत्ति मिलने की सूचना मिली और हाथ में स्कॉलरशिप के पैसे आए तो मुझे लगा कि अब मैं अपनी मां का कर्ज पूरा नहीं तो थोड़ा सा तो उतार सकूंगी। वैसी पागल खुशी का क्षण फिर कभी नहीं आया जीवन में।
प्र. कदाचित् उसी दु:ख ने सुख को ज्यादा गहरा बनाया होगा?
उ. मैं ऐसे सुख का सपना भी नहीं देख सकती थी निर्मला।
प्र. वैसे लगता तो नहीं कि आपको आवेश आता होगा? क्या कभी आता है, तो किस बात पर आता है?
उ. तुम्हारी यह राय किस तरह बन गयी? मैं लोगों के सामने भले रिजर्व रहती होऊं पर रोष मुझे बहुत आता है। गलत कहने और करने वाले को मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती। मेरे विरूद्ध कोई कुछ कहे तो मैं भले ही चुप रह जाऊं, पर मेरे अपनों के विरूद्ध कही गई गलत बात या अन्याय का प्रतिकार मैं अवश्य करती हूं। बचपन की एक घटना याद हो आयी है, मेरी दिवंगता जीजी से जुड़ी। उन दिनों जीजी हमारे पास, मायके आयी हुई थीं। जिस दिन उन्हें वापस ससुराल जाना था, किसी कारणवश नहीं भेजा जा सका। दूसरे दिन जीजा जी आए और अकेले में जीजी से कुछ बेहद कड़ी बातें गुस्से में बोल गए। जीजी के लिए उतना भर ही बरदाश्त कर पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। अचानक ठीक सामने जा कर जीजा जी से बेहद सख्त स्वर में बोली थी मैं-आप यहां मेरी जीजी को कुछ नहीं बोलेंगे। जीजाजी स्तब्ध रह गए। चुपचाप उठ कर चले गए। आश्चर्य! परिवार में कुछ नहीं कहा मुझसे किसी ने, पर मेरा सोच-सोच कर बुरा हाल था, यह क्या किया मैंने। तो इस तरह की चीजें मुझसे बहुत बार हो जाया करती हैं। जीजाजी ने बाद में किसी बात पर कहा था- बाप रे.. मिन्नी का गुस्सा (मिन्नी सूर्यबाला का घर का नाम है)
प्र. साहित्यिक विरासत परिवार से मिली या विकसित थी? आपने अपने परिवार के विषय में कम कहा है।
उ. कोई बहुत विद्वता वाला नहीं, किंतु हमारे परिवार में साहित्य संगीत और कलात्मक सुरूचि का एक भला सा माहौल था। हारमोनियम बजाने वाले पिता, हौज में मछलियां, पिंजरों में चिडिय़ा, तोते।... राजा रविवर्मा की पेंटिंग्स। माता-पिता दोनों बेहद संवेदनशील, जिन्होंने अपनी चारों बेटियों को शहजादियों की तरह लाड़ से पाला पोसा। भाई सबसे छोटा। घर में हिंदी, इंग्लिश, उर्दू की पत्रिकाओं-पुस्तकों का समृद्ध माहौल था। मेरी मां को ठीक-ठाक उर्दू भी आती थी। नुक्कड़ के चूड़ी वाले उमरल्ली चाचा, मां से अपने उर्दू के पत्र पढ़वाने आते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता। मां पर गर्व होता। लाड़ प्यार बहुत था पर अनुशासन तोडऩे की जरा भी छूट नहीं थी। सरसता व तरलता हमारी दैनिकचर्या में मिश्री से घुली रहती थी। मेरे पिता का नाम वीर प्रताप सिंह था। वे शायरी के शौकीन थे। एक शेर उनका हमेशा मेरे मन में गूंजता रहता है, तिरंगे को लेकर लिखा हुआ-
ये फहरे हिंद से लेकर, अटल कैलाश तक फहरे
जियें तो वीर सिर पर और मरें तो लाश पर फहरे
प्र. आप दस वर्ष की थी तभी पिता का अवसान हो गया। इस अभाव ने आपके जीवन को बचपन को किस तरह प्रभावित किया?
उ. मैं छठी में पढ़ती थी तब... पिता का अचानक हुआ अवसान घर भर के लिये जबरदस्त आघात था। बड़े सुरक्षित माहौल में रही थी, पर सब के सिर पर से जैसे छत उड़ गई थी। जब यह घटना घटी, तो न केवल हमारे घर में, बल्कि हमारे मुहल्ले में भी दूर-दूर तक सन्नाटा पसर गया था। लेकिन हम सभी अपने अंदर के दु:ख एक-दूसरे से छुपाते।  दु:ख को कम करने के लिए आपस में खूब हंसते बोलते, माहौल को सामान्य करने में लगे रहते। यह मुश्किल था पर बहुत जरूरी भी था हमारे लिए। तभी से मुझे मृत्यु जैसे दु:ख पर सहानुभूति और संवेदना प्रकट करने वालों से एक तरह की चिढ़ सी होती है। मुझे लगता है, दु:ख से उबरने में समय लगता है। ऐसे कच्चे क्षणों में वही-वही बातें संवेदना का मजाक उड़ाती सी लगती हैं। वे जितनी कम कहीं जाये उतना अच्छा।
प्र. परिवार में या दोस्तों में कोई ऐसा है जिसमें सम्मुख मन के ओने-कोने का खंगाला जा सके.. कोई विश्वसनीय साथी?
उ. पहली तो मेरी जीजी ही थी, दूसरा मेरा छोटा देवर। बांटने के लिए उस व्यक्ति का सिर्फ  बहुत अपना होना ही काफी नहीं होता निर्मला, उस व्यक्ति के अंदर वह गहराई और सलाहियत भी होनी चाहिए जिससे लिखने की बातें, घर की बातें, मन की बातें बांटी जा सके। जीजी तो रही नहीं, छोटे देवर हैं जिनसे मैं अपनी कोई भी बात बेझिझक कह सकती हूं। तीसरे व्यक्ति तो मेरे पति ही हैं जिनसे मैंने अपने मन की क्षुद्र से क्षुद्र बात कहने में भी कभी कोई संकोच नहीं किया। कभी उनसे कुछ छुपाया नहीं। इसे गर्वाेक्ति न समझा जाए, दरअसल मैं उनसे कुछ छुपा ही नहीं पाती। हां पिछले वर्षों वागर्थ ने एक अनूठा अंक निकाला था। कथाकारों से उनकी कविताएं मांगी थी। तब मैंने अपने छोटे देवर पर कुछ पंक्तियां लिख कर भेजी थी।
प्र. हां उस अंक को पढ़ा तो था मैंने भी, पर क्या वे पंक्तियां आप दोहराएगीं?
उ. हूं..याद करती हूं, हां, शीर्षक था कुटुंब या शायद आधी सदी पहले की बात जो भी हो, खैर सुनो-
आधी सदी पहले, वो मेरा छुटंका देवर रसोई के दरवाजे पर डंका सा पीटता था        और बाईस की मैं, सहमी सकपकायी चूल्हे से फूली गरम रोटियां निकाल
 उसकी थाली में सरकाती थी
भाप से जली हथेलियां चुपके से नल की धार में ठंडाती थी,
अंखियों से अंदाजती कि कहीं वो भूखा ही तो नहीं जा रहा।्
तब मुंडेर से देखता मेरा पति मन ही मन तृप्त होता था कि
यह स्त्री उसके कुटुंब की सही संभाल कर ले जा रही है..
.      .     .     .     .     .    .
आधी सदी बाद, खिचड़ी बालों वाला वही अधेड़ देवर
मेरे पांव इस तरह छूता है कि उन्हें मंदिर की देहरी बना देता है
और जूते के तस्मे खोलते मेरे पति का रूंधा गला सोचता है
यह भाई, इस स्त्री की सार संभाल कर ले जाएगा
प्र. वाह..क्या बात है ! क्या अद्भुत दृश्य खींचा है रिश्तों की सरसता व भव्यता का। अच्छा, हास्य व्यंग्य दुरूह विधा है। आपका रूझान इस तरफ  किस तरह हुआ?
उ. मैं व्यंग्य को गद्य का निकष मानती हूं। एक चुनौती भी। व्यंग्य लिखने का अलग से विशेष प्रयास नहीं किया मैंने। शायद यह मेरी फितरत में शामिल है। प्रकृति में है। इसलिए शुरू से ही कहानियों के साथ-साथ व्यंग्य लेखन भी चला है। अलग से योजना बनाकर विधिवत व्यंग्य लेखन मैंने कभी नहीं किया। मुझे भोलापन और स्थूलता पसंद नहीं है। यहां मैं बड़े से बड़े व्यंग्यकारों की रचनाओं के अंशों को भी अपनी पसंद की लिस्ट से निकाल देती हूं। मैं उस स्तर के हास्य-व्यंग्य को हेय मानती हूं जो किसी व्यक्ति पर आक्षेप करता हो। हास्य या व्यंग्य, व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर होना चाहिए।
प्र. लेखन के क्षेत्र में महिला रचनाकार का सशक्त व्यंग्यकार होना यकीनन बड़ी बात है, क्योंकि इस क्षेत्र में पुरूषों का ही वर्चस्व दिखता हैं जबकि रोजमर्रा की जीवनचर्या में महिलाओं की बोलचाल में ताने-तिश्ने काफी होते हैं। कभी-कभी वे संबधों में खटास भी ला देते हैं। आप क्या कहती हैं?
उ. महिलाएं जरा स्टेटस कांशस होती हैं, संभवत: इसी कारण उन्होंने अपनी कहानियों में व्यंग्य को स्थान कम दिया। फिर व्यंग्य विधा तो अपने यहां शूद्र विधा तक मान ली गई थी। अगंभीर और हल्की भी। मेरे मन में ऐसा कोई पूर्वाग्रह कभी नहीं रहा। मैं सागर्व स्वयं को व्यंग्यकार मानती रही। यूं भी पिछली सदी की महिलाओं ने कहानी व कविता लिख लेने का साहस किया, यही क्या कम है। जिस समाज में महिलाओं को निर्भयतापूर्वक दृष्टि उठा कर देखने बोलने की भी मनाही हो, उस समाज की स्त्री हास्य व्यंग्य लिखने की हिम्मत कर भी कैसे सकती है। पर यह जरूर है कि हास्य-व्यंग्य को परस्पर शत्रुता निकालने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए।
प्र. बदलते परिप्रेक्ष्य में किताबों की दुनिया का विकल्प क्या है?
उ. एकबारगी बड़ा सहमा देने वाला प्रश्न है यह। मेरी समझ में किताबों की दुनिया का कोई विकल्प नहीं हो सकता। नई पीढ़ी को ईबुक पढ़ते देख कर संतोष होता है। सबसे बड़ी उम्मीद तो यही कि लिखना जब कभी छूट नहीं सकता तो फिर पढऩा किस तरह छूट सकता है? किसी न किसी रूप में जब तक हम रहेंगे, किताबें भी रहेंगी ही। जिस रूप में भी। संभवत: हम उसके अभ्यस्त भी होते जायेंगे।
प्र. स्वतंत्रता और अकेले पन के क्या मायने है आपके लिए?
उ. एक बेहद जटिल सवाल..। मैं स्वतंत्रता से ज्यादा, स्वातंत्र्य चेतना को महत्व देती हूं। स्वतंत्रता एक भाववाचक संज्ञा है। दिखने में बड़ी आकर्षक, आकाश-कुसुम जैसी.. पर बरतने में चुनौतियां ही चुनौतियां। जैसे कोई बहुमूल्य चीज हाथ में आ तो जाए पर उसे कैसे रखा जाए, कैसे बरता जाए। स्वतंत्रता एक चुनौती है, स्त्री और पुरूष दोनों के लिए। अब अकेले पन.. तो अकेलापन भी एक अहसास है। जरूरी नहीं कि हम अकेले होने पर ही अकेलेपन की अनुभूति करें। कभी-कभी भीड़ के बीच भी हम बेहद अकेले होते हैं, और कभी अपने को न समझने वाले के साथ भी.. और एक बात, इसी से जुड़ा एक शब्द है एकांत..यह हम खुद निर्मित करते हैं। इसका एक अर्थ हमारी मनचाही शांति भी होता है। सामान्यत: हमारे समाज में अकेलेपन से जो अर्थ लिया जाता रहा है वह थोड़ा बहुत सूनेपन से जुड़ा होता था। लेकिन अब अकेला होना विशिष्ट कर स्त्री के संदर्भ में स्वतंत्रता का भी पर्याय हो जाता है। लेकिन यहां एक बात कहूंगी, जरूरी नहीं कि अकेले होकर हम स्वतंत्र भी हों, स्वतंत्रता, मुक्ति हमें अपने अंदर के अंधेरों और पूर्वाग्रहों से भी चाहिए होती है। अंकुश हमारे अंदर के भी होते हैं। और लोनलीनेस वाले अकेलेपन को समझदार और परिपक्व व्यक्ति अपने एकांत में बदल लेते हैं।
प्र. लेखन के लिए कैसा परिवेश चाहिए? क्या अक्सर सहज उपलब्ध हो जाता है या जुटाना पड़ता है?
उ. नहीं, सहज नहीं उपलब्ध होता। बहुत कांच खुरचकर समय जुटाना होता है। मुझे लिखने के लिए गुपचुप एकांत चाहिए, इतना कि किसी को कानों-कान खबर तक न हो कि मैं लिख रही हूं। अक्सर अचानक सूझे विचारों को भी मैं संकोचवश सबके सामने नहीं लिख पाती। इस आदत से बहुत नुकसान उठाया है मैंने। लेकिन अब मेरी छोटी सी स्टडी है उसके एक कोने में जाते ही खुद को बेहद निरापद व रिलैक्स महसूस करती हूं। खुले में तो कलम चलती ही नहीं, जरा भी आवाज, कोई खटका, मेरा ध्यान हटा देता है। मेरी कलम को सात तालों में रहना ही भाता है। इसलिए ही शायद मैं हर वक्त अपनी कलम के लिए समय चुराने की जुगत में लगी रहती हूं।
प्र. जब कोई बड़ा काम, जैसे उपन्यास शुरू करती हैं तो दूसरी छुटपुट चीजों को किनारे रखना पड़ता है या साथ-साथ चलती हैं?
उ. अपनी दूसरी चीजें तो टाल जाती हूं। लेकिन दूसरों का नहीं टाल पाती क्योंकि वह अंदर-अंदर डिस्टर्ब करता रहता है। तो ऐसी चीजें उतार कर हल्की हो लेती हूं। किसी का कुछ मांगा, चाहा, तो भी किनारे नहीं रख पाती। अंदर का अपराध बोध गहराता है। तभी तो ग्यारह वर्षों से चलता, डायरी शैली का उपन्यास अब जाकर पूरा हो पाया। हर बार दूसरे कामों को पूरा करने के बाद इससे नए सिरे से जूझना पड़ता था।
प्र. समकालीन महिला लेखन में आप अपनी भूमिका किस तरह पहचानती हैं?
उ. मैं समकालीन लेखन में कहीं न कहीं हूं बस इतना अहसास काफी है मेरे लिए। सच कहूं तो इसे लेकर मैं कभी सोचती नहीं। मेरे लिए मेरे समर्पित पाठकों की प्रतिक्रियाएं ही बहुत महत्वपूर्ण होती हैं और वही मुझसे लगातार लिखवाती भी है। इससे इतर मैंने अपनी भूमिका की दूसरी शिनाख्त करने की कोशिश कभी नहीं की। सिर्फ  अच्छा और मन भर लिखने का सुख मेरे लिए काफी है। लिखते हुए जिस दिव्यता का आभास मिलता है, मैं उसी में मग्न रहती हूं।
प्र. रचनात्मक लंबे सफर में विशेष उल्लेखनीय संदर्भ, घटना, स्मृति या संबंध?
उ. पहले तो यही कि मुझे छपने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा। इससे छोटा सा ही सही पर एक आत्मविश्वास तो मिला ही। मेरे छपने की शुरूआत भी कम दिलचस्प नहीं थी। एक प्रेम कहानी जो सारिका में छपी थी उस पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यंग्य शैली से लिख भेजी सारिका के संपादक कमेलश्वर जी को। प्रत्युत्तर और प्रशंसा में कमलेश्वर जैसे कद्दावर लेखक का जो पत्र मिलता है वह मेरे लिए जादू की छड़ी का काम करता है। उनके पत्र की अंतिम पंक्ति थी- यदि आप नियमित रूप से लिखें तो हिंदी को आप से कुछ बहुत अच्छी रचनाएं मिल सकती हैं। मैं बावली सी उछल पड़ी। इधर-उधर से अपनी लिखी कहानियां तलाशी और अंतत: हल्की गहरी स्याही से बेहद खराब हैंडराइटिंग में लिखी एक कहानी उन्हें पोस्ट कर दी। बहुत बाद में कमलेश्वर जी ने लाल को बताया कि पहले तो मैंने उसे डस्टबिन में फेंक दिया था फिर न जाने क्या लगा कि निकाल कर वापस पढ़ी और महिला कथाकार अंक के लिए स्वीकृत कर ली। तो यह एक यादगार पल था। शायद इसलिए मेरे पास जितने भी पत्र आते हैं, ज्यादा करके हर पत्र का उत्तर अवश्य देती हूं। इसी तरह मेरे पहले ही उपन्यास, मेरे संधि पत्र, का धर्मयुग जैसी शीर्ष पत्रिका में धारावाहिक रूप में छपना भी मेरे लिए किसी रोमांचक घटना से कम नहीं था। 72 के अक्टूबर में पहली कहानी जीजी सारिका में छपी और 75 में धर्मयुग में उपन्यास धारावाहिक आना शुरू हो गया। आज भी विश्वास नहीं होता कि कुल जमा 2-3 वर्ष की लेखिका का उपन्यास धर्मयुग में धारावाहिक आ गया। मुझसे ज्यादा मेरे पाठक उसे याद करते हैं।
प्र. आपका प्रतिवर्ष विदेश जाना होता है, वहां के अनुभवों को अपने लेखन के मार्फत पाठकों तक पहुंचा ही रही हैं। रहने का विकल्प चुनना हो तो स्वदेश या विदेश प्राथमिकता क्या होगी?
उ. शत प्रतिशत स्वदेश उसका कोई विकल्प नहीं है। विदेश जाना एक बात है किंतु रहना एकदम दूसरी। मुझे चारों तरफ अपने लोग और पैरों के नीचे अपनी ही धरती चाहिए।
प्र. आप भाग्य वाद को कितना मानती हैं?
उ. वादों से तो मुझे एलर्जी है। हां, मेरे जीवन में संयोगों ने बड़ी अहम भूमिका निभायी है निर्मला। इसलिए कर्म में पूरा विश्वास होते हुए भी मैं जीवन में भाग्य के हस्तक्षेप और महत्व को बहुत स्वीकारती हूं।
प्र. संयोगों से आपका तात्पर्य?
उ. अनेक बार ऐसे संयोग बने, अप्रत्याशित घटा मेरे जीवन में। एमए के बाद मां ने पीएचडी करने के लिए प्रेरित किया। मैं हैरान थी, घर की तंगहाली से पूरी तरह निराश। मेरी बड़ी नानी (अर्थात पिताजी की पहली पत्नी की मां और हिंदी के प्रकाश स्तंभों में एक, लाल भगवान दीन जी की पत्नी) मुझे नानाजी के शिष्य आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के पास ले गईं। उन्होंने आश्वासन भी दिया किंतु बाद में सूचना मिली कि वह छात्रवृत्ति किसी दूसरे छात्र को मिल चुकी है। मेरी हताशा का कोई अंत नहीं था कि तभी यकायक चमत्कार हुआ और छात्रवृत्ति कमेटी की अगली मीटिंग में वह स्कॉलरशिप मुझे ग्रांट हो गई। इसी तरह मेरे विवाह को लेकर परेशान मेरी मां के सामने मेरी बड़ी मौसी ने मुझे अनायास गौरा गुनवंती की ताई वाला आशीर्वाद दे डाला था-हीरे-मोती में खेलेगी ये कुछ इस तरह का। इसके कुछ ही वर्षों बाद, मर्चेंट नेवी के युवा इंजीनियर से अपने विवाह को भी एक संयोग या चमत्कार ही मानती हूं मैं या फिर बड़ी मौसी का आशीष। इन्हीं मौसी का एक बहुत बड़ा अवदान मेरी कलम को मिला है। उनकी बातों में हमेशा हास्य व्यंग्य, कटाक्ष, विनोद और परिहास की अनेक परतें हुआ करती थी जो अनायास मुझे आकृष्ट करती थी।
प्र. लंबी साहित्यिक यात्रा में काफी कुछ पाया तो बहुत कुछ छूटा भी होगा। कभी नहीं लगता कि बहुत हुआ कलम घसीटना। अब वो भी कर लिया जाए, जो छूट गया। मसलन आम गृहस्थ औरतों की तरह फोन पर लंबी-लंबी गपशप, फिल्में देखना, घूमना या ऐसा ही दूसरा कुछ इस शर्त के साथ कि सोचने की प्रक्रिया को पूरी तरह से विराम?
उ. (जोर से हंस पड़ती हंै) क्या बात कही है तुमने। पर सबसे बड़ी समस्या तो सोचने की प्रक्रिया पर विराम देने की ही है। उस पर हमारा वश कहां रहता है। जब नहीं चाहते तो लगातार सोचते चले जाते हैं और जब चाहते हैं तो दिमाग विचार शून्य हो जाता है। और ये जो तुमने कहा खोए और पाए का हिसाब, यही रखना तो सबसे मुश्किल। कई बार लगता है, यह कहां का रोग लगा बैठी मैं। क्यों कर रही हूं और किसलिए? लेकिन तब लगता है कि इस पागलपन का वरण तो हमने स्वयं ही किया है(वह भी अनजाने) तो भुगतना भी हमीं को पड़ेगा। वैसे सच कहूं तो मेरी दिनचर्या आम इंसान की तरह ही बदस्तूर चलती है। मुझे लगता है मैं जीवन से लेखन और लेखन से जीवन को जोडऩे-घटाने की कला में पारंगत हो चुकी हूं। छोड़ती हूं तो ऐसे कि कलम ही मेरे पीछे दौड़ती है, मैं उसके पीछे नहीं। यह इसलिए संभव हो पाया कि मैं कलम को लिखने के सुख से ज्यादा किसी चीज से नहीं जोड़ती। लिखना मेरे लिए तीर्थाटन जैसा है। जब मन हुआ डुबकी मार ली गंगा में और निर्मल हो लिए।
प्र. हिंदी में साहित्योपजीवी होकर अपने दम पर जिया जा सकता है?
उ. सिर्फ  लिख कर? कभी नहीं। इसका स्वप्न भी कोई हिंदी लेखक नहीं देख सकता। हम सोचते हैं कि विदेशों में लेखकों को बहुत मिलता होगा लेकिन वहां भी, ऐसा सिर्फ लोकप्रिय या व्यावसायिक लेखन के साथ होता है, रचनात्मक लेखन के साथ नहीं।
प्र. लेखक, कवि इत्यादि तथाकथित बुद्धिजीवी कहने को स्त्री मुक्ति के समर्थक बनते हैं किंतु व्यक्तिगत जीवन में ठीक इसके उलट होते हैं। ऐसा दोमुंहापन अजीब नहीं लगता है?
उ. वितृष्णा होती है। मेरे हिसाब से तो ऐसे दोमुंहेपन के लिए सामान्य व्यक्ति को तो फिर भी क्षमा किया जा सकता है, किंतु लेखक या विचारक का ऐसा आचरण अक्षम्य है। स्त्री के पक्ष में बड़ी-बड़ी बातें लिखना और खुले आम डंके की चोट पर इसके उलट जीना, अपने पढऩे वालों के साथ किया गया लेखक का एक बड़ा छल है।
प्र. आप नारीवादी नहीं कहलाना चाहती, लेकिन इस तरह के दोमुंहेपन से दो-चार होते वक्त क्या सोचती हैं?
उ. मैं नारीवाद के खिलाफ  बिल्कुल नहीं हूं निर्मला! पर नारीवाद के नाम पर चल रही बाजारू साजिशों के खिलाफ अवश्य हूं। मेरे पास मेरा अपना नारीवाद है। स्त्री-सामथ्र्य और चेतना की अपनी परिभाषा भी। तुम जिस दोमुंहेपन की बात कहती हो उसे मैंने हमेशा गलत ठहराया है। मैंने कई जगह कहा है कि चैतन्य स्त्री वह है जो हमेशा गलत के खिलाफ  खड़ी हो।
प्र. औरत की आत्मनिर्भरता वो भी आर्थिक दृष्टि से कितनी जरूरी है?
उ. बहुत-बहुत जरूरी है आर्थिक आत्मनिर्भरता लेकिन लगभग इतनी ही बड़ी जरूरत स्त्री के लिये भावनात्मक संबल की भी होती है। यह मैं विशेषत: पति-पत्नी के संबंधों को दृष्टि में रखकर कह रही हूं। भावना स्त्री मात्र का प्रबल पक्ष है। यदि इस मुकाम पर वह भरीपूरी है, पति से पूरा भावनात्मक संबल मिल रहा है तो पैसा उसके लिए उतना महत्व नहीं रखता। स्त्री के लिए परस्पर विश्वास व प्रेम की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। कभी-कभी आर्थिक आत्मनिर्भरता वाली बात को सर्वोपरि मानने के कारण ही संबंधों में खटास भी आ जाती है। मेरी एक कहानी माई नेम इज ताता में शादी से पूर्व दोनों बैठ कर अपनी शर्तें इस तरह तय करते हैं, जैसे किसी मुकदमे के इकरारनामे की बात हो रही हो। स्त्री-सुरक्षा पर आजकल जितने कानून बन रहे हैं, वे कहीं-कहीं अंदरूनी खाइयों को बढ़ा भी रहे हैं। मैं उन कानूनों की मुखालफत बिलकुल नहीं कर रही हूं, वे जरूरी हैं। किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है। आज भाई-बहनों के बीच बंटवारे की कितनी गूंज सुनायी दे रही है। हमारी परंपरा थी कि बहन घर में आती रहे, सम्मान मिलता रहे। माता-पिता की संपति में बेटी का हक जरूर हो किंतु अपना-अपना हक हथियाने के बदले स्वयं एक दूसरे का हक उसे सौंपने की सद्भावना हो तो कैसा रहे। और यह तभी संभव है जब बच्चों ने परिवार में अपने माता-पिता को ऐसा आचरण करते देखा हो।
प्र. चूल्हे-चौके और बिस्तर इन दो चौहद्दियों से स्त्री कितना निकल पायी है? नौकरी और गृहस्थी दोनों ही अन्तत: उसके हिस्से का चूल्हा चौका ही तो है?
उ. बहुत मार्मिक बात कही है तुमने। लेकिन मेरी इससे एकदम उल्टी बात सुन कर तुम चौंक भी सकती हो। जरा हम इस तरह सोचें कि यदि स्त्री के पास चूल्हा-चौका नहीं होता तो वह कितनी छूंछी सी नहीं हो जाती! बिस्तर की बात अभी एक बारगी छोड़ ही दें, पर चूल्हा चौका स्त्री की जागीर है उसकी चुनौती है और उसका हथियार भी है। परिवार इसे प्रत्यक्ष भले न स्वीकारे, पर मन ही मन समझता और स्वीकारता भी है। चूल्हे चौके में स्त्री अपना बहुत कुछ सिरज सकती है, सिरजती रही है। मैं चाहती हूं, स्त्री में यह आत्मविश्वास तथा अहसास हमेशा रहे कि चूल्हे चौके से उसका मान सम्मान घटता नहीं। किसी के मानने या न मानने से उसका महत्व कम नहीं हो जाता। पुरानी स्त्रियों का यह कर्तव्य, धर्म दायित्व और इन्हीं के माध्यम से अधिकार भी हुआ करता था। इस अधिकार का उपयोग पहले की स्त्री बड़ी समझदारी से करती थीं। तभी तो यह मुहावरा बना, पेट के रास्ते दिल में प्रवेश करना। हां, आज बेशक गृहस्थी तथा नौकरी के दबाव के बीच स्त्री के लिए सचमुच स्थितियां बड़ी मार्मिक है, लेकिन सोचो तो यह भी खुद स्त्री की चुनी हुई स्थिति है। दरअसल हर समस्या का समाधान भी एक नई समस्या खड़ी करता है। आज लडक़े वाले भी चाहते हैं कि अन्य सभी योग्यताओं के साथ कमाने वाली बहू ही चाहिए। तो ऐसे में दुहरे दबाव के बीच, स्त्री पूरी तरह बिखर जाती है सामंजस्य बैठाते-बैठाते, पर उससे मुक्ति का कोई विकल्प तब तक नहीं संभव है जब तक जीवन साथी या परिवार, संवेदनशील, समझदार न हों।
प्र. अपने एक जगह कहा है कि स्त्री की आर्थिक आजादी स्त्री-मुक्ति का नहीं पुरूष मुक्ति का दरवाजा है और यह बात बिल्कुल सही भी है किंतु फिर पुरूष के उस किंग साइज इगो का क्या होगा जो मां, पत्नी, प्रेमिका, बेटी के फैले हाथ में पैसे धर कर पुष्ट होती है?
उ. वही तो, कमाने वाली स्त्री, पूरे परिवार के लिए लाभप्रद होने के साथ-साथ कहीं न कहीं पुरूष के इस इगो के लिए चुनौती भी तो बनती है। पुरूष को अधिकार युक्त भी तो करती है, जैसे-जैसे स्त्री, मुक्ति के अहसास या संभावना मात्र से सक्रिय होती चली गई, वैसे-वैसे पुरूष निष्क्रिय होता चला गया, निश्चिंत भी। स्त्री का अति उत्साह, उसके लिए ही घातक सिद्ध हुआ। पहले का पुरूष शोषक था, पर संरक्षक भी था। शोषक भी वह प्रकृति से कम, परंपरा से ज्यादा था। वहीं संरक्षक, पुरूष बाद में स्त्री का प्रतिस्पर्धी होता चल गया। मेरी बात आमतौर पर कहीं जाने वाली बातों से थोड़ी अलग हैं। देखो! स्त्री की सबसे बड़ी चुनौती है पुरूष की इगो को संभाल ले जाना। जो स्त्री इस गुर में माहिर होती है, समझो वो किला फतह कर लेती है। असल में समस्या तो तब खड़ी होती है जब स्त्री की जगह स्त्री का इगो पुरूष के इगो के साथ कंधे से कंधा मिला कर अड़ जाता है। दरअसल आत्मसम्मान और इगो, दो अलग चीजें हैं। परिपक्व और समझदार स्त्री, पुरूष के इगो को नासमझी के रूप में ले, चुटकी बजाते संभाल ले जाती है। लेकिन ये गए जमाने की बातें हैं। आज की स्थितियां बहुत अलग हैं। आज की स्त्री पुराने नुस्खे अजमाने को तैयार भी नहीं। और फिर हर स्त्री की अपनी अलग स्थिति और समस्या होती है जो बेहद लाचारगी भरी और कष्टप्रद भी होती है। अधिकांशत: अपने समाधान स्त्री को स्वयं तलाशने होते हैं।
प्र. उद्दण्डता का इलाज सिर्फ  मां रूपी औरत ही कर सकती है। किंतु शहरी व्यस्तता के बीच यह कैसे संभव होगा?
उ. तुम्हारा यह प्रश्न मेरे अभी-अभी कही बातों से सीधा जुड़ता है। मैं स्वयं इस प्रश्न से लगातार जूझती रही हूं। मुझे लगता है, विश्व को खूबसूरत बनाने का नुस्खा सिर्फ  स्त्री के पास है पर तकलीफ  तो यही है कि स्त्री इसे स्वयं ही नहीं समझ पा रही। जब मैं आए दिन गैंगरेप जैसे भयानक कृत्यों के बारे में पढ़ती हूं तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कोई मां अपने कर्तव्य में, जिम्मेदारी से चूकी है। अगर मां सही संस्कार दे पाए (इस प्रदूषित समय में) तो वह अपने बच्चों ही नहीं पूरे समाज को बहुत सारी बुराइयों से बचा सकती है। मैंने हमेशा कहा है कि दोष बच्चों को न दें, उनके अभिभावकों की कार्यशाला लीजिए, ताकि वे अपने बच्चों को सुरूचि, सलीका और संस्कार दे सकें।
प्र. आर्थिक आजादी ने औरत को दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी में जकड़ दिया है फिर भी वो सम्मान की हकदार नहीं हो पायी तो फिर उसका पहले वाला रोल ही क्या ठीक नहीं था, कम से कम कुछ चिंताओं से निजात तो मिलती थी भले पुरूष की मेहरबानी से ही मिले?
उ. बिलकुल और आज तो पुरूष की मेहरबानी भी नहीं रह गई। तुम हंसोगी कि मैं हर प्रश्न के समाधान का ठीकरा, स्त्री की समझदारी पर जाकर ही क्यों फोड़ देती हूं। इसलिए क्योंकि मैं स्त्री को पुरूष से कहीं ज्यादा बेहतर मानती हूं। वास्तव में सदियों से दबी-कुचली स्त्री को खुले वातावरण में सांस लेने की आजादी मिली, तो उसे लगा, उसने जो चाहा, वह पा लिया किंतु जल्दी ही उसका मोह भंग हो गया। वो समझ गई कि न खुदा ही मिला न विसाले सनम। आज की स्त्री को यह अच्छी तरह समझ लेना है कि उसकी वास्तविक तलाश क्या है और उसे पाने का सही तरीका क्या है? यह भी कि जीवन में सब कुछ नहीं मिला करता। रही सम्मान की बात तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पतंग को कितना उड़ाना है, कहां ढील देनी और कितना खींचना है, उसे ही जानना समझना होगा। पुरूष तो पहले ही उद्दण्ड था, अब स्त्री भी हो गई, तो समाज कैसे चलेगा? कोई तो समझदार हो। प्रकृति ने स्त्री को जिन उदार प्रकृत गुणों से भरपूर किया है उसे स्त्री स्वयं छोड़ती जायेगी तो यह विश्व ध्वस्त, पस्त हो जाएगा। इसे संभालना पुरूष के बूते की बात नहीं।
प्र. अपने आलेख, लिखना क्यों में आपने कहा कि पहला अवसादी अहसास आज भी मुझ में पैठता चला जाता है, यह किस दु:ख या अवसाद की बात है। (कात्यायनी-संवाद)
उ. संभवत: बचपन में, बहुत छोटी उम्र में बड़ी बहनें स्कूल चली जाती थी। घर की मुंडेर पर खड़ी मैं हर थोड़ी देर बाद जाती हुई अर्थियों को देखती रहती थी। तब हम जौनपुर में थे। वे अर्थियां हमारे घर के सामने से बनारस जाने वाली सडक़ से गुजरती थी। शायद तब उस उम्र में मेरे बाल मन पर छायी सहमियत रही होगी। (माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में घिरे होते थे।) शायद इसीलिए मेरा व्यक्तित्व, दो ध्रुवांत बिंदुओं में विभाजित है। एक तरफ  मैं बहुत खिलंदड़ी विनोदी प्रकृति की हूं तो दूसरी तरफ एकदम गुपचुपी अवसादी। दोनों भिन्न अवश्य हैं पर एक दूसरे को बाधित नहीं करते। उल्टे अधिकांशत: पूरक ही होते हैं।
प्र. फिर से आपके लेखन पर आती हूं। नए आइडिया का जन्म कई बार लाख चाहने पर भी नहीं होता और कई बार अंधेरी रात में जुगुनू सा चमक उठता है। क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?
उ. बिलकुल। तुम खुद भी अच्छी रचनाकार हो। इस अनुभव से गुजरती होगी। प्राय: नये विचार ऐसे ही समय में कौंधते हैं जहां उनकी कौंध का हम कोई उपयोग नहीं कर पाते। कभी भीड़ और सरगर्मियों के बीचों बीच विचारों का भी धकापेल, ट्रैफिक-जाम और कभी एकांत में भी ऐसा सूखा, जैसे कभी कोई धारा बही ही नहीं हों वहां।
प्र. व्यंग्य विधा के लिए कोई प्रेरक प्रसंग तो जरूर हुआ होगा जिसने आपके लेखन को सान पर चढ़ाया।
उ. सारिका में छपी वह प्रेम कहानी जिसकी व्यंग्य प्रतिक्रिया में मैंने एक लंबी पैरोडी के रूप में संपादक को लिख भेजी थी, वह व्यंग्य से ही जुड़ी थी। मैं उसे भेज कर भूल भी गई थी। महीने भर बाद सारिका की मुहर लगे लिफाफे में कमलेश्वर जी के हाथ से लिखा पत्र मिला। जिससे मेरे भीतर उत्साह, जुनून उत्तेजना और रोमांच का ऐसा ज्वार उमड़ा कि मेरे रचनात्मक प्रकोष्ठ में भूचाल सा ला दिया। अर्थात सबसे पहले उन्होंने ही मेरे लेखन के व्यंग्य पक्ष का नोटिस लिया। हां मेरी व्यंग्य प्रतिक्रिया का शीर्षक, यादों की चैन में बरसात की रात का एक लॉकेट स्वयं एक व्यंग्योक्ति था। दूसरा संयोग यह बना कि 4-5 महीने बाद धर्मयुग में होली विशेषांक के लिए युवा रचनाकारों की व्यंग्य रचनाएं आमंत्रित की गईं। मन में कहीं न कहीं यह था ही कि मेरी रचना को कमलेश्वरजी की सराहना मिल चुकी है। तो मैंने एक आंखों देखी घटना को व्यंग्य रचना में ढाल कर धर्मयुग को भेज दिया और सचमुच वह भी पूरी सज-धज के साथ धर्मयुग के होली विशेषांक में छप गई। अत: अपने व्यंग्य लेखन के प्रेरक स्रोतों के रूप में पूरा श्रेय कमलेश्वर एवं डॉ धर्मवीर भारती को ही जाता है।
प्र. सूर्यबाला जी! इंसान न अपने प्रेरक को भूलता है न बाधक को। सफल होने के बाद क्या वह स्वयं चाहता है कि वो भी संभावनाशील रचनाकर्मी के लिए प्रेरक की भूमिका निभाए?
उ. निश्चित रूप से हम अपने से छोटे, नये और संभावनाशील लेखकों के लिए सदैव प्रस्तुत रहते हैं लेकिन समस्या तब आती है निर्मला जब नयों का आत्मविश्वास ज्यादा कुछ सुनना सीखना चाहता ही नहीं। प्राय: वह अपनी प्रशंसा ही सुनना चाहते हैं उल्टे बतायी गई चूकों को जस्टीफाइ करने लगते हैं। हां तुम्हारी यह बात बिलकुल ठीक है कि आज इतनी अस्वस्थ और क्षुद्र प्रतिद्वंद्विता का माहौल है कि हम किसी और को आगे बढ़ते देख ही नहीं सकते। सिर्फ  लेखन नहीं, हर क्षेत्र में। खेल के मैदान जैसी स्पोर्टिंग स्प्रिट वाली स्वस्थ स्पर्धा तो होनी ही चाहिए लेकिन अब तो वहां भी फिक्सिंग चल रही है। जहां तक मेरी बात है, मैं बड़े-छोटे किसी भी लेखक का कुछ अच्छा पढ़ती हूं तो उसे तत्काल फोन करती हूं। जानती हूं कि रचनाकार के लिए उसकी रचना के लिए कहे गए कुछ शब्द कितना महत्व रखते हैं।
प्र. अब कुछ बातें आपके उपन्यासों पर अग्निपंखी उपन्यास का नायक जयशंकर जीवन में दो तरफ  मुठभेड़ से जूझता है। गांव में अपने शहरी जीवन की भीषण दुश्वारियों को उजागर न करके एक भ्रामक पर्दा खींच कर रखता है, किंतु इसकी सजा उसकी जर्जर मां जितना भुगतती है वह तो इंतिहा ही है।
उ. ये विडंबनाएं ऊपर से ज्यादा हमारी अंदरूनी सतहों पर भी घटती है। मेरी ज्यादातर रचनाएं मनुष्य के अंदर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों पर ही लिखी गई है। मेरा मानना है, व्यक्ति खलनायक नहीं होता, स्थितियां उसे बना देती है। इस उपन्यास में भी यही है। अब जयशंकर पढ़ा लिखा है तो पढ़ लिख कर हल कैसे पकड़ेगा। फिर बेरोजगारी उसके पंख काट देती है और उसका आहत स्वाभिमान अपनी रक्षा के लिए लहूलुहान होता रहता है। दरअसल यह उपन्यास जयशंकर से ज्यादा उसकी विधवा मां के मोहभंग की कहानी भी समांतर रेखाओं में कहता चलता है।
प्र. दीक्षांत के शर्मा सर के जीवन की विडम्बना आपने वर्षों पहले देख ली, जबकि यह सर्वव्यापी सच तो आज ज्यादा है, जहां प्रतिभाओं को कोने में धकेलने के लिए पूरी सामाजिक व शैक्षणिक व्यवस्था जुटी है।
उ. हां, बहुत सी रचनाएं समय से पहले की लिखी हुई लगती हैं, मेरी ही नहीं, अन्य रचनाकारों की भी। मेरी रेस कहानी का विषय भी कमोबेश यही है। जिंदगी को रेस के मैदान में तब्दील कर देने वाली सभ्यता के प्रतिस्पद्र्धी पक्ष से जुड़ी है यह कहानी, जहां व्यक्ति की निर्मम महत्वाकांक्षा उससे बहुत कुछ अमानवीय भी करा डालती है।
प्र.  मेरे संधिपत्र, धर्मयुग में धारावाहिक प्रकाशित हो रहा था, तब पढ़ा था। बाद में अनेक बार पढ़ा। यकीन माने युवाकाल में गुनाहों के देवता पढ़ते वक्त पूरी चेतना पर आठों प्रहर एक खुमार सा तारी रहा करता था। ठीक-ठीक वो तो नहीं, पर लगभग वैसा ही भला सा अहसास खुद के भीतर महसूस किया। उत्सुकता रोमांच, सब फिर से चरम पर, तो एक अद्भुत आश्वस्ति का बोध सा हुआ। आखिर ऐसा पढऩे को मिल कहां रहा है इन दिनों जो स्मृति पृष्ठों में दर्ज होकर रह जाए।
उ. निर्मला! लेखक को इससे बड़ा संतोष दूसरा नहीं कि उसने जो कुछ लिखा उसने पढऩे वाले को भरपूर तृप्त दी।
प्र. मैंने यामिनी कथा भी फिर से पढ़ी। इधर मेरी धारणा बन चुकी थी कि पढऩे के साथ ढुल-ढुल ढुलकते आंसुओं का जमाना चुक गया। किंतु यामिनी-कथा पढ़ते-पढ़ते मन्नू भंडारी का चर्चित उपन्यास आपका बंटी याद हो आया। ठीक वैसी ही कलेजे में कसक उठी, जैसी न जाने कितनी बार बंटी के लिए उठी थी। इस बार आपके पुतुल के लिए।  शब्दों से एक संसार रच कर उसमें अपने पाठक को ले जाकर काल्पनिक गढ़े पात्रों के सुख दु:ख का भागीदार बना देना एक सशक्त रचनाकार ही कर सकता है। मैं अभिभूत हूं।
उ. और मैं कृतकृत्य। तुम्हारी आंखों में आई नमी, इस कृति का सम्मान और पुरस्कार हैं। सचमुच, बहुत कुछ काल्पनिक होने पर भी हम अपनी रचना में एक ऐसा संसार रच देते हैं जो स्वयं हमें भी पूरा सच लगने लगता है। उनके दु:ख से हमारी आंखें भी नम हो जाती हैं। तुमसे बताऊं, अभी पिछले दिनों, दो संस्थाओं में अपनी कहानी माय नेम इज़ ताता सुनाते हुए अंत की पंक्तियों तक आते-आते मेरा स्वयं का गला रूंध आया। जबकि यथार्थ जीवन में न कोई सचमुच की ताता थी, न उसकी दादी।
प्र. यामिनी-पुतुल जैसे पात्रों से कभी मिलना हुआ या स्थितियों के गर्भ से पात्र जनमे?
उ. हां, हुआ न तभी तो कृति का जन्म हुआ। ये सारे पात्र सच के प्रसंगों से ही जन्मे हैं। तुम तो खुद लिखती हो तो जानती होगी कि हर रचना हमारी महसूस की गई सच्चाइयों से ही जुड़ी होती है। जैसे एक छोटे से बीज से, पूरा पेड़, फल, फूल, पत्तों के साथ विकसित होता है उसी तरह एक सच का अहसास न जाने कितने सच उद्घाटित कर देता है। यदि ऐसा नहीं होता तो समझो रचना सच्ची नहीं है और हां, एक रचना में जाने कितनी धाराएं आपसे आप आकर मिलकर उसे संपूर्णता दे देती है।
प्र. सुबह के इंतजार तक  उपन्यास में निम्न मध्यम वर्ग की विद्रूपभरी नियति, उनकी व्यथा कथा इतनी मारक है कि पाठक तिलमिला उठता है। सत्य की पक्षधर नायिका का सशक्त चरित्र अद्भुत गढ़ा है आपने। इस पुस्तक को लिखे कितने वर्ष बीत गए, परंतु ऐसे वीभत्स सच को कहने का साहस जुटाना मुश्किल है, आज भी। आपकी मानू कैसे कह पायी?
उ. कैसे कहलवाया मैंने मानू से! शायद मेरे अंदर की आकांक्षा हमेशा यही रही है कि सच का स्वीकार होना चाहिए। माना कि ऐसा सच बोलने के लिए बड़े साहस की जरूरत होती है किंतु एक बार सच के प्रति आपकी पूरी निष्ठा हो, तो साहस भी जुट जाता है और आप कर ले जाते हैं। मानू जैसा दारूण जीवन सब स्त्रियों को नहीं मिला करता, लेकिन इस यातनामय जीवन के बीच ही वह तप कर और ज्यादा निखरी। लोग विनोद में कहते हैं, चुटकी लेने के स्वर में, लेकिन मैं पूरी गंभीरता से स्वीकारती हूं कि मैं नारीवादी हूं, पर मेरे नारीवाद के स्वर, मानव-मूल्यों की महती विरासत को लेकर चलते हैं। जिसमें स्त्री अपने सुख, अपनी सार्थकता, अपनी चेतना का उपयोग सिर्फ  अपने लिये नहीं अपनों के लिए और समूचे समाज के लिए भी करती है।
प्र. सही बात है, इस उपन्यास का सार-संक्षेप यही तो है।
उ. हां और फिर किसी के लिए कुछ करके जो सुख मिलता है, उसकी तुलना किसी दूसरी उपलब्धि से नहीं की जा सकती। मुझे तो लगता है, यह भी एक नशा है और उसी पर दुनिया टिकी है। सच कहूं तो मुझे भी अंर्तद्वंद ने घेरा था कि कहीं मैंने मानू के रूप में कोई अवास्तविक, कागजी-स्त्री तो नहीं खड़ी कर दी। लेकिन इस उपन्यास के नये संस्करण के वक्त मैं विदेश में थी। और उन्हीं दिनों रीडर्स-डाइजेस्ट में एक ऐसी सत्य कथा पढ़ी थी जिसमें एक किशोरवय की लडक़ी अपने कई छोटे भाई बहनों का संरक्षण अपने ऊपर लेती है। उन्हें अनाथ आश्रम में नहीं जाने देती। मुझे विस्मय के साथ बहुत आश्वस्ति भी मिली थी।
प्र. आपका व्यंग्य संग्रह धृतराष्ट्र टाइम्स अद्भुत था। व्यंग्य रचनाओं के लिए यह कहना पड़ेगा कि आपके पास व्यंग्य, शिल्प की तरह भी है और संवेदना की तरह भी। आप क्या कहती हैं?
उ. क्या कहूंगी, सब कुछ तो तुमने कह दिया। जीवन की तरह कलम के भी कुछ उसूल होते हैं। तुम्हारे ही शब्दों में कहूं तो ईमान-धर्म। ये ही किसी रचना में प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं। कहानी हो या व्यंग्य, लेकिन जिस तरह संस्मरण, गद्य, निबंध, कहानी, काव्य ललित निबंध इत्यादि विधाओं में आपस में आवाजाही बनी रहती है। एक ही लेखक इन सारी विधाओं को साध सकता है एक दूसरे में संक्रमण कर सकता है, वह व्यंग्य में संभव नहीं। यह एक मात्र ऐसी विधा है जिसमें संवेदना तथा शिल्प दोनों स्तरों पर समृद्ध लेखक ही सफल व्यंग्यकार हो सकता है। यह प्रजाति जीवन में भी कम दिखती है, लेखन में भी। जीवन में कुछ लोग बेहद अन्र्तमुखी, शांत होते हैं, तो दूसरे तीक्ष्ण और मुखर, सीधे अपनी बात न कह कर, तिरछी मार करने वाले। मैं यथा संभव व्यक्तिगत उपहास तथा लाउड प्रहार से दूर रहती हूं मेरा मानना है कि व्यंग्य की शक्ति उसकी सहजता और मासूमियत में निहित होती है।
प्र. अनुभवों की विविधता के लिहाज से आपकी तमाम कहानियां जीवन के तमाम रंग बिखेरती हैं। आपकी कहानियां उन मर्मज्ञ पाठकों के लिए है जो स्तरीय रचना होने के साथ सहज ही हृदयंगम हो जाने वाली रचनाएं पढऩा चाहते हैं।
उ. मैं पाठक को सोच कर कहानी को पठनीय बनाने की कोशिश जरा भी नहीं करती। हां लिखते वक्त मेरे अंदर वाला अदृश्य पाठक अवश्य मेरी कलम को साधता चलता है। ज्यादा बड़े आख्यान परक वर्णन, स्थूलता या क्लिष्टता का आभास होते ही स्वयं ही मेरी कलम उसे काटती चलती है। कहानी में ज्ञान, विचार, आख्यान आदि प्रदर्शन के लिए नहीं, तरल स्पर्श के लिए होना चाहिए। जो अनुभूति के स्तर पर पाठक की अंजली को तृप्त कर दे। यह मेरे अपने संतोष के लिए बहुत आवश्यक है। मेरा यह भी मानना है कि एक अच्छी कहानी, कभी समाप्त नहीं होती। वह अपने अंत के साथ, पढऩे वाले के हृदय में ढेर सारी बेचैनियों भरी कहानियां सौंप जाती है। एक अच्छी कहानी, बरसों बरस पाठक के मन में पैठी रहती है।
प्र. बिल्कुल पैठ जाती है अब गौरा-गुनवंती को ही लें, तो उसमें जो ताई का आपने स्केच खींचा है जो मुग्ध कर देता है।  
उ. गौरा गुनवंती की गौरा की तरह ही मेरी रमन की चाची की चाची, सुमिंतरा की बेटियां की दोनों बच्चियां, अनाम लम्हों के नाम की पत्नी, आदमकद कहानी की महाकुरूप मामी, ये सभी स्त्रियां अपनी सामन्यता में अति विशिष्ट है। हां गौरा गुनवंती की ताई का जिक्र सभी पाठकों ने खूब किया है, तो जरूर अच्छा बन पड़ा होगा उसका गुपचुप सा किरदार।
प्र.  आपके लेखन में अक्सर खांटी आंचलिक शब्द आते हैं और वे रचना को अधिक प्रभावी बना देते हैं। कथ्य के बीच माणिक मुक्ता से फबते हैं और कथ्य का नया अर्थ खोलते हैं।
उ. लेखन में वही अनायास आता है, जो हमारी अपनी शब्द संपदा में होता है। हां यह जरूर कि लिखने के बाद जब हम उसे दुबारा पढ़ते हैं तो कभी ज्यादा उपयुक्त शब्द कौंध जाता है तो कभी पहला वाला ही फाइनल हो जाता है। मेरा यह भी मानना है कि जिस लेखक के पास आत्मविश्वास जरा कम होता है और उसके अंदर का आलोचक ज्यादा प्रबल, वही अपनी कलम से लगातार तराश पाता है।