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Saturday 25 Nov 2017

साझे का पेड़


छाया सिंह
डी एम कालोनी रोड़,
सिविल लाइन्स, बाँदा
(उप्र)-210001
मो. 9415123008
उफ, आज तो बहुत ठंड है। रजाई में भी हाथ पैर ठंडे हुए जा रहे हैं। अपने टोपे को ठीक से कानों तक खींच कर सत्यनारायण बाबू ने मफलर कस कर लपेट लिया। थोड़ा बाईं करवट लेकर उन्होंने घड़ी की ओर देखा.. अभी तो छह ही बजे थे। नींद तो काफूर हो चुकी थी अब चाय की तलब जोर मारने लगी क्या करूँ... मालती से कहूँ क्या चाय बनाने को ..नहीं नहीं दो दिन से बुखार में तपने के बावजूद बेचारी सब काम करती रही है.... उसे सोने देना चाहिए। उन्होंने स्वयं से ही कहा।
ढीले पड़े मोजों को ऊपर खींच कर उन्होंने रजाई से बाहर निकलने की हिम्मत जुटाई। दरवाजा खोलते ही बर्फीली हवा ने उन्हें ठिठुरा दिया। हथेलियों को रगड़ते हुए वे रसोई में पहुँचे और गैस चूल्हा जला का चाय का पानी रखा। अदरक, लौंग, काली मिर्च, ढूंूढ कर कडक़ चाय बनाई। ‘मालती उठो, चाय पी लो कुछ आराम मिलेगा।’ अपने स्वर को कोमल बनाते हुए उन्होंने कहा।
‘अरे आप कब उठ गये और चाय भी बना ली.... मुझे जगा दिया होता।’ मालती हड़बड़ाते हुए उठ बैठी जैसे उनसे कोई पाप हो गया हो।
‘कोई बात नहीं, अब तुम्हारी तबीयत कैसी है। आज दवा फिर ले आऊँगा। चाहो तो तुम भी साथ चली चलना, घर से निकलोगी तो थोड़ा मन बहल जाएगा। चलो अब चाय पी लो।’ सत्यनारायण बाबू बोले।
चाय पी कर वे दैनिक कर्मों से निवृत्त हुए और नहा कर पूजा की। आज मौसम खुला हुआ था। जाड़े की मुलायम गुनगुनी धूप आंगन के नींबू वाले कोने पर आने लगी थी। उन्होंने खटिया उठाकर वहीं पर बिस्तर लगा लिया। मालती भी शॉल में अपने बदन को लपेटते हुए वहीं आकर बैठ गयी। अभी धूप में अधिक गर्मी नहीं आई थी।
‘मालती एक बात कहूँ..... देखो गुस्सा मत होना। आज मेरा गरमागरम हलवा खाने का बड़ा मन कर रहा है। अगर तुम्हारी तबीयत ठीक लग रही हो तो बना दो।’ उन्होंने हिचकते हुए कहा।
मालती को हँसी आ गई और वे लंगड़ाते हुए चौके की ओर चल दी। उन्हें लंगड़ाता देख सत्यनारायण बाबू की आँखे भर आई.. क्या दिया मैंने इस औरत को... न गहने, न महंगे कपड़े। कभी कहीं घुमाने फिराने भी नहीं ले गया, पर आज तक न इसने कोई मांग रखी और न कभी शिकायत की। कुछ तो इसके अरमान होंगे, इच्छाएं होंगी, सब इसने मन में ही दफन कर दिये। ऐसी संतोषी एवं धर्मपरायण पत्नी बड़े भाग्य से मिलती है। उन्होंने हाथ जोडक़र ईश्वर को धन्यवाद दिया।
‘बड़े बाबू, दादी कहाँ हैं?’ आवाज सुनकर उन्होंने ऊपर देखा। बगल वाली छत से पड़ोसी सुधीर का सात वर्षीय बेटा पूछ रहा था।
‘तुम्हारी दादी हलवा बना रही हैं। तुम भी आ जाओ’ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। पांच मिनट के अन्दर बबलू हाजिर हो गया। बबलू के साथ बैठकर हलवा खाते हुए पति पत्नी दोनों ही एक अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे थे। सच में बच्चों के बिना भी कहीं घर, घर होता है।
‘दादी, मम्मी ने नीबू मंगाये हैं, दे दीजिये। मुझे स्कूल भी जाना है।’ बबलू ने अपनी गोल-गोल आँखे नचाते हुए कहा। नींबू लेकर बबलू चला गया।
उन्होंने मालती का माथा छूकर देखा, बुखार नहीं था। उन्होंने राहत की सांस ली। मालती को दवा खिलाकर उन्होंने अखबार उठा लिया। अखबार पढ़ कर उन्होंने पेड़ पौधों की सुध ली। नींबू के पेड़ में जाला लग गया था। उन्होंने पाइप उठाकर धो डाला। चमकते हुए हरे-हरे पत्तों की बीच लगे, बड़े-बड़े कागजी नींबू देखकर आस पड़ोस वाले जब-तब नींबू मांगते रहते थे। दो प्राणी कितने नींबू खाते इसलिये पति-पत्नी किसी को मना नहीं करते थे। इसी बहाने लोगों का घर पे आना-जाना बना रहता था नहीं तो आज के आपाधापी वाले समय में किसके पास फुर्सत है, बुजुर्गों से बात करने की। बड़े प्यार से उन्होंने नींबू के पत्तों को सहलाया।
धूप में अब गर्मी आ गई थी। बड़े बाबू ने टोपी, मफलर और स्वेटर उतार दिये और बिस्तर पर लेट गये। सेवानिवृत्ति के बाद उनके पास समय ही समय था। उन्होंने अपनी आंखे बन्द कर ली। नींद तो खैर क्या आनी थी, बीते हुए समय की एक-एक घटनाएं उनके मस्तिष्क में उभरने लगीं।
छोटी सी फैक्ट्री में बड़े बाबू के तौर पर उनकी नियुक्ति क्या हुई, घर बाहर सब उन्हें बड़े बाबू ही कहने लगे थे। अगर वे चाहते तो अपने पद का लाभ उठाकर खूब कमाई कर लेते पर सात्विक विचारों वाले सत्यनारायण बाबू को बेईमानी का एक पैसा भी हराम था। विवाह के पन्द्रह वर्षों बाद ईश्वर ने एक ही सन्तान उन्हें दी थी जिसे वे प्यार से अनमोल कहते थे। अनमोल के जन्म के बाद पति-पत्नी की पूरी दुनिया बच्चे के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी। छोटे से इस कस्बे के सबसे महंगे स्कूल में उन्होंने अनमोल को पढ़ाया। उसकी हर इच्छा, हर शौक को पूरा किया पर अतिशय लाड़ प्यार से वह जिद्दी और बदतमीज हो गया था।
बड़े बाबू को याद आया वह दिन, जब बारहवीं की परीक्षा में अनमोल के कम अंक आने पर वे अनमोल को समझा रहे थे, ‘देखो बेटा, तुम्हारी हर जरूरत हम पूरी करते हैं, तुम्हारा ध्यान रखते हैं तो तुम मन लगाकर क्यों नहीं पढ़ते। हमारे तो बुढ़ापे की लाठी तुम ही हो।’
‘अगर आप मेरे ऊपर खर्च करते हैं तो कौन सा अहसान करते हैें। सभी माँ-बाप ऐसा करते हैं। कौन से आपके 5-6 बच्चे हैं। सब मेरे लिए ही तो करना है फिर भी मुझे इतने छोटे कस्बे में पढ़ा रहे है, बस बहुत हो गया। मुझे इंजीनियर बनना है, डोनेशन और फीस का इन्तजाम कर लीजिए।’’
‘डोनेशन क्यों? पहले प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करो, मेहनत करो। तुम्हारा चयन हो जाएगा तो डोनेशन की आवश्यकता ही नहीं होगी। अच्छा सरकारी कॉलेज मिल जाएगा तो बहुत कम पैसा पढ़ाई में लगेगा, ये डोनेशन तो एक तरह की घूस...’
‘बस-बस, अपना लेक्चर बन्द कीजिए। मुझे समझ में आ गया है कि आपको मेरी नहीं पैसों की चिन्ता है।’ यह कहकर अनमोल पैर पटकता हुआ, बाहर निकल गया।
अनमोल की जिद और पत्नी के आँसू देखकर उन्होंने किसी तरह पैसों की व्यवस्था करके उसका दाखिला इंजीनियरिंग कॉलेज में करा दिया था। हॉस्टल में अनमोल को छोड़ कर लौटते समय पति-पत्नी दोनों फूट-फूट कर रो पड़े थे।
अनमोल का मन पढ़ाई में तो ज्यादा लगता नहीं था किसी तरह उसने बीटेक पूरा किया पर अच्छे अंक न आने के कारण उसे कहीं अच्छी नौकरी नहीं मिली। उन्होंने सुझाव दिया था, ‘चलो बेटा, वापस चल कर वहीं कोई नौकरी ढूंढ लो।’ पर अनमोल ने साफ  इन्कार करके वहीं कॉल सेन्टर में पंद्रह हजार की नौकरी पकड़ ली। वे निराश  होकर लौट आए थे।
पड़ोसी और रिश्तेदार कहते, ‘बड़े बाबू, आप तो बड़े भाग्यशाली हैं। एक ही लडक़ा, वह भी इंजीनियर। आपकीे तो लॉटरी लग गई।’ क्या कहते वो बेचारे, लडक़े पर उनका कोई वश नहीं था।
‘सोते ही रहेंगे कि खाना भी खाएंगे।’ पत्नी की आवाज से उनकी तंद्रा भंग हुई। दाल, चावल, आलू सोयामेथी की सब्जी, टमाटर की चटनी वाह... मालती एक-एक फुल्का सेंकने लगी और वे खाने लगे। खाना खाकर तृप्त भाव से वे उठे और हाथ मुंह धोये। अब धूप उनकी चारपाई से खिसक गई थी। लेटकर उन्होंने आँखे बन्द कर लीं...विचारों की कडिय़ां पुन: जुडऩे लगीं।
पिछले कई दिनों से मालती की कमर में तकलीफ  थी। दर्द के कारण बेचारी ठीक से चल भी नहीं पा रहीं थीं। अब तो दो दिन से बुखार भी आ गया था। नहीं अब लापरवाही ठीक नहीं है। कल सुबह ही जाकर अनमोल के साथ बड़े अस्पताल में मालती को दिखाएंगे।
निश्चय तो कर लिया पर अनमोल की पत्नी.. बाप रे..उसके कर्कश स्वभाव से सभी घबराते थे। औरत है या जेलर। पूरा दिन.... यहां मत बैठो ऐसा करो, वैसा करो ये सामान किसने फैलाया चीखती ही रहती थी। उनसे पूछे बिना ही अनमोल ने अन्तर्जातीय विवाह कर लिया था। उन्हें तो छह माह बाद पता चला था। ना अनमोल जल्दी घर आता था न माँ-बाप का अपने घर आना उसे पसन्द था। दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने भी बेटे बहू से दूरी बना ली थी पर माता-पिता का हृदय भला कब मानता है। मालती अन्दर ही अन्दर घुटती रहती थी इसी कारण मधुमेह और उच्च रक्तचाप की चपेट में आ गई थी। अब यह कमर दर्द की नयी समस्या खड़ी हो गई थी।
अगली सुबह की बस से दोनों शहर रवाना हो गये। उन्हें देखते ही बहू की त्यौरियां चढ़ गई थी। अनमोल ने भी विशेष उत्साह नहीं दिखाया। बेमन से बहू ने चाय नाश्ते की व्यवस्था की। गोलू और बबलू जरूर दादा-दादी को देखकर प्रसन्न थे। बड़े लाड़ से उन्होंने पूछा, ‘दादी आप हमारे लिए क्या लाई हो?’
मालती ने बड़े प्यार से बच्चों को अपने हाथ के बनाए लड्डू, पेड़े और मठरी निकाल कर दिये। ‘लो बहू, कुम्हड़े की बडिय़ां और नींबू का ताजा अचार लाई हूँ।’ बहू ने देखकर मँुह बिचका दिया।
अस्पताल में आधा दिन लग गया। कई तरह की जाँच और एक्सरे के बाद डाक्टर बोले, ‘मालती जी के कूल्हे की हड्डी में सडऩ शुरू हो गयी है। और कोई उपाय नहीं है कूल्हे का प्रत्यारोपण करना पड़ेगा।’
बड़े बाबू तो जैसे आसमान से गिरे, ‘इतना बड़ा ऑपरेशन, कितना खर्च होगा?’
‘सब मिला कर आठ-नौ लाख समझ लीजिए।’ डाक्टर ने कहा।
उदास मन से सब घर लौट आये। सबके चेहरे पर तनाव था। अनमोल ने तो साफ  मना कर दिया ‘मेरी छोटी सी तनख्वाह में गृहस्थी और बच्चों की पढ़ाई मुश्किल से हो पाती है। मुझसे तो एक पैसे की भी मदद की उम्मीद मत करियेगा।’
निराश माँ-बाप वापस लौट आए। मालती ने पति से कहा, ‘कितने दिन जीना है, मैं ऐसे ही काट लूंगी। इतने पैसों का इन्तजाम नहीं हो पायेगा। अनमोल भी क्या करे, मजबूर है।’
बड़े बाबू हैरानी से मालती को देख रहे थे। ये औरत है या देवी। न अपने कष्ट की परवाह, न किसी से शिकायत पर उन्हें तो अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। मन ही मन उन्होंने कुछ निश्चय किया।
‘आइये गुप्ता जी, मैंने आपको इसलिये बुलाया है क्योंकि आप तो हमारे घर की सब परिस्थितियां जानते हैें। अपना सारा धन तो मैंने अनमोल की पढ़ाई में लगा दिया। बस यह मकान बचा है। अब आपसे क्या छुपाना....... मालती का बड़ा ऑपरेशन होना है जिसके लिये आठ-दस लाख रूपयों की जरूरत है। अपना आंगन और पीछे के तीन कमरे अगर मैं बेच हूँ तो इतना मिल जाना चाहिए। दो प्राणियों के लिये एक कमरा, बरामदा और रसोई पर्याप्त है।’ बड़े बाबू थोड़ा दबी आवाज में बोले।
‘मै समझ सकता हूँ बड़े बाबू। आप पर क्या बीत रही है। अगर आप उचित समझे तो मैं ही ले लूँ। फिर हम पड़ोसी हो जाएंगे।’ गुप्ता जी थोड़ा संकोच से बोले।
‘यही ठीक रहेगा। बस आपसे एक गुजारिश है। नींबू का पेड मत कटवाइयेगा’........ कहते-कहते रो पड़े वे।
‘नहीं बड़े बाबू, मैं वचन देता हूँ वह पेड़ सदैव हम दोनों का साझा रहेगा। आप निश्चिन्त रहें।’
पैसों की व्यवस्था होते ही मालती का आपॅरेशन हो गया। धीरे-धीरे वे सामान्य तरीके से चलने लगीं। ऑपरेशन सफल रहा था। जीवन फिर ढर्रे पर आ गया था।
‘मालती अब तुम पूरी तरह से ठीक हो। देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूं।’ मालती के हाथों में लिफाफा थमाते हुए वे मुस्कुराए।
लिफाफा खोलते ही मालती दंग रह गई। उसमें तो टे्रन के टिकट थे।’ हम कहां जा रहे हैं?’
‘तैयारी कर लो मालती। हम चार धाम की यात्रा पर जा रहे हैं। घूमेंगे-फिरेंगे, मनचाहा खाएंगे। जीवन की इस संध्या बेला में मैं तुम्हें हर खुशी देना चाहता हूँ। आज तक तुमने कुछ नहीं मांगा न ही मैं कुछ दे पाया। जब किसी को हमारी परवाह नहीं तो हम भी किसी की चिन्ता नहीं करेंगे। अब अपना जीवन अपने मन मुताबिक जियेंगे और यह देखो......
एक मखमली डिब्बे में एक सुन्दर सी चेन चमक रही थी। पति के कंधे पर सिर रखकर मालती रो पड़ीं। ‘बस मालती, अब रोना नहीं। अब तुम्हारे हँसने के दिन है।’ मैं तुम्हारी पसंद की काजू कतली भी लाया हूँ।’ पत्नी के आँसू पोंछते हुए बड़े बाबू बोले। मालती मुस्कुरा दी।  ठ्ठ