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Thursday 23 Nov 2017

रोटी दे दे मां

  अंकुश्री
प्रेस कॉलोनी, सिदरौल, नामकुम, रांची
(झारखण्ड)-834 010
  मो. 8809972549
‘मां! बड़ी भूख लगी है मां !! आज भी तू ने सुबह से कुछ खाने को नहीं दिया मां !’’ छह वर्ष का सुबोध अपनी मां का आंचल पकड़े बार-बार कुछ खाने के लिये मांग रहा था, ‘‘मां, पहले खाना देने में तुम इतनी देर नहीं किया करती थी। अब कुछ दिनों से तुम ठीक से खाना क्यों नहीं बनाती..? बोल न मां !  आज भी क्या भूखे पेट...?’’
‘‘बेटा, मैं सोच रही हूं कि तुम्हें आज खाने के लिये क्या दूं .. ’ बेटे की भूख से कातर आंखें अब सोमेश्वरी को देखी नहीं जा रही थीं।
 मां-बेटे के भूखे रह रहे वैसे तो आज चार दिन हो गये थे, लेकिन परसों शाम को पड़ोसन से दो रोटी मांग कर उसने सुबोध को खिला दिया था। जब उससे बेटे की भूख बरदाश्त नहीं हो पायी तो कलेजे पर पत्थर रख कर वह पड़ोसन से रोटी मांगने गयी थी।
‘‘मां, चल ना, आज भी नीलू दीदी से दो रोटी मांग ली जाये। एक तू खा लेना और दूसरी मैं...’’ सुबोध की बातें सुन कर सोमेश्वरी ने उसे गले से लगा लिया और कहा,‘‘मेरा कितना खयाल रखता है तू ? अभी तेरी यह हालत है, जब तू कमायेगा तब मेरे लिये क्या करेगा !’’
‘‘मां ! चल ना !!’’ सुबोध बहुत धीरे से बोला था।    
‘‘रोज-रोज किसी से नहीं मांगते बेटा’’ भूखे बेटे को आदर्श की सीख देने में सोमेश्वरी को लगा कि उसका कलेजा मुंह को आ जायेगा। कुछ दिन पहले तक उसे मुहल्ले में किसी के आगे हाथ पसारने की दूर, किसी से खुल कर बात करने की भी नौबत नहीं आयी थी। वह अपने घर और परिवार में मशगूल थी। लेकिन अपने पति मदन के कंपलसरी रिटायर हो जाने से घर की स्थिति बिगड़ गयी थी और यहां तक पहुंच गयी थी कि बेटे की भूख शांत करने के लिये दूसरे के आगे हाथ पसारना पड़ रहा था।
मदन राज्य सरकार का क्लर्क था। कंपलसरी रिटायर कर दिये जाने पर उसने सरकार के विरोध में अपनी तरह के कुछ और लोगों को इक_ा करके धरना देना शुरू कर दिया था। धरना नहीं देता तो और क्या करता! दूसरी कोई आशा नहीं थी। दो-दो जवान बेटियों की शादी करनी थी, बेटे सुबोध को पढ़ाना था।
धरना देते महीनों बीत गये। मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग पायी। बाद में उसने अनशन का सहारा लिया था. लेकिन आमरण अनशन पर बैठे अभी आठ दिन ही हुए थे कि ‘मेडिकली अनफिट’ करके मदन को अस्पताल में डाल दिया गया था।
मदन के रिटायरमेंट के दो माह बीत गये थे। घर की स्थिति पहले से ही ठीक नहीं थी, अब और बिगड़ गयी। उसके अस्पताल से आने के बाद ही घर में सामान की व्यवस्था हो पाती, घर-खर्चा का कोई उपाय निकल सकता था।
‘‘मां, मैं जाता हूं, नीलू दीदी से रोटी मांग लूंगा, घर में नमक तो है ही, हमलोग रोटी-नमक खा लेंगे।’’ सुबोध की जिद के कारण सोमेश्वरी को रोटी के लिये जाना पड़ा।
रास्ते में सोमेश्वरी सोच रही थी कि उसकी या सुबोध की गलती ही क्या है, जो भूखे रह कर भी जीवन काटना संभव नहीं हो पा रहा है. मदन अभी भला-चंगा था और उसकी नौकरी के कुछ वर्ष बाकी भी थे। जब तक वह रिटायर करता, सुबोध कुछ काबिल हो जाता। यदि मदन की आयु अधिक हो जाने से उसकी नौकरी ली जा सकती है तो उसकी पढ़ी-लिखी जवान लड़कियों को नौकरी दी भी तो जा सकती है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
नीलू से सुबोध के लिये सोमेश्वरी दो रोटी मांग कर ले आयी थी अैर उसे खिला रही थी। सुबोध ने उसे भी रोटी खाने पर मजबूर कर दिया। उसे भी आधी रोटी खानी पड़ी।
‘‘मां ! तुम मौसी के यहां चलने के लिये कहती रहती हो। क्या वहां भी हम लोगों को भूखे ही रहना पड़ेगा?’’ वह भूख से घबरा गया था. उसकी बात सुन कर सोमेश्वरी ने कहा,
‘‘नहीं बेटा ! तुम्हारे मौसा एक नेता हैं। उन्हें किसी चीज की कमी नहीं है। तुम्हारे पिताजी के अस्पताल से वापस होने पर सभी वहीं चलेंगे। तुम्हारी अपनी दोनों बहनों से भी वहां भेंट हो जायेगी।’’ सोमेश्वरी सोचने लगी कि सुबोध के मौसा मदन से भी अधिक दिनों से काम कर रहे हैं। उनकी आयु भी मदन से अधिक है। वे देखने में भी अधिक बूढ़े लगते हैं। काम भी कुछ विशेष नहीं करते हैं, नेतागिरी में लगे रहते हैं।
‘‘मां, मौसा नेता हैं। लेकिन पिताजी भी तो आंदोलन कर रहे थे.’’ सोमेश्वरी के सोचने का क्रम सुबोध ने तोड़ दिया। उसे आश्चर्य हो रहा था कि उसके यहां यह गरीबी और कभी नहीं खत्म होने वाली अभागी भूख कहां से आ गयी है।
‘‘तुम्हारे मौसा कर्मचारी के साथ ही नेता भी हैं। लेकिन तुम्हारे पिता मात्र एक कर्मचारी थे। अपनी मांग पूरी कराने के लिये वे आंदोलन कर रहे थे।’’ सोमेश्वरी सुबोध को समझाने लगी कि उसके पिताजी कितने लगनशील और मेहनती कर्मचारी थे तथा कार्यालय के कामों में किस तरह हमेशा व्यस्त रहते थे। वे बहुत ही कुशल कर्मचारी माने जाते थे। पर उनकी एक बहुत बड़ी अकुशलता थी कि वे किसी की चापलूसी नहीं करते थे। उनकी एक और आदत थी कि वे गलत बातें बरदाश्त नहीं कर पाते थे और उसका विरोध कर बैठते थे।  
अस्पताल में भर्ती होने के बाद मदन की आंत में घाव हो गया था। एक दिन मदन की अस्पताल में ही मृत्यु हो गयी। कुछ दिनों तक सोमेश्वरी ने रोया-गाया। फिर उसने सोचा कि उसका कोई लाभ नहीं है। जब आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता तो आंसू स्वत: सूख जाते हैं। उसके रोते रहने से उल्टे सुबोध पर बुरा असर पड़ रहा था। अपने दुलारे बेटे का मुंह देख कर सोमेश्वरी की आंखों के आंसू सूख गये।
मदन की मृत्यु के बाद सोमेश्वरी अपनी दयनीय स्थिति का बोझ बहन-बहनोई के कंधे पर नहीं डालना चाह रही थी। भूख से निपटने के लिये वह कोई काम करना चाह रही थी। मगर उसे कोई काम भी नहीं मिल पा रहा था। उसे खुद अपनी स्थिति पर दया आ रही थी कि चाहते हुए भी उसके खाली हाथों को कोई काम नहीं मिल पा रहा था। स्वस्थ औरतों को जब कभी सडक़ों पर हाथ पसारे देखती थी तो उसे गुस्सा आता था। उसे लगता था कि वे औरतें काम करने से जी चुराती हैं, काम नहीं करना चाहती हैं और भीख मांगती हैं। लेकिन चाहते हुए भी उसे काम नहीं मिल पा रहा था तो उसका अनुमान गलत लगने लगा था। आसपास की संपन्नता को देख कर उसकी विपन्नता अधिक उजागर हो जाती थी।
कुछ दिनों तक सोमेश्वरी ने घर के सामानों को बेच-बेच कर घर का काम चलाया था। लेकिन सामान बेचने का क्रम जल्द ही समाप्त हो गया। बेचने के लिये आगे कुछ बचा ही नहीं। वह मुहल्ले के कुछ घरों में चौका-बरतन करने लगी। अपने जी-तोड़ परिश्रम और लोगों की दया के मिले-जुले परिणामस्वरूप वह अपनी और सुबोध की आधी भूख दूर कर लेती थी। दिन कट रहा था, मगर जिंदगी बोझ बनी हुई थी।
एक दिन मुहल्ले में नेता जैसे कुछ लोग आये। वे कहते फिर रहे थे कि साड़ी और रुपये बांटे जा रहे हैं। मुहल्ले वालों ने साड़ी और रुपये लेने के लिये भीड़ लगा दी। सोमेश्वरी भी भीड़ में घुस गयी। भीड़ के आगे एक शिविर लगा हुआ था। काफी देर बाद सोमेश्वरी की भी बारी आ गयी। उसे एक कोठरी में ले जाया गया। डाक्टरों और नर्सों के बीच उसे पार दिया गया। जबर्दस्ती उसका आपरेशन कर लिया गया। कुछ देर बाद वह बाहर आयी तो साड़ी और रुपये के लालच में हर उम्र के लोग वहां अब भी खड़े थे।
दूसरे दिन सोमेश्वरी को पेट में दर्द होने लगा। बेचारी शर्माती हुई फिर शिविर में गयी। ‘‘सब ठीक हो जायेगा’’ का आश्वासन लेकर वह वापस आ गयी। वह लौट तो आयी, लेकिन पेट का दर्द खत्म नहीं हो सका।
ऑपरेशन के करीब आठ दिन बीत गये। मगर सोमेश्वरी की तकलीफ  कम नहीं हो सकी। उल्टे उसकी तबीयत खराब होती जा रही थी। उसके शरीर से खून के साथ मवाद भी गिरने लगा था।
बेचारा नन्हा सुबोध अपनी बीमार मां के लिये पानी ला देता था। सोमेश्वरी जिनके यहां काम करती थी, उन लोगों के यहां से कुछ दिनों तक भोजन आदि आया। लेकिन कुछ दिनों के बाद उसे पूछने वाला कोई नहीं रहा। बेचारा सुबोध कर भी क्या सकता था?
सोमेश्वरी का स्वास्थ्य दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा था। एक दिन वह मनहूस शाम भी आयी, जब ‘बाप-बाप’ करती सोमेश्वरी का सारा दर्द समाप्त हो गया। वह बिलकुल शांत हो गयी। टिटनेस हो जाने के कारण उसने सदा के लिये आंखे बंद कर ली थी।
शाम बीत चुकी थी। सुबोध ने जब घंटों अपनी मां के कराहने की आवाज नहीं सुनी तो वह मां को जगाने लगा, ‘‘मां, मां ! उठो न मां! सोयी हुई है मां? बोलती क्यों नहीं मां? कल लाला साहेब के यहां से रोटी मांग लाया था, आज क्या खाऊं मां? अब तो रात भी हो गयी है। भूख लगी है मां, रोटी दे दे मां ! ’’