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Sunday 19 Nov 2017

चर्चा में ‘समाज का आज’

संस्कृति समाचार
जयपुर  पीस फाउण्डेशन के तत्वावधान में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की नव प्रकाशित पुस्तक समाज का आज पर चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई। कृतिकार डॉ अग्रवाल ने अपनी पुस्तक के बारे में  बताया कि मूलत: एक अपराह्न दैनिक के स्तम्भ के रूप में लिखे गए ये आलेख समकालीन देशी-विदेशी समाज की एक छवि प्रस्तुत करते हैं। डॉ अग्रवाल ने कहा कि ये लेख विधाओं की सीमाओं के परे जाते हैं और बहुत सहज अंदाज में हमारे समय के महत्वपूर्ण सवालों से रू-ब-रू कराने  का प्रयास करते हैं। कृति चर्चा की शुरुआत की जाने-माने पत्रकार श्री राजेंद्र बोड़ा ने। उनका कहना था कि यह किताब बेहद रोचक है और हल्के फुल्के अंदाज में बहुत सारी बातें कह जाती हैं। क्योंकि ये लेख एक अखबार  के लिए लिखे गए हैं इसलिए इनमें अखबार की ही तर्ज पर इंफोटेनमेण्ट है, यानि सूचनाएं भी हैं और मनोरंजन भी। श्री बोड़ा का यह भी विचार था कि इस किताब  के बहुत सारे- करीब चालीस-  लेख प्रश्न चिह्न पर खत्म होते हैं, और लगता है कि लेखक खुद कोई स्टैण्ड नहीं ले रहा है. लेकिन उनका एक मत यह भी था कि लेखक अपनी बात कहता है और निर्णय पाठक पर छोड़ देता है। श्री बोड़ा का कहना था कि इन लेखों में कोई भी पीड़ा सघन रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है, उसकी सूचना मात्र है. फिर भी, किताब की पठनीयता की उन्होंने उन्मुक्त सराहना की। वरिष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज ने कहा कि आकार इन लेखों की बहुत बड़ी सीमा है। विषय जैसे ही खुलने लगता है, लेख समाप्त हो जाता है। लेकिन लेखक के स्टैण्ड की बात पर उनका कहना था कि मूल्यों के स्तर पर लेखक लोकतांत्रिक स्टैण्ड लेता है। वह अपनी बात कहता है और फैसला पाठक पर छोड़ देता है। वह भले ही कोई निर्णय न दे, विचार को जरूर प्रेरित करता है। वरिष्ठ रचनाकार और साहित्यिक त्रैमासिकी ‘अक्सर’के सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज का  कहना था कि यह किताब अखबार और लेखक के रिश्तों पर विचार करने की जरूरत महसूस कराती है। उनका सवाल था कि क्या अखबार लेखक का इस्तेमाल करता है, और अगर लेखक कोई स्टैण्ड लेता है तो अखबार का रुख क्या होगा? उन्होंने लेखक से चाहा कि वो कभी ऐसा भी कुछ लिखकर देखे जो अखबार को स्वीकार्य न हो। चर्चा में सहभागिता करते हुए कथाकार और विमर्शकार हरिराम मीणा ने कहा कि हर कॉलम की अपनी शब्द सीमा होती है और लेखक को उस सीमा के भीतर रहना होता है। उन्होंने कहा  कि इस किताब के लेख बहुत रोचक और समसामयिक हैं। ‘न्यूज टुडे’ के पूर्व सम्पादकीय प्रभारी, जिनके कार्यकाल में ये आलेख प्रकाशित हुए थे, श्री अभिषेक सिंघल का कहना था कि अखबारी लेखन और साहित्य में स्वभावत: एक फासला होता है, और फिर अगर वह अखबार सांध्यकालीन हो तो यह फासला और बढ़ जाता है क्योंकि इसका पाठक वर्ग भिन्न होता है। चर्चा का समापन करते हुए राजनीति विज्ञानी डॉ नरेश दाधीच ने कहा कि इस किताब के लेखों की भाषा नए प्रकार की है और वह उत्तर आधुनिक है। यह भाषा विषयों द्वारा निर्मित सीमाओं का अतिक्रमण करती है और कभी-कभी यह आभास देती है जैसे यह हरिशंकर परसाई की भाषा का उत्तर आधुनिक संस्करण है।
प्रस्तुति- नरेश दाधीच