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Monday 20 Nov 2017

विकास की बात कब्रिस्तान, श्मशान तक

सर्वमित्रा सुरजन
नरेन्द्र मोदी ने कभी खुद को चायवाला बताया, कभी प्रधान सेवक और कभी फकीर। एक आदमी के कितने रूप और कितने चेहरे हो सकते हैं, यह उन्होंने विगत ढाई सालों में देश को बता दिया है। अपने बारे में कोई भी राय बनाने, कोई भी पेशा चुनने के लिए वे स्वतंत्र हैं। लेकिन 2014 में जब उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो अब भारत की जनता के लिए वे प्रधानमंत्री ही हैं। अफसोस कि नरेन्द्र मोदी अपने इस पद और पद की गरिमा को बार-बार ठेस पहुंचा रहे हैं। संसद में बोलने की मर्यादा का पालन उन्होंने नहींकिया, वहां चुनावी सभा की तरह बोले और जब चुनावी सभा में बोले तो प्रधानमंत्री पद की मर्यादा की उपेक्षा की, बल्कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का भी खयाल नहींरखा। इस साल 2 जनवरी को धर्मनिरपेक्ष भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बड़ा महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि प्रत्याशी या उसके समर्थकों के धर्म, जाति, समुदाय, भाषा के नाम पर वोट मांगना गैरकानूनी है। सात जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा था कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। इस आधार पर वोट मांगना संविधान की भावना के खिलाफ है। जन प्रतिनिधियों को भी अपने कामकाज धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करने चाहिए। अदालत के इस फैसले के बाद उम्मीद बंधी थी कि पांच राज्यों के चुनावों पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। लेकिन उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ताधारी समाजवादी पार्टी पर जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस तरह की राजनीति से हर कोई प्रभावित हो रहा है। भाजपा नेता समाजवादी पार्टी को कोसे, भला-बुरा कहे, चुनाव में यह सब चलता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी का सपा सरकार की आलोचना करते हुए यह कहना कि गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए, अगर रमजान में बिजली रहती है तो दिवाली में भी बिजली आनी चाहिए, बेहद खेदजनक है। उनके भाषण से यह साफ जाहिर हुआ है कि उत्तरप्रदेश में सरकार बनाने के लिए भाजपा ध्रुवीकरण के खेल में जुट गई है। समाजवादी पार्टी की सरकार अगर धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव कर रही है, तो इस पर कार्रवाई करने के लिए देश में संवैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं। प्रधानमंत्री स्वयं संसद में इस मुद्दे को उठाकर संवैधानिक दायरे में रहकर जांच की मांग कर सकते हैं। इतने वर्षों में उन्होंने रमजान और ईद, दीवाली और होली की बात संसद सत्रों में नहींकी। फिर चुनाव के वक्त उन्हें यह सब क्यों नजर आया? जिस बात पर सपा की आलोचना उन्होंने की, क्या खुद वे वही काम नहींकर रहे हैं? कहां तो अब तक नरेन्द्र मोदी और उनके चाटुकार विकास की बातें करते नहींथकते थे। मानो देश में बीते बरसों में कुछ हुआ ही नहींऔर जो हुआ वह इन दो-ढाई सालों में हुआ है। लेकिन अब विकास की बात कब्रिस्तान और श्मशान तक पहुंच गई है। भाजपा के पास पहले राम मंदिर प्रमुख मुद्दा हुआ करता था। रथयात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंस और गोधरा कांड, सब का दुष्परिणाम देश ने भुगत लिया। देश में सांप्रदायिक तनाव की रेखा गहरी हो गई। गनीमत है कि इतनी गहरी अब भी नहींं है कि 1947 का विभाजन दोहरा सके। ऐसा इस देश की जनता की समझदारी के कारण है। सहिष्णु जनता ध्रुवीकरण के खेल को समझने लगी है, इसलिए राम मंदिर मुद्दे के बावजूद उत्तरप्रदेश में भाजपा को सत्ता नहींमिली। लोकसभा में यूपीए सरकार के खिलाफ लहर थी, जिसे मोदी लहर बताया गया और इसका फायदा भाजपा को मिला। पर दिल्ली और बिहार में वह लहर भी सिर पटककर लौट गई। अब उत्तरप्रदेश में ऐसा ही हश्र न हो, यह डर बेतरह भाजपा, विशेषकर अमित शाह और नरेन्द्र मोदी को सता रहा है। अमित शाह तो केवल भाजपा अध्यक्ष हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी भाजपा सांसद होने के साथ-साथ भारत जैसे धार्मिक, जातीय, भाषायी विविधता वाले देश के प्रधानमंत्री भी हैं। वे जब भाजपा निशान कमल को सीने में लगाए जगह-जगह भाषण देते हैं, तो यह शोभा नहींदेता है। प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नरेन्द्र मोदी ने बहुत सी पुरानी बातों को खारिज किया है, परंपराओं को बदलने की कोशिश की है, और ऐसा करते हुए पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री होने का दंभ उनमें नजर आया है। कम से कम उस दंभ की खातिर ही प्रधानमंत्री पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ न करें।