Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

टेपचू : वह जन मारे नहीं मरेगा। नहीं मरेगा

पल्लव
393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी, शालीमार बाग़
दिल्ली-110088
विचारधारा अब फैशन की बात नहीं रही। गरीब, मजदूर और किसान अब दलित, स्त्री या अल्पसंख्यक विमर्श में बदल गए हैं। विमर्श का दायरा आदिवासी और ओबीसी तक बढ़ता जा रहा है। जाति वर्ग से बड़ी सच्चाई मान ली गई। इन्हीं दिनों दुनिया के पैमाने पर एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म को हिंसक और जाने क्या-क्या मानते हुए जुलूस निकाल रहे हैं। ऐसे में हिन्दी कहानी के दो पुराने चरित्र याद आते हैं हामिद और अल्ला बक्स उर्फ टेपचू। हामिद आजादी से पहले अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदने के जतन में लगा था ताकि उसके हाथ रोटियां सेंकते हुए जले नहीं। टेपचू थोड़ी देर बाद आया है जब देश की जनता दूसरी आजादी के नारे और जुलूस देख चुकी थी। यह वह टेपचू है जो अपना पेट भरने का उद्यम जानता है, संगठित होने का महत्व समझ चुका है और आपकी आंखों में आंखें डाल सकता है।
‘टेपचू’ उदय प्रकाश की कहानी में आया था और यह कहानी 1980 के आसपास प्रकाशित हुई थी। उदयप्रकाश के पहले कहानी संकलन ‘दरियाई घोड़ा’ में इसे संकलित किया गया था जो 1982 में पहली बार छपा था।
लगभग पैंतीस साल पुरानी इस कहानी को इधर पढऩा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ‘मनुष्य की जय यात्रा’ का हिस्सा होने का अनुभव है। उदयप्रकाश कहानी को सीधे टेपचू से शुरू करने के बजाय उसके पिता अब्दुल्ला बक्सा उर्फ अब्बी से प्रारंभ करते हैं जो मनमौजी, रंगीला और स्वप्नदर्शी था। हिन्दी में इस जोड़ के एक और पिता को पाठक भूल नहीं सकते जो मनोहर श्याम जोशी के अमर उपन्यास ‘कसप’ में डी.डी. के पिता के रूप में प्रकट हुए थे। वे उडऩे का जादू करना चाहते थे- कर नहीं सके और टेपचू के पिता अब्बी भी बाढ़ भरी नदी में नाचने का जादू करते हुए नदी में ऐसे बिला जाते हैं कि फिर कभी नहीं मिलते। अब्बी की पत्नी फिरोजा किसी तरह टेपचू को पाल पोसकर बड़ा कर रही है। यह और बात है कि टेपचू ‘इतना घिनौना था कि फिरोजा की जवानी पर गोबर की तरह लिथड़ा हुआ लगता था। पतले-पतले सूखे हुए झुर्रीदार हाथ-पैर, कद्दू की तरह फूला हुआ पेट, फोड़ों से भरा हुआ शरीर। लोग टेपचू के मरने का इंतजार करते रहे।’ टेपचू मरता नहीं बल्कि जीने के लिए ऐसे उपक्रम रचता कि लोगों को विश्वास हो गया कि हो न हो टेपचू साला जिन्न है, वह कभी मर नहीं सकता। टेपचू भूख को परास्त करने के लिए तालाब में कमल गट्टे तोडऩे गहरे पानी उतर सकता है, मां के लिए भूतहा बगीचे में आधी रात कच्ची अमिया तोडऩे जा सकता है और अलौकिक स्वाद की आकांक्षा भी उसमें मौजूद है। इसके लिए ताड़ी के आसमान टंगे मटके तक पहुंचने का जोखिम वह उठाता है भले लट्ठबाज मदना सिंह का पहरा हो, भले मटके में फनियल करैत हो और चाहे इसके लिए उसे गीध की तरह उडऩा पड़े।
जिजीविषा की अद्भुत ललक टेपचू को न केवल जिंदा रखती है बल्कि उसे समय के साथ ‘भरपूर आदमी’ बना देती है। उदयप्रकाश ने लिखा है- ‘पसीने, मेहनत, भूख, अपमान, दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धार को चीरकर वह निकल आया था। कभी उसके चेहरे पर पस्त होने, टूटने या हार जाने का गम नहीं उभरा।’ वह एक कारखाने में मजदूरी करने लगता है और अपने ह$क के लिए लडऩा सीख गया है। हां, हक के लिए लडऩा उसे बचपन से आता था लेकिन अकेले लडऩे से वह हर बार पिटा और हारा था। अकारण नहीं कि उसे पिटने से सख्त न$फरत थी। खैर! वह कथावाचक से कारखाने के नये हालात पर दो टूक कहता है- ‘दस हजार मजदूरों को भुक्खड़ बना कर ढोरों की माफिक हांक देना कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। छंटनी ऊपर की तरफ से होनी चाहिए। जो पचास मजदूरों के बराबर पगार लेता हो, निकालो सबसे पहले उसे, छांटों अजमानी साहब को पहले।’ याद कीजिए हमारे देश में अच्छे दिनों की सरकार आने से पहले हरियाणा में एक कार कारखाने में हड़ताल हुई थी और मजदूर निकाल दिए गए थे। आज तक वे जेलों में हैं। उनके अच्छे दिन जाने कब आएं? इधर जुनून है कि पुराने कानून रद्द हो, ऐसा वातावरण बने कि खूब उत्पादन हो, कल-कारखाने लगे और समृद्धि आए- विकास हो। इसके लिए पर्यावरण, श्रम और जमीन से संबंधित कानून बदलने के लिए, रद्द करने के लिए पूरा उत्साह है, तैयारी है। सवाल यह है कि यह समृद्धि और विकास किसके लिए है? मुनाफा क्या एक ही मिल्कियत है? बहरहाल।
टेपचू अपने कारखाने के मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए लड़ता है और पुलिस उसे उठा ले जाती है, जीप के पीछे रस्सी से बांधकर डेढ़ मील तक उसे घसीटा जाता है। लाल टमाटर की तरह उसका गोश्त जगह-जगह से झांक रहा है तभी जीप रोककर उसे जिलाबदर होने का हुक्म दिया जाता है और भागते-न-भागते उसे गोली मार दी जाती है। कोई कसर न रह गई हो इसके लिए दोनों कंधों के पास बंदूक की नाल सटाकर फिर गोलियां मारी जाती हैं।
याद आती है अमर शहीद चंद्रशेखर आजादी की वीरगति। अंग्रेजों की सरकार थी क्रांतिकारी को कैसे न मारा जाता? लेकिन अब तो हमारी सरकार है। हमने इसे चुना है फिर आदिवासियों को नक्सली कहने वाले और उनकी जमीनों पर कब्जा करने वाले लोग कहां से आ गए? हर दाढ़ी वाला- टोपी वाला आतंकवादी क्यों माना जाने लगा? अमरीकी लोग तो न जानते होंगे लेकिन हमारे देश में तो सन् 1857 की लड़ाई हो, हल्दीघाटी का युद्ध हो- मुसलमानों और आदिवासियों ने हमेशा अन्याय का मुकाबला मिलकर किया है। फिर? फिर भी टेपचू को मारना जरूरी है। ये टेपचू बगावत जो करते हैं। सवाल उठाते हैं और इनका मिजाज तो देखिए- ‘उसकी हंसी के पीछे घृणा, वितृष्णा और गुस्से का विशाल समंदर पछाड़ें मार रहा था। उसकी छाती उघड़ी हुई थी। कुर्ते के बटन टूटे हुए थे। कारखाने के विशालकाय फाटक की तरह खुले हुए कुर्ते की गले के भीतर उसकी छाती के बाल हिल रहे थे, असंख्य मजदूरों की तरह, कारखाने के मेन गेट पर बैठे हुए।’
कहानी का शिल्प और कथ्य प्रगतिशील कहानियों से बदला हुआ है। न मजदूरों-गरीबों का महिमा मंडन और न ही अमीरों के खिला$फ नारेबाजी। कहानीकार की सहानुभूति टेपचू के साथ भले हो लेकिन जोखिम की हद तक नहीं। और तभी तो इतनी गोलियां मारे जाने पर जब उसकी लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया है तब वह कराहकर बोल रहा है- ‘ये सारी गोलियां निकाल दे। मुझे बचा लो। मुझे इन्हीं कुत्तों ने मारने की कोशिश की है।’ कथाकार अंत में मडऱ गांव वालों की बात याद दिलाता है- टेपचू कभी मरेगा नहीं- साला जिन्न है। यह गरीबी, भूख और अन्याय से लड़ रही इंसानियत का जिन्न है जो मारे नहीं मरेगा। आप कारखाने बनाइए, काम के घंटे बढ़ाइए, छुट्टी के दिन और तनख्वाहें घटाइए, हमारी जमीनें कौडिय़ों में लीजिए और तब भी मानते रहिए कि महान राष्ट्र के नवनिर्माण के विराट संकल्प में कोटि-कोटि जनता आपके साथ है। आप हमारे असली सवालों को झाड़ू से सरका दीजिए या महान संकल्पों की याद दिलाइए- टेपचू के जिन्न बार-बार प्रकट होते रहेंगे और अपना हिस्सा मांगेंगे। ये टेपचू नहीं मरते। ये साले मर ही नहीं सकते।