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Tuesday 21 Nov 2017

प्रेमानुभूति की सजीव आधुनिकता

ब्रजेश पाण्डेय
हिन्दी विभाग एल पी शाही कॉलेज पटना रामकृष्ण नगर
पटना 800027 (बिहार)     मो. 08083638008
बूंद-बूँद अहसास और दर्द का कारवाँ के बाद एक नदी जामुनी-सी कविता संग्रह। परिवेश की अनुकूलता के साथ प्रतिभा और संवेदना का संतुलित संयोग गति के सातत्य के साथ ऐसी उपलब्धियाँ जोड़ता जाता है। यह तीसरा संग्रह कवयित्री की परिपक्वता प्रमाणित कर जाता है। परिपक्वता यानि अभिव्यक्ति का सयानापन। रूपकत्व और प्रतीक विधान की सटीकता और मौलिकता की बदौलत मालिनी गौतम निश्चय ही हिन्दी कवयित्रियों की परंपरा में विशेष उल्लेखनीयता प्राप्त करने की संभावना के अनेक संकेत दे जाती हैं। स्त्री संवेदना और जीवन की अनुभूतियों को मालिनी ने सधे-सटीक शब्दों का माध्यम दिया है। इस प्रक्रिया में मालिनी की विशेष मौलिकता दृष्टि-फलक के विस्तार, सटीक रूपकत्व और सजीव बिंबों के रूप में सामने आयी है। विगत वादों या धारा विशेष अथवा किसी परंपरा विशेष के किसी भी दबाव से मुक्त नयी कवि-पीढ़ी के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण नये नामों में मालिनी गौतम की स्थिति बनती है। उन्मुक्ति के लिए स्त्री-चेतना की अकुलाहटों के अंतद्र्वंद को विविध कोणों से मालिनी ने देखा और शब्दांकित किया है। विशेषकर नारी मन के संदर्भ में संबंधों के अंत:सूत्रों की बारीकी तथा संरचनागत जटिलता के विश्लेषण की तरफ उन्मुखता मालिनी के कविमन की प्रकृति है और काव्यात्मक सफलता है कि अभिव्यक्तियाँ कभी शुष्कता का शिकार नहीं होतीं। बिंबों की सजीवता सदा काव्यात्मक सजीवता को बचा ले जाती है। इस खतरे पर विजय पाने के लिये मालिनी प्राय: कथात्मकता का भी उपयोग करती हैं । मुक्तकों में कथात्मकता के प्रयोग की आधुनिक हिन्दी कविता में एक पुष्ट और सार्थक परंपरा रही है, जिस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। जहाँ तक संबंधों का का संदर्भ है, इस संग्रह की कविता कुछ रिश्ते पेचीदा से में महीन तंतुओं में गुँथे कुछ हसीन पल, कुछ कड़वी यादों के साथ ही जिस्म से लिपटे कुछ अहसास, तो बंद आँखों से जिस्म मरोड़ते से कुछ सपने। बर्फ पर नाचती धवल किरणों-सी श्वेत शुभ्र हँसी भी गुँथी होती है। रिश्तों की कभी बिखरते भी नहीं कभी सिमटते भी नहीं का अंतद्र्वन्द मालिनी चित्रित करती हैं। संबंध बोध की बड़ी ही महत्वपूर्ण कविता है मौन संदेश, इस कविता में दर्द पीड़ा और संवेदना के ईंट गारे से बने अदृश्य सेतु के संबंध बोध की पहचान सधी और सुगठित कलात्मकता के साथ रूपाकार पाती है। प्रिय के स्मरण में घर, आँगन, फूल, गमले या तुलसी, अक्षत, रोटी, बेलन आदि के बाह्य विभावों के चित्रण की सहूलियत से भिन्न मालिनी मनोलोक और हृतप्रांत के आवेगों को लक्षित करती हैं। मुझमें समायी हुई तुम्हारी यादें, तुम्हारे होने का अहसास कराये बिना ही, बन जाती हैं साक्षी, मेरे दिन और रात की, हर रोज चाँद आकर ऊँडेल देता है, कुछ और तड़पते लम्हे,  मेरे आँचल में। परदेसी प्रिय की वियुक्ति की पीड़ा स्वीकार गृहिणी गृहस्थी निभाती तो जाती है परंतु उसका मन  प्राय: किसी अप्रिय की आशंका से भयभीत हो जाता और वह प्रार्थनाओं का अनायास सहारा खोज लेती है। किसी अनहोनी की आशंका से, मैं काँपती रहती हूँ दिन-रात, हाथ उठ जाते हैं सजदे में, और होंठ माँगने लगते हैं, दुआ तुम्हारी सलामती की। निस्संदेह ऐसी चरम भावनात्मक पराजय-स्वीकार के उपरांत कविता का विस्तार कठिन हो जाता है। उस कठिनता पर विजय पाने के लिये मालिनी फंतासी का प्रक्षेप कर कलात्मक सिद्धि प्रमाणित कर देती हैं- दर्द की यही लहरें, शायद मुझसे टकरा-टकरा कर, पहुँचती हैं तुम तक, आखिर टूट ही जाता है बाँध, तुम्हारे भी सब्र का और चला आता है, तुम्हारा मौन संदेश, बनकर गवाह, तुम्हारे दर्द और तड़प का। दर्द के रिश्ते के संक्रमण-क्रम की परिणति होती है कि ठिठुरती देह, फिर से सुलगने लगती है, धमनियों में बहने लगता है लावा, फिर से मजबूत होती है, जीने की आस। गृहस्थ्य प्रेम की यह व्याख्या, इस आस के साथ अकथित दांपत्य का माण्य बन जाती है जो हिन्दी प्रेम-काव्य परंपरा में कवयित्री मालिनी को उल्लेखनीय विशिष्टता प्रदान करती है। अंतर्मन की अनुभूतियों की विकास-प्रक्रिया की कलात्मक सिद्धि या विशिष्टता अनछुआ अहसास में विशेष स्तरीयता प्राप्त करती है। काव्य में मालिनी द्वारा फंतासी के प्रयोग की कलात्मक विशेषता उसकी सहजता में है। समकालीन हिन्दी कविता में यह विशेषता प्राय: कहीं अन्यत्र दृष्ट नहीं होती। होगी भी तो उसे पहचानने की क्षमता वर्तमान हिन्दी काव्यालोचन में नहीं रही ।
    मालिनी गौतम प्रेम के विविध पहलुओं को काव्य का विषय बनाती हैं। उनके संबंध-बोध और सौन्दर्य-बोध में सपाटबयानी कभी काव्यात्मक चारुत्व को बाधित नहीं कर पाती। भाषा के स्तर पर कुछेक वर्तनी आदि की च्युतियाँ भले मिल जायें, काव्य गठन में संरचनागत सपाटता, दुहराव, कृत्रिमता या जटिलता आदि के दोष इन कविताओं में कहीं दिखाई नहीं पड़ते । इन छोटी कविताओं में भी प्रबन्धात्मकता का पूर्ण सफल प्रयोग मालिनी को समकालीनों विशेषकर कवयित्रियों में, विशिष्ट बनाता है। मिलन एक पल का जैसी छोटी कविता में प्रबन्धात्मकता का कलात्मक उपयोग देखा जा सकता है। यह कविता पढऩे के बाद ध्यान जाता है कि सुबह और सूर्य सर्वथा अभिन्न से दिखते हैं परंतु उनके मिलन की क्षणिका को सर्वप्रथम रेखांकित किया है मालिनी गौतम ने। सूर्योदय के साथ ही सुबह का कोमल सौन्दर्य तिरोहित हो जाता है।
जैसे ही सूरज की, पहली किरण ने, चूमे उसके होंठ, सुबह मचल कर छुप गयी, कहीं बादलों के पीछे, इस एक पल के मिलन की, वेदना लिए सूरज दिनभर, तपता रहा, जलता रहा।
इस छोटी-सी काव्यात्मक प्रेम कहानी में कुल चार पात्र हैं. रात, सुबह, सूर्य और शाम । इनमें सुबह और सूर्य के बीच संध्या के पदक्षेप से त्रिकोणात्मकता का अंतद्र्वन्द्व पैदा किया गया है। इस संग्रह की कविताओं में आधुनिकतम सजीव बिंबों की सहज प्रयोगशीलता सपाटबयानी से ऊब चुके पाठकों को विशेष आश्वस्ति प्रदान करती है। कविताओं को पढ़ते हुए भरे-पूरे रास्तों से गुजरती जिन्दगी, अचानक आकर खड़ी हो जाती है। कविता में अकेलापन और अहसास जैसी भाववाचक संज्ञाएँ भी चाक्षुषता प्राप्त कर लेती हैं। रहस्यमयी चुप्पी, खालीपन से भरे, अँधेरे गहरे कुएँ से टकराकर, परिवर्तित हो जाती है कोलाहल में, कोलाहल, खालीपन के अभेद्य आवरण में, लिपटा कोलाहल। जिस्म में सुलगती है, एक मद्धिम-सी आग की विवरणात्मकता जो लौ बनकर बदल जाती है, तक चलकर तेज भडक़ीले शोलों का बिंब प्राप्त कर लेती है। ये पंक्तियाँ कोलाहल शीर्षक कविता की हैं। गतिशील वस्तु की फोटोग्राफी आधुनिक विज्ञान ने संभव कर दी है परंतु अमूर्त आत्मा की गतिशील अवस्था का बिंबाकन कविता में सहज सुलभ है। भारतीय नारी-मन की विविध दशाओं और भंगिमाओं को प्रत्यक्ष करती इस संग्रह की कविताओं में प्रधानता प्रेमानुभूति की है परंतु उस अनुभूति में प्रमुखता वियुक्ति की अंतर्धारा ने बना रखी है। उस वियुक्ति को विरह नाम देना इसलिये अपर्याप्त होगा कि उसमें विरह के पारंपरिक अर्थ से आगे का भी बहुत कुछ है जो आधुनिक बौद्धिक अंतद्र्वन्द और स्त्री की स्वचेतना से युक्त है। वह महादेवी के मैं विरह में चिर हूँ से भी आगे का स्वबोध है जिसमें कवयित्री स्पष्ट  कहती है कि कर न सकूँगी मैं, कभी भी स्वागत तुम्हारा, मेरे जीवन के, इस स्तब्ध एकांत में, यहाँ स्त्री न आश्रित है न पराजित। अपने एकांत (अकेलेपन) पर स्तब्ध वह उसके होने से स्वयं जूझ रही है। बाहर से आलीशान दिखता यह महल अंदर से हो चुका है खंडहर, टूटा-फूटा, जर्जरित। धूल-मिट्टी और सीलन से भरा। मिलन की आकांक्षा और स्वीकृति की सुंदर कविताएँ भी संग्रह में हैं पर प्रतीक्षा और स्मृति का रासायनिक मेल इस संग्रह की कविताई से अधिक बैठ पाया है। अंतिम कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं- दर्द की स्वर लहरियाँ जब जिस्मों को चीरकर बिखर गयी होंगी आसमान में, चाँद ने भी घबरा कर कहा होई, रे मनवा जोगी, न छेड़ ऐसी तान, कि यह आखिरी तार भी, टूट कर बिखर जाए और फिर कोई तार, बचे ही नहीं जोडऩे के लिए।