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Friday 17 Nov 2017

यह कैसा संकलन

 

 महेंद्र राजा जैन
सन्दर्भ, 8ए बंद रोड, एलेनगंज इलाहाबाद 211002                                                            मो. 9415347351
संकलन की दुनिया में अभी तक कविता, कहानी, निबंध और पत्रों के संकलन ही देखने में आते थे, अब कृष्णदत्त पालीवाल ने अज्ञेय के भाषणों का संकलन कर एक अच्छी शुरुआत की है। पर भाषणों का संकलन कर उन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशित करने के लिए जिस प्रकार के श्रम, धैर्य और कौशल की आवश्यकता होती है, वह यहाँ नहीं दिखता।
इस संग्रह की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें संग्रहीत किसी भी भाषण का स्रोत नहीं बतलाया गया है और अधिकाँश का तो समय भी नहीं बतलाया है? इससे क्या यह समझा जाए कि जहां-जहां जब-जब अज्ञेय भाषण देने गए संकलनकर्ता भी उनके साथ वहाँ गया या वहां उपस्थित था और उसने वहां पूरा भाषण रिकॉर्ड कर लिया, यद्यपि यह भी संभव नहीं जान पड़ता क्योंकि कुछ भाषण तो उस समय के हैं जब टेप रिकॉर्डर और टूइनवन का आविष्कार भी नहीं हुआ था। यह भी नहीं माना जा सकता कि जितने भी भाषण यहाँ संग्रहीत किये गए हैं वे सभी उसने स्वयं सुने हों यानी वह वहां उपस्थित था और भाषण अपनी नोटबुक में लिखता गया। यदि प्रत्येक भाषण के साथ स्रोत भी दे दिया जाता, तो क्या संकलनकर्ता के श्रम का मूल्यांकन कम हो जाता? नहीं, ऐसा तो नहीं, पर हाँ इतना अवश्य होता कि उसने जो कुछ इस संग्रह में रखा है उस पर प्रामाणिकता की मुहर अवश्य लग जाती और मुझ जैसे पाठकों को यह सब नहीं लिखना पड़ता। स्रोत के अभाव में कहीं-कहीं स्वयं संकलनकर्ता की खोज पर संदेह होता है कि उसने अमुक भाषण के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, क्या वह वास्तव में सही है या भाषण में अज्ञेय का कहा हुआ जो कुछ बतलाया गया है क्या वह वास्तव में वैसा ही कहा गया था।
एक उदाहरण लें- प्रासंगिकता की कसौटी शीर्षक भाषण बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर में दिया गया बतलाया गया है। प्रासंगिकता का प्रश्न शीर्षक एक भाषण अज्ञेय के निबंध संग्रह अद्यतन में भी है जिससे पता चलता है कि यह भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता में दिए गए भाषण का लिखित रूप है तथा यह कि इसी विषय का एक भाषण दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में भी हुआ था जिसका आलेख नहीं बन सका।  
आप देखेंगे कि भारतीय भाषा परिषद् वाले भाषण और इस संग्रह में दिए गए भाषण के कुछ अंशों में गजब का सामंजस्य है। इस सम्बन्ध में आगे कुछ और कहने के पहले मैं यह बतला देना चाहता हूँ ;और आप भी इससे सहमत होंगे कि भाषण या अभिभाषण सामान्यत: लिखित नहीं होते यानी श्रोता के समक्ष पढ़े नहीं जाते वरन मौखिक बोले जाते हैं और इस संग्रह में भी सभी भाषणों के साथ दी गई टिप्पणी में कहा गया है कि ये लेख भाषणों के लिखित रूप हैं। इन तीनों में से किसी भी भाषण के सम्बन्ध में यह नहीं बतलाया गया है कि कौन सा भाषण कब दिया गया। यह तो माना ही नहीं जा सकता कि अज्ञेय जैसे व्यक्ति ने एक ही भाषण तीन अलग-अलग जगह शब्द-प्रति-शब्द ;और वह भी 8-10 या 10-20 पंक्तियाँ नहीं वरन पूरा का पूरा पैराग्राफ  और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा पृष्ठ ज्यों का त्यों दुहरा दिया होगा। यदि उन्होंने ऐसा किया भी हो तो क्या यह सम्भव है कि अज्ञेय ही नहीं किसी भी व्यक्ति की स्मरण शक्ति इतनी तीव्र हो सकती है कि उसे इस प्रकार के लम्बे-लम्बे भाषण शब्द प्रति शब्द और पूर्ण विराम, अद्र्ध विराम आदि के साथ ज्यों के त्यों याद रहें। यदि हाँ, तब तो अज्ञेय की स्मरण शक्ति की दाद देनी पड़ेगी।
जो भी हो, इस भाषण के सम्बन्ध में लिखी गई इस बात पर संकलनकर्ता यानी सम्पादक द्वारा और कुछ नहीं लिखे जाने की स्थिति में सम्पादक की नीयत पर ही संदेह होता है कि क्या उसने जान-बूझकर यह घालमेल किया है यानी कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा रखकर एक नया भाषण तैयार कर उसे अपनी खोज बतला कर इस संग्रह में अज्ञेय के नाम से जोड़ दिया। विश्वास नहीं होता कि सम्पादक ने ऐसा किया होगा, पर जब तक सम्पादक स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता तब तक संदेह की सुई उसकी तरफ  तो घूमी ही रहेगी।
परिस्थिति और साहित्यकार शीर्षक भाषण के सम्बन्ध में दी गयी सम्पादकीय टिप्पणी इस प्रकार है - परिस्थिति और साहित्यकार का मूल रूप मेरठ साहित्य परिषद में दिया गया अभिभाषण, 1944 । इसका क्या अर्थ है या हो सकता है? इसी प्रकार एक अन्य भाषण के सम्बन्ध में दी गयी सम्पादकीय टिप्पणी तो और भी भ्रामक है : बीकानेर की साहित्यिक पत्रिका चिति द्वारा कविताओं के साथ काव्य सम्बन्धी एक वक्तव्य, जून 1972। इससे यह तो समझा जा सकता है कि बीकानेर की साहित्यिक पत्रिका चिति में छपी कविताओं के साथ यह वक्तव्य छपा होगा। पर इस वक्तव्य को क्या भाषण या अभिभाषण भी माना जा सकता है? निश्चित ही नहीं। तब फिर क्या कारण है कि इसे अभिभाषणों के इस संग्रह में शामिल कर दिया गया?
एक और टिप्पणी इस प्रकार है : यह संस्कृति और परिस्थिति शीर्षक निबंध पहले जबलपुर के हितकारणी सभा हाई स्कूल के वार्षिकोत्सव का अभिभाषण, 1945। इस टिप्पणी के गलत वाक्य विन्यास पर ध्यान न भी दें, तो भी यह बात तो विचारणीय है ही कि क्या भारत में हाई स्कूल के विद्यार्थियों की पढ़ाई का स्तर इतना ऊंचा होता है (या उस समय रहा होगा) कि वे पूरे दस पृष्ठों का यह भाषण ध्यानपूर्वक सुनते रहे हों और उसमें कही गई बातें समझ सके। ध्यान देने की बात यह भी है कि इस भाषण में अंग्रेजी उपन्यासकर डीएच लारेंस का 30 पंक्तियों का उद्धरण भी है। हाई स्कूल की बात तो जाने दें, आजकल के एमए पास विद्यार्थी भी इसका अर्थ नहीं समझ पाएंगे।
सम्पादकीय कौशल का एक और उदाहरण यह भी लिया जा सकता है कि कहीं-कहीं सम्पादक ने एक ही बात एक ही पृष्ठ पर दो बार कह दी है, जैसे पहले ही भाषण के शुरू में बतला दिया गया है कि यह भाषण राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से अंतर्भारती अजमेर, फिर यही बात उसी पृष्ठ पर नीचे फुटनोट के रूप में भी दे दी गई है। ऐसी ही पुनरावृत्ति भाग 1 में दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी कालेज द्वारा आयोजित संगोष्ठी में दिए गए भाषण के सम्बन्ध में हुई है। सागर की साहित्यिक संस्था रचना के आमंत्रण पर दिए गए भाषण का संक्षिप्त रूप  भी एक ही पृष्ठ पर दो बार फुटनोट के रूप में दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दुस्तानी अकादेमी में दिए गए भाषण के सम्बन्ध में भी एक ही पृष्ठ पर दो जगह लिखा गया है: संगोष्ठी के अध्यक्ष पद से दिए गए भाषण का लिखित रूप और इलाहाबाद की हिन्दुस्तानी अकादेमी में अध्यक्ष पद से दिया गया भाषण। इस सम्बन्ध में यह भी देखें कि एक ही पृष्ठ पर अकादेमी और अकादमी लिख कर सम्पादक ने शायद अपने संशय की पुष्टि ही की है कि अकादेमी या अकादमी इन दोनों में सही रूप क्या है? पर यह शब्द एकाडमी और एकेडेमी के रूप में भी तो लिखा जा सकता है। अत: उसने ये चारों ही रूप लिखकर अपने को बचा लेने की कोशिश की है।
सभ्यता का संकट शीर्षक भाषण के सम्बन्ध में एक ही पृष्ठ पर दो फुटनोट इस प्रकार दिए गए हैं:
1. बीकानेर के रामपुरिया कालेज में स्व. रूपपाल सिंह स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत दिया गया भाषण
2. सभ्यता का वर्तमान संकट शीर्षक से आयोजित एक विस्तार-क्रम का यह पहला भाषण था और (टेप से प्रत्यंकित) वाचिक रूप में ही यहाँ प्रस्तुत है। अध्यक्षता डा. छगन मोहता ने की थी। भाषण के अनंतर कुछ प्रश्नोत्तर भी हुआ था।
दूसरे फुटनोट के सम्बन्ध में पूछा जा सकता है कि क्या अध्यक्ष का नाम और प्रश्नोत्तर सम्बन्धी बात लिखना आवश्यक था? यदि हाँ, तो अन्य सभी भाषणों के संबंध में भी ऐसा क्यों नहीं किया गया? ऐसा तो सोचा ही नहीं जा सकता कि अन्य भाषणों के अंत में प्रश्नोत्तर न हुए हों या किसी ने उनकी अध्यक्षता न की हो। मैं समझता हूँ कि इन दोनों फुटनोटों की जगह केवल निम्न प्रकार एक ही फुटनोट देना अधिक अच्छा होता:
बीकानेर के रामपुरिया कालेज में स्व. रूपपाल सिंह स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत सभ्यता का वर्तमान संकट शीर्षक से आयोजित एक विस्तार-क्रम का पहला भाषण         
केन्द्रीय हिंदी संस्थान, नयी दिल्ली में उपाधि पाने वाले विदेशी विद्यार्थियों के समक्ष दिया गया भाषण जो अद्यतन में हिंदी भारत के हृदय की कुंजी है, शीर्षक से दिया गया है, वह इस संग्रह में नहीं है। क्यों नहीं है, यह तो सम्पादक ही बतला सकते हंै। यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि अज्ञेय विशेषज्ञ सम्पादक को इस भाषण की जानकारी न हो या उन्होंने अद्यतन न देखा हो।
क्या सम्पादक को यह अधिकार है कि किसी लेख या भाषण का लेखक द्वारा रखा गया शीर्षक किसी नए संग्रह में बदल दे? शायद नहीं, लेकिन इस संग्रह में कुछ ऐसे भाषणों के शीर्षक बदल दिए गए हैं जो अन्यत्र किसी अन्य शीर्षक से हैं। इन्द्रप्रस्थ कालेज दिल्ली में 27 फरवरी 1973 को उपाधि वितरण के अवसर पर दिया गया भाषण यहाँ शिक्षा, संस्कार और राजनीति शीर्षक से दिया गया है। जबकि यही भाषण अद्यतन में अकेली यात्रा की देहरी पर शीर्षक से दिया गया है। नेशनल स्कूल आफ  ड्रामा, दिल्ली में दिया गया भाषण यहाँ कलाओं की बुनियाद: सम्प्रेषण शीर्षक से है जब कि यही भाषण अद्यतन में नाटक : ऋतूत्सव शीर्षक से है, इस प्रकार एक ही भाषण दो अलग-अलग शीर्षकों से छपने पर पाठकों को तो भ्रम होगा ही, इस संग्रह के सम्पादक की नीयत पर भी पाठक उंगली उठाएंगे।
सम्पादक ने केवल भाषण का शीर्षक या भाषण स्थल का नाम बदलने में ही मनमानी नहीं की है, कहीं कहीं पूरे भाषण में भी मनमाने ढंग से काट-छांट भी की है यानी पूरा भाषण न देकर कुछ अंश निकाल दिया है और कहीं कहीं नाम भी इस प्रकार बदल दिए गए हैं कि सही नाम का पता लगाना मुश्किल है। जैसे अद्यतन में दिया गया गोकुलदास कन्या महाविद्यालय, इस संग्रह में कहीं गोकुलदास गल्र्स कॉलेज तो कहीं गोकुलदास हिन्दू गल्र्स कॉलेज हो गया है। इसी प्रकार नानकचन्द एंग्लो-वैदिक महाविद्यालय का नाम ही इस संग्रह में बदलकर नानकचन्द एंग्लो-संस्कृत कालेज ही नहीं हो गया है, वरन यहाँ दिए गए भाषण में से 20 पंक्तियाँ भी निकाल दी गई हैं और इसका कोई कारण भी नहीं बतलाया है। अद्यतन में छपे भाषण के अंत में दी गई स्वामी विवेकानंद की चार पंक्तियाँ भी इस संग्रह में नहीं हैं। दयानंद एंग्लो-वैदिक महाविद्यालय, कानपुर में दिए गए दीक्षांत भाषण के बीच का 27 पंक्तियों का एक पूरा पैराग्राफ  भी इस संग्रह में नहीं है। इससे भी अधिक रोचक बात यह है कि इसके बाद जो पैराग्राफ  शुरू होता है उसका पहला वाक्य है-
वास्तव में यह प्रश्न भी उस मूल प्रश्न से अलग नहीं है
पर कौन सा प्रश्न या कौन सा मूल प्रश्न, यह पता नहीं चलता, क्योंकि वह तो इसके पहले वाले पैराग्राफ  में था जिसे संपादक महोदय ने हटा दिया है। इस प्रकार अनाधिकारिक रूप से और मनमाने ढंग से भाषणों के शीर्षक बदल देने और भाषणों में हेर-फेर करने से पाठक किस प्रकार भ्रमित हो सकते हैं, क्या यह भी बतलाने की आवश्यकता है?
किसी-किसी भाषण के सम्बन्ध में इस प्रकार अधूरी सूचनाएं दी गई हैं कि पाठक को पता ही नहीं चलता कि वह भाषण कहाँ-कब  दिया गया। पहले भाग में पृष्ठ 114 से 125 तक भारतीय साहित्य शीर्षक भाषण दिया गया है और इसके सम्बन्ध में बतलाया गया है अध्यक्षीय भाषण वर्ष 22, अंक 1.4, सन 1977, इससे कोई पाठक क्या समझेगा कुछ भी नहीं। इसके साथ यदि पत्रिका का नाम भी दे दिया गया होता तो उससे यह तो पता चलता कि यह भाषण अमुक पत्रिका के अमुक अंक में छपा था। पर भाषण कहाँ दिया गया, यह कैसे पता चलेगा, क्योंकि पूरे भाषण में कहीं भी ऐसा कोई संकेत नहीं है। एक भाषण के सम्बन्ध में लिखा गया है: पूर्वग्रह (पत्रिका) अंक 78-79 आलोचना और समाज, विषय पर भाषण, तेरहवें वर्ष का तीसरा-चौथा अंक, सं. अशोक वाजपेयी, भारत भवन, भोपाल इस सन्दर्भ में पहली बात तो यही है कि क्या पूर्वग्रह पत्रिका के सम्बन्ध में इतनी सारी सूचना देना आवश्यक था? दूसरी बात यह कि इतनी सारी सूचना के बावजूद क्या पाठक को इस भाषण के सम्बन्ध में पूरी सूचना मिल सकेगी? उसे यह तो पता चलेगा कि यह भाषण अमुक पत्रिका के अमुक अंक में छपा, पर यह कैसे पता चलेगा कि यह भाषण कब, कहाँ दिया गया? इसी प्रकार खंड 1 में हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान में दिये गये गये व्याख्यान का संक्षिप्त रूप दिया गया है, पर यह नहीं बतलाया गया है कि यह व्याख्यान कब दिया गया और पूरे व्याख्यान का संक्षिप्त रूप क्यों और किसने किया? क्या लम्बाई की वजह से? नहीं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि यह व्याख्यान तो केवल 7 पृष्ठों का ही है जबकि इस संग्रह में 24 पृष्ठ तक के लम्बे व्याख्यान भी हैं।
एक भाषण के सम्बन्ध में लिखा गया है- मिरांडा हॉउस, दिल्ली के एक दीक्षांत समारोह, अप्रैल 1980 का लिखित भाषण। क्या किसी एक जगह एक साथ एक से अधिक दीक्षांत भाषण दिए जाते हैं जो ऐसा लिखना पड़ा? भारतीयता का सरकारी चेहरा सभा प्रसंग,  शीर्षक भाषण के सम्बन्ध में लिखा गया है-12 नवम्बर 1963 दिल्ली में एक संगोष्ठी में दिया गया अभिभाषण। पर कहाँ, किसके द्वारा आयोजित कौन सी संगोष्ठी? और कैसी सभा या सभा प्रसंग? सम्पादक को यह सब तो पता होगा ही, तब फिर बतलाने में शर्म किस बात की?
इस लेख में केवल भाषणों के शीर्षक और गोष्ठियों के सम्बन्ध में सम्पादक द्वारा दी गई टिप्पणियों के सम्बन्ध में ही विचार किया गया है। भाषणों या अभिभाषणों के पाठ के सम्बन्ध में सम्पादक द्वारा किये गए चमत्कारों के सम्बन्ध में फिर कभी।