Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

हिंदी बालसाहित्य की चुनौतियां

उमेश चन्द्र
ग्रा. आटा, पो. मौलागढ़, तह. चन्दौसी, जि. सम्भल
उ.प्र.- 244412
मो. 9720899620
किसी भी देश या समाज के भविष्य का अनुमान वर्तमान बचपन को देखकर लगाया जा सकता है। बचपन के निर्माण में जिन तत्त्वों की प्रमुख भूमिका रही है, वे हैं- परिवार, वातावरण, विद्यालय और बच्चों को पढऩे के लिए मिलने वाला साहित्य। जहाँ तक बालसाहित्य का प्रश्न है तो सामान्यत: 4 से 12 वर्ष तक की आयु वाले बालक-बालिकाओं के लिए लिखा जाने वाला साहित्य बालसाहित्य माना जाता है। बालसाहित्य का आरम्भ सदियों से वाचिक परंपरा के रूप में हुआ। ‘‘जिस भाषा में बालसाहित्य का सृजन नहीं होता उसकी स्थिति उस स्त्री के समान होती है जिसकी संतान नहीं होती। प्रत्येक देश का भविष्य उसके बच्चों पर ही निर्भर होता है। वही उसके भावी निर्माता होते हैं। अतएव जो देश अपने इन भावी निर्माताओं के प्रति उदासीन रहता है उसका भविष्य अंधकार पूर्ण समझना चाहिए।’’1 आज के बालक कल के नागरिक हैं। अत: किसी देश का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए वहाँ के बालकों के सम्यक विकास की आवश्यकता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था- ‘‘मैं हैरत में पड़ जाता हूँ कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र का भविष्य जानने के लिए लोग तारों को देखते हैं। मैं ज्योतिष की गिनतियों में दिलचस्पी नहीं रखता। मुझे जब हिंदुस्तान का भविष्य देखने की इच्छा होती है तो बच्चों की आँखों और चेहरों को देखने की कोशिश करता हूँ। बच्चों के भाव मुझे भावी भारत की झलक दे जाते हैं।’’2
बालक की उम्र बढऩे के साथ-साथ ही उसका मानसिक विकास होता है। छोटे बच्चों का संसार अपने आकार-प्रकार, रंग-रूप में बड़े लोगों के संसार से सर्वथा भिन्न होता हैं। बड़ों के संसार में सभ्यता, संस्कृति, समाज, राष्ट्र, जाति, आदि पग-पग पर विद्यमान रहते हैं, जिनसे अलग करके हम व्यक्ति की कल्पना नहीं कर सकते। बच्चों को इन सबका ज्ञान नहीं होता, बच्चे निजी तौर पर न तो शिष्टता-सभ्यता का अर्थ समझते हैं और न ही समाज के नियम-विधानों की कोई चिन्ता उन्हें सताती है। उन्हें अपने खेल-खिलौनों, तस्वीर और पुस्तकों इत्यादि से जितना मोह होता है उतना किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से नहीं। अपने खेल के साथियों को वह पारिवारिक सदस्यों से भी ज्यादा प्यार करते हैं। ‘‘संसार के सारे पदार्थ और कार्य बच्चों को व्यापार जैसे दिखाई देते हैं, बड़ों को नहीं। पहाड़, नदी या बादल को देखकर जो कौतूहल, जिज्ञासा, हर्ष या भय के भाव बच्चों के मन में उठते हैं, वैसे बड़ों के मन में नहीं उठते। बच्चों के लिए बड़े किसी परदेशी से कम परिचित नहीं होते, जैसे हम भारतीय किसी रूसी, जर्मन या अंग्रेज के बारे में एक अजनबीपन अनुभव करते हैं, वैसा ही अजनबीपन बच्चे हम बड़ों के बारे में अनुभव करते हैं।’’3
बालसाहित्य में मनोरंजन अहम कड़ी है। बालसाहित्य को लेकर विभिन्न विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं। बालसाहित्य के पुरोधा निरंकारदेव ‘सेवक’ के अनुसार- ‘‘जिस साहित्य में बच्चों का मनोरंजन हो सके, जिसमें वे रस ले सकें और जिसके द्वारा वह अपनी भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास कर सकें, वह बालसाहित्य है।’’4 बालसाहित्य बच्चों में सहजता, सरलता, सज्जनता, सहनशीलता, सहिष्णुता, दयालुता तथा परोपकार आदि उदात्त भावनाओं का बीजारोपण करे, उन्हें अन्याय, अनीति, अनाचार, हिंसा तथा ईष्र्या-द्वेष आदि कुत्सित भावनाओं से विरत करे, उनके कौतूहल का तार्किक शमन करे, उनका ज्ञानवद्र्धन करे, उनकी कल्पनाशक्ति का विकास करे, उन्हें आशावादी बनाए, उनमें आत्मसम्मान, आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता की भावना का संचार करे तथा अपने परिवेश के प्रति जागरूक, जिम्मेदार एवं संवेदनशील बनाए। लल्ली प्रसाद पांडेय ने ‘बालसखा’ पत्रिका के जनवरी 1917 के अंक में लिखा था- ‘‘बालसाहित्य का उद्देश्य है बालक, बालिकाओं में रुचि लाना, उनमें उच्च भावनाओं को भरना और दुर्गणों को निकाल कर बाहर करना, उनका जीवन सुखमय बनाना और उनमें हर तरह का सुधार करना।’’5  महान कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं- ‘‘बालक तो स्वयं एक काव्य है, स्वयं ही साहित्य है।’’6 प्रभावकारी साहित्य को पढक़र बालक, भावी जीवन जीने की कला, युक्ति, अनुभव ग्रहण करता है।
आज हमारे बच्चों का जीवन इंटरनेट, मोबाइल ने छीन लिया है। वे किताबों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में बालसाहित्यकारों का दायित्त्व बन जाता है कि बच्चों के लिए कुछ हटकर सोचें, ऐसी रचना करें, जिससे बच्चे पत्र-पत्रिकाओं की ओर आकर्षित हों। बच्चे अत्याधुनिक साधनों के आने से तेजी के साथ असामान्य रूप से परिपक्व होते जा रहे हैं। आज के बच्चे पढ़ते नहीं हैं तो कहीं न कहीं हम नहीं पढ़ते। बालसाहित्य को लिखने वाले बड़े लोग ही होते हैं और उसे बाजार से खरीदकर बच्चों के हाथों तक पहुँचाने वाले भी बड़े ही होते हैं। जार्ज बर्नाड शॉ का कथन है कि ‘‘जो व्यक्ति बच्चों के स्वाभाविक चरित्र को मोड़ देने का प्रयत्न करते हैं, वह संसार का सबसे बड़ा गर्भ गिरा देने वाला होता है।’’7 संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों की समस्याओं ने बालमन की स्भाविकता को छीन गहरी अशोक्ति में डाला है। उपभोक्तावाद ने बच्चों के कोमल मन पर प्रत्यक्ष असर डाला है। आज की स्कूली व्यवस्था ने बच्चों के बचपन का समय कम कर दिया है। बाजार में परोसी गई चीजों ने मल्टीनेशनल कंपनियों के सामने बच्चों का बाजार खोल दिया है। कार्टूनों ने भी बच्चों के समक्ष एक नई दुनिया खोल दी है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की दुनिया में आज भी आम मूलभूत चीजें मयस्सर नहीं है। बच्चों पर काम का बोझ आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है। बच्चों की बेहतर दुनिया के निर्माण में बालसाहित्य ही उम्मीद की किरणहै। बालसाहित्य के नाम पर जो कुछ छप रहा है उसमें मौलिकता और सार्थकता का अभाव है। बालमन बहुत चंचल होता है, उसे बदलाव चाहिए, नयापन चाहिए। बच्चों के मनोरंजन और मानसिक विकास के लिए ऐसे बालसाहित्य की आवश्यकता है जो बाल-मनोविज्ञान के आधार पर सृजित हो, जो उन्हें यथार्थ से, वास्तविकता से अवगत कराए।
आज के परिदृश्य में साहित्यिक सेमीनार और संगोष्ठियों में बालसाहित्य और समस्याओं पर निरंतर परिचर्चा की आवश्यकता है। ऑडियो-वीडियो, इंटरनेट, डिजीटल और ई-पुस्तकों के माध्यम से भी बच्चों तक काफी रचनात्मक समाग्री पहुँचाई जा सकती है। आपने कोई फिल्म, खबर, विज्ञापन या कार्यक्रम ऐसा देखा है जिसमें कोई बच्चा माता-पिता से किसी किताब की फरमाइश कर रहा हो, शायद नहीं। लेकिन आजकल ऐसे आर्टिकल बार-बार देखने को मिलते हैं जिनमें बताया जाता है कि बच्चे माता-पिता की खरीददारी की च्वाइस को डिक्टेट कर रहे हैं। वे कार खरीदने से लेकर, घर, कपड़ों, मोबाइल, जूतों का ब्रांड तय कर रहे हैं। कारपोरेट और मीडिया इसे ‘ग्रोथ’ बता रहा है। वह बच्चे की जिद को एक पॉजीटिव वैल्यू में बदल रहा है। क्या सचमुच इसे कहते हैं ग्रोथ?
अक्सर जब हम हिंदी बालसाहित्य की बात करते हैं तो हमारे जेहन में प्रिंट मीडिया रहता है। किताबों के बिकने और छपने की बातें रहती हैं। एक बात सुनाई देती है कि हिंदी में कोई किताब हैरी पॉटर की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं होती। सचाई यह ही तो है कि हैरी पॉटर की जो हार्स मार्केटिंग की गई, इंफोटेनमेंट के तमाम माध्यमों ने उसे घर-घर तक पहुँचाया, क्या आज तक भारत में बच्चों की किसी किताब के साथ ऐसा हुआ है? बच्चों की किताबों के प्रति तो वैसे ही उदासीनता बिखरी पड़ी है। हर रोज चुनौतियां बढ़ रही हैं। सवाल तो यही है कि उनसे कैसे निपटा जाए? क्या लेखक इस बच्चे को संबोधित कर रहे हैं? एक तरफ  उन कविता-कहानियों से बचना है जो बच्चे को मार-मारकर उपदेश की घुट्टी पिलाते हों, तो दूसरी तरफ  उस बच्चे को देखना है जिसकी हर इच्छा पूरी हो रही है, मगर वह खुश नहीं है। बालसाहित्यकारों के सामने यह चुनौती है कि बालसाहित्य के प्रति रूचि कैसे पैदा करें? उसका सामना एक खतरनाक वैश्विक बाजारवाद से है, जिसके पास अकूत पैसे की ताकत है जो बच्चों से बचपन छीनना व अपनी विचारधारा थोपना अच्छी तरह से जानता है ओर इसमें वह सफल भी हो रहा है। ये सारा परिदृश्य बेहद निराशाजनक है, मगर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने से स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। यदि हमने बच्चों के विकास और खुशहाली के प्रति तत्काल कदम न उठाए तो इसका सिला हमें भुगतना पड़ेगा क्योंकि आने वाला समय चुनौतियों से भरपूर है। इन चुनौतियों का मुकाबला हम बच्चों के लिए अच्छा बाल-मनोवैज्ञानिक साहित्य रचकर, उनकी मानसिक दुविधाओं हल ढूँढकर ही कर सकते हैं। जब बच्चों की मानसिक भूख के अनुसार उन्हें भोजन मिले और उनकी संवेदनशीलता के अनुसार पठन-सामग्री हो तो यह बच्चों के हित में होगा और ऐसा करके हम भावी पीढ़ी के प्रति अपना कत्र्तव्य निभा रहे होंगे। बालसाहित्य के ममज्र्ञ विद्वान डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के शब्दों में ‘‘यह तभी संभव है जब परिवार में मुक्त वातावरण हो और बच्चों की बात सुनी जाए। भविष्य का समाज जैसा होगा, उसके अनुरूप बच्चों को तैयार करना ही हमारा दायित्त्व है और यह दायित्त्व बच्चों की दुनिया से जुड़े लोगों और बालसाहित्य लेखकों को पूरा करना है, क्योंकि उन्हें इस विचार को जगाना है, जो नई पीढ़ी को, नई शताब्दी के लिए तैयार कर सकेंगे।’’8
संदर्भ ग्रथ
1- बालसाहित्य की रूपरेखा: द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, पृ. 11
2- विनोदचन्द्र पांडेय ‘विनोद’, हिंदी बालकाव्य के विविध पक्ष, हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, प्रथम संस्करण 2010, पृ. 9
3- बालगीत साहित्य: निरंकारदेव सेवक, प्रस्तावना भाग से
4- अखिलेश श्रीवास्तव चमन, ऐसा हो बच्चों का साहित्य, संपादक-फऱहत परव़ीन, आजकल पत्रिका, नवंबर 2014, प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, नई दिल्ली, पृष्ठ 12
5- वही, पृष्ठ 12,                
6- वही, पृष्ठ 15
7- बालगीत साहित्य: निरंकारदेव सेवक, प्रस्तावना भाग से
8- आज के परिवारों में बालक, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन, पृ. 30