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Sunday 19 Nov 2017

आधुनिक हिन्दी उपन्यासों के बदलते परिवेश में नारी: एक मूल्यांकन

डॉ. राजेश श्रीवास
सेठ फूलचंद अग्रवाल स्मृति  
महा. नवापारा, रायपुर  छ.ग.
मो. 98271.96498
आधुनिक हिन्दी उपन्यासों में नारी की अस्मिता की तलाश बड़़ी गहराई और छानबीन के साथ हुई। नारी के जिस परम्परागत मध्ययुगीन स्वरूप से हम परिचित थे, वह बहुत पीछे छूट गया। उसका स्थान उस नारी ने लिया था जो परम्परा और आधुनिकता के बीच त्रिशंकु की स्थिति में अटकी हुई थी। वैज्ञानिक युग की समकालीन आधुनिकता को आत्मसात करने वाली आधुनिका की अस्मिता भी भारतीय वातावरण में गायब थी। घर और बाहर के दोहरे दायित्वों के बोझ के नीचे दबी नारी अपनी निजी पहचान बनाए रखने के मोह में दिग्भ्रमित हो और ........और जटिलताओं के व्यूह में फंसती जा रही थी। नारी की इस विडम्बनाजन्य स्थिति को जीवंतता के साथ उपन्यासों में चित्रित किया है। दाम्पत्य संबंधों के बदलते रूपरंग, विवाह संस्था का औचित्य, नैतिकता एवं अनैतिकता की कारा को तोडऩे के लिए विकल नारी मानस के संदर्भो को लेकर इस युग के उपन्यासकारों को जूझना पड़ा है। किन्तु संवेदनात्मक धरातल पर नारी के आसपास के परिवेश और उसके बिखरे रूपों में वैविध्य की पहिचान अवश्य इस युग के उपन्यासकारों ने की है।
देश की समसामयिक परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना कोई भी साहित्यकार नहीं रह सकता। यह प्रभाव ही प्रकारांतर से उसकी कृति विशेष में संकेतिक होता है। इस दृष्टि से साहित्य की इन विभिन्न विधाओं में कवियों और लेखकों ने नारी का विविध रूपों में चित्रण किया जो युगानुरूप और भावी परिस्थितियों में परिवर्तन का संकेत देती थी। भारतेन्दु काल से लेकर आधुनिक काल तक साहित्यिक गतिविधियों में हुए विविध परिर्वतनों के साथ-साथ नारी के व्यक्तित्व विकास में हिन्दी उपन्यासों का सर्वाधिक योगदान रहा है और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारतीय समाज में नारी-जागरण एवं नारी-स्वातंत्र्य को लेकर अनेक दिशाओं में प्रयत्न आरंभ हो गये थे। आर्यसमाज हो या ब्रम्ह समाज, एशियाटिक सोसायटी हो या थियोसोफिकल सोसायटी सभी संस्थाओं की पृष्ठभूमि में राष्ट्र और समाज के सुधार के साथ-साथ नारी समस्याओं पर गहराई से चिंतन किया गया।
वर्तमान समयावधि में नारियों का पहिनावा, भाषा, विचार और जीवन के मानदंड बदल गये हैं। आज वह पुरूष की विलास साम्रगी अथवा क्रीतदासी न होकर उसकी सहचरी है। समाज, परिवार एवं व्यक्तिगत स्तर पर आज की नारी स्वयं के अस्तित्व-बोध के प्रति सचेत है परन्तु यदि तनिक गहराई से पैठ की जाये तो नारी जागृति की यह धारणा नारी समाज का केवल ऊपरी आवरण दिखाई देगा। उसकी तह में आज भी नारी की सिसकी, निरूपाय स्थिति से एकदम छुटकारा मिलता दिखाई नहीं देता। प्रेमचंद की सुमन (सेवा सदन), धनिया (गोदान) ऐसी नारी है जिसमें जीवटता तो है और समाज से लोहा लेते भी दिखाई देती है, परन्तु चारित्रिक दृढ़ता एवं आस्था के बल पर सामाजिक पोषण एवं पाखण्ड के विरूद्ध विद्रोह करने की धुन में स्वयं को गला देती है। नारी की यही द्वंद्वात्मक स्थिति उपन्यासों में विविध स्तरों पर परखी जा सकती है। जो जीवन के एक किनारे पर स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने में सफल होता भी है तो दूसरा किनारा उन्हें अपनी सीमा में बांधे बिना नहीं छोड़ता। नैतिकता और अनैतिकता के मानदंडों की बदली हुई स्थिति में बदले रूप को लेकर स्वीकृति-अस्वीकृति की दुविधा में जूझती नारी की तस्वीर को इन उपन्यासकारों ने कई कोणों से चित्रित किया है।
आधुनिक उपन्यासों का मूल स्वर आज के व्यक्ति की कुंठा, संत्रास, मृत्युबोध तथा एकाकीपन की असह्य यातना है। जिसमें नारी और पुरूष के यौन संबंधों से लेकर नारी के बाह्य और आंतरिक परिवेश पर घटित घटनाक्रम का उल्लेख मिलता है। इसके साथ-साथ नारी के घर और बाहर के बीच की दूरी तय करने में आने वाली समस्याएं तथा उनसे जूझती, उलझती नारी चरित्रों के संदर्भ को निरूपित किया गया है। साहित्य की प्राय: सभी विधाओं में नारी का चित्रण किसी न किसी रूप में मिलता है। कवि निराला का श्रमिक स्त्री का खींचा गया यह चित्र यथा     
तन फटा हुआ मन फटा हुआ,
हो रहे वसन भी तार तार,
जिसके भीतर से झांक-झांक,
निर्धनता करती है, पुकार।
किसी शाहजहां हतभागे की,
मुमताज बिलखती जाती है,
 देखो भारत की भूख स्वयं,
साकार सिसकती जाती है। 1
किन्तु आनुपातिक दृष्टि से उपन्यास-साहित्य में नारी-चित्रण की असीम सम्भावनाएं निहित हैं। कथात्मक को गति देने के लिए नारी पात्रों के विरोधी व्यक्तित्वों को घटनाओं के घात-प्रतिघात से आगे बढ़ाने में जितनी सुविधा उपन्यासों में रहती है। उतनी साहित्य की अन्य किसी विधा में नहीं रहती। यही कारण है, कि प्राचीन युग से लेकर आधुनिक युग तक नारी-मनोविज्ञान का जितना विस्तृत और गहरा चित्रण उपन्यासों में मिलता है, उतना अन्य किसी विधा में नहीं। वास्तव में प्राचीन युग से लेकर मध्ययुग और आधुनिक युग तक नारी की मानसिकता का विकास-क्रम समझना चाहे तो उपन्यास-साहित्य एक ठोस आधार प्रस्तुत कर सकता है।
नारी-स्वातंत्र्य संघर्ष की जो चर्चाएं नित्य नये स्तर पर उभर रही है, उनसे भारतीय नारी समाज भी अप्रभावित नहीं रहा है। नारी कानून, सामाजिक तथा वैयक्तिक रूप में पुरूष की दासता से सर्वथा मुक्ति की छटपटाहट लिये आत्म विकास की प्रक्रिया से गुजर रही है। वह निर्बंध और उन्मुक्त रहकर आत्मविश्वास का अवसर चाहने लगी है। नारी की यह चाह अनेक सामाजिक, पारिवारिक एवं वैयक्तिक मान्यताओं से सीधे टकराती है। इस टकराहट में वह किन्हीं क्षेत्रों में अपने स्वप्न साकार होते भी देखती है तो कहीं उसे पुरातन रूढिय़ों एवं मान्यताओं के सामने मन-मसोस कर रह जाना पड़ता है, लेकिन समय के साथ सभी मान्यताएं बदल जाती हैं। शायद यही कारण रहा है माक्र्सवादी दृष्टिकोण धर्म, समाज, ईश्वर के नाम पर स्त्रियों के शोषण के विरूद्ध है। पतिव्रत्य, सच्ची माता, सती लक्ष्मी जैसे शब्दजाल से भी वह नारी मुक्ति की हिमायत करता है। प्रगतिवादी कवियों ने नारी को शोषित मानकर उसे शोषण से बचने की चेतावनी भी दी यथा
दमयंती, सावित्री, सीता इनका प्रियतमे ! युग बीता।
पतिधर्म गुलामी का बंधन, ऐ नारी तुम्हारा अभिनंदन।। 2
इस प्रकार कहा जा सकता है कि काव्य में चिर-उपेक्षिता वेश्या-नारी के प्रति भी तर्कपूर्ण आदरानुभूति व्यक्त की गई है। कवि, साहित्यकारों ने युगों से शोषित, पीडि़त नारी के उग्र और क्रांतिकारी रूप का आह्वान किया है। मध्ययुगीन, भक्तिकाव्य का एक समय था जब संतों ने नारी को मायारूप, महाठगिनी बताया। मुक्ति-साधना में नारी ज्वालपुंज बनी बाधारूपिणी है- यथा
एक कनक और कामिनी, दोऊ अगनि की झाल।
देखै हो तन प्रंजलै, परस्यां ह्वै
पामाला।। 3
कालान्तर में अशिक्षा, पर्दा-प्रथा, विधवा-समस्या तथा दहेज समस्या लेकर नारी-विषयक अनेक कारूणिक चित्र साहित्यकारों ने खींचे हैं। पुरूष की वासना को परितृप्त करने को विवश नारी वेश्या का जीवन जीने को विवश की जाती रही है। नारी के इस विवशताजन्य पराजय का विषपान अनेक कवि, उपन्यासकारों को आंदोलित कर गया। उन्होंने सामाजिक विषमता के मध्य नारी के अधिकार शून्य व्यक्तित्व को देखा और उसके पतन की पराकाष्ठा को पहिचाना। कवि पंत ने तो मुक्त स्वर में कहा - यथा
मुक्त करो नारी को मानव, चिर वंदिनी नारी को।
युग-युग की बर्बर कारा से, जननी सखि प्यारी को।।
मुक्त करो जीवन संगिनी को, जननी देवी को आहत।
जग जीवन में मानव के संग, हो मानवी प्रतिष्ठित।। 4
समष्ठि रूप में हिन्दी उपन्यास व काव्य में नारी के विविध रूपों में उसका कन्या, माता, प्रेमिका, प्रेरिका, पत्नी, विधवा, भिखारिन, पगली, निर्वासिता, वेश्या, सोसायटी गर्ल, नर्तकी, अभिनेत्री, श्रमिक, वीरांगना, ग्रामीण, नर्स, डॉक्टर आदि रूप-चित्रित हुआ है। इस प्रकार नारी-विषयक दृष्टिकोण परम्परा की अपेक्षा अत्यंत स्वस्थ एवं सात्विक मनोवृत्ति का परिचायक है। आज के संघर्षशील, यर्थाथवादी युग में जीने वाली शिक्षिता नारी को उपन्यासकार, कवि भावना के प्रवाह में बहने वाली नहीं मानता। स्वाभिमान और समता चाह से उद्वेलित नारी के उभयपक्षीय चित्र प्रस्तुत किये गये है। जिनमें कठोरता एवं कोमलता, अमृत एवं विष, स्वर्ग एवं नरक, जीवन एवं मृत्यु जैसे दो विरोधी पक्षों को नारी-चित्रों में अंकित किया गया है। नारी अपने इस कार्य को स्वयं व्यक्त करते हुए कहती है- विश्वव्यापी क्रांति के इस युग में नारी ने अपनी शक्ति को पहिचाना है और इस महाबीज को सुरक्षित रखे हुए है। अब उसके मानसिक विद्रोह को दबाने की शक्ति किसी मानव में तो क्या ब्रम्हा में भी नहीं रह गई है। 5
प्रेम की व्यर्थता को जैसे कविताओं में व्यक्त किया है, वैसे ही उपन्यासों में भी। यही कारण है कि उपन्यास क्षेत्र मनुष्य-जीवन के व्यापक संदर्भों को स्पर्श करने वाला और यथार्थ जीवन की गत्यात्मकता के अधिक निकट होने के कारण नारी की स्थिति को यथार्थ रूप में अंकित कर सका है। जिन उपन्यासकारों ने संवेदनशीलता के साथ नारी को चित्रित करने का प्रयास किया है, उन्होंने भी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक उहापोहों के बीच पिसते हुए अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए नारी-रूप को उजागर करने की कोशिश नहीं की है। कुछ अत्याधुनिक नारी रूपों में निरर्थकता के विद्रूप चित्रण अवश्य मिलते हैं, आधुनिकता के बाद लिखे गये प्रतिनिधि उपन्यासों में चित्रित नारी हमारे जीवन के समीप है और यह समीपता मात्र फैशन के वशीभूत होकर नहीं, वास्तविक अर्थों में है। इनमें चित्रित विसंगति, आरोपित नहीं हैं। यथार्थ जीवन के निकट है।
 
संदर्भ ग्रंथ    
1 शर्मा, डॉ. विमला साठोत्तरी, हिन्दी उपन्यासों में नारी के विविध रूप पृष्ठ -18
2 वही।।.......।।....पृष्ठ - 14  
3 त्रिगुणायत, डॉ. गोविन्द ऌ: कबीर ग्रंथावली  पृष्ठ - 211
4 पंत, सुमित्रानंदन. युगवाणी  
पृष्ठ - 58.59
5 जोशी, इलाचंद: प्रेत और छाया
 पृष्ठ -406