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Friday 24 Nov 2017

रेणु की कहानियों में मानवीय मूल्य

 

भारत यायावर
यशवंत नगर, मार्खम कॉलेज के निकट, हजारीबाग - 825301 (झारखण्ड)
मो. 9835312665
रेणु की कहानियों में लोक-जीवन अपनी समग्रता में चित्रित हुआ है। उसमें उसका सामाजिक ताना-बाना, आर्थिक विपन्नता, राजनीति के छल-छद्म के साथ-साथ समृद्ध लोक-संस्कृति का चित्रण हुआ है, किन्तु इन सबके बावजूद रेणु की कहानियों को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं उसके जीवंत पात्र और मानवीय मूल्य। रेणु की कहानियों के केन्द्रीय पात्र मानवीय संवेदना से भरे हुए हैं। रेणु ने अपनी कहानियों के संदर्भ में लिखा है - अपनी कहानियों में मैं अपने को ही ढूँढ़ता फिरता हूँ। अपने को अर्थात् आदमी को। रेणु का यह एक वाक्य अत्यंत ही अर्थगर्भित है। किसी मानवीय संवेदना से भरे हुए आदमी को खोजना ही रेणु के रचनाकार की सार्थकता है। यही उनके निजी व्यक्तित्व को परिपूरित करता है और यही उनकी कहानियों को आत्मीय बनाता है। रेणु की इस विशेषता को ही रसग्राही चेतना भी कहा गया है। जीवन में इतना झूठ, फरेब है, भुखमरी है, सामाजिक असमानता है, राजनीतिक उठा-पटक है, अमानवीयता है, फिर भी मनुष्य जिन्दा है, क्योंकि लोक-जीवन में अब भी मानवीय मूल्यों के वाहक मनुष्य जीवित हैं। रेणु की कहानियाँ वैसे ही मनुष्यों की खोज करती हैं। विष्णु किशोर बेचन को वे एक पत्र में लिखते हैं - शिल्पी और मिस्त्री में फर्क होता है, कि हर शिल्पी की तरह मेरी भी जिज्ञासाएँ हैं, जो पुरानी हैं, ... मनुष्य की हैसियत से मनुष्य के अस्तित्व का क्या मूल्य है, इस पृथ्वी पर? हम क्यों जिन्दा हैं? इतनी व्यर्थताओं के बीच भी मैं (मनुष्य मैं), रेतकण से भी नगण्य मैं, क्यों नहीं इतने अन्याय, अविचार, अनाचार के बीच आत्महत्या कर लेता हूँ? मृतप्राय होकर जीवित रहने का आनंद कहाँ से प्राप्त कर लेता हूँ, कहाँ से? यहाँ रेणु अपने-आपसे प्रश्न पूछते है और इसका उत्तर उनकी कहानियाँ देती हैं - जीवन में अब भी रस है, राग है, लय है, सौंदर्य है, संगीत है - जिससे जीवित रहने का आनन्द मिलता है। इसे ही रेणु की कहानियों के संदर्भ में प्रकाशचन्द्र गुप्त ने ‘जीवन की उद्दाम शक्ति और गहरी मानवीयता’ कहा है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी बात को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि रेणु की कहानियाँ मनुष्य की गहरी वेदना को नापने वाली कहानियाँ हैं। रेणु सतह के नहीं, अतल के रचनाकार हैं। वे चरित्रों को ऊपर-ऊपर नहीं, उनके अतल में जाकर छूते हैं। उन्हें ऐसी झंकार देते हैं जो स्मृति में सदा के लिए झंकृत होते रहते हैं। रेणु के किसी भी चरित्र को उठा लें, आप देखेंगे उसके भीतर के उस सच को जिससे वह स्वयं अपरिचित है। आप देखेंगे इस स्वप्न को जिसे वह चरितार्थ करना चाहता है। आप देखेंगे उस आत्मा को जिसे राक्षसों ने सात तालों में कैद कर रखा है। ... रेणु के चरित्रों में एक कोमल धुकधुकाता हृदय है, एक तड़प है, एक प्यास है, एक गहरा लगाव है। ... यदि जीवित मनुष्य को देखना हो, मनुष्य के भीतर राग, रंग, गंध को महसूस करना हो, उस अंचल की सम्पूर्ण धडक़न को सुनना हो तो जाओ रेणु के पास, तुम्हें नर के भीतर नारायण की व्यथा मिलेगी।
    रेणु की कहानियों में कुछ केन्द्रीय पात्र होते हैं, कुछ गौण। परन्तु गौण पात्रों की व्यथा-कथा भी कुछ ही पंक्तियों में वे उजागर कर देते हैं। रेणु की पहली कहानी महज चार पृष्ठों की है, किन्तु इसमें निम्नलिखित पात्रों का चित्रण हुआ है - निरधन साहू, अनंत भंडर, फरजंद मियाँ, लछमनिया, अनंत मंडर की पतोहू, कलरू महतो, टहलू पासवान, भजू धानुक आदि। इन सभी पात्रों के अपने-अपने दुख हैं। ये दुखी-विपन्न लोग रेणु की गहरी सहानुभूति और संवेदना से चित्रित हुए हैं। ‘पहलवान की ढोलक’ का लुट्टन सिंह जाति का दुसाध है, लेकिन पंजाबी पहलवान चाँद सिंह, जिसे ‘शेर का बच्चा’ कहा जाता था, को दंगल में पछाड़ कर श्यामनगर के राजा का चहेता पहलवान बन जाता है। पर उसकी बेहद ही करुण-कथा है, जिसे रेणु ने चित्रित कर अमर बना दिया है। ‘कलाकार’ कहानी में शरदेन्दु बनर्जी नामक एक अत्यंत ही मानवीय संवेदना से भरे कलाकार का चित्रण है, जिसका पूरा परिवार बंगाल के भीषण दुर्भिक्ष में समाप्त हो गया। वह बनारस की गलियों में अकेला घूमता रहता है और लोगों की सहायता करता है। ‘प्राणों में घुले हुए रंग’ में एक डॉक्टर की कहानी है, जो प्रेम और मनुष्यता से पगा हुआ दीन-दुखी लोगों का इलाज करता है किन्तु गाँव के जमींदार के द्वारा प्रताडि़त होता है। ‘न मिटने वाली भूख’ में शहर के मिडिल इंग्लिश स्कूल की प्रधानाध्यापिका उषा देवी उपाध्याय और स्कूल की अन्य शिक्षिकाओं तथा महिला कर्मचारियों का सजीव चित्र रेणु ने प्रस्तुत किया है। स्कूल में एक बारात रुकती है और बारात के लोग दीवारों पर अश्लील फब्तियाँ लिख डालते हैं। ‘रखवाला’ कहानी में रेणु ने नेपाल की पहाड़ी तराई पर बसे एक गाँव और उसमें रहने वाले गोरखा-परिवार का मार्मिक चित्रण किया है। एक अकेली औरत, जिसका पति फौज में भर्ती हो गया, उसके जीवन का सहारा बनता है एक युवक। वही उसका रखवाला है। ‘रसूल मिसतिरी’ कहानी मूलत: चरित्र प्रधान है। रसूल जैसा लोक-हितकारी आदमी आज मिलना दुर्लभ है। वह अपना काम-धंधा छोडक़र दीन-दुखियों की सेवा करने में ही दिनभर दौड़धूप करता रहता है। ‘इतिहास, मजहब और आदमी’ नामक कहानी का नायक मनमोहन भी माननीय संवेदना से भरा पात्र है। वह एक बड़े रईस घर में जन्म लेकर भी हैजा और मलेरिया से पीडि़त गाँव वालों के बीच दवा और पथ्य बाँटता फिरता है। ‘खण्डहर’ कहानी का गोपालकृष्ण भी ऐसा ही पात्र है।
‘रेणु रचनावली’ की भूमिका में मैंने लिखा है - रेणु के कथाकार ने जो इतने पात्रों से, इतनी जीवन-स्थितियों से परिचित कराया है - दरअसल उसकी पूरी कोशिश ‘आदमी’ की तलाश के तहत है और इसी में उसके ‘कथाकार होने’ की सार्थकता है। अपने पात्रों में स्वयं को खोजना अपनी पूर्णता की तलाश है, साथ ही समाज के हर अंग में स्वयं को समाहित करना। ... पर यहाँ देखना यह है कि वह ‘आदमी’ कौन है, जिसमें रेणु अपने-आपको तलाश करते हैं या जिसके जीवन के चित्रण में अपने जीवन की सार्थकता पाते हैं।
रेणु की कुछ कहानियों के पात्रों का उल्लेख इस प्रकार है -
1.    पंचकौड़ी मिरदंगिया - जो नाच-गाना सिखाकर, अपना पेट पालता है, बुढ़ापे में जिसकी बोली ‘फटी भाँथी’ की तरह हो गई है।
2.    हिरामन - काला-कलूटा, चालीस साला गाड़ीवान, भोला-भाला, प्रेम से परिप्लावित।
3.    हीराबाई - मेले में नाचने वाली पतुरिया, पर निश्छल, कोमल।
4.    सिरचन - गरीब पर अक्खड़, स्वाभिमानी कलाकार।
5.    बिरजू की माँ - सर्वे सेट्लमेंट से प्राप्त थोड़ी-सी धनहर जमीन पर ही लालपान के बेगम की तरह दीखती।
6.    हरगोबिन संवदिया - मानवीय संवेदना से ओतप्रोत दुर्लभ मनुष्य।
7.    रात भर मिट्टी की गन्ध से मदमाता करमा।
8.    ग्रामीणों के झगड़ों को रोकते हुए अपने को बलिदान कर देने वाला और ‘एकला चलो रे’ के दर्शन को माननेवाला किशन महराज।
9.    कट्टरपंथियों के खिलाफ संघर्ष करती हुई हताहत फातिमा दी।
यही वे ‘आदमी’ हैं, व्यवस्था के द्वारा सताये हुए, उपेक्षित, दलित, पर बेहद मानवीय, जमीन से जुड़े हुए, सांस्कृतिक चेतना से सम्पन्न, प्रेम और राग से पगे लोग ! जिनके जीवन से एकाकार होकर रेणु ने ये कहानियाँ लिखी हैं।
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानवीय मूल्यों में ह्रास होता गया है। हमारा सामाजिक जीवन जिस अर्थतंत्र और अवसरवादी राजनीति से बदलता गया है, लोक-जीवन में भी बदलाव आया है और सम्बन्धों में बिखराव आया है। ऐसे में मानवीय मूल्य भी दुर्लभ हो गए हैं। रेणु की कहानियों में व्यक्त लोक-जीवन अब बदल चुका है। अर्थात् रेणु की कहानियाँ एक बीते हुए युग की कहानियाँ हैं। फिर भी वे आज भी पाठकों को बेहद आकर्षक लगती हैं। इसका कारण है, समाज से लुप्त हो चुके वे पात्र जो सच्चाई, ईमानदारी, दया, करुणा, लोक-हित की चेतना से युक्त हैं। ऐसे पात्र हमारे समय और समाज में विलुप्त प्राणी हैं, जो रेणु की कहानियों में मिलते हैं। रेणु ने अपने समय और समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करते हुए, जिन पात्रों को अपनी कहानियों में चित्रित किया है, वे आज भी हमारे दिल को छूते हैं। डॉ. श्रीनिवास शर्मा ने लिखा है - यह परिस्थितियों और जनपदीय लोक-चेतना का दबाव ही है जो रेणु जैसे संवेदनशील कथाकार को सामान्य मनुष्यों की दुनिया से बाहर जाने नहीं देता। ग्राम-जीवन का इतना बेबाक, संवेदनपूर्ण और मानवीय धरातल पर मन को छूने वाला चित्रण हिन्दी कहानियों में प्रेमचन्द के बाद यदि किसी कथाकार में देखने को मिलता है तो निश्चय ही वह नाम केवल फणीश्वरनाथ रेणु का है।
मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित करने वाले लोक-जीवन के फटेहाल लोगों को अपनी कहानियों में रेणु ने इतने अपनत्व या ममत्व से रचा है कि वे आज भी हमें अपने दिल के आसपास दिखाई पड़ते हैं। ये पात्र आदर्श भारतीयता के द्योतक भी हैं। इन पात्रों में सामाजिक चेतना भी है और संस्कृतिधर्मिता भी। ये लोकजीवन में समाहित राग और प्रेम के संवाहक हैं। मानवीय मूल्यों के संवाहक ये पात्र स्वाभिमानी हैं, तेजस्वी हैं। ये कला-सम्पन्न हैं। गुणी हैं। अंत में विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्द लेकर कहें, ये पात्र लोकमान्यता की लोलुपता से भी अलग हैं। स्वाधीनता के बाद निहायत तेजी से जो परिवर्तन हुए हैं और हो रहे हैं, उनके सन्दर्भ में स्थित होकर ये पात्र जीवित स्वप्न या किसी व्यतीत की स्मृति प्रत्यक्षता बन जाते हैं।