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Monday 20 Nov 2017

आलोचना का अर्थ और कवि की आत्ममुग्धता के खतरे

 

  सुशील कुमार
प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, एमडीआर्इ भवन, धुर्वा, रांची – 834004
मो. 9006740311
हर कोई इस बात से सहमत होगा कि साहित्य के साथ-साथ साहित्यालोचना भी ज़रूरी है। दीगर है कि एक अच्छी आलोचना रचना से कमतर नहीं होती, जिसे पढक़र सृजनप्रेमी न केवल अघाते और फूले नहीं समाते बल्कि उससे बेहतर सृजन के गुर भी सीखते हैं। वस्तुत: ये ही वे आँखें हैं जो राह दिखाती हैं कि हमें किधर जाना है, वर्ना हमारे लिये अमूर्तन के अँधेरे में गुम हो जाना बहुत आसान है। इससे कवि की जड़ता टूटती है, उसे अपने सृजन के दौरान हो रहे चूक का पता चलता है। हालांकि यह बात भी सही है कि अपनी रचना का व्यामोह और आत्ममुग्धता तो बड़े से बड़े कवियों में भी समूल नष्ट नहीं हो पाता, उनमें से कुछ तो अपने सिवाय किसी को सुकवि मानते ही नहीं, फिर भी कवियों की आत्ममुग्धता के बरक्स उनकी कविता के मूल्यांकन का जो अंत:संघर्ष है, उससे समालोचक को दो-चार होना पड़ता है ।
    जब कवि की आत्ममुग्धता पर कुछ सुधिजनों से युवा लेखक उमाशंकर सिंह परमार से राय जानना चाहा तो उन्होंने कुछ इस तरह व्यक्त किया – आत्ममुग्धता किसी को भी फर्जी श्रेष्ठताबोध से ग्रसित कर देती है और श्रेष्ठताबोध अहंकार मे बदल जाता है... । -  उमाशंकर सिंह परमार -
बात बोलेगी...और बात ही बोलेगी...बेबात को नष्ट होना ही है भाई – अनवर सुहैल
-    हर कवि को अपनी आलोचना सुनने को तैयार रहना चाहिए, भले ही आलोचना प्रायोजित या पूर्वाग्रह-ग्रस्त हो। कविता प्रकाशित होने के बाद सार्वजनिक वस्तु में बदल जाती है। उस पर राय कोई भी दे सकता है। पर राय देना कविता का वस्तुपरक मूल्यांकन नहीं होता । कविता का मूल्यांकन वही कर सकता है जिसने कविता को गहरी दृष्टि से समझा हो । सिर्फ राय देने को मूल्यांकन नहीं समझ लेना चाहिए। देखना यह है कि जो कविता पर राय दे रहा है उसकी पहुँच कहाँ तक है। आलोचना भी एक कठिन रचना-कर्म है। उसे सब कोई नहीं निभा पाता। आत्म-मुग्धता एक रोग है जो लेखक को जीवन और समाज के बड़े सामाजिक सरोकारों से दूर ले जाता है। आत्ममुग्ध हम तभी होते हैं जब अपने सामाजिक यथार्थ से दूर जाते हैं। यह एक प्रकार से लेखक की आत्म-रिक्तता का लक्षण है। इससे बचना चाहिए।  - विजेंद्र
उपर्युक्त बातों से यह तो साफ है कि रचना के प्रकाशन के उपरांत उस पर कॉपीराइट भले ही लेखक-प्रकाशक का हो, पर सार्वजनिक हो जाने के बाद  उस पर राय देने से किसी को रोका नहीं जा सकता। किन्तु वह राय कवितालोचना में मान्यता तब पाती है, जब वह समालोचना के दायरे में आए। समग्र रूप में सृजन को परखने को आलोचना या समालोचना कहते हैं। अत: हम किसी भी रचना के मूल्यांकन को आलोचना कह सकते हैं। आलोचना कवि और पाठक के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी होती है। कोई भी रचना अच्छी है या बुरी, यह निर्णय देना आलोचना नहीं है। आलोचना का उद्देश्य तो रचना का प्रत्येक दृष्टि से मूल्यांकन कर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। साथ ही पाठक की रुचि का भी परिष्कार करना इसका धर्म होता है, ताकि उसकी साहित्यिक समझ का विकास हो। व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी कृति की निन्दा या प्रशंसा करना आलोचना का धर्म नहीं। कृति की व्याख्या और विश्लेषण के लिए आलोचना में पद्धति और प्रणाली का महत्त्व होता है। आलोचना करते समय आलोचक अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष, रुचि-अरुचि से तभी बच सकता है जब आलोचना-पद्धति रचना की गुण-ग्राहकता का अनुसरण करे। वह तभी वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के प्रति न्याय कर सकता है। पर इस दृष्टि से समालोचना कवि की आत्ममुग्धता का विपर्यय भी बन सकता है जो लाजमी है। यहाँ अहम सवाल यह है कि कवि में आत्ममुग्धता का बीज-वपन होता कैसे है। इंटरनेट पर रोज सैकड़ों कविताएं पढ़ी-लिखी जाती हैं। जैसे-जैसे लेखक सामाजिक यथार्थ से दूर जाता है, उसमें एक आत्म-रिक्तता आती चली जाती है। उसके लेखन के कार्य-कारण और उद्देश्य स्पष्ट नहीं रहने के कारण वह अपने निर्रथक कर्म को भी सार्थक मान बैठता है और जब कोई उसे उसकी यथास्थिति से उबारना चाहता है, तो वह उसके विरोधियों में शुमार हो जाता है। अतएव कवि की आत्ममुग्धता समालोचना के आत्म-संघर्ष से जुड़ा विषय है, जिसके खतरे उठाना एक समालोचक के साहित्यिक साहस, उसके उत्कट लगन, गहन-गंभीर अध्ययन और चरित्र-निष्ठा का भी प्रमाण है। इसी कारण यह कार्य जटिल हो जाता है और हिन्दी साहित्य में समालोचकों की कमी खलती है।  फलत: कवि की आत्ममुग्धता पर अंकुश रखने वाला कोई होता नहीं और कवि अपनी रचनाओं का निर्णायक स्वयं बन बैठता है। दूसरी ओर, कटाक्ष करने के बजाय निस्पृह होकर कविता की समीक्षा करना भी कम कठिन कार्य नहीं। जहाँ तक सृजनात्मक और रचनाधारित आलोचना का प्रश्न है, सामान्यतया हमारे आलोचकों की अध्ययन-परम्परा भी गहन-गंभीर और संदर्भमूलक नहीं रही है, इतिहास इसका गवाह है। जिनकी रही भी है तो उनके द्वारा नए रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व को माँजने और गुनने के बजाय उनके संबंध में अपनी नकारात्मक टिप्पणियाँ और निष्कर्ष ही अधिक दिये जाते रहे हैं। जो काव्य के पारखी-आलोचक हैं, उनमें से भी कई अपने यशस्वी मायालोक से इतने ग्रस्त होते हैं कि उनका आलोचना-विवेक लगभग आलोचना-अहंकार का पर्याय बन जाता है और वे भी आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते हैं। अपने-अपने पूर्वाग्रह, विवाद, सुविधाओं के लालच और दुराग्रहों के कारण वे आलोचना की खास ज़मीन और वज़ह खोजते हैं, इस कारण तटस्थ नहीं रह पाते। संभवत: इन्हीं कारणों से हिन्दी काव्य-संसार का अब तक न तो समग्र मूल्यांकन हो पाया है, न  कवियों की प्रतिष्ठा ही हिंदी साहित्य में उस तरह से हो पायी है जिसके वे सही मानो में हक़दार थे या हैं। यह अभिलक्षण अन्य भाषा-साहित्य की तुलना में हिन्दी में अधिक दृष्टिगत होता है जो इस साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा । पर अब शायद आज़ादी के छ: दशकों के बाद समालोचकों की नींद शनै:-शनै: खुल रही है। पुराने धाक़ वाले आलोचक की जगह नये आलोचक ले रहे हैं, इस क्षेत्र में संप्रति कई प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों का अभ्युदय हुआ है (संख्या की दृष्टि से यहाँ नाम गिनाना उचित न होगा) जिनकी समीक्षा-कृति न तो कहीं से यांत्रिक है, न उबाऊ। लोक में इनकी गहरी आस्था है, इसलिये जीवन और साहित्य को बेहतर बनाने की दिशा में इनकी समालोचनाएँ सतत क्रियाशील दिखती हैं। इन सबकी अपनी–अपनी ज़मीन हैं पर बहुत उर्वर, जहाँ हम कुछ सीख सकते हैं, समझ सकते हैं और उससे लाभ उठाकर अपनी रचना का प्रसन्न विकास भी कर सकते हैं। कई कवि भी ऐसे हैं जिन्होंने अपने आलेखों के माध्यम से कविता का समुचित मार्गदर्शन किया है अथवा कहें, इनके आलेख क्लासिक आलोचकों की तुलना में अधिक ग्राह्य और पठनीय भी बन पड़े हैं जिन्होंने जीवन-पर्यन्त कवि-कर्म का निर्वाह करते हुए अपने विचारों में कविता के सौंदर्य-शास्त्र और उसके आत्म-पक्ष पर गहरी और बुनियादी बातें कही हैं।
इन कवि-लेखकों में सार्वजनीन अभिलक्षण है - लोकधर्मिता और जनपदीय चेतना, जो रूपवादी नव्य समीक्षा की तुलना में हमारे अभ्यांतर को बाह्य-जगत से मात्र मन-बुद्धि के स्तर पर ही नहीं जोड़ता बल्कि क्रियाशील जीवन के ऐन्द्रिक बिम्ब, विचार-खनिज और जीवन-द्रव को ठीक से आत्मसात करने के लिये हमारे इन्द्रिय-बोध को ज्यादा प्रखर बनाये रखने के लिये सदैव सचेष्ट रहने के उपाय पर भी बल देता है। साथ ही हमें आशान्वित करता है कि आने वाले समय में प्रतिबद्ध कवियों के साथ न्याय हो सकेगा।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि कविता की कोई ‘एकोअहम  द्वितीयोनास्ति’ आलोचना पद्धति नहीं होती। नामवर सिंह ने जवाहरलाल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रथम पुनर्नवा पाठ्यक्रम में दि. 14 अक्तूबर, 1993 को उन्होंने भाषण देते हुए कहा था कि -    ‘किसी सिद्धांत का सहारा लेकर यदि कविता को जाँचेगे तो खतरे हैं। चूक हो सकती है। गलतियाँ हो सकती हंै।....निष्कर्ष के रुप में मैं यही कहूँगा कि कुल मिलाकर मैंने आपको कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। आपको कोई केनन नहीं दिया है। मैंने सिर्फ़ यह कहना चाहा है कि कविता के परख के जो निकष हैं, वह चाबी नहीं है कि हम आपको दे दें कि ताला खोल लीजिएगा। यह हस्तांतरित नहीं किया जाता। अर्जित किया जाता है। हर पाठक अर्जित करता है। यह टिकट नॉन ट्रांसफरेबल है। फिर भी हम लोग ट्रांसफर कर दिया करते हैं । कविता का निकष नॉन ट्रांसफरेबल  होता है। हर पाठक, हर सहृदय पाठक स्वयं अर्जित करता है। और वह जजमेंट अपना हुआ करता है। दूसरों की दी हुई चाबी से खोले जाने वाले कमरे और होते हैं और ताले भी और हुआ करते हैं। कविता वह ताला है जिस ताले में हर आदमी किसी दूसरे की दी हुई चाबी नहीं लगाता है। बल्कि खुद अपने-आप खोलता है। अर्थ, रस, भावबोध प्राप्त करके और अपना जजमेंट देता है कि मुझे ऐसा लगता है कि हर जजमेंट इस मामले में निहायत इंडीविजुअल (व्यक्तिगत) होता है । और उस जजमेंट में, अपनी साधना में जितनी ताकत होती है उतनी ही उसको सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होगी। (प्रतिमानों की प्रासंगिकता आलोचना पुस्तक  संपादक: डॉ रमाकांत शर्मा) में उद्धृत।
      नामवर सिंह के उक्त विचार-वीथियों पर अगर हम गौर करें तो कविता का कोई निकष नहीं होता, पर इतिहास इसका साक्षी है कि रीतिकालीन कवियों की काव्य-साधना में भी ताकत कम न थी। न उनके शब्दों में जादू, लर्जिश और खनक ही कम थे पर उनकी रचना को कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली। न कभी वे जनप्रिय नहीं हो पाए क्योंकि यह कहने की जरूरत नहीं कि उनकी रचना के केंद्र में कौन था और साहित्य का उनका यह तप-साधना-श्रम किनको समर्पित था। हिन्दी कविता-काल की विपुल विरासत में हम कविता की जिन-जिन प्रवृत्तियों यथा; रीति, भक्ति, छायावाद, प्रगतिशीलता, प्रयोगधर्मिता, रूपवाद आदि-आदि से रु-ब-रु होते हैं, हम उनके सामयिक महत्व को तो नहीं नकार सकते पर जनपक्षधरता ही कविताओं का सर्वाधिक लोकप्रिय अभिलक्षण रहा । दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि सभी प्रतिमानों में लोकधर्मिताऔर जनवाद अब तक कविता के सबसे सशक्त और समय-सिद्ध प्रतिमान हैं, क्योंकि कविता जब अपने खनिज, सत्व और जल जनपद से ग्रहण करती है तो वहाँ लोक का सौंदर्य उद्भासित होता है। तब कवि के सारे शब्द, शैली, शिल्प, मुहावरे कविता में लोक से ही आते हंै और जन के पक्ष में रूप का सृजन करते हैं। रामचरित-मानस के राम के लोकमंगलकारी रूप की छवि जब रामचन्द्र शुक्ल जी ने आलोचना के माध्यम से जनोन्मुख किया, तभी तुलसीदास संत से साहित्य में महाकवि बन पाए। कविता का रूप-संभार चाहे जितना ही अनगढ़ क्यों न हो, कविता जब जन को रचती है, अभिजन को नहीं, तो वह सार्वजनिक, सार्वदेशिक और सार्वकालिक हो जाती है। अब तक की कवितालोचना में यही बात दीगर है जो हमें जनता का साहित्य रचने की प्रेरणा देती है। पर इस बात की कद्र तभी होगी जब समालोचक जैसा कहते हैं वैसा करें भी। यानि उनकी कथनी और करनी में भेद न हो। पर होता यह आया है कि स्वार्थपरता और अन्यथा कारणों (जिनका जिक्र लाजि़मी न होगा) से हमारे कुछ समालोचक संवाद की जग़ह विवाद को ही प्रश्रय दे जाते हैं। इस कारण बड़े-बड़े कवि भी गुमनामी के अँधेरे में चले जाते हैं और उनके प्रयाण के बाद उनकी कृति पर विचार किया जाता है। मसला यह है कि अगर हमारे नामचीन आलोचकगण (जिन्हें हम जानते हैं,) कविता के विषय में इतने ईमानदार, सहृदय और उदार रहे हैं तो फिर उनके द्वारा  त्रिलोचन, नागार्जुन, कुमारेन्द्र, केदारनाथ अग्रवाल, गोरख पाण्डेय, धूमिल, मान बहादुर सिंह, पंजाबी कवि अवतार सिंह संधु पाश, हरीश भदान , शंभु बादल जैसे बड़े कवियों को समीक्षा के केन्द्र में क्यों लाना भुला दिया गया? उनके काव्य-सौष्ठव की व्याख्या से क्यों परहेज किया गया और सिर्फ़ भुलाया ही नहीं, बल्कि रुपवाद और उपभोक्तावाद को प्रश्रय देने और अपने किये को उचित ठहराने के लिये उनके द्वारा निरंतर विचलित करने वाले स्पष्टीकरण भी दिया जाता रहा है, जिससे उनके आलोचना-कर्म के प्रति हिंदी-प्रेमियों में आशंकायें दिनानुदिन गहनतर होती चली गयी क्योंकि अपेक्षाकृत कम कद वाले मँझोले कवियों को जो दजऱ्ा उनके द्वारा हासिल हुआ, वह बड़े और कालजयी रचना के रचनाकारों को नहीं।
हिंदी के आधुनिक काल में उनके रुपवादी झुकाव की त्रासद स्थिति यह रही कि कविता की एक धारा सहज और संश्लिष्ट न होकर दुर्बोध और जटिल हो गयी। निश्चय ही हमारे लब्ध-प्रतिष्ठ समालोचकों के द्वारा भी कवितालोचना के क्षेत्र में जाने-अनजाने कहीं-न-कहीं चूक बरती गयी है जिसे वे भी अब स्वीकारते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि उनका हिंदी साहित्य को अवदान कम है। उनके व्यापक अध्ययन और समालोचना-दृष्टि से अवश्य ही कवियों को आगे आने में सहायता मिली है। पर समालोचना आज साहित्य के जिस चौराहे पर खड़ी है वहाँ कविता और कवि-कर्म को बहुत गंभीर होने की जरुरत है। इस पर बहस हमेशा अपने भारतीय परिवेश में ही होनी चाहिये।
उत्तर-आधुनिक और ग्लोबल होती दुनिया में कविता को सबसे बड़ा खतरा आज आयातित रूपवाद और नव-रीतिवाद से है क्योंकि यहाँ चमत्कार-प्रदर्शन, वाकपटुता और सपाटबयानी का आधिक्य होता है जो कविता को सरस बनाने के बजाय बोझिल बनाते हैं और उसकी लय और उसके बुनावट को बिगाड़ते हैं जिससे कविता के पाठक एक ओर जहाँ  बिदकने लगते हैं, वहीं दूसरी ओर जीवन-तत्व का सांगोपांग समाहार नहीं होने एवं सृजन का जनाकीर्ण नहीं होने के कारण कविता अन्यतम होने से चुक जाती है और काव्य-तत्वों की अनुभवहीनता का शिकार होकर कवि नकली और किताबी कविता को ही लिखकर अपने कवि-कर्म की इतिश्री मान लेता है, फलत: परिदृश्य में फालतू कविताओं की बाढ़-सी आ जाती है। आज रोज़ थोक में लिखी जा रही कविताएँ इसका प्रमाण हैं जो साहित्यिक पत्रिकाओं के पृष्ठ बरबाद करती हैं, और पाठकों का समय भी। कई ब्लॉगों और सोशल-नेटवर्किंग वेबसाइटों पर भी ऐसी फालतू किस्म की कविताएँ क्षण-क्षण छपती रहती हैं।                
उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट है कि समालोचना और समीक्षा अब पुनर्नवा होने की जरूरत है । कविता पर कोई जजमेन्ट नहीं थोपा जाना चाहिये। समालोचना कोई तुला या निकष नहीं कि अमुक रचना ठीक है या अमुक खऱाब और कमजोऱ। समालोचक किसी दूसरे उपग्रह का वासी नहीं,  इसी रचे-बसे लोक का हिस्सा है, इसलिये  समालोचकों का मूल मक़सद अपने कवियों से सार्थक संवाद करना होना चाहिये, उनका उत्साह-वद्र्धन करना होना चाहिये। न कि विवाद और बहस खड़ा कर उनका हौसला कम करना। अर्थात उनसे हम कवियों को कुछ सीखना है, आगे बढऩा है।
अगर समालोचक कविता की दुनिया पर आसीन होकर उसका सामंत बन जाय और बिना कारण बताये ही कवियों की रचना पर अपनी लेखनी के चाबुक जड़ें तो कवियों को भी यह समझने की जरुरत है कि ऐसे राजसी-तामसी-सामंती-उपभोक्तावादी-पाश्चात्यवादी समालोचकों को नकार कर उन अध्ययनशील-श्रमशील भारतीय चित्त और माटी की गंध से जुड़े समालोचकों से अपने तार जोड़ें जो कविता को सही ज़मीन देने की दिशा में कारगर काम कर रहे हैं। कविता में आलोचना के निष्पक्ष और प्रसन्न विकास के लिये नये और विकासशील कवियों के मन में यह विचार फलित होना चाहिये ताकि नकारात्मकता का प्रकटीकरण भी समालोचना में संतुलित और सकारण युक्ति के साथ  ही गोचर हो जिससे कवितालोचना की स्वस्थ और आदर्श परम्परा एवं दशा-दिशा तय की जा सके।
मैं समझता हूँ, इस तरीके को अपनाकर संप्रति कविता पर किये जा रहे निगेटिव आलोचना-कर्म के खतरे से युक्तियुक्त रीति से निपटा जा सकता है।
मसलन, लोकतंत्र में पुलिस अपराध पर नियंत्रण रखने की एक संस्था मानी जाती है, पर पुलिस कितनी ईमानदार है, इसे देखने का जितना हक़ शासन और न्यायपालिका को है उतनी ही जनता को भी। बंदिशें तो सब पर लागू करनी होगी ताकि सब अपने अनुशासन के दायरे में रहें और अपना काम नि:शंक करें। तभी साहित्य या कहें, कविता की समालोचना की सही संकल्पना विकसित हो पायेंगी।
    आह-आह,वाह-वाह, बेहरतरीन, मर्मस्पर्शी, मनभावन, इत्यादि शब्द पाठकों के होते हैं। कविताओं को पढक़र उनके दिल में भावनाओं का जो गुबार उठता है, उन्हें वे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। हालांकि वे समीक्षक की तरह नहीं कह पाते, पर उनकी ही प्रतिक्रियाओं का ही महत्व अहम होता है क्योंकि उनकी अभिव्यक्तियाँ प्रायोजित नहीं होतीं। समीक्षा में तो कविता के कारण-विधान किये जाते हैं कि अमुक रचना की श्रेष्ठता और लोकप्रियता के कौन-कौन से कारक व तत्व विद्यमान हैं। पर समीक्षक ही संप्रभु नहीं है, वे मात्र साहित्य के जनतन्त्र में उस सरकार की तरह हैं जिसे प्रबुद्ध पाठक का मत हासिल होता है क्योंकि कविता उनकी खातिर ही रची जाती है।