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Sunday 19 Nov 2017

पड़ोसी और पूजा के फूल


कुन्दन सिंह परिहार
59, नव-आदर्श कॉलोनी
गढ़ा रोड, जबलपुर-482002
मो. 9926660392
पड़ोसी परेशान है। कुपित नेत्रों से बार-बार अपनी खिडक़ी की जाली से मुझे घूरता है। परेशान हंै क्योंकि आज उसकी दाल नहीं गल रही है।
मेरे और पड़ोसी के मकान के बीच में करीब चार फुट ऊंची दीवार है। मेरी पत्नी फूलों की शौकीन है। दीवार के नीचे गुलाब और जासौन के फूलों की क्यारियां हैं। पड़ोसी सबेरे मुझसे पहले उठता है और हमारी आंख खुलने से पहले फूलों पर हाथ साफ कर देता है। ‘जागे सो पावे।’ अंग्रेजी में कहावत भी है कि जल्दी उठने वाली चिडिय़ा को ही कीड़े का नाश्ता मिलता है। हम रोज ‘सोवे सो खोवे’ को भोगते हैं।
फूल हथियाने के बाद पड़ोसी इत्मीनान से गुनगुनाते हुए स्नान-ध्यान और पूजा की तैयारियों में लग जाता है और मैं अपने पुष्पविहीन पौधों की हालत देखकर उसके गुनगुनाने पर गुस्से से भुनभुनाने लगता हूं। क्यारियों की हालत यह कि ‘कल चमन था आज, इक सहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ!’
कई दिन तक फूलों की बटमारी को झेलने के बाद आज मैं इस सीनाजोरी को रोकने के लिए कटिबद्ध हूं। आज मैं पड़ोसी से पहले उठकर क्यारियों के पास घूम रहा हूं और पड़ोसी बार-बार खिडक़ी में से मुझे झांककर वापस घर में गुम हो रहा है। जाहिर है कि वह खासा परेशान है।
मुझे टायलेट जाना है सो मैं पत्नी को आवाज देता हूं। कहता हूं, ‘थोड़ा यहां खड़ी रहना। मैं आता हूं।’ पत्नी समझ नहीं पाती लेकिन पति की आज्ञा मानती है।
उधर पड़ोसी की पत्नी कह रही है, ‘यह क्या घर में भौंरे जैसा भन्ना रहे हो! नहाते क्यों नहीं?’
पड़ोसी झन्ना कर जवाब देता है, ‘तुमसे मतलब? अपना मुंह बंद नहीं रख सकतीं?’
लगता है पड़ोसी बाथरूम में घुस गया है। आज उसे गेंदा और चांदनी के मध्यवर्गीय फूलों से ही पूजा करनी पड़ेसी। मेरी चौकसी से उसकी पूजा के स्तर में गिरावट आ गई है। वह दस बजे के करीब दफ्तर के लिए निकलता है। उसका मुंह सूजा हुआ है। मुझे बाहर खड़ा देखकर व्यंग्य से कहता है, ‘आज बड़ी जल्दी उठ गए, मेहरा जी! ऐसे ही रोज उठा करो। सेहत सुधर जाएगी।’
मैं हंसकर सिर हिलाता हूं और भीतर आकर निश्चिंत हो जाता हूं। पड़ोसी आज तो पटखनी खा गया, लेकिन मेरी चुनौती स्वीकार करके कल से और जल्दी उठने लगे तो?  ठ्ठ