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Tuesday 21 Nov 2017

परिवर्तन


डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3,
 गुलमोहर भोपाल-35 (म.प्र.)
मो. 9425376413
(आवाज लगाता हुआ क्लीनर : छतरपुर, छतरपुर, छतरपुर... जा रही है तूफान मेल। जिनको बमीठा, गंज छतरपुर चलना हो, वे जल्दी से आकर गाड़ी में बैठ जाएं... फिर्रर्र-फिर्रर्र-सीटी की आवाज- जा रही है, जा रही, दिल्ली में तूफान मेल)
कंडक्टर : ए बाई, उते आगे की सीट मा न बैठो।
मखनिया : काये न बैठे? अबे तो चिल्ला रयेते, बैठो-बैठो-बैठो। बैठ गये तो कै रये, उतै न बैठो। कां बैठे??
कंडक्टर : आगे की सीट छोड़ के कऊं बैठो। उते पिछाऊं काये नई बैठतीं आराम से। पूरी गाड़ी खाली डरी है।
मखनिया : पूरी गाड़ी खाली डरी है तो हम पिछाऊं बैठें, और अगाऊं को बैठहैं?
कंडक्टर : अगाऊं की सीट मा नन्ना खां बैठने। बा उनके लाने रिजर्ब है।
मखनिया : बे आए नई सो उन्हैं आगे बैठने, औ हम पैलऊं से आ गए तो पिछाऊं बैठें। जो कहां को न्याव आय?
कंडक्टर : न्याय-स्वाय की बातें छोड़ो। जो हम कै रये सो सुनौ। पछाऊं बैठो। जोई न्याव आय।
मखनिया : तो लेव हमैं पछाऊं की सीट पै आज नई बैठने। हम तो जेई आगे की सीट पे बैठहैं। देखत हमैं को हटाउत।
कंडक्टर : देखो बाई, जिद न करौ। पीछे बैठो। बाद की चिक-चिक अच्छी नई होत। कह दई कि उतै नन्ना खां बैठनें।
मखनिया : जे नन्ना का लाट साब आय कि पछाऊं नई बैठ सकत? का उनको रुपैया बड़ो और हमाओ छोटो है? हमें सोई किराया देने। मुफत में नई जानें। न हमाऔं रुपैया चउदा आना मा चलनें? सोला आना मा नन्ना को चलनें, सो सोलई आना मा हमाओ रुपैया चलहै। हम काये आगे नई बैठ सकत? पैले जो बताव?
कंडक्टर : हम तुमसे फालतू बहस नई करो चाहत। दिमाग न खाव। सूदे पीछे चली जाव।
मखनिया : तौ लेव अब मोय आंगेई बैठनें। हमने कै दई, आगे आए हैं सो आंगेई बैठहैं। हम काऊ से कम हैं का?
नन्ना : (नन्ना का बस में प्रवेश) नई बेटा! तुम आराम से आगे बैठो। पीछे काये जाव। आगे आई सो आगे बैठो। हम को कऊ बैठ जैहैं। का फरक परत। पहुंचने तो एकई साथ, एकई टेम पे है।
मखनिया : हम सब जानत। हम औरत आंय, छोटी जात की आंय। पढ़ी-लिखी न होयं। अच्छा उन्ना-लत्ता नई पैनें। गरीब हैं। बताओ नई जानत। सो हमैं पीछे बैठो। चइये। जो बड़ी जात के इज्जतदार होयें, पढ़े-लिखे बड़े आदमी होयें, सो गरीबन्ह का उठा कैं आगे बैठें। जोई आय मतलब?
नन्हा : जो बात न होय बेटा। हम असल पै जा बस से रोज जात, सो कंडक्टर साहब हमैं अच्छे से चीनत-जानत। ऐईसे हमाये लाने आगे की सीट रखा लई ती। इमें छोटे-बड़े की कछू बात न होय। तुम आराम से बैठो। हमें तो खुशी है।
मखनिया : हम जानते हैं कि आपका औ सब लोगन का कित्ती खुसी है। आपकी जेई खुसी के लाने तो हम आगे बैठ गए, औ उठे नईं। हमें पतो है कि आपको सबसे ज्यादा खुसी भई हुई है। न भई होय तो हम अबै पीछे चले जात।
नन्हा : नई-नई। तुम उतई बैठो। हमैं तो आतमा से खुशी है। हमें कछु फरक नई परत।
मखनिया : फरक नन्ना इत्तो परत कि तुम आव बामन, सो सबके ऊपर आप की जागा है। हम जात की अहीर-दउवा आंय सो हमाई जागा सबसे नैचे कहाई। आप औरें जो करौ सो सब सोहत। औ हम तनक लैन छोड़े सो बेजा कहाउत।
नन्ना : एसो कछू नई आय। बस-गाड़ी पे काये को ऊंच-नीच। काये को गरीब अमीर। जो पइसा देय सो बराबरी से बैठे। गाड़ी तो सबके लाने आय।
कंडक्टर: लो, साहब आ गये, इन्हैं ऊ आगे बारी सीट पै बिठाओ।... पंडत जी आप तो एकदम ड्राईवर की बाजू वाली सीट पै निकर जाव। होई बैठो।
हेडमास्टर : अच्छी बात है (बस में चढऩे के बाद)... आज नन्ना काये पछाऊं मुंह लटाकये बैठें? कछु गप-शप नई हो रहई?
एक यात्री : अबै तक गप्पई आय हो रई तो। मजबूरी म आय उतै बैठे। येई से तो मों लटको।
नन्ना : देखो यार, तुम ओरैं फालतू की बातें न करे करौ। जहां सींक न जाय उतै मूसर घुसेड़बे की का जरूरत? इतै बैठे कि उतै बैठे। ईमे का मजबूरी आ गई। आपस में लड़ाए से का फायदा मिलने?
यात्री : आपकों औ ई बाई को का अपसाना। बे कऊं की औ आप कऊं के। आपकी ऊकी कहा-सुनी भई, सो हमने भी तनक सी कै दई। बुरई लगी होय तो हम कान पकरत। लड़ाबे की तौ कछू बातई नई आय।
हेड मास्टर : का हो गओ नन्ना? आज कछू है तो गड़बड़।
मखनिया : हम बताउत। हमसे पूछो। हम आज उनकी सीट पै आगे बैठ गए सो उनकी बेइज्जती हो गई। इत्ती बात आय।
हेड मास्टर : हां, है तो बेजा। नन्ना रोजई ऊ सीट पै बैठत ते। सयाने-बूढ़े हैं। बामन हैं। सब उनको मानत भी हैं। कई बार तो उनै देख के लोग उठ जात।
नन्ना : भइया, मैं कऊं नई कहत कि मौं बामन हौं। इज्जतदार हौं। बड़ौ आदमी हौं। जा कहकै मोई मखौल काय उड़ा रहे?
हेड मास्टर : नई बाई। करो तो तुमने बेजा है। कंडक्टर ने तुमै बताओ तो हुइ है?
कंडक्टर : मैंने तो ऐन बताओ। समझाई कि बाईं पछाऊं सीट खाली है। चली जाव। नन्ना को बैठने। पै जा विधाता ऐसी जबर्दस्त निकरी कि नन्ना खां भी दस ठो सुना दई। वे भी चुप रै गये।
नन्हा : ऐसी कछु बात नई आय। हम तो खुस हैं। हमैं काये की बुराई? सब बराबर हैं। ऐसी जांगन पै जात-पांच की बातैं न करो चइये। काये साहब?
मखनिया : साहब से नई, हमसे पूछो। सबके भीतर ऊंच-नीच को भाव भरो है। बाहर कछू, भीतर कछू। हम इतै बैठ गए, सो सबको अचरज हो रओ। अनरथ लग रओ। मखनियां आगे नन्ना पाछे? लोगन का सहन नई होत।
नन्ना : हम तौ अपनी आत्मा से कै रहे कि हमें कछु बुराई नई आय। जात-पांत से का हो? आदमी जात-पांत से छोटो-बड़ो नई होत। आचार-विचार से होत। अकेले लिहाज-कायदा तो करो चइये। जा तो मनुष्यता आय।
मखनिया : जेई तो हम कै रहै। सब लोग दो मुंही बातैं करत। चाहे नन्ना होयं, चाहे साहब होयं, चायें कोऊ।
नन्हा : अब ईमें दो मुंही का हो गई?
मखनिया : आप हमैं नई चीनत। हम आपका चीनत। हम मंडला के गबडू दउआ की बहू आंय। गनेशी की घरवारी। मखनिया।
नन्हा : ओ, अच्छा...ऽऽऽ। तुम गबड़ू की बहू आव? मैं तो तमाये घरे दो बेरै चाय पी चुकौ। एक बेरा गनेशा ने मोको थैला भर के बेर लाके दये ते। तुम्है याद है?
मखनिया : सब याद है। हमें तो बा सोई याद है जबै आप अम्बेदकर जयंती म भासन करबे आये ते। सरपंच हते संगै।
नन्ना : हां-हां,  रात मं देर हो गई ती, तो सब जने बरगद के नैचे सोये ते। औ उतई भटा-गकरियां खाई ती।
मखनिया : जो तो हमें पतो नईं। बाकी भासन में आपने कई ती कि औरतें आगे आएं, बढ़ैं, काम संभारैं, तबई सबकी तरक्की हो पाहैं। देश को भलो हुई है और अम्बेदकर जी की आत्मा को सांति मिलहै। काऊ से डरबे की, पीछे रहबे की जरूरत नई आय। हम सबकी मदद करबी।
नन्ना : हां-हां। कही ती। रोज कहत। हमाओ तो अटल विश्वास है कि जब तक हमाये देश की औरतें हिम्मत से आगे न आहें, पढ़-लिखकै सब काम न करहैं, घूंघट काढ़ कै चूल्हो-चक्की करत रैहैं, तब तक कछू नई होने। जबरा औ बेईमान शोषन करत रैहैं। कछू कल्याण नईं हो सकत।
मखनिया : भासन मा, सम्मेलन मा जे सब कहत। उपदेश करत। औ बस पै हम आगे बैठ गये तो सबकी छाती मा जलन होत। हमाई हंसी ठिठोली करत। जेई तो दो मुंही बातें आएं।
नन्ना : अब तो तुम चिन्हार-जनार की, घर की बहू-बिटिया कहाय गईं। तुमैं ऐसो न कओ चइये। हमने तो कई नई कि तुम पाछे जाव। आगे न बैठो। हम आगये तो तुम उठ जाव। फिर जा नाहक की गऊ हत्या हमारे ऊपर काये लगा रई।
मखनिया : गऊ हत्या नई लगा रये। सांसी कै रये। सो भीतरई-भीतर सबको चींटा आय लग गओ। ऊपर से कछु कओ। अब देखो बै साहब जौन आठ-आठ दिना अपने दफ्तर से गायब रहत, इनने बस पै चढ़तई-कैसी बातें करीं तीं?
हेड मास्टर : हमैं न समेटो बाई। हमने का बेजा कई ती?
मखनिया : नन्ना तो उतै बैठे देख कै आपको अचरज न भओ तो? अपन तो पढ़े लिखे, शिक्षक आव। साहब हौ। सबको ज्ञान-शिक्षा देत। आपको तो इतै एक औरत को बैठे देखकै खुसी भओ चइये। एक औरत ने ऊ सीट पै बैठबे की हिम्मत तो करी। कंडक्टर से अपने हक के लाने लड़ी। छाती फूलो चइये। फूलबे की जागा, सबकी छाती फटन लगीं। आतमा पै हाथ धर कै ईमानदारी से सब जने बताओ कि हम का गलत कै रये?
नन्ना : हम तो तुमाई तारीफई कर रये। इत्ती बातें करबे को साहस तौ तुमपै आवो। आगे बैठबे की हिम्मत तो करी। जा भावना तौ जागी कि सबको बरोबर को हक है। कोऊ छोटी-बड़ो नई होत। दादा-गिरी अलग बात है।
मखनिया : नन्ना। हम तो अब तुमाई बहू बरोबर है। आप हमाये पूज्ज हौ। कहौ तो हम आपखां सिर पै बैठाये। आपके चरनन पै सिर धर दें। हमैं कछू बुराई न होय। पै इत्तो ईमानदारी से कहौ कि जब हम आगे की सीट पै बैठ गए ते, औ कंडक्टर के कये से आपके आए पै भी सीट छोड़बे से मना कर दओ तो, तौ आपको भीतर से बुरौ न लगो तो? सांची-सांची कहौ भगवान की कौल करके। आपको मौं बेगर गओ तो। चेहरा उतर गओ तो। भीतरई भीतर गुस्सा सोई आ गई ती। सांची कहौ नन्ना, संकोच न करियो।
नन्ना : देखौ बेटा, इन बातन पै न जाव। मन बेगरो कि नहीं, ई बताबे के लाने भगवान की कौल-कसम कराबे की जरूरत नई आय। परिवर्तन एक दिन मा नई होत। दुनिया मा सब तरां के लोग होत।
मखनिया : दुनिया की नई, हमतो तुमाई आय के रये। काय, आप तो सब जागा भासन देत। दलितन का जगाउत। औरतन का समझाउत। नियम-कायदा बताउत। पै आप मा सोई बा बात नई आय। सम्मेलन मा कछू, और घर-बाहर कछू। साहब हरन की तौ खैर का कहने।
नन्ना : तुम कछू कहो, पै हम छूत-छात, ऊंच-नीच नई मानत। सबकै घरै खात-पियत। सबका अपने घरै खबाउत। मौका परत तो सबके लाने लड़ाई भी लरत। बाकी, सबको ठेका तो कोऊ नईं ले सकत।
मखनिया : सबको छोड़ो, आदमी अपनोई ठेका लै ले तो भौत है। अब उत्तरप्रदेश बिहार म औरते मुख्यमंत्री बन गई सो काऊ को अच्छो लगो का?
हेड मास्टर : अच्छो लगै-चहै न लगै, राज तो उन्हें मिलई गओ।
मखनिया : मिल गओ कि सबने मिलकै सौंप दओ? ओई पै लोग हंसी उड़ा रये।
नन्ना : को हंसी उड़ा रओ? उड़ाउत हैं तो उड़ाउन दो। ऊकी का फिकर करने।
मखनिया : फिकर होत है नन्ना, लोग ओछी बातें करत तो मन को कलेश होत। काल गांव मा बिलात लोग कै रये ते कि अब घोर कलजुग आ गओ। दउवा, लोधी, दलित जात के हांतन राज चलो गओ। बिहार मा पती गओ सो पतनी आ गई। जे ऊंठा छाप कैसे राज करहैं। सत्यानास होने।
नन्ना : दुनिया में हर तरा के लोग होत बाई। भांत-भांत की बातें होतीं। उनमें भजा लओ, चइये। बुरओ न मानो चइये।
मखनिया : आदमी ऊंठा छाप हों, बड़े लोग ऊंठा छाप होंय, चाय जित्ते बेगारें बनायें, ऊकी चर्चा कोऊ नहीं करता। पंचात बनी हमाये इतै। सब बड़े लोगन ने हतिया लओ। दुनियाभर को भ्रष्टाचार मचो। न कोई सुनै, न दैखे। अब कोऊ औरत सरपंच बनी होती और जेई करती तौ हजार जीभन से बढ़-चढ़ कै बातैं होतीं।
हेड मास्टर : का भ्रष्टाचार हो गओ बाई तुमाई पंचायत मा?
मखनिया : गांव के गरीब-दलित लोगन के नाम पे बिजली, सडक़, अस्पताल, कुआं, खेती, स्कूल, अनाज, पंप सबको पइसा आओ। कलट्टर साब ने पहुंचाओ। सब बड़े लोगन ने बांट लओ। अपने घरन पै धर लओ। गांव ऊंसई का ऊंसो नरक बनो हैं। कोऊ सुनइया नई आय। एक दिना औरतन को जुलूस निकरो, सो गांव मा हाहाकर मच गओ। बड़े लोगन ने कई कि जे अनरथ के लच्छन आयं। कलजुग आ गओ। तबईं तो औरतें लरबे निकर परीं।
हेड मास्टर : हमैं जानकारी नई आय।
मखनिया : आपका जानकारी कहां से होय। आप ओरन की सामिलात से तो सब हो रओ। औरतें अपनी तकलीफ बतायें तो अनरथ हो जात और आप कै रये कि औरतें आगे बढ़ैं।
नन्ना : तुम्हाये भीतर जा भावना आ गई, जेई तो जागरन को लच्छन आय। जेई भावना से ताकत बढ़त। आज हमें तुमाई बातें सुनके आत्मा से खुसी भई। तुम सबका समझा कै औरतन को संगठन बनाओ।
मखनिया : हमाओ बस चलै तो हम घर-घर मुखमंत्री बना दें औरतन खां। सबकी नौकरी लगा दें। हर गाड़ी-बस मां आगे की सीटें गरीबन, दलितन, औरतन का रिजर्व करा दें। सरकारी पइसा से गांवन का चमका दें। पै आदमियन के मारे ‘न नौ मन तेल होन, न राधा को नाचने।’ कलजुग मा सतयुग नई आ सकत। बातें भले करौ।
नन्ना : आहै बाई, आहै। धीरत धरौ। भगवान के घरै देर है, अंधेर नई आय।
मखनिया : अब तो भगवान पै भी विस्वास नई रओ नन्ना! भगवान होते तो बेईमान मजा मारते? बेईमानी इत्ती फैलती? गरीबन दलितन खां इत्ते दुख-अपमान सहने परतो? गांवन का जीवन तो नरक है नरक। जो रहत, सोई जानत। दांतन के बीच मां जीभ जैसो।
नन्ना : मैं जानत हौं गांव को हाल। गांव मा, गांव बारन के बीचई मा मोरी जिन्दगी बीती। पचास साल में परिवर्तन तो भओ है। पै उत्तो नई भओ, जित्तो भओ चइये। आगे और हुईहैं।
हेड मास्टर : परिवर्तनईं को प्रभाव आय कि तुम बाई इत्ती बातें कै रई। तनक विचार करौ कि का दस-पन्द्रा साल पैलें ऐसी कै सकत तीं। जबान न खुलत ती। घूंघट न खुलते।
नन्ना : परिवर्तन तो है। स्कूल, बिजली, पानी, अस्पताल, सडक़, कई जागा बन गईं। पंचायत से काम होन लगो। हां, ईमानदारी अवस चली गई। बिकास भऔ, तो बेईमानी को बिकास भी खूब भओ। बेईमानी की जगा ईमानदारी आजाती तो फिर पूरो प्रभाव दिखतो। बेईमानी ने सब लील लओ। कई गांव तो ऊंसई हैं अबै, जैसे पचास साल पैलऊं हते।
मखनिया : बेईमानी ने पइसा और विकास तो खाई लओ, भलमनसाहत सोई चली गई। आदमी-आदमी को दुश्मन हो गओ। सब समेटबे मा लगे। तबई तो पूरे देश पे इत्तो भ्रष्टाचार मचो है।
हेड मास्टर : अखबार, टी.वी. जहां देखो, उतई, जेई-जेई की बातें, भ्रष्टाचार की बाढ़ सी आ गई। कोऊ साफ नई देखात। परदा के पछाऊं सबई नंगे हैं। अदालत रोज खिंचाई कर रई। बहुत से तो जेलन म परै औ कछू जाबे की तैयारी कर रये।
नन्ना : जेई से हम कै रये कि आदमी सब भ्रष्टा है तो औरतें आगे आके सब संभारे। आदमियन खां ठीक करें। तबई विकास हुईहंै। तबई कल्याण हुइहैं। खाली बतान से कछू नई होनें। औरतें तो ईमानदार हैं। बे सब कर सकतीं।
मखनिया : लो, बातन-बातन मा हमाओ ठिकानो सोई आ गओ। हम जा रये। कछू बेजा कही-सुनी होय तो नन्ना हमें माफ करिओ। अब कोऊ और बैठक मा भेंट हुइ है तबई बातैं करहैं। हमने तो पक्की गांठ बांद लई। (क्लीनर की सीटी) बस रुकने की आवाज। मखनियां तथा और यात्रियों के उतरने की खटपट)।
कंडक्टर : ये बाई, किराओ तो देत जाव। आगे की सीट पै बैठीं, और किराओ भी गोल। ऐसी जबरई?
मखनिया : जब नन्ना और साहब से किराओ नई लअओ, तौ हमसे काय लै रये? जेई तो भेदभाव आय। जेई गुस्सा पैदा करत। ई में काये की जबरई? एक से लेव, एक से न लेव, जो कैसो नियम आय?
नन्ना : जाव बाई जाव। हम दै दैहें किराओ। चलो, कंडक्टर साहब चलो।
मखनिया : अपुन काय दैहो हमाओ किराओ? हमें तो देनई है। हम तो ऊकी असलियत आय बता रये ते। लो, संभारी अपनो किराओ। सबको राम-राम। (जाने की आवाज)।