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Tuesday 21 Nov 2017

दुश्मन से संवाद (2)

राधेलाल बिजघावने
मैं मौत से संवाद करना चाहता हूं

पर मौन रहती है
वह संवाद नहीं करती।

दुश्मन से संवाद

मैं दुश्मन से संवाद नहीं करना चाहता
फिर भी यह मुझसे बतियाता है
और मुझे दुश्मन में बदल देता है।

मैं दुश्मन को देखना नहीं चाहता
फिर भी वह मेरी आंखों में निगाहें डाल
मुझसे बतियाता है।

मैं दुश्मन को भोजन नहीं खिलाता
फिर भी वह मेरी भोजन की थाली में आकर बैठ जाता है
और सारा खाना खा जाता और पानी पी जाता है।

मैं अपने घर, घरेलूपन में
दुश्मन को प्रवेश करने नहीं देता
फिर भी वह खिड़की दरवाजों दराजों से प्रवेश कर
मेरे कमरे और बिस्तर पर पसर जाता है।

मैं दुश्मन को आत्मीय संवेदनों के खेत में नहीं बुलाता
फिर भी वह बीज बनकर खेत में उग जाता है
और दुश्मनी की लहलहाती फसल बन जाता है।

मैं दुश्मन को अपनी नींद सपने में आने नहीं देता
फिर भी वह चुपचाप मेरे मौलिक आचरणों, सोच-विचारों में
आकर मुझे डराता है।
मैं दुश्मन को अपनत्व के बगीचे में प्रवेश करने नहीं देता
फिर भी वह मुस्कुराते फलों में आकर बैठ जाता है
और लकड़बग्घे सा हंसता खिलता है।
मैं दुश्मन को बार-बार अंधेरे में ढकेलता हूं
फिर भी वह चुपचाप उठकर मेरे जेहन में आकर
बैठ जाता है।

हत्यारे
कहां नहीं है हत्यारे
हवा पानी और मिट्टी में मौजूद है हत्यारे
मौजूद हैं हत्यारे हत्याओं के इरादों और मानसिकता में।

हत्यारे घर परिवार समाज संस्कृति में
हंसी खुशी स्नेह प्रेम के आत्म संवेदनों में रहते हैं
और उनकी इच्छाओं आकांक्षाओं संभावनाओं की हत्याएं करते हैं।

हत्यारों की कोई भाषा शब्द शैली नहीं होती
वे अपने आक्रोश विरोधी तेवरों से हत्याएं करते हैं
और निरपराधी बने रहते हैं।

हत्यारों का कोई चरित्र नहीं
हत्यारे अपना चरित्र आचरण विचार विवेक बुद्घि
जमीन में दफन कर देते हैं

हत्यारे सभी की रचनाओं आकांक्षाओं और इरादों में मौजूद
होते हुए चुपचाप हत्याएं करते हैं।

हत्यारे दवाओं, इलाजों, रोटियों, पानी के गिलास में
मौजूद होते हैं
और बिना हथियारों के ही हत्याएं करते हैं।
हत्यारों की कोई आचार संहिता नहीं होती
वे कानूनी दावपेचों से सदा बचे रहते हैं।

हत्यारे अपना हत्यारापन
सभी को बांटते रहते हैं।
हत्यारों का कोई लोकतंत्र और जनतंत्र नहीं
वे स्वतंत्र रहकर हत्याएं करते हैं।
हत्यारों के घर परिवार नहीं होते
वे शकों, संदेहों और इरादों में रहते हैं।