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Friday 24 Nov 2017

मौत से संवाद (1)

राधेलाल बिजघावने
 ई-8/73, भरत नगर, अरेरा कॉलोनी, शाहपुरा,
भोपाल-462039,
मो. 9826559989
मौत से संवाद

मैं हंस खिलकर मौत से संवाद करना चाहता हूं
पर मौत भाषा शब्द हीन और मौन है
वह किसी से संवाद नहीं करती।

मुझे जिस तरह की खुशनुमा ज़िंन्दगी पसंद है
मौत उससे कहीं ज्यादा ही पसंद है
वह जीवन की तमाम परेशानियों, संकटों, झंझटों
दु:खों, तनावों से हमेशा के लिए मुक्त कर देती है।

मैं जानता हूं
मौत का कोई घर और घरेलूपन नहीं होता
वह हर जगह हत्या आतंकवाद खतरों डर हादसों से मौजूद होती है
होती है मौजूद
दुखों, पीड़ाओं, घटनाओं, दुर्घटनाओं में।

मौत दिन और रात का समय नहीं देखती
वह बिना सूचना के कभी भी आ जाती है।

मौत के लिए कोई स्वागत द्वार नहीं बनाता
नहीं मनाता खुशियां उसके आगमन पर
मौत आने पर सभी दुख शोक मनाते हैं
हंसना गाना नाचना भूल जाते है।

मौत हंसती हुई आती है
उदासी निराशा शोक संतप्त संवेदनाएं छोड़ जाती है

मौत की कोई उम्र नहीं होती
वह कभी बूढ़ी बीमार नहीं होती
उसका कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता
मौत सीधे पांव आती है
और उल्टे पैर लौट जाती है।

मौत का कोई चरित्र नहीं होता
उसके पास अपना $खौफ और डर होता है
जो दिन रात लकड़बग्घे सा हंसता रहता है